1. पहला व्यायाम
पहले व्यायाम को बुद्ध सहस्त्र हस्त प्रसार कहा जाता है। नाम के अनुसार, यह ऐसा है जैसे सहस्त्र-भुजाओं वाले बुद्ध या सहस्त्र-भुजाओं वाली बोधिसत्त्व अपनी भुजाएँ फैला रही हो। निश्चित ही, हमारे लिए हजार क्रियाएँ करना संभव नहीं है—आप उन्हें स्मरण नहीं रख पाएँगे, और उन्हें करने से आप थक जाएँगे। इस व्यायाम में हम उस विचारधारा को दर्शाने के लिए आठ सरल, आधारभूत क्रियाओं का उपयोग करते हैं। सरल होते हुए भी ये आठ क्रियाएँ हमारे शरीर की सैकड़ों नाड़ियों को खोलने में सक्षम होती हैं। मैं एक बात समझाता हूँ: हम क्यों कहते हैं कि आरंभ से ही हमारा अभ्यास बहुत उच्च स्तर से शुरू होता है? क्योंकि हम केवल एक या दो नाड़ियाँ, “रेन और दू” नाड़ियाँ, या आठ “अतिरिक्त नाड़ियाँ” नहीं खोलते। बल्कि, हम सभी नाड़ियाँ खोलते हैं, और वे सभी आरंभ से ही एक साथ गति करती हैं। इसलिए हम पहले से ही बहुत उच्च स्तर पर अभ्यास आरंभ करते हैं।
यह व्यायाम करते समय आपको शरीर को खींचना और ढीला छोड़ना होता है। हाथों और पैरों का अच्छी तरह समन्वय होना चाहिए। खींचने और ढीला छोड़ने से शरीर में जहाँ शक्ति अवरुद्ध होती है वे क्षेत्र खुल जाते हैं। निश्चित ही, यदि मैं आपके शरीर में यंत्रों का एक संग्रह स्थापित न करूँ तो क्रियाओं का कोई प्रभाव नहीं होगा। जब आप खिंचाव करते हैं, तो पूरा शरीर धीरे-धीरे अपनी सीमा तक विस्तारित होता है—यहाँ तक कि आपको ऐसा अनुभव हो सकता है जैसे आप दो भागों में विभाजित हो रहे हों। शरीर ऐसे विस्तारित होता है जैसे वह बहुत ऊँचा और विशाल हो गया हो। कोई मनोभाव प्रयोग नहीं किया जाता। जितना हो सके उतना विस्तारित करने के बाद शरीर को तुरंत ही ढीला छोड़ देना है— जितना हो सके उतना विस्तारित करने के बाद तुरंत ही ढीला छोड़ दें। ऐसी क्रिया का प्रभाव हवा से भरे चमड़े के थैले जैसा है: दबाने पर उसकी हवा बाहर निकलती है; जब व्यक्ति थैले से हाथ हटाता है, तो हवा वापस खींच ली जाती है और नई ऊर्जा अंदर भर ली जाती है। इस यंत्र के कार्य के द्वारा शरीर के अवरुद्ध क्षेत्र खोले जाते हैं।
जब शरीर को खींचा जाता है, एड़ियाँ बल लगाकर नीचे दबाई जाती हैं और सिर को ऊपर की ओर खींचने के लिए बल लगाया जाता है। ऐसा लगता है जैसे आपके शरीर की सभी नाड़ियाँ खुलने तक खिंच रही हों और फिर अचानक ढीली हो रही हों—खींचने के बाद आपको तुरंत ही ढीला हो जाना चाहिए। इस प्रकार की गतिक्रिया से आपका पूरा शरीर तुरंत ही खुल जाता है। निश्चित ही, हमें आपके शरीर में विभिन्न यंत्र भी स्थापित करने होते हैं। जब भुजाएँ फैलायी जाती हैं, तो उन्हें धीरे-धीरे और बलपूर्वक अपनी सीमा तक फैलाना होता हैं। दाओवादी पद्धति तीन यिन और तीन यांग नाड़ियों में ऊर्जा प्रवाह करना सिखाती है। वास्तव में, केवल तीन यिन और तीन यांग नाडियाँ ही नहीं होती, बल्कि भुजाओं में सैकड़ों आड़ी-तिरछी नाडियाँ भी होती हैं। उन सभी को खींच कर खोलना और अवरोधमुक्त करना होता है। हम अपने अभ्यास के आरंभ में ही सभी नाडियाँ खोल देते हैं। साधारण साधना मार्गों में से, सच्चे मार्ग—अर्थात वे नहीं जो ची का उपयोग करते हैं—एक ऊर्जा नाड़ी के माध्यम से सैकड़ों नाड़ियों को गति में लाने की विधि का उपयोग करते हैं। इन अभ्यासों को सभी नाड़ियों को खोलने में बहुत लंबा समय—अनगिनत वर्ष—लगते हैं। हमारा अभ्यास आरंभ से ही सीधे सभी नाड़ियों को खोलने का लक्ष्य रखता है, और इसी कारण हम बहुत उच्च स्तर पर अभ्यास आरंभ करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को इस मुख्य बिंदु को समझना चाहिए।
अब मैं खड़े होकर की जाने वाली मुद्रा के बारे में बताऊँगा। आपको पैरों को कंधों की चौड़ाई जितना रखकर स्वाभाविक रूप से खड़ा होना है। पैरों का समानांतर होना आवश्यक नहीं है, क्योंकि यह युद्ध-कला नहीं हैं। अनेक अभ्यासों की खड़े होकर की जाने वाली मुद्राएँ युद्ध-कला की अश्व मुद्रा से उत्पन्न हुई हैं। चूँकि बौद्ध पद्धति सभी प्राणियों का उद्धार चाहती है, इसलिए आपके पैर हमेशा भीतर की ओर मुड़े हुए नहीं होने चाहिए। घुटने और कूल्हे शिथिल रहते हैं, घुटने हल्के मुड़े रहते हैं। जब घुटने हल्के मुड़े हुए होते हैं, वहाँ की नाड़ियाँ खुली हुई होती हैं; जब आप सीधे खड़े होते हैं, वहाँ की नाड़ियाँ अकड़ी हुई और अवरुद्ध होती हैं। शरीर सीधा और शिथिल रखा जाता है। आपको भीतर से बाहर तक पूरी तरह शिथिल होना चाहिए, पर अत्यधिक ढीला नहीं होना चाहिए। सिर सीधा रहना चाहिए।
