लांताओ द्वीप पर दी गयी फा की सीख
कुछ लोग अपने जीवनकाल में साधना में सफल नहीं होते हैं, न ही वे अपने आने वाले जन्मों में साधना जारी रखने की प्रतिज्ञा करते हैं, और इसलिए वे साधारण लोगों के रूप में पुनर्जन्म लेने की संभावना रखते हैं और उनके पास साधना करने के कोई अवसर नहीं बचते हैं। उस स्थिति में जो उन्होंने अपने पिछले जन्मों में साधना की है, वह सौभाग्य में परिवर्तित हो जाती है। उदाहरण के लिए, कई भिक्षु उच्च पदवी के अधिकारी के रूप में पुनर्जन्म लेते हैं। उन्होंने साधना करते हुए बहुत कठिनाइयाँ सहन कीं और कुछ पुण्य संचित किये, और इस प्रकार वे, यद्यपि उनकी साधना फल पदवी तक नहीं पहुँची, उच्च पदवी के अधिकारी या सम्राट बन गये।
यदि उन्होंने यह प्रतिज्ञा की कि वे अपने अगले जन्म में फिर से साधना करेंगे, यदि वे इस जन्म में साधना में सफल नहीं हुए, तो वह कार्य उनके अगले जन्म में एक कार्मिक संबंध बनाने में सहायता करेगा। वे संभवतः अगले जन्म में उसी मार्ग में अपनी साधना जारी रखेंगे, और इससे साधना के लिए एक कार्मिक संबंध बन सकता है। यदि कोई व्यक्ति ऐसी प्रतिज्ञा करता है, तो पुनर्जन्म के बाद वह निम्न स्तर के पृथ्वी के देवताओं की देखरेख में नहीं रहेगा। उसके गुरु उसकी सहायता करेंगे, पुनर्जन्म लेते समय उसके साथ रहेंगे और उसकी देखरेख करते रहेंगे, यह सुनिश्चित करेंगे कि वह ऐसे परिवार में जन्म ले जो उसकी साधना को सुविधाजनक बना पाये। और इस प्रकार उसे फिर से साधना करने का अवसर मिलेगा।
कुछ मठों में भिक्षुओं का अधिकतर भाग साधना में सफल नहीं हो पायेगा। उनके सफल न होने के विशेष कारण यह हैं कि कई मोहभाव त्यागे नहीं जाते हैं, वे यह नहीं जानते कि साधना कैसे करनी है, और उन्होंने फा प्राप्त नहीं किया है। कुछ लोगों का मानना है कि वे सूत्रों का जाप करके सफलतापूर्वक बुद्धत्व की साधना कर सकते हैं, किंतु यदि वे मानवीय मोहभावों को त्यागने में विफल रहते हैं, तो वे सफल नहीं होंगे। हालाँकि, उनका मन बुद्ध पर केंद्रित रहता है, इस कारण देहांत के पश्चात् वे मठों में इधर-उधर भटकते रहते हैं, और जैसे दूसरे साधना करते हैं, वे भी वैसे ही करते रहते हैं । उनके साथ ऐसा ही होता है। आप उसे भूत नहीं कह सकते हैं, किंतु आप उसे भिक्षु भी नहीं कह सकते, क्योंकि वह मनुष्य नहीं है। मनुष्य जाति की कठिन स्थिति वास्तव में एक जटिल स्थिति है। एक और बात यह है कि कुछ बुद्ध प्रतिमाओं पर कोई बुद्ध नहीं होते हैं, और कुछ लोगों द्वारा की गई पूजा के परिणामस्वरुप कुछ पाखंडी बुद्ध पैदा हो जाते हैं। आजकल कुछ लोग एक वृक्ष पर लाल कपड़े की पट्टी बाँधते हैं और उसकी पूजा करते हैं, और वे पर्वतों, या एक चट्टान की पूजा करते हैं। वे एक बुद्ध प्रतिमा बनने के बाद उसकी पूजा करते हैं, जबकि उसका प्रतिष्ठापन नहीं हुआ होता है। ऐसी पूजा ने बनावटी बुद्धों को जन्म दिया है। [ये पाखंडी बुद्ध] वास्तविक बुद्धों के समान ही दिखते हैं, किंतु वे बनावटी होते हैं, और बुद्धों के भेष में बुरे काम करते हैं। ऐसा अक्सर होता है।
दिव्यलोक व्यक्ति की फल पदवी (ज़ेंग-गुओ) की प्राप्ति के लिए कठोर नियम निर्धारित करता है, जो लोगों की कल्पना के विपरीत है। वास्तव में, आधुनिक समय के आगमन के साथ बौद्ध धर्म अप्रभावी हो गया है। बहुत से लोग अब नहीं जानते कि साधना कैसे करनी है, और साधना करनी अब कठिन हो गयी है। बौद्ध धर्म में अब बौद्ध सूत्रों की व्याख्याओं की भरमार पायी जाती है। एक भिक्षु एक स्पष्टीकरण देगा, जबकि अगला मुड़कर दूसरा स्पष्टीकरण प्रस्तुत करेगा। किंतु इस प्रकार के स्पष्टीकरण लोगों को भटका सकते हैं, और वे सभी बुद्ध फा को हानि पहुँचाने का काम करते हैं। लोग बौद्ध सूत्रों में उपस्थित मूल शब्दों और अर्थों से ही नई अंतर्दृष्टि प्राप्त कर सकते हैं, और अंतर्दृष्टि की एक छोटी सी मात्रा भी वे केवल इसी प्रकार प्राप्त कर सकते हैं। किंतु यदि केवल एक छोटा सा सत्य भी उन्होंने आत्मसात किया है, तो इससे उन्होंने सुधार किया होगा। और फिर से पढ़ने पर, वे एक और सत्य के बारे में स्पष्ट हो जाएँगे, और फिर से उन्होंने सुधार किया होगा। विभिन्न स्तरों पर वे विभिन्न समझ प्राप्त करेंगे। कुछ भिक्षुओं ने बौद्ध सूत्रों के अर्थ को प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है, और कुछ ने तो ऐसी पुस्तकें भी लिखी हैं जो बुद्ध फा को समझाने का प्रयत्न करती हैं, व्याख्याओं के कठोर अर्थ प्रस्तुत करती हैं, यह दावा करते हुए कि इस वाक्य का अर्थ अमुक है, उस वाक्य का अर्थ यह या वह है, और अगले वाक्य का... किंतु एक बुद्ध द्वारा मूल रूप से कहे गए वाक्यों के विभिन्न स्तरों पर, तथागत के स्तर तक विस्तृत, विभिन्न अर्थ होते हैं। जबकि, जो भिक्षु ऐसा करता है, वह साधना के एक निम्न स्तर पर होता है और बोधिसत्व या बुद्ध के सत्यों को समझ नहीं पाया है। फिर भी वह यह बताने का प्रयत्न करता है कि बौद्ध सूत्रों का क्या अर्थ है, हालाँकि वास्तव में वह उसकी स्वयं की समझ उसके स्वयं के स्तर तक ही सीमित है। उसके शब्दों में उच्च अर्थ सम्मिलित नहीं होते हैं, और वह केवल दूसरों को समझ के एक निम्न स्तर पर ले जायेगा, उन्हें वहाँ फँसा देगा। उसने वास्तव में लोगों को एक वक्र मार्ग पर भटका दिया है। जब वह कहता है, "बुद्ध का अर्थ यह था कि..." तो लोग उससे सीमित हो जाएँगे। लोग चीजों की व्याख्या उसी ढंग से करेंगे, और कोई भी उच्च स्तरों तक साधना नहीं कर पायेगा।
इस प्रकार की व्याख्याएँ पीढ़ियों से प्रचुर मात्रा में हुई हैं। जब लोग त्रिपिटक— सूत्र , नियम और ग्रंथ—के बारे में बात करते हैं, तो सूत्रों को अलग रख देना चाहिए; न तो मठों के नियमों और न ही दार्शनिक ग्रंथों को सूत्रों के समान स्तर पर माना जा सकता है। विशेष रूप से ग्रंथ, बुद्ध फा के संबंध में अव्यवस्थित टिप्पणियों से भरे हैं, और उन अर्थों को कमतर करते हैं जो मूल रूप से बुद्ध फा के थे। आजकल के भिक्षु बौद्ध सूत्रों को समझाने के लिए साधारण शब्दावली का उपयोग करते हैं, किंतु वे पूरी तरह से विफल रहे हैं। बुद्ध शाक्यमुनि ने जो सिखाया था उसका मूल अर्थ ठीक वैसा ही था जैसा वह प्रकट हुआ था, और कोई भी व्याख्या एक भटकाव होगी। यह एक कारण है कि आजकल के भिक्षुओं के लिए साधना में सफल होना कठिन क्यों है। लेकिन, भिक्षु यह नहीं जानते हैं, और जब वे बौद्ध सूत्रों के मूल को समझ नहीं पाते हैं—और ऐसा होता है, क्योंकि वे प्राचीन शास्त्रीय व्याकरण के साथ रचे गए थे—तब वे संदर्भ ग्रंथों को ढूंढते हैं। किंतु वे संदर्भ ग्रंथ उन अनुत्तरदायी व्याख्याओं से भरे हैं जो लेखकों ने अपनी स्वयं की निम्न समझ के आधार पर की थीं। पूरे इतिहास में यह एक समस्या रही है। प्राचीन समय में भी ऐसा ही था, इसलिए बहुत पहले लिखी गई पुस्तकों पर आँख मूँदकर विश्वास न करें। वे कुछ अलग नहीं हैं, और वास्तव में बुद्ध फा को हानि पहुँचाने का काम किया है। बुद्ध शाक्यमुनि ने कहा था कि उनकी शिक्षाएँ कुछ निश्चित वर्षों के बाद निष्प्रभावी हो जाएँगी, और जब धर्म विनाश काल का युग आयेगा तो असुर धर्म को हानि पहुँचाने आएंगे। यह भी एक कारण है।
भारत में बौद्ध धर्म अब नहीं पाया जाता है, और इसका कारण वहाँ के भिक्षुओं के अनुत्तरदायी कार्य हैं। एक व्यक्ति [सूत्र] का एक अर्थ निकालेगा और दूसरा व्यक्ति कुछ और, जिससे विभिन्न दृष्टिकोणों का एक उलझा हुआ जाल बन गया। जो भी व्याख्या प्राप्त हुई, वह वह अर्थ नहीं था जो बुद्ध शाक्यमुनि बताना चाहते थे; मूल अर्थ खो गया था। इसी कारण से बौद्ध धर्म का अब भारत में अस्तित्व नहीं रहा है।
जो अंतर्दृष्टि आपको प्राप्त हुई है, उस पर दूसरों के साथ मिलकर चर्चा करना ठीक है, क्योंकि उस स्थिति में आप स्वयं के अनुभवों और बुद्ध के सूत्रों की अंतर्दृष्टि के विषय में बात कर रहे होते हैं। इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है और इसके कोई नकारात्मक परिणाम नहीं होंगे। जो सबसे बुरा है, वह है बुद्ध के सूत्रों के अर्थ को प्रस्तुत करने के लिए स्वयं के शब्दों का उपयोग करना। प्रत्येक मूल वाक्य केवल उस समझ तक सीमित नहीं है जो एक विशेष स्तर पर प्रस्तुत होती है। आपको उसमें बताया गया एक सिद्धांत इतना उचित और इतना अच्छा लग सकता है, किंतु जब आप और अधिक ऊँचा स्तर प्राप्त करते हैं और सुधार करते हैं, तो आप पाएँगे कि उसी वाक्य में एक और उच्चतर सत्य समाहित है।