पाँचों व्यायाम करते समय आँखें बंद रखनी होती हैं। लेकिन जब आप क्रियाएँ सीख रहे हों तो आँखें खुली रखनी चाहिए और देखना चाहिए कि आपकी क्रियाएँ सही हैं या नहीं। बाद में, जब आपने क्रियाएँ सीख ली हों और स्वयं अभ्यास कर रहे हों, तब व्यायाम आँखें बंद करके करने चाहिए। जीभ की नोक तालु को स्पर्श करनी होती है, ऊपर और नीचे के दाँतों के बीच अंतर रखा जाता है, और होंठ बंद रहते हैं। जीभ से तालु को क्यों छूना चाहिए? जैसे कि आप जानते होंगे, वास्तविक अभ्यास में केवल सतही, त्वचा-स्तर की ब्रह्मांडीय परिपथ ही गति में नहीं होती, बल्कि शरीर की प्रत्येक नाड़ी जो लंबवत या क्षैतिज रूप से काटती है, गतिमान होती है। सतही नाड़ियों के अतिरिक्त, आंतरिक अंगों की और आंतरिक अंगों के बीच में भी नाड़ियाँ होती हैं। मुख रिक्त होता है, इसलिए वह एक आंतरिक सेतु बनाने के लिए उठी हुई जीभ पर निर्भर करता है, जिससे नाड़ियों की परिक्रमा के दौरान शक्ति प्रवाह सुदृढ़ होता है और शक्ति जीभ के माध्यम से एक परिपथ बना सकती है। बंद होंठ बाह्य सेतु का कार्य करते हैं जिससे सतही शक्ति परिक्रमा कर सके। हम ऊपर और नीचे के दाँतों के बीच अंतर क्यों रखते हैं? क्योंकि यदि व्यायाम के दौरान आपने दाँत भींचे, तो शक्ति अपनी परिक्रमा में उन्हें अधिक और अधिक भींच देगी। शरीर का जो भी भाग तनावग्रस्त होता है वह पूरी तरह रूपांतरित नहीं हो सकता। इसलिए जो भाग शिथिल नहीं है वह अंततः छूट जाएगा और रूपांतरित या विकसित नहीं होगा। यदि आप दाँतों के बीच अंतर छोड़ते हैं तो ऊपर और नीचे के दाँत शिथिल हो जाएँगे। ये व्यायामों की मूल आवश्यकताएँ हैं। तीन और क्रियाएँ हैं जो आगे अन्य व्यायामों में दोहराई जाएँगी। मैं उन्हें यहाँ समझाना चाहता हूँ।
श्वांग शोउ हेशी (छाती के सामने दोनों हाथों को जोड़ना)। हेशी करते समय बाहें सीधी रेखा बनाती हैं और कोहनियाँ उठी हुई रहती हैं जिससे बगलें खुली रहें। यदि बगलें कसकर दबा दी जाएँ, तो वहाँ ऊर्जा-मार्ग पूरी तरह अवरुद्ध हो जाएँगे। उँगलियाँ चेहरे के सामने तक नहीं उठती, बल्कि केवल छाती के सामने रहती हैं। उन्हें शरीर से न लगाएँ। हथेलियों के बीच रिक्त स्थान रखा जाता है, और हथेलियों को नीचे से जहाँ तक हो सके एक-दूसरे के साथ दबाना चाहिए। आप सभी को यह स्थिति स्मरण रखनी चाहिए, क्योंकि यह कई बार दोहराई जाती है।
दाइ कोव श्याओ फु (निचले उदर के सामने हाथों को एक-दूसरे पर रखना)। कोहनियाँ बाहर की ओर रहनी चाहिए। व्यायामों के दौरान आपको कोहनियाँ बाहर की ओर रखनी होंगी। हम इसको उचित कारण से महत्व देते हैं: यदि बगलें खुली नहीं होंगी, ऊर्जा अवरुद्ध हो जाएगी और प्रवाहित नहीं हो सकेगी। इस स्थिति में पुरुषों का बायाँ हाथ भीतर रहता है; स्त्रियों का दायाँ हाथ भीतर रहता है। हथेलियों को एक-दूसरे को नहीं छूना चाहिए—उनके बीच एक हथेली की मोटाई जितनी दूरी रखी जाती है। भीतरी हाथ और शरीर के बीच दो हथेलियों की मोटाई जितनी दूरी रखी जाती है; हाथ को शरीर को छूने न दें। क्यों? जैसा कि हम जानते हैं, अनेक आंतरिक और बाहरी नाड़ियाँ होती हैं। हमारे अभ्यास में हम उन्हें खोलने के लिए फा चक्र पर निर्भर करते हैं, विशेष रूप से आपके प्रत्येक हाथ के लाओगोंग
बिंदु को खोलने के लिए। वास्तव में, लाओगोंग बिंदु एक क्षेत्र है जो केवल इस शरीर में ही नहीं, बल्कि अन्य आयामों के हमारे शरीर के सभी अस्तित्व-रूपों में भी विद्यमान है।). — उसका क्षेत्र बहुत विशाल होता है, और इस शरीर के हाथों की सतह से भी अधिक होता है। उसके सभी क्षेत्रों को खोलना होता है, इसलिए हम यह कार्य करने के लिए फा चक्र पर निर्भर करते हैं। हथेलियों को दूर रखा जाता है क्योंकि उन पर, दोनों हथेलियों पर, फा चक्र घूमते हैं। व्यायामों के अंत में जब हाथ निचले उदर के सामने एक-दूसरे पर रखे जाते हैं, तो उन की ऊर्जा बहुत शक्तिशाली होती है। दाइ कोव श्याओ फु का दूसरा उद्देश्य निचले उदर में फा चक्र और अमृत-क्षेत्र (दान-त्येन)
दोनों को सुदृढ़ करना है। इस क्षेत्र में बहुत सी वस्तुएँ—दस हजार से भी अधिक—विकसित होंगी।
एक और स्थिति होती है जिसे जी दिंगयिन कहा जाता है। संक्षेप में हम इसे जेयिन (हथेलियों को जोड़ना) कहते हैं। जुड़ी हुई हथेलियों को देखें: इसे ऐसे ही नहीं किया जाता। अंगूठे उठे हुए होते हैं, जिससे अंडाकार आकार बनता है। उँगलियाँ हल्के से जुड़ी रहती हैं और नीचे वाले हाथ की उँगलियाँ ऊपर वाले हाथ की उँगलियों के बीच के स्थानों के ऊपर स्थित रहती हैं। यह इसी प्रकार किया जाता है। हथेलियाँ जोड़ते समय पुरुषों के लिए बायाँ हाथ ऊपर रहता है, जबकि महिलाओं के लिए दायाँ हाथ ऊपर रहता है। ऐसा क्यों? क्योंकि पुरुष शरीर पूर्ण रूप से यांग का होता है और स्त्री शरीर पूर्ण रूप से यिन का। यिन और यांग का संतुलन प्राप्त करने के लिए, पुरुषों को यांग को दबाना और यिन को प्रकट करना चाहिए, जबकि महिलाओं को यिन को दबाना और यांग को प्रकट करना चाहिए। इसलिए कुछ क्रियाएँ पुरुषों और महिलाओं के लिए भिन्न हैं। हाथ जोड़ते समय कोहनियाँ उठी रहती हैं—उन्हें बाहर की ओर होना चाहिए। जैसा कि आप जानते होंगे, अमृत क्षेत्र का केंद्र नाभि से दो उँगली नीचे है। यही हमारे फा चक्र का केंद्र भी है। इसलिए जोड़े हुए हाथों को फा चक्र धारण करने के लिए थोड़ा नीचे रखना चाहिए। शरीर को शिथिल करते समय कुछ लोग हाथों को शिथिल करते हैं लेकिन पैरों को नहीं। पैरों और हाथों को साथ-साथ शिथिल करना और खींचना चाहिए।.