बुद्ध शाक्यमुनि ने उनचास वर्षों तक अपने उपदेश प्रदान किये। आरंभ में वह तथागत स्तर पर नहीं थे, और उन्होंने जो फा सिखाया, उसमें से कुछ, वर्षों पहले सिखाया गया था। किंतु उन्होंने निरंतर सिखाया, और जो उन्होंने अपने बाद के वर्षों में, अपने निर्वाण से पहले, सिखाया, वह आरंभ में सिखाए गए विषयों से बहुत भिन्न था। यह इसलिए है क्योंकि वह स्वयं निरंतर नई अंतर्दृष्टि प्राप्त करने और सुधार करने की प्रक्रिया से गुजरे, और वह स्वयं निरंतर साधना कर रहे थे। किंतु वास्तव में, वे संसार के लिए ब्रह्मांड का सिद्धांत नहीं छोड़ कर गए; आजकल के लोग ही इसे फा या सूत्र कहते हैं। जब बुद्ध शाक्यमुनि जीवित थे, तब कोई सूत्र नहीं थे। वह सामग्री, बाद में लोगों द्वारा बुद्ध शाक्यमुनि के शब्दों को स्मरण करने का उत्पाद थी, और इस संकलन प्रक्रिया में त्रुटियाँ थीं। बुद्ध शाक्यमुनि ने जो कुछ कहा था, उसमें से कुछ का वास्तविक अर्थ बदल दिया गया था, किंतु उस समय मनुष्य को केवल इतना ही जानने की अनुमति थी। इसमें से कुछ भी आकस्मिक नहीं था; बल्कि, ऐसा होना निहित था। यह इसलिए था क्योंकि अतीत में किसी ने भी साधना की बातों को बिलकुल स्पष्ट शब्दों में लिखने और उन्हें मनुष्यों के लिए छोड़ने का साहस नहीं किया था। लोगों को सब कुछ स्वयं ही समझना पड़ता था। मनुष्य भ्रम में हैं और कुछ भी नहीं जानते। चीजों की अंतर्दृष्टि प्राप्त करना उनके लिए वास्तव में कठिन है।
बुद्ध शाक्यमुनि अपने जीवनकाल में मनुष्य के लिए जो पीछे छोड़कर गये हैं, वह मुख्य रूप से मठों के नियम थे। जब बुद्ध शाक्यमुनि अंततः निर्वाण के समीप पहुँचे, तो उनके शिष्यों में से एक ने उनसे पूछा, "अब जब हमारे गुरूजी जा रहे हैं, तो हम किसे अपना गुरु मानें?" बुद्ध शाक्यमुनि का उत्तर था, "नियमों को अपना गुरु मानो।" और वास्तव में, उनके द्वारा छोड़े गए नियम आध्यात्मिक साधकों को फल पदवी प्राप्त करने के लिए मार्गदर्शन दे सकते थे। नियम उनकी जीवित अवस्था में ही निर्धारित किये गए थे, जबकि बाद की पीढ़ियों ने जो उन्होंने अतीत में कहा था, उसका अर्थ निकाल कर बाद में लिखा, उसे सूत्र के रूप में प्रतिष्ठापित किया। मैं पहला व्यक्ति हूँ जिसने वास्तव में मनुष्य को साधना के विषय में ज्ञान प्रदान किया है; यह पहले कभी नहीं किया गया है। मैंने कुछ ऐसा किया है जो किसी पूर्ववर्ती ने कभी नहीं किया, और लोगों को दिव्यलोक के लिए एक सीढ़ी दी है।
वास्तव में, धर्म दो उद्देश्यों के लिए अस्तित्व में हैं। पहला, वे वास्तव में उन लोगों के लिए मार्ग सीखने को संभव बनाते हैं जो अच्छे हैं और साधना कर सकते हैं; दूसरा, वे यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि मानव समाज की नैतिकता अपेक्षाकृत उच्च स्तर पर बनी रहे। ये वे दो चीजें हैं जो धर्मों को करनी होती है। हालाँकि, जो मैं शिक्षा दे रहा हूँ, उसका उद्देश्य धर्म स्थापित करना नहीं है। किंतु फिर भी, वास्तव में फा को प्रदान करने में और लोगों को बचाने का प्रभाव समान होगा: अर्थात्, लोग वास्तव में मार्ग खोज पाएं और साधना कर पाएं, आपको एक मार्ग प्रदान हों; और वे लोग जिन्होंने फा सुना है और पुस्तक पढ़ी है, कुछ सिद्धांतों को समझें, यद्यपि वे साधना नहीं करना चाहते हों, और इस प्रकार वे उसके बाद जानबूझकर बुरे या हानिकारक कार्य नहीं करेंगे। अतः परिणाम समान है, जिसमें मानव नैतिकता को एक अपेक्षाकृत उच्च स्तर पर रखा जाता है। वह उद्देश्य भी पूरा होता है। वास्तव में एक मार्ग प्रदान करना और लोगों को सिखाना—क्या इसका अर्थ लोगों को बचाना नहीं है?