2. दूसरा व्यायाम
दूसरे व्यायाम को फालुन स्थिर खड़े रहकर की जाने वाली मुद्रा कहा जाता है। इसकी क्रियाएँ बहुत सरल हैं, क्योंकि केवल चार चक्र-धारण मुद्राएँ हैं। इन्हें सीखना सरल है, लेकिन यह एक चुनौतीपूर्ण और कठिन व्यायाम है। यह कठिन कैसे है? सभी खड़े होकर की जाने वाली मुद्राओं में लंबे समय तक स्थिर खड़े रहना आवश्यक होता है। हाथ लंबे समय तक ऊपर रखे जाने पर भुजाओं में पीड़ा होगी। इसलिए यह व्यायाम कठिन है। खड़े होकर की जाने वाली मुद्रा पहले व्यायाम जैसी ही है, पर इसमें खिंचाव नहीं होता है और आप केवल शरीर को शिथिल रखकर खड़े रहते हैं। चारों मूल मुद्राएँ चक्र धारण करने से संबंधित हैं। वे सरल हैं—केवल चार मूल मुद्राएँ—फिर भी यह महान मार्ग की साधना है, इसलिए ऐसा नहीं हो सकता कि प्रत्येक एकल क्रिया केवल किसी एक विशेष अलौकिक क्षमता या किसी छोटी वस्तु के विकास के लिए हो; प्रत्येक क्रिया में अनेक वस्तुएँ सम्मिलित होती हैं। यदि प्रत्येक वस्तु के विकास के लिए एक क्रिया आवश्यक होती तो यह उचित नहीं होता। मैं आपको बता सकता हूँ कि आपके निचले उदर में जो वस्तुएँ मैं स्थापित करता हूँ और हमारे साधना मार्ग में जो वस्तुएँ विकसित होती हैं, उनकी संख्या लाखों में है। यदि आपको प्रत्येक वस्तु के विकास के लिए एक क्रिया करनी पड़ती, तो कल्पना करें: लाखों क्रियाएँ करनी होतीं, और आप उन्हें एक दिन में भी पूरा नहीं कर पाते। आप स्वयं को थका देते, और संभव है कि आप उन सभी को स्मरण भी न रख पाते।
एक कहावत है, “महान मार्ग अत्यंत सरल और सुगम होता है।” व्यायाम समग्र रूप से सभी वस्तुओं के रूपांतरण को नियंत्रित करते हैं। इसलिए स्थिर साधना व्यायाम करते समय यदि कोई क्रिया ही न हो तो और भी अच्छा होगा। किन्तु सरल क्रियाएँ बड़े स्तर पर अनेक वस्तुओं के एक साथ रूपांतरण को नियंत्रित कर सकती हैं। क्रियाएँ जितनी सरल होती हैं, रूपांतरण उतना ही सम्पूर्ण होने की संभावना होती है, क्योंकि वे व्यापक स्तर पर सब कुछ नियंत्रित करती हैं। इस व्यायाम में चार चक्र-धारण करने वाली स्थितियाँ हैं। जब आप चक्र धारण करेंगे, तो अपनी भुजाओं के बीच एक बड़े फा चक्र का आवर्तन अनुभव करेंगे। लगभग प्रत्येक साधक इसे अनुभव कर सकता है। फालुन खड़े होकर की जाने वाली मुद्रा करते समय किसी को भी उन व्यायामों की तरह डोलने या कूदने की अनुमति नहीं है जहाँ ग्रसित करने वाली आत्माओं का नियंत्रण होता है। डोलना और कूदना अच्छा नहीं है—वह अभ्यास करना नहीं है। क्या आपने कभी बुद्ध, दाओ या देवता को इस प्रकार कूदते या डोलते देखा है? उनमें से कोई भी ऐसा नहीं करता।
3. तीसरा व्यायाम
तीसरे व्यायाम को ब्रह्मांडीय छोरों को भेदना कहा जाता है। यह व्यायाम भी बहुत सरल है। जैसा इसके नाम से स्पष्ट है, यह व्यायाम ऊर्जा को “दो छोरों” तक पहुँचाने के लिए है। इस असीम ब्रह्मांड के दो छोर कितने दूर हैं? यह आपकी कल्पना से परे है, इसलिए व्यायाम में विचार द्वारा निर्देशित करना सम्मिलित नहीं है। हम यंत्रों का अनुसरण करके व्यायाम करते हैं। इसलिए आपके हाथ उन यंत्रों द्वारा निर्देशित होते हैं जिन्हें मैंने आपके शरीर में स्थापित किया है। पहले व्यायाम में भी ऐसे यंत्र हैं। मैंने पहले दिन आपको इसका उल्लेख नहीं किया क्योंकि क्रियाओं से परिचित होने से पहले आपको इस अनुभूति की अपेक्षा नहीं होनी चाहिए। मुझे चिंता थी कि आप उन सबको याद नहीं रख पाएँगे। वास्तव में आप पाएँगे कि जब आप भुजाओं को खींचते और शिथिल करते हैं, तो वे अपने आप लौट आती हैं। यह आपके शरीर में स्थापित यंत्रों के कारण होता है, जिसे दाओवादी पद्धति में हस्त-गति यंत्र कहा जाता है। एक क्रिया समाप्त करने के बाद आप देखेंगे कि आपके हाथ अगली क्रिया करने के लिए अपने आप गतिशील होते हैं। जैसे-जैसे आपका व्यायाम समय बढ़ेगा, यह अनुभूति अधिक स्पष्ट होगी। ये सभी यंत्र आपको दिए जाने के बाद स्वयं आवर्तन करते रहते हैं। वास्तव में, जब आप व्यायाम नहीं कर रहे होते, तब फा चक्र के यंत्रों के कार्य से गोंग आपकी साधना कर रहा होता है। अगले व्यायामों में भी यंत्र हैं। इस व्यायाम की मुद्रा फालुन खड़े होकर की जाने वाली मुद्रा जैसी है। इसमें खिंचाव नहीं होता है, क्योंकि आप केवल शरीर को तनाव मुक्त रखकर खड़े रहते हैं। हाथों की दो प्रकार की क्रियाएँ हैं। पहली एक-हाथ से ऊपर-नीचे गति करने की क्रिया है, अर्थात एक हाथ ऊपर की ओर गति करता है जबकि दूसरा नीचे की और गति करता है—हाथ अपनी स्थितियाँ बदलते हैं। प्रत्येक हाथ की एक ऊपर-नीचे की क्रिया को एक गिना जाता है, और क्रिया कुल नौ बार दोहराई जाती है। आठ और आधी क्रिया पूरी होने के बाद नीचे वाला हाथ ऊपर गति करता है, और दोनो-हाथों वाली ऊपर नीचे की गति करने की क्रिया आरंभ होती है। यह भी नौ बार की जाती है। बाद में यदि आप अधिक बार करना और व्यायाम की मात्रा बढ़ाना चाहें, तो आप इसे अठारह बार कर सकते हैं—संख्या नौ की गुणक होनी चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि नौवीं बार के बाद यंत्र स्थिति बदलता है; उसे नौवीं बार पर स्थिर किया गया है। भविष्य में व्यायाम करते समय आप हमेशा गिन नहीं सकते। जब यंत्र बहुत शक्तिशाली हो जाएँगे, तो वे नौवीं बार पर स्वयं क्रियाएँ समाप्त कर देंगे। आपके हाथ स्वतः ही वापस आ जाएँगे, क्योंकि यंत्र अपने आप बदलते हैं। आपको गिनने की भी आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि यह सुनिश्चित है कि नौवीं ऊपर नीचे की गति करने की क्रिया समाप्त होने पर आपके हाथ स्वतः ही फा चक्र घुमाने के लिए चले जाएँगे। भविष्य में आपको हमेशा गिनना नहीं चाहिए, क्योंकि आपको व्यायाम विचार-मुक्त अवस्था में करना है। विचारों के साथ करना मोहभाव है। उच्च-स्तरीय साधना में कोई विचार प्रयोग नहीं होता—यह पूरी तरह विचार-मुक्त अवस्था में होता है। निश्चित ही, कुछ लोग कहते हैं कि क्रियाएँ करना स्वयं विचारों से भरा है। यह समझ उचित नहीं है। यदि वे कहते हैं कि क्रियाएँ विचारों से भरी हैं, तो बुद्धों द्वारा की जाने वाली मुद्राओं, या ज़ेन बौद्ध भिक्षुओं और मठों के भिक्षुओं द्वारा किए जाने वाले जुड़े हाथ और ध्यान का क्या? क्या उनके “विचार होने” का तर्क इस बात से संबंधित है कि कितनी क्रियाएँ और मुद्राएँ सम्मिलित हैं? क्या क्रियाओं की संख्या यह निर्धारित करती है कि कोई व्यक्ति विचार-मुक्त अवस्था में है या नहीं? क्या अधिक क्रियाएँ होने पर मोहभाव होते हैं और कम क्रियाएँ होने पर नहीं? क्रियाएँ निर्णायक नहीं हैं; निर्णायक यह है कि व्यक्ति के मन में मोहभाव हैं या नहीं और क्या ऐसी बातें हैं जिन्हें वह छोड़ नहीं सकता। मन ही महत्वपूर्ण है। हम यंत्रों का अनुसरण करके व्यायाम करते हैं और धीरे-धीरे विचार-प्रेरित सोच को छोड़ते हुए विचार-मुक्त अवस्था तक पहुँचते हैं।
हाथों के ऊपर और नीचे की गतिक्रिया के दौरान हमारे शरीर एक विशेष प्रकार के रूपांतरण से गुजरते हैं। साथ ही, हमारे सिर के शिखर की नाड़ियाँ खुलेंगी, जिसे “सिर का शिखर खोलना” कहा जाता है। हमारे पैरों के तल की नाड़ियाँ भी अवरोधमुक्त होंगी। यह नाड़ियाँ केवल योंगचुआन
बिंदु नहीं हैं, वे वास्तव में स्वयं एक क्षेत्र है। क्योंकि मानव शरीर के अन्य आयामों में विभिन्न अस्तित्व-रूप होते हैं, व्यायाम करते समय आपके शरीर क्रमशः विस्तृत होंगे और आपके गोंग का आयतन बढ़ता जाएगा, जिससे [अन्य आयामों में आपका शरीर] मानव शरीर के आकार से अधिक हो जाएगा।
जब आप व्यायाम कर रहे होंगे, सिर के शिखर पर “सिर का शिखर खोलना” होगा। हमारा यह “सिर का शिखर खोलना” तांत्रिक पद्धति जैसा नहीं है। तांत्रिक पद्धति में यह व्यक्ति के बाई-ह्वे
बिंदु को खोलकर उसमें “भाग्यशाली तिनका” डालने से संबंधित है। वह तांत्रिक पद्धति में सिखाई जाने वाली साधना-तकनीक है। हमारा “सिर का शिखर खोलना” भिन्न है। हमारे लिए ब्रह्मांड और हमारे मस्तिष्क के बीच के संचार से है। आप जानते हैं, सामान्य बौद्ध साधना में भी “सिर का शिखर खोलना” होता है, पर यह कभी कभार ही बताया जाता है। कुछ अभ्यासों में सिर के शिखर का खुल जाना उपलब्धि माना जाता है। वास्तव में, उन्हें अभी बहुत आगे जाना शेष है। वास्तविक “सिर का शिखर खोलना” कहाँ तक पहुँचना चाहिए? व्यक्ति के कपाल पूरी तरह खुलने चाहिए और फिर हमेशा स्वतः खुलने-बंद होने की अवस्था में रहने चाहिए। मस्तिष्क विशाल ब्रह्मांड के साथ निरंतर संचार में रहेगा। ऐसी अवस्था विद्यमान होगी, और यही वास्तविक “सिर का शिखर खोलना” है। निश्चय ही, हम इस आयाम के कपाल की बात नहीं कर रहे—वह भयावह होगा। यह अन्य आयामों के कपाल हैं।
यह व्यायाम करना भी सरल है। आवश्यक खड़े होकर की जाने वाली मुद्रा पिछले दो व्यायामों जैसी ही है, यद्यपि पहले व्यायाम की तरह खिंचाव नहीं करना है। आगे के व्यायामों में भी खिंचाव आवश्यक नहीं है। आपको केवल शिथिल होकर खड़ा रहना है और मुद्रा अपरिवर्तित रखनी है। ऊपर-नीचे हाथों की गति करते समय सभी को सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके हाथ यंत्रों का अनुसरण करें। पहले व्यायाम में भी आपके हाथ वास्तव में यंत्रों के साथ गति करते हैं; शरीर को खींचने और शिथिल करने के बाद आपके हाथ अपने आप हेशी में पहुँच जाएँगे। इस प्रकार के यंत्र आपके शरीर में स्थापित किए गए हैं। हम यंत्रों के साथ-साथ व्यायाम करते हैं जिससे वे सुदृढ़ हों। आपको स्वयं गोंग की साधना करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यंत्र यह भूमिका निभाते हैं। आप केवल यंत्रों को सुदृढ़ करने के लिए व्यायाम करते हैं। जब आप इस आवश्यक बिंदु को समझेंगे और उचित प्रकार से क्रियाएँ करेंगे, तो आप उनके अस्तित्व को अनुभव करेंगे। आपके हाथों और शरीर के बीच दूरी 10 सेंटीमीटर (4 इंच) से अधिक नहीं होनी चाहिए। यंत्रों का अस्तित्व अनुभव करने के लिए हाथों को इसी सीमा में रहना चाहिए। कुछ लोग कभी यंत्रों को अनुभव नहीं कर पाते क्योंकि वे पूरी तरह शिथिल नहीं होते। कुछ समय व्यायाम करने के बाद वे धीरे-धीरे उन्हें अनुभव