प्रागैतिहासिक काल में, कुछ मानव सभ्यताएँ अधिक समय तक चलीं और कुछ कम, जिनमें से कुछ काफी लंबी अवधि की थीं। प्रत्येक काल में, विज्ञान के विकास का वह मार्ग जो मनुष्य ने लिया, भिन्न था। आजकल के लोग आधुनिक वैज्ञानिक विकास के ढाँचे के भीतर कार्य करते हैं और यह नहीं जान सकते कि अन्य मार्ग हैं जिनसे इसका विकास हो सकता था। वास्तव में प्राचीन चीन का विज्ञान आधुनिक यूरोप से आये विज्ञान से पूरी तरह से भिन्न था। प्राचीन चीन का वह विज्ञान सीधे मानव जीवन और ब्रह्मांड पर अपने अध्ययन को केंद्रित करता था। प्राचीन लोग ऐसी चीजों की खोज करने का साहस करते थे जो अमूर्त और अदृश्य थीं, और वे उनके अस्तित्व की पुष्टि करने में सक्षम थे। ध्यान करते हुए बैठने पर जो संवेदनाएँ होती हैं, वे बढ़ती जाती हैं, अंततः इस बिंदु तक कि संवेदनाएँ केवल प्रबल ही नहीं होती हैं, बल्कि कुछ ठोस और दृश्यमान भी बन जाती हैं। इस प्रकार कुछ निराकार स्वयं को पार करके आकार वाली वस्तु बन जाता है। अतः प्राचीन लोगों ने एक विशिष्ट मार्ग अपनाया, एक मार्ग जो जीवन के रहस्यों और मानव शरीर तथा ब्रह्मांड के बीच के संबंधों की खोज करता था—एक मार्ग जो आजकल के अनुभवजन्य विज्ञानों से पूरी तरह भिन्न था।
वास्तव में, चंद्रमा प्रागैतिहासिक मनुष्य द्वारा बनाया गया था, और उसका आंतरिक भाग खोखला है। प्रागैतिहासिक मनुष्य काफी उन्नत था। आजकल के लोग यह मानते हैं कि पिरामिडों का निर्माण मिस्र वासियों ने किया था, और यह जानने का प्रयत्न किया है कि पत्थर कहाँ से लाए गए थे। किंतु यह वैसा बिलकुल नहीं है। वास्तव में पिरामिड एक प्रागैतिहासिक संस्कृति से संबंधित हैं, और एक समय पर समुद्र के नीचे डूब गए थे। पृथ्वी पर बाद में हुए परिवर्तनों—अर्थात्, महाद्वीपीय परतों में कई परिवर्तनों—के कारण पिरामिड नए सिरे से उभरे। समय के साथ, उस क्षेत्र में लोगों की संख्या बढ़ी, जिसमें नए निवासियों को धीरे-धीरे [पिरामिडों] के उपयोग का पता चला—अर्थात्, वे चीजों को बहुत लंबी अवधि तक सुरक्षित रख सकते थे। इस प्रकार उन्होंने मानव शवों को उनके भीतर रखा। किंतु ये लोग वे नहीं थे जिन्होंने पिरामिड बनाये; मिस्र वासियों ने केवल उनको देखा और उनका उपयोग किया। कुछ समय बाद मिस्र वासियों ने मूल पिरामिडों के आधार पर उनके छोटे रूप बनाये, और इस प्रकार वैज्ञानिकों को भ्रमित कर दिया।
आजकल मनुष्य केवल वर्तमान ज्ञान के प्रकाश में चीजों को देखने में सक्षम है, जिसका सबसे अधिक ध्यान देने योग्य परिणाम यह है कि अनेक वैज्ञानिकों द्वारा परिभाषित असंख्य नियम और स्वयंसिद्ध सिद्धांत लगभग लोगों को सीमित कर देते हैं। डार्विन ने कहा कि मनुष्य वानरों से विकसित हुआ है, और सभी लोग विश्वास करते हैं कि मनुष्य वानरों से विकसित हुआ है। परिणामस्वरूप, वे इस सिद्धांत से यह और वह अनुमान लगाते रहे हैं। अभी विज्ञान ने कुछ चीजों की खोज की है जो आधुनिक सभ्यता के इतिहास से कहीं आगे तक पहुँचती हैं, फिर भी लोग ऐसी चीजों को स्वीकार करने का साहस नहीं करते हैं और बल्कि उन्हें असंभव मानते हैं, और अव्यवस्थित ढंग से चीजों को आगे बढ़ाते रहते हैं और निरर्थक बातें करते हैं। किसी दिन मानव शरीर का एक विज्ञान उभरेगा। भविष्य के भौतिकी, रसायन विज्ञान, और अन्य वैज्ञानिक विषय एक भिन्न आधार पर विकसित हो सकते हैं, जो पूरी तरह से पश्चिमी होगा यह आवश्यक नहीं है। आजकल के अनुभवजन्य विज्ञान द्वारा निर्धारित स्वयंसिद्ध सिद्धांत काफी संकीर्ण हैं, और केवल उसी को स्वीकार करते हैं जो दृश्यमान और ठोस है; दृष्टि या स्पर्श से जो कुछ भी अनुभव नहीं किया जा सकता है, उसे स्वीकार नहीं किया जाता है। इसके वैज्ञानिक स्वयंसिद्ध सिद्धांत थोड़े से भी वैज्ञानिक नहीं हैं, और मनुष्य को पूरी तरह से घेर लिया है। जब कोई व्यक्ति वैज्ञानिक साधनों के माध्यम से साधारण रूप से अदृश्य और अमूर्त चीजों की खोज करता है, तो क्या वह विज्ञान नहीं है? क्या इसे विज्ञान नहीं माना जाना चाहिए?
पदार्थ की वास्तविक समझ आजकल के वैज्ञानिकों की समझ से मेल नहीं खाती है। जब आजकल के वैज्ञानिक न्यूट्रिनो और परमाणुओं जैसी चीजों का अध्ययन करते हैं, तो वे मानते हैं कि यह सुरक्षित नहीं है, क्योंकि यदि कणों को सीसे के पात्र में नहीं रखा गया तो वे विकिरण उत्सर्जित करेंगे। यह उनकी धारणा है, जो वर्तमान के सिद्धांतों पर आधारित है जो जितनी वे स्वयं जाँच कर सकते हैं वहीँ तक सीमित हैं। हालाँकि, यह केवल इतना ही है जिसे वे जान सकते हैं। वास्तव में, सभी वस्तुएँ जीवित हैं। बुद्ध शाक्यमुनि ने भी यही कहा था। चाहे वह कोई भी आयाम हो, वहाँ पाया जाने वाला पदार्थ भौतिक रूप से अस्तित्व में है और साथ ही जीवित भी है। न्यूट्रिनो, परमाणुओं, गामा किरणों, और यहां तक कि और अधिक सूक्ष्म स्तरों के पदार्थ को भी नियंत्रित किया जा सकता है, किंतु ऐसा करने के लिए उस स्तर तक पहुँचना पड़ता है। वह गोंग जो हम साधना के माध्यम से विकसित करते हैं, वास्तव में उसमें शक्तिशाली विकिरण होता है जिसे साधक पूरी तरह से नियंत्रित करने में सक्षम है। आजकल का विज्ञान यह खोज कर रहा है कि ब्रह्मांड कैसे बना, हर संभव सिद्धांत प्रस्तुत कर रहा है और इसकी रचना को निर्धारित करने का प्रयत्न कर रहा है। एक उच्चतर समझ यह है कि ब्रह्मांड काल अवकाश से बना है। और वास्तव में, सबसे मूलभूत स्तर पर ब्रह्मांड ऊर्जा से बना है। पदार्थ जितना छोटा होता है, उसकी रेडियोधर्मिता उतनी ही अधिक होती है, और यह सबसे मूलभूत स्तर पर होने वाले कार्य का सार है। आजकल के वैज्ञानिक इसे स्वीकार नहीं करना चाहेंगे, क्योंकि उनका ज्ञान वहां तक नहीं पहुंचा है।
एक अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर पदार्थ—एक अति-सूक्ष्म अवस्था में—एक मूल पदार्थ से बना है जो वास्तव में जीवित नहीं है। यह मूल पदार्थ का एक ऐसा स्वरूप है जिसकी कल्पना एक साधारण मानव सोच के माध्यम से नहीं की जा सकती है। यह मूल पदार्थ भयानक है, क्योंकि इसमें गिरने वाली कोई भी वस्तु घुल जाएगी और विघटित हो जाएगी। मूल पदार्थ को, वास्तव में कहा जाए तो, पदार्थ नहीं कहा जा सकता है। ब्रह्मांड में एक विशेष गुण है, जिसे जन, शान, रेन कहा जाता है। ऐसा क्यों है कि वस्तुओं के सभी सूक्ष्म कणों में जन, शान, रेन सम्मिलित हैं? जैसा कि ज्ञात है, जन, शान, रेन वास्तव में सबसे मूल पदार्थ—वह सबसे मूल अस्तित्व जिसे पूरी तरह से पदार्थ नहीं कहा जा सकता—की रचना करने और उसे बनाये रखने में सक्षम है, और इस प्रकार सबसे मूल चीज की रचना करती है और बनाये रखती है, जिससे मूल पदार्थ का सबसे सूक्ष्म प्रकार बनता है। उसे बनाने के बाद, उसके आधार पर विभिन्न प्रकार के अत्यंत सूक्ष्म पदार्थ के कण निर्मित किये जाते हैं, और ये सूक्ष्म कण फिर समूहित होकर विभिन्न आयामों में पाये जाने वाली मिट्टी, पत्थर, धातु, प्रकाश, और समय—ब्रह्मांड की मूल सामग्री—का निर्माण करते हैं। ये आगे जाकर और अधिक बड़े पदार्थों के स्वरूपों को उत्पन्न और निर्माण करते हैं, जिसके परिणामस्वरुप असंख्य वस्तुएँ बनती हैं। अतः, जब सभी चीजें और वस्तुएँ ब्रह्मांड के इस विशेष गुण से बनायी जाती हैं, तो उनमें स्वाभाविक रूप से ब्रह्मांड के फा का संयोजक गुण होता है। इस प्रकार, सभी पदार्थ में बुद्धत्व प्रकृति होती है—अर्थात्, जन, शान, रेन, वह तत्व जो ब्रह्मांड का गठन करता है। और यह बुद्ध फा है, जिसे दाओ के नाम से भी जाना जाता है।
सभी वस्तुएँ जीवित हैं और उनमें बुद्ध प्रकृति होती है; केवल इतना है कि उनपर थकान का प्रभाव पड़ सकता हैं। विशेष गुण, जन, शान, रेन के अतिरिक्त, किसी भी अन्य उत्पन्न पदार्थ का कोई भी स्वरूप थकने पर गंभीर खतरे का सामना करता है—अर्थात्, एक भौतिक वस्तु का अपक्षय और विघटन। दूसरे शब्दों में, वस्तुएँ विघटित हो जाती हैं। व्यापक रूप से कहा जाए तो, जब वस्तुएँ विघटित होती हैं, तो इसका अर्थ है कि ब्रह्मांड के निम्न स्तर बिगड़ जाते हैं, यह कि फा कार्य करना बंद कर देता है। जब लोगों के मन में फा कार्य करना बंद कर देता है, तो मनुष्य दुष्ट हो जाते हैं, वे नैतिक मूल्यों से बंधे नहीं रहते। जब मानव नैतिकता को एक सामान्य अवस्था में बनाये रखा जाता है, तो फा स्थिर और अटल रह सकता है; यह तब तक संभव है जब तक कि मानव मन दुष्ट नहीं हो जाता। किंतु यदि ऐसा नहीं होता है, तो एक मनुष्य को पुनर्जन्म के माध्यम से गुजरना पड़ता है, और इसलिए वह पुनर्जन्म के चक्र में चाहे जो भी बन जाता है—चाहे वह एक पौधा, एक पशु, एक भौतिक वस्तु, सीमेंट, या रेत हो—वह जो कुछ भी हो, वह फिर भी अपने कर्म को अपने साथ लेकर चलेगा। और इस प्रकार, इसे इस दृष्टिकोण से देखते हुए, जब मानव जाति पतन करती है, तो केवल मानव समाज ही पतन नहीं कर रही होती है, बल्कि, सभी वस्तुएँ भी पतन कर रही होती हैं। फा विनाश काल के युग में, पृथ्वी, ब्रह्मांड के कुछ आयामों, फूलों, घास, और पेड़ों सभी में कर्म होता है।