करेंगे। व्यायाम के दौरान आपको ची को ऊपर खींचने के विचार का उपयोग नहीं करना चाहिए, और न ही ची उड़ेलने या ची को भीतर दबाने का विचार करना चाहिए। हथेलियाँ हमेशा शरीर की ओर होनी चाहिए। एक बात मैं बताना चाहता हूँ: कुछ लोग अपने हाथों को शरीर के निकट ले जाते हैं, पर जैसे ही हाथ चेहरे के सामने आते हैं, चेहरे को छूने के भय से वे हाथ दूर कर लेते हैं। यदि हाथ चेहरे से बहुत दूर हों तो ऐसा नहीं चलेगा। आपके हाथ चेहरे और शरीर के निकट ऊपर-नीचे गति करने चाहिए, जब तक कि वे इतने निकट न हों जाएँ कि आपके वस्त्रों को छू लें। सभी को इस महत्वपूर्ण बिंदु का पालन करना चाहिए। यदि आपकी क्रियाएँ सही हैं, तो एक-हाथ वाली ऊपर-नीचे गति करने की क्रिया में ऊपर की स्थिति में आपकी हथेली हमेशा भीतर की ओर होगी।
एक-हाथ वाली ऊपर-नीचे गति करने की क्रिया करते समय केवल ऊपर वाले हाथ पर ध्यान न दें। नीचे वाले हाथ को भी अपनी स्थिति तक पहुँचना होता है क्योंकि ऊपर और नीचे की क्रियाएँ एक साथ होती हैं। हाथ एक साथ ऊपर-नीचे गति करते हैं और एक साथ अपनी स्थितियों पर पहुँचते हैं। छाती के सामने गति करते समय हाथों को एक-दूसरे के ऊपर नहीं आना चाहिए, अन्यथा यंत्रों को क्षति पहुंचेगी। हाथों को अलग-अलग रखा जाना चाहिए, प्रत्येक हाथ को शरीर के केवल एक पक्ष की ओर से ही गति करनी चाहिए है। भुजाएँ जब सीधी की जाती हैं, तब इसका अर्थ यह नहीं कि वे शिथिल नहीं होती हैं। भुजाएँ और शरीर दोनों शिथिल होने चाहिए, पर भुजाओं को सीधा रखना होगा। क्योंकि हाथ यंत्रों के साथ चलते हैं, आप अनुभव करेंगे कि यंत्र और एक शक्ति आपकी उँगलियों को ऊपर की ओर गति करने का नेतृत्व कर रहे हैं। दोनो-हाथ की ऊपर-नीचे गति करने की क्रिया करते समय भुजाएँ थोड़ी खुल सकती हैं, पर उन्हें बहुत दूर नहीं फैलाना चाहिए क्योंकि ऊर्जा ऊपर की ओर गति करती है। इस क्रिया में इस बात पर विशेष ध्यान दें। कुछ लोग तथाकथित रूप से “ची को धारण कर सिर के शीर्ष में उड़ेलने” के अभ्यस्त होते हैं। वे हमेशा हथेलियाँ नीचे रखकर हाथों को नीचे ले जाते हैं और हथेलियाँ ऊपर रखकर हाथों को ऊपर उठाते हैं। यह अच्छा नहीं है—हथेलियाँ शरीर की ओर होनी चाहिए। यद्यपि क्रियाओं को ऊपर और नीचे गति करना कहा जाता है, वास्तव में वे आपको दिए गए यंत्रों द्वारा की जाती हैं—यंत्र ही यह कार्य करते हैं। कोई विचार सम्मिलित नहीं होता है। पाँचों व्यायामों में कोई विचार निर्देशन नहीं होता है। तीसरे व्यायाम के बारे में एक बात है: व्यायाम करने से पहले आपको कल्पना करनी होती है कि आप एक रिक्त पात्र या दो रिक्त पात्र हैं। इसका उद्देश्य आपको यह विचार प्रदान करना है कि ऊर्जा सहज रूप से प्रवाहित होगी। यही मुख्य उद्देश्य है। हाथ कमल मुद्रा की स्थिति में होने चाहिए।
अब मैं हाथों से फा चक्र घुमाने के बारे में बताऊँगा। इसे कैसे घुमाते हैं? हमें फा चक्र क्यों घुमाना चाहिए? हमारे व्यायामों से उत्सर्जित की गई ऊर्जा अकल्पनीय रूप से दूर तक जाती है, दो छोरों तक पहुँचती है, पर कोई विचार प्रयोग नहीं किया जाता। यह साधारण व्यायामों जैसा नहीं है, जिनमें “स्वर्ग से यांग ची एकत्र करना और पृथ्वी से यिन ची एकत्र करना” भी पृथ्वी की सीमा तक सीमित रहता है। हमारा व्यायाम ऊर्जा को पृथ्वी को भेदकर ब्रह्मांड के छोरों तक पहुँचा देता है। आपका मन कल्पना नहीं कर सकता कि वे छोर कितने विशाल और दूर हैं—यह वास्तव में अकल्पनीय है। यदि आपको इसे कल्पना करने के लिए पूरा दिन भी दिया जाए, फिर भी आप नहीं समझ पाएँगे कि यह कितना विशाल है या ब्रह्मांड की सीमा कहाँ है। यदि आप अपने मन से पूर्णतः बंधन मुक्त होकर सोचें, तब भी थक जाने पर भी उत्तर नहीं जान पाएँगे। वास्तविक साधना विचार मुक्त अवस्था में की जाती है, इसलिए विचार से निर्देशित करने की कोई आवश्यकता नहीं है। व्यायाम करने के लिए आपको बहुत कुछ चिंता करने की आवश्यकता नहीं—केवल यंत्रों का अनुसरण करें। मेरे यंत्र यह कार्य करेंगे। कृपया ध्यान दें कि व्यायाम के दौरान ऊर्जा बहुत दूर तक पहुँच जाती है, इसलिए व्यायाम के अंत में हमें अपने फा चक्र को हाथों से घुमाना होता है जिससे उसकी सहायता कर ऊर्जा तुरंत लौटा ली जाए। फा चक्र को चार बार घुमाना पर्याप्त है। यदि आप इसे चार बार से अधिक घुमाएँगे तो पेट फूला हुआ लगेगा। फा चक्र घड़ी की दिशा में घुमाया जाता है। फा चक्र घुमाते समय हाथ शरीर की सीमा से बाहर नहीं जाने चाहिए, क्योंकि वह अधिक चौड़ाई तक घुमाना हो जाएगा। नाभि से दो उँगली नीचे का बिंदु, केंद्र होना चाहिए। कोहनियाँ बाहर की ओर तथा नीचे रहती हैं, और हाथ तथा बाँहे सीधी रखी जाती हैं। जब आप व्यायाम करना आरंभ करते हैं तो क्रियाएँ उचित रूप से करनी आवश्यक है, अन्यथा यंत्र विकृत हो जाएँगे।
4. चौथा व्यायाम
चौथे व्यायाम को फालुन अलौकिक परिपथ कहा जाता है। यहाँ हमने दो बौद्ध और दाओवादी