पुनर्जन्म के अस्तित्व के होते हुए, यह संभव है कि एक मनुष्य एक जीवन में मनुष्य के रूप में जन्म ले और अगले जीवन में एक पशु के रूप में। वास्तव में पुनर्जन्म केवल छह श्रेणियों के जीवन में पुनर्जन्म लेने तक सीमित नहीं है [जैसा कि पारंपरिक रूप से सोचा जाता है]। छह श्रेणियाँ केवल वही हैं जिनका वर्णन बुद्ध शाक्यमुनि ने किया था। एक जीव एक मनुष्य, एक दिव्य प्राणी, या एक असुर राक्षस के रूप में पुनर्जन्म ले सकता है, ठीक वैसे ही जैसे वह एक जंगली पशु, एक पालतू पशु, या एक भौतिक वस्तु जैसी किसी चीज के रूप में पुनर्जन्म ले सकता है।
यदि मनुष्य का विज्ञान एक निश्चित स्तर तक विकसित होना है, तो सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि मानव नैतिकता के स्तर को ऊपर उठना होगा, कहीं ऐसा न हो कि एक ब्रह्मांडीय युद्ध जैसा कुछ भड़क उठे। मनुष्य कभी भी तकनीकी के माध्यम से बुद्धों के आयामों तक पहुँच नहीं पायेगा। ऐसा क्यों है? बुद्धों और दिव्य प्राणियों के पास जो विज्ञान और तकनीकी है, वह मनुष्य के विज्ञान और तकनीकी से उच्चतर है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो, यदि मनुष्य ऐसी उच्चता की आकांक्षा रखते हैं, तो वे केवल विज्ञान और तकनीकी के साधनों के माध्यम से ऐसा नहीं कर सकते। यदि वास्तव में वैज्ञानिक और तकनीकी साधन ऐसी सफलताएँ प्राप्त करने में सक्षम होते, तो प्राकृतिक आपदाएँ वास्तव में घटित होतीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि यदि मनुष्य तकनीकी के माध्यम से ऐसी उच्चता के एक आयाम तक पहुँचते और उस परिमाण की दिव्य शक्तियाँ प्राप्त करते, किंतु उनके मन में अभी भी लड़ाकूपन, लालच, कामेच्छा, विभिन्न इच्छाएं, ईर्ष्या, और यश तथा लाभ सहित सभी प्रकार के मोहभाव भरे होते हैं—यदि वे वहाँ हर प्रकार के मोहभाव ले आते—तो दिव्यलोक पर अराजकता छा जाती। अतः उस परिस्थिति को घटित होने की बिल्कुल भी अनुमति नहीं है।
मनुष्यों के लिए ऐसी उच्चता तक पहुँचने का केवल एक ही मार्ग है जो है साधना। केवल कठोर परिश्रम वाली साधना के माध्यम से मोहभावों और इच्छाओं से स्वयं को मुक्त करके और ब्रह्मांड के विशेष गुण—जन, शान, रेन—के साथ आत्मसात करके ही उस उच्च स्तर तक पहुँचना संभव है। वैसे भी विज्ञान क्या है? बुद्धों और देवताओं के अधीन जो है वह सर्वोच्च विज्ञान है। पदार्थ के विषय में उनकी समझ श्रेष्ठ है, और सूक्ष्म स्तरों पर वे एक निश्चित सूक्ष्म सीमा तक पदार्थ को देख सकते हैं, साथ ही ब्रह्मांड में विद्यमान पदार्थ के बड़े स्वरूपों को भी। वर्तमान में, जिस प्रकार मनुष्य इसकी कल्पना करते हैं, यहाँ यह भौतिक वस्तु है, फिर अणु हैं, और फिर और नीचे परमाणु आदि हैं... और जहाँ तक उच्चतर पदार्थ का प्रश्न है, वे मानते हैं कि ग्रह सबसे बड़े हैं। किंतु ग्रह पदार्थ का सबसे बड़ा स्वरूप नहीं हैं; अन्य और भी बड़े हैं। बुद्ध बहुत बड़े पदार्थ के स्वरूपों के साथ-साथ सूक्ष्म स्तर पर बहुत सूक्ष्म स्वरूपों को भी देखने में सक्षम हैं। हालाँकि, ऐसी क्षमताओं के साथ भी बुद्ध, तथागतों सहित, फिर भी पदार्थ की उत्पत्ति को नहीं देख सकते हैं; यहाँ तक कि तथागत भी यह नहीं देख सकते कि ब्रह्मांड अंततः कितना विशाल है।
दिव्यलोक में रहने वाले प्राणी कहते हैं कि साधना करनी बहुत कठिन है, कि साधना लगभग असंभव है। और वे ऐसा क्यों कहते हैं? क्योंकि बुद्धों को सहन करने के लिए कोई कठिनाई नहीं होती है। दिव्यलोक में बुद्धों को कोई कठिनाई नहीं होती है। उनके पास केवल सुखद चीजें, आनंददायक चीजें होती हैं, और वे जो चाहें प्राप्त कर सकते हैं—परम सुख का जीवन। तो इसके बारे में सोचिए : विशाल दिव्य शक्तियाँ होने और कोई कठिनाई न होने पर, वे साधना कैसे कर सकते हैं? उनके लिए सुधार करना वास्तव में कठिन है। मनुष्यों के लिए साधना करनी सरल है, किंतु यदि मनुष्य उस उच्चतर क्षेत्र तक नहीं पहुँचते हैं, तो कोई भी वहाँ तक आरोहण नहीं कर सकता है। यह एक ऐसी बोतल के समान है जो गंदगी से भरी है और पानी की सतह पर नहीं उठ सकती है। यह निश्चित रूप से सत्य है कि कोई व्यक्ति स्वयं की शुद्धिकरण के बिना वहाँ आरोहण नहीं कर सकता है।
एक बुद्ध की महान बुद्धिमत्ता का संदर्भ उनके आयाम के भीतर की महान बुद्धिमत्ता से है। एक बुद्ध जिसका स्तर एक तथागत से दुगुना उच्च है, ब्रह्मांड के सत्य को कहीं अधिक उच्च स्तर पर समझते हैं। जब वे तीन हजार लघु ब्रह्मांडों की बात करते हैं, तो उसका अर्थ यह नहीं है कि रेत के हर एक कण में वे हैं। महान ज्ञानप्राप्त लोगों ने पाया है कि कुछ रेत और चट्टानों में वे होते हैं। किंतु कुछ चट्टानों में नहीं होते हैं। उदाहरण के लिए, ग्रेनाइट में नहीं होते। कुछ चट्टानों में, जब आप उनमें से एक को उठाते हैं तो आप एक अत्यंत विशाल संसार देख पाएंगे, और [वहाँ उपस्थित प्राणी] मनुष्यों जैसे दिखते हैं। यदि आप [चट्टान] फेंकते हैं, तो भी वे कंपन अनुभव नहीं करते हैं, क्योंकि उनका अस्तित्व वैसा ही रहता है; यदि आप इसे कहीं रख देते हैं या यहां तक कि यदि यह पानी में डूब भी जाती है, तो पानी उसके आयाम में प्रवेश नहीं कर पाएगा।
यह एक विशाल संसार है। जिस तरह से मनुष्य वस्तुओं के आकार को देखते हैं, वह वास्तव में अनुचित है। जिस तरह से साधारण लोग इसकी कल्पना करते हैं, उस प्रकार की "आकार" नामक कोई चीज नहीं है। आप देखते हैं कि कोई वस्तु ऐसी है, किंतु यह केवल वही है जो साधारण लोगों को प्रकट होता है। चाहे वह एक कागज का टुकड़ा हो, एक चित्रकला हो, या कागज का एक बहुत पतला पन्ना हो—उनमें से किसी पर भी फा-शरीर (फाशन) हो सकते हैं। साधारण मनुष्यों को यह अकल्पनीय लगता है, किंतु वे केवल साधारण लोग हैं।
वास्तव में, पृथ्वी पर हमारे भौतिक आयाम में मनुष्य ही एकमात्र मानव-प्रकार नहीं है। ऐसे मानव-प्रकार हैं जो सागरों में निवास करते हैं। अतीत में कुछ लोगों ने इसे सार्वजनिक किया था, किंतु साधारण समाज इसे स्वीकार नहीं कर सका, और इसे एक कल्पित कथा घोषित कर दिया। किंतु वास्तव में, जो कहा गया था वह सत्य था। जब महाद्वीपीय प्लेटें खिसकना शुरू करती हैं, तो अनेक सागर तल उभरते हैं। सागर के तल पर मानव-प्रकार हैं, कई प्रकार के। उनमें से कुछ हमारे समान दिखते हैं, और कुछ काफी भिन्न होते हैं। कुछ के गलफड़े होते हैं, जबकि कुछ कमर से ऊपर मनुष्य हैं और कमर से नीचे मछली; अन्य के मानव पैर होते हैं जिनका ऊपरी शरीर मछली का होता है।
आजकल, कुछ भिक्षुओं ने कई पुस्तकें लिखी हैं। किंतु उन्होंने क्या लिखा है? काली ची प्रत्येक शब्द और पंक्ति में व्याप्त है। ये व्यक्ति इसे स्वयं नहीं पहचान पाते; उनमें व्याप्त चीजों में बहुत गड़बड़ी हैं। इस प्रकार की घटनाएँ धर्म विनाश काल के युग में अधिक मात्रा में फैल गयी हैं।
बुद्ध शाक्यमुनि का धर्म भारत में अस्तित्व में आया, तो यह कैसे हुआ कि वह वहाँ से लुप्त हो गया? जब बुद्ध शाक्यमुनि जीवित थे, तो उन्होंने जो चीजें सिखायीं और जो उन्होंने लोगों से अपेक्षा की, उनका पालन किया गया। जब बुद्ध शाक्यमुनि अपना धर्म सिखाते थे, यदि कोई उसे नहीं समझता था, तो वह उनसे पूछ सकता था। और यदि वह कुछ अनुचित करता था, तो बुद्ध शाक्यमुनि उसे ठीक कर सकते थे। इस संसार से बुद्ध शाक्यमुनि के जाने के बाद, कई भिक्षुओं ने बुद्ध शाक्यमुनि के शब्दों की स्वयं की व्याख्याओं के आधार पर त्रुटिपूर्ण स्पष्टीकरण दिए। समझ लें कि बुद्ध शाक्यमुनि एक घर की ऊँचाई के स्तर तक साधना कर पाये थे और औसत भिक्षु केवल एक फुट ऊँचाई तक ही साधना कर पाया, तो क्या वह भिक्षु तथागत के दिव्य पदवी (गुओ-वेई) तक विभिन्न स्तरों पर धर्म के सभी वास्तविक अंतर्निहित अर्थ को समझ पाया था? . बुद्ध शाक्यमुनि के शब्दों में, प्रत्येक स्तर पर, उस स्तर के लिए साधना का वह मार्ग सम्मिलित है। यही कारण है कि एक साधक उन समझों के आधार पर ऊपर की ओर साधना कर सकता है जो वह विभिन्न स्तरों पर प्राप्त करता है। जब वह एक नये स्तर तक साधना करता है तो उसे मार्गदर्शन देने के लिए हमेशा फा वहाँ होगा। और इसी कारण से वह जब भी एक नए स्तर पर पहुँचता है तो फा के उसी वाक्य की एक नई समझ प्राप्त करता है। बौद्ध सूत्रों के मूल पाठ के साथ, आप प्रत्येक पठन के साथ एक नई समझ प्राप्त करेंगे। जब आप और सुधार करते हैं और सूत्र को फिर से पढ़ते हैं, तो आप फिर से नई समझ प्राप्त करेंगे। ठीक इसी प्रकार, जैसे-जैसे आप सीखते रहेंगे और परिवर्तित होते रहेंगे और अपनी समझ में सुधार करते रहेंगे, आपकी साधना का स्तर ऊँचा होता जाएगा।