शब्दों का उपयोग किया है जिससे सभी इसे समझ सकें। इस व्यायाम को पहले “महान फालुन को घुमाना” कहा जाता था। यह व्यायाम दाओवादी पद्धति की महान अलौकिक परिपथ से थोड़ा मिलता-जुलता है, पर हमारी आवश्यकताएँ भिन्न हैं। पहले व्यायाम के दौरान सभी नाड़ियाँ खुल चुकी होनी चाहिए, इसलिए चौथा व्यायाम करते समय वे सभी एक साथ गति करेंगी। नाड़ियाँ मानव शरीर की सतह पर भी विद्यमान होती हैं और उसकी गहराइयों में भी, उसकी प्रत्येक परत में और उसके आंतरिक अंगों के बीच के स्थानों में भी। तो हमारे व्यायाम में ऊर्जा कैसे गति करती है? हमारी यह आवश्यकता है कि मानव शरीर की सभी नाड़ियाँ एक साथ गतिमान हों, न कि केवल एक या दो नाड़ियाँ परिक्रमा करें या आठ “अतिरिक्त नाड़ियाँ” घूमें। इससे ऊर्जा प्रवाह अत्यंत शक्तिशाली हो जाता है। यदि मानव शरीर का आगे और पीछे का भाग वास्तव में क्रमशः यांग और यिन पक्षों में विभाजित है, तो प्रत्येक पक्ष की ऊर्जा गति कर रही होती है; अर्थात पूरे पक्ष की ऊर्जा गतिमान होती है। यदि आप फालुन दाफा की साधना करते हैं, अब से आपको अलौकिक परिक्रमा का निर्देश करने के लिए उपयोग किए गए सभी विचार छोड़ने होंगे, क्योंकि हमारी साधना में सभी नाड़ियाँ खोली जाती हैं और एक साथ गतिमान होती हैं। क्रियाएँ बहुत सरल हैं और खड़े होने की मुद्रा पिछले व्यायाम जैसी ही है, केवल आपको कमर से कुछ झुकना होता है। यहाँ भी आपकी क्रियाओं को यंत्रों का अनुसरण करना चाहिए। ऐसे यंत्र पिछले प्रत्येक व्यायाम में भी विद्यमान हैं, और क्रियाओं को फिर से यंत्रों का अनुसरण करना होता है। इस विशेष व्यायाम के लिए मैं आपके शरीर के बाहर जो यंत्र स्थापित करता हूँ वे साधारण नहीं हैं, बल्कि ऐसे यंत्रों की एक परत हैं जो सभी नाड़ियों को गति में ला सकती हैं। वे आपके पूरे शरीर की नाड़ियों को निरंतर आवर्तन में रखेंगे—ऐसा आवर्तन जो तब भी जारी रहता है जब आप व्यायाम नहीं कर रहे होते हैं। उपयुक्त समय पर वे विपरीत दिशा में भी घूमेंगे। यंत्र दोनों दिशाओं में घूमते हैं; आपको उन चीजों के लिए स्वयं परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं है। आपको केवल वही अनुसरण करना चाहिए जो हमने सिखाया है और किसी भी निर्देशकारी विचार से मुक्त रहना चाहिए। बड़ी नाड़ियों वाली वही परत आपका व्यायाम पूरा करने का नेतृत्व करती है।
अलौकिक परिक्रमा करते समय पूरे शरीर की ऊर्जा गति में होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, यदि मानव शरीर वास्तव में एक यिन और एक यांग पक्ष में विभाजित है, तो ऊर्जा यांग पक्ष से यिन पक्ष तक, शरीर के भीतर से बाहर तक, बार-बार आगे-पीछे परिक्रमा करती है, जबकि सैकड़ों या हजारों नाड़ियाँ एक साथ परिक्रमा करती हैं। आपमें से जो लोग पहले अन्य अलौकिक परिक्रमाएँ करते थे और विभिन्न प्रकार के निर्देशकारी विचारों या अलौकिक परिक्रमा के बारे में विभिन्न धारणाओं का उपयोग करते थे, उन्हें हमारे दाफा का अभ्यास करते समय उन सभी को छोड़ना होगा। जो आपने अभ्यास किया था वे वास्तव में छोटी चीजें थीं। केवल एक या दो नाड़ियों को गति में रखना प्रभावी नहीं है—प्रगति बहुत धीमी होगी। मानव शरीर की सतह को देखकर ज्ञात होता है कि नाड़ियाँ विद्यमान होती हैं। नाड़ियाँ वास्तव में शरीर के भीतर लंबवत और क्षैतिज रूप से प्रतिच्छेद करती हैं, ठीक रक्त-वाहिकाओं की तरह, और उनका घनत्व रक्त- वाहिकाओं से भी अधिक है। वे मानव शरीर की विभिन्न आयामों वाली परतों में विद्यमान हैं, अर्थात आपके शरीर की सतह से लेकर गहरे आयामों के शरीरों तक, आंतरिक अंगों के बीच के स्थानों सहित। यदि मानव शरीर वास्तव में दो पक्षों, एक यिन और एक यांग, में विभाजित है, तो व्यायाम करते समय पूरा पक्ष, चाहे आगे हो या पीछे, एक साथ परिक्रमा करता होगा—अब यह केवल एक या दो नाड़ियाँ नहीं है। आपमें से जो लोग पहले अन्य अलौकिक परिक्रमाएँ करते थे, यदि हमारे व्यायामों को किसी भी निर्देशकारी विचार से करेंगे, तो अपने अभ्यास को बिगाड़ देंगे। इसलिए आपको अपने पूर्व उपयोग किए गए किसी भी विचार को पकड़े नहीं रहना चाहिए। यदि आपकी पूर्व अलौकिक परिपथ खुली भी थी, तो भी उसका कोई अर्थ नहीं है। हम उससे बहुत आगे निकल चुके हैं, क्योंकि हमारे अभ्यास की सभी नाड़ियाँ आरंभ से ही गतिमान रखी जाती हैं। खड़े होकर की जाने वाली मुद्रा पिछले व्यायामों से भिन्न नहीं है, केवल कमर से कुछ झुकना होता है। व्यायामों के दौरान हाथों को यंत्रों का अनुसरण करना होता है। यह तीसरे व्यायाम जैसा है, जिसमें हाथ यंत्रों के साथ ऊपर और नीचे गति करते हैं। इस व्यायाम को करते समय पूरी परिक्रमा के दौरान आपको यंत्रों का अनुसरण करना चाहिए।
इस व्यायाम की क्रियाओं को नौ बार दोहराना आवश्यक है। यदि आप उन्हें अधिक करना चाहें तो अठारह बार कर सकते हैं, पर यह सुनिश्चित करना होगा कि संख्या नौ की गुणक हो। आगे चलकर जब आप एक निश्चित स्तर पर पहुँचेंगे, तो संख्या गिनना आवश्यक नहीं रहेगा। ऐसा क्यों है? क्योंकि क्रियाओं को नौ बार दोहराने से यंत्र स्थापित हो जाएँगे। नौवीं बार के बाद यंत्र आपके हाथों को स्वाभाविक रूप से निचले उदर के सामने एक-दूसरे पर ले आयेंगे। कुछ समय तक व्यायाम करने के बाद ये यंत्र नौवीं बार के बाद हाथों को अपने आप निचले उदर के सामने एक-दूसरे पर लाने का नेतृत्व करेंगे, और आपको फिर गिनने की आवश्यकता नहीं रहेगी। निश्चय ही, जब आपने अभी-अभी व्यायाम आरंभ किये हैं, तब संख्या गिननी होगी, क्योंकि यंत्र अभी पर्याप्त शक्तिशाली नहीं हुए हैं।