जैसे ही कुछ भिक्षुओं ने बौद्ध सूत्रों पर अपनी स्वयं की व्याख्याओं के माध्यम से चर्चा की, और ऐसा साधारण लोगों की शब्दावली का उपयोग करके किया, या उस प्रकार की पुस्तकें लिखीं, उन्होंने तुरंत लोगों को स्वयं की सीमाओं में खींच कर सीमित कर दिया। वे बौद्ध सूत्र की व्याख्याएँ प्रस्तुत करते थे। बुद्ध शाक्यमुनि के शब्द बहुत उच्च स्तर के थे और उनमें बहुत अधिक गहन अर्थ सम्मिलित था। लेकिन उन भिक्षुओं ने उसमें से किसी को भी नहीं समझा था। वह इसलिए था क्योंकि उनके साधना स्तर निम्न थे! अतः उनके शब्द, जब बौद्धों द्वारा मन से स्वीकार किये जाते हैं, तो वे लोगों को भिक्षु के स्वयं के संज्ञानात्मक ढाँचे तक ले जाते हैं और सीमित कर देते हैं। ऐसा लगता था कि वे एक अच्छा कार्य कर रहे थे, क्योंकि ऐसा प्रतीत होता था कि वे लोगों को बौद्ध धर्म के अध्ययन के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे। किंतु क्या वे वास्तव में बुद्ध फा को क्षीण नहीं कर रहे थे? बुद्ध फा को क्षीण करना विभिन्न स्वरूपों में हो सकता है। कुछ विनाशक उसकी प्रशंसा करते हैं और साथ ही उसे बाधित भी करते हैं। इस प्रकार की क्षति को पहचानना और देख पाना सबसे कठिन है, और यह सबसे अधिक हानिकारक है। बुद्ध शाक्यमुनि का धर्म ठीक इसी कारण से अब भारत में आगे नहीं बढ़ पाया है।
अनेक लोग बुद्ध शाक्यमुनि ने जो सिखाया, उसे समझाने का प्रयास कर रहे हैं, यह कहते हुए कि उनका अर्थ यह और वह था। किंतु वह केवल वही है जो उन व्यक्तियों ने अपने स्वयं के स्तरों पर समझा है। कुछ लोगों के दिव्य नेत्र ( तिआन-मू ) खुले हैं, और उन्होंने विभिन्न स्तरों पर कुछ सत्य देखे हैं। किंतु [जो उन्होंने देखा है] वह उतना उच्च और गहन नहीं है जितना बुद्ध शाक्यमुनि ने तथागत के स्तर पर देखा था, और जिन आयामों को उन्होंने पार किया है, वे उतने विशाल नहीं हैं। और जिन लोगों के दिव्य नेत्र बहुत निम्न स्तरों पर खुले हैं, वे केवल कुछ ही आयामों को देख सकते हैं, और जिन्हें वे देखते हैं, वे बहुत निम्न स्तरों पर होते हैं। विभिन्न आयामों के विभिन्न सत्य होते हैं, अतः जब वे कहते हैं कि कोई चीज ऐसी और वैसी है, तो वास्तव में वैसी नहीं होती है। जो लोग बिना उत्तरदायित्व के फा की व्याख्या करते हैं, वे लोगों को स्वयं की समझों की सीमाओं तक सीमित कर रहे होते हैं। तो मुझे बताइए : क्या वे बुद्ध फा की रक्षा कर रहे हैं या उसे बाधित कर रहे हैं? यही कारण है कि किसी को भी धर्मग्रंथों का एक भी शब्द बदलने की अनुमति नहीं है! बस धर्मग्रंथों की मूल शिक्षा से ज्ञानप्राप्त प्राप्त करें और साधना करें! किसी को भी बौद्ध धर्मग्रंथों के एक भी शब्द की मनमाने ढंग से व्याख्या करने की अनुमति नहीं है। हालाँकि, अपनी स्वयं की व्यक्तिगत समझों के बारे में बात करना ठीक है। लोग आपस में विचार साझा कर सकते हैं, यह कहते हुए : "मैंने कुछ अनुभव किया है... अब मैंने यह अर्थ समझा है..." "मुझे लगता है कि यह संकेत करता है कि मैंने किसी चीज को अच्छे से नहीं संभाला, इसलिए मुझे कुछ चीजों में सुधार करना चाहिए..." या "यह वाक्य मेरी ओर संकेत कर रहा है, बता रहा है कि मैंने अच्छा नहीं किया। यह बढ़िया है।" जब वह व्यक्ति सुधार करता है और उसे फिर से पढ़ता है, तो वह पायेगा कि वही वाक्य नई अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। इस प्रकार एक व्यक्ति सुधार करता है, और इसी प्रकार लोग ज्ञानप्राप्त करते हैं और चीजों को समझते हैं।
आजकल ऐसे भिक्षु और अज्ञानी बौद्ध हैं जिन्होंने बहुत सी चीजें लिखी हैं और जो स्वयं द्वारा लिखी गई चीजों को सूत्र मानते हैं। किंतु केवल एक बुद्ध द्वारा सिखाया गया फा ही सूत्र होता है! वे चीजें जो वे लिखते हैं, सूत्र के रूप में कैसे मानी जा सकती हैं?! और फिर भी वे उन्हें सूत्र कहते हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि कई अज्ञानी बौद