5. पाँचवाँ व्यायाम
पाँचवें व्यायाम को दिव्य शक्तियों को सुदृढ़ करना कहा जाता है। यह उच्च-स्तरीय साधना है जिसे मैं पहले स्वयं किया करता था। अब मैं इसे बिना किसी परिवर्तन के सार्वजनिक कर रहा हूँ। क्योंकि मेरे पास अब अधिक समय नहीं है… मेरे लिए आपको प्रत्यक्ष रूप से सिखाने का दूसरा अवसर प्राप्त करना कठिन होगा। इसलिए मैं अब आपको सब कुछ एक साथ सिखाता हूँ जिससे आगे चलकर आपके पास उच्च स्तरों पर अभ्यास करने का मार्ग हो। इस व्यायाम की क्रियाएँ जटिल नहीं हैं, क्योंकि महान मार्ग अत्यंत सरल और सुगम होता है—यह आवश्यक नहीं की जटिल क्रियाएँ अच्छी ही हों। फिर भी यह व्यायाम बड़े स्तर पर अनेक वस्तुओं के रूपांतरण को नियंत्रित करता है। यह बहुत चुनौतीपूर्ण और कठिन व्यायाम है, क्योंकि इस व्यायाम को पूरा करने के लिए आपको लंबे समय तक ध्यान में बैठना होता है। . यह व्यायाम स्वतंत्र है, इसलिए इसे करने से पहले पिछले चार व्यायाम करना आवश्यक नहीं है। निश्चित ही, हमारे सभी व्यायाम किसी भी क्रम में किए जा सकते हैं। यदि आज आपके पास अधिक समय नहीं है और आप केवल पहला व्यायाम कर सकते हैं, तो आप केवल पहला व्यायाम करें। आप व्यायामों को भिन्न क्रम में भी कर सकते हैं। मान लें आज आपके पास समय कम है और आप केवल दूसरा व्यायाम, या तीसरा व्यायाम, या शायद चौथा व्यायाम करना चाहते हैं—तो वह भी ठीक है। यदि आपके पास अधिक समय है तो अधिक कर सकते हैं, और यदि कम समय है तो कम कर सकते हैं— व्यायाम किसी भी क्रम में किए जा सकते हैं। जब आप उन्हें करते हैं, तो आप उन यंत्रों को सुदृढ़ कर रहे होते हैं जिन्हें मैंने आपके शरीर में स्थापित किए हैं, और आप अपने फा चक्र तथा अमृत-क्षेत्र को सुदृढ़ कर रहे होते हैं।
हमारा पाँचवाँ व्यायाम स्वतंत्र है और तीन भागों से बना है। पहला भाग मुद्राएँ करना है, अर्थात हस्त-संकेत, जो आपके शरीर को व्यवस्थित करने के लिए हैं। क्रियाएँ बहुत सरल हैं और उनमें केवल कुछ ही क्रियाएँ हैं। दूसरा भाग आपकी दिव्य शक्तियों को सुदृढ़ करता है। इसमें कई स्थिर मुद्राएं हैं जो आपकी दिव्य सिद्धियों और दिव्य शक्तियों को शरीर के भीतर से आपके हाथों तक पहुँचाती हैं, जिससे व्यायाम के दौरान वे सुदृढ़ हों। इसी कारण पाँचवें व्यायाम को दिव्य शक्तियों को सुदृढ़ करना कहा जाता है—यह आपकी दिव्य सिद्धियों को सुदृढ़ करता है। अगला भाग ध्यान में बैठना और गहन स्थिरता में प्रवेश करना है। व्यायाम इन तीन भागों से बना है।
पहले मैं ध्यान के बारे में बताऊँगा। ध्यान के लिए पैरों को मोड़ने के दो प्रकार हैं; वास्तविक अभ्यास में पैरों को मोड़ने के केवल दो प्रकार होते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि दो से अधिक प्रकार हैं, और कहते हैं, “तांत्रिक अभ्यासों को देखिए—क्या पैरों को मोड़ने के अनेक प्रकार नहीं हैं?” मैं आपको बताता हूँ कि वे पैर मोड़ने की विधियाँ नहीं हैं, बल्कि व्यायाम की स्थितियाँ और गतिक्रियाएँ हैं। वास्तविक पैर मोड़ने के केवल दो प्रकार हैं: एक को “अर्ध-पद्मासन” कहा जाता है और दूसरे को “पूर्ण पद्मासन” कहा जाता है।
मैं अर्ध-पद्मासन की व्याख्या करूँगा। इस स्थिति का उपयोग केवल आरंभ में करें, अंतिम उपाय के रूप में, जब आप दोनों पैर मोड़कर बैठने में समर्थ न हों। अर्ध-पद्मासन एक पैर नीचे और दूसरे पैर को ऊपर रखकर किया जाता है। अर्ध-पद्मासन में बैठते समय अनेक लोगों को टखने की हड्डियों में पीड़ा होती है और वे लंबे समय तक उस पीड़ा को सहन नहीं कर पाते। उनके पैरों में पीड़ा आरंभ होने से पहले ही टखने की हड्डियों की पीड़ा असहनीय हो जाती है। यदि आप अपने पैरों को पलट सकें जिससे तलवे ऊपर की ओर हों, तो टखने की हड्डियाँ पीछे की ओर खिसक जाएँगी। निश्चित ही, यद्यपि मैंने आपको व्यायाम इस प्रकार करने को कहा है, हो सकता है आप आरंभ में ऐसा करने में समर्थ न भी हों। आप धीरे-धीरे इस का प्रयास कर सकते हैं।
अर्ध-पद्मासन के बारे में अनेक भिन्न सिद्धांत हैं। दाओवादी अभ्यास “बाहर उत्सर्जित किए बिना भीतर खींचना” सिखाते हैं, जिसका अर्थ है कि ऊर्जा सदा भीतर खींची जाती है और कभी बाहर उत्सर्जित नहीं की जाती। दाओवादी अपनी ऊर्जा को बिखरने से बचाना चाहते हैं। वे इसे कैसे प्राप्त करते हैं? वे अपने एक्यूपंक्चर बिंदुओं को बंद करने पर ध्यान देते हैं। अक्सर जब वे पैर मोड़ते हैं तो एक पैर के योंगचुआन बिंदु को दूसरे पैर के नीचे रखकर बंद करते हैं और दूसरे पैर के योंगचुआन बिंदु को विपरीत जांघ के ऊपरी भाग के नीचे रखते हैं। यही बात उनकी जेयिन स्थिति में भी होती है। वे एक अंगूठे से विपरीत हाथ के लाओगोंग बिंदु को दबाते हैं, और दूसरे हाथ के लाओगोंग बिंदु से विपरीत हाथ को ढकते हैं, जबकि दोनों हाथ निचले उदर को ढकते हैं।
हमारे दाफा में पैरों को मोड़ने में वे आवश्यकताएँ नहीं हैं। बौद्ध साधना के सभी मार्ग—चाहे कोई भी साधना-पथ हो—सभी प्राणियों का उद्धार करने की बात सिखाते हैं। इसलिए वे ऊर्जा उत्सर्जित करने से नहीं बचते। वास्तव में, यदि आपकी ऊर्जा निकल भी जाए और खर्च भी हो जाए, तो बाद में अभ्यास के दौरान आप उसकी बिना कुछ खोए फिर से पूर्ति कर सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि आपका नैतिकगुण एक निश्चित स्तर तक पहुँच चुका होगा—आपकी ऊर्जा लुप्त नहीं होगी। पर यदि आप अपना स्तर और ऊपर उठाना चाहते हैं, तो आपको कष्ट सहने होंगे। उस स्थिति में आपकी ऊर्जा किसी भी प्रकार लुप्त नहीं होगी। अर्ध-पद्मासन के लिए हमारी बहुत आवश्यकताएँ नहीं हैं क्योंकि वास्तव में हमें पूर्ण पद्मासन चाहिए, अर्ध-पद्मासन नहीं। पर कुछ लोग अभी दोनों पैर नहीं मोड़ सकते, इसलिए मैं इस अवसर पर अर्ध-पद्मासन के बारे में कुछ बताना चाहूँगा। यदि आप अभी पूर्ण पद्मासन में नहीं बैठ सकते तो अर्ध-पद्मासन कर सकते हैं, पर आपको धीरे-धीरे दोनों पैरों को ऊपर रखने का प्रयास करना होगा। हमारे अर्ध-पद्मासन में पुरुषों के लिए दायाँ पैर नीचे और बायाँ पैर ऊपर होना चाहिए; महिलाओं के लिए बायाँ पैर नीचे और दायाँ पैर ऊपर होना चाहिए। वास्तव में, वास्तविक अर्ध-पद्मासन बहुत कठिन है क्योंकि इसमें मोड़े हुए पैरों को एक रेखा बनानी होती है; मुझे नहीं लगता कि अर्ध-पद्मासन करना पूर्ण पद्मासन से सरल है। पैरों के निचले भाग मूलतः समानांतर होने चाहिए—यह प्राप्त करना होगा—और पैरों तथा श्रोणि के बीच स्थान होना चाहिए। अर्ध-पद्मासन करना कठिन है। ये एक-पैर मोड़ने की स्थिति की सामान्य आवश्यकताएँ हैं, पर हम लोगों से यह नहीं चाहते। क्यों? क्योंकि इस व्यायाम में आपको दोनों पैर मोड़कर बैठना होता है।
अब मैं पूर्ण पद्मासन के बारे में बताऊंगा। हम आपसे दोनों पैर मोड़कर बैठने की अपेक्षा करते हैं, जिसका अर्थ यह है कि एक-पैर मोड़ने की स्थिति से आप नीचे वाले पैर को ऊपर खींचते हैं, उसे भीतर से नहीं बल्कि बाहर से खींचते हैं। यही पूर्ण पद्मासन है। कुछ लोग अपने पैरों को काफी कसकर मोड़ते हैं। ऐसा करने से दोनों पैरों के तलवे ऊपर की ओर होते हैं और वे “पाँच केंद्रों का आकाश की ओर होना” प्राप्त कर सकते हैं। बौद्ध व्यायामों में वास्तविक “पाँच केंद्रों का आकाश की ओर होना” सामान्यतः इसी प्रकार किया जाता है—सिर का शीर्ष, दोनों हथेलियाँ और दोनों पैरों के तलवे ऊपर की ओर होते हैं। यदि आप पैरों को ढीला मोड़ना चाहते हैं, तो जैसा आपको उचित लगे वैसा कर सकते हैं; कुछ लोग ढीला पद्मासन पसंद करते हैं। पर हमारी केवल यही अपेक्षा है कि दोनों पैर मोड़े हुए हों; पैरों को ढीला मोड़ना भी ठीक है और कसकर मोड़ना भी।
स्थिर ध्यान में लंबे समय तक ध्यान में बैठना आवश्यक है। ध्यान के दौरान कोई मानसिक गतिविधि नहीं होनी चाहिए—किसी भी बात के बारे में न सोचें। हमने कहा है कि आपकी मुख्य चेतना को जागरूक रहना चाहिए, क्योंकि यह व्यायाम आपके स्व की साधना करता है। आपको सजग मन के साथ आगे बढ़ना चाहिए। हम ध्यान कैसे करते हैं? हमारी अपेक्षा है कि आपमें से प्रत्येक को यह ज्ञात रहे कि आप ही वहाँ व्यायाम कर रहे हैं, चाहे आप कितनी भी गहरी ध्यान-अवस्था में हों। आपको बिल्कुल भी ऐसी अवस्था में प्रवेश नहीं करना चाहिए जिसमें आपको कुछ भी ज्ञात न रहे। तो कौन-सी विशेष अवस्था उत्पन्न होगी? जब आप वहाँ बैठेंगे तो आपको बहुत अद्भुत और अत्यंत आरामदायक अनुभव होगा, मानो आप अंडे के खोल के भीतर बैठे हों। आपको ज्ञात रहेगा कि आप व्यायाम कर रहे हैं, पर आप अनुभव करेंगे कि आपका पूरा शरीर हिल नहीं सकता। यह हमारे अभ्यास में निश्चित रूप से होता है। एक और अवस्था भी है। ध्यान के दौरान आप अनुभव कर सकते हैं कि आपके पैर विलुप्त हो गए हैं और आपको स्मरण नहीं रहता कि वे कहाँ हैं। फिर आप अनुभव कर सकते हैं कि आपका शरीर, भुजाएँ और हाथ विलुप्त हो गए हैं, केवल सिर रह गया है। जैसे-जैसे आप ध्यान जारी रखते हैं, संभव है कि सिर भी विलुप्त हो जाए, और केवल आपका मन—जागरूकता का एक सूक्ष्म अंश—यह जानता हो कि आप वहाँ ध्यान कर रहे हैं। आपको उस सूक्ष्म जागरूकता को बनाए रखना चाहिए। यदि हम उस अवस्था तक पहुँच सकें तो पर्याप्त है। क्यों? जब आप उस अवस्था में व्यायाम करते हैं, तो आपका शरीर पूर्ण रूपांतरण से गुजरता है। वही सर्वोत्तम अवस्था है, इसलिए हम अपेक्षा करते हैं कि आप उसे प्राप्त करें। पर आपको सोना नहीं चाहिए, सुस्त नहीं हो जाना चाहिए, या उस सूक्ष्म जागरूकता को त्यागना नहीं चाहिए। यदि आप ऐसा करेंगे तो आपका ध्यान व्यर्थ जाएगा, और वह सोने जैसा और ध्यान नहीं करने जैसा होगा। व्यायाम पूरा करने के बाद, हाथों को हेशी में लाएँ और स्थिरता से बाहर निकल आएँ। तब आपका व्यायाम पूरा होता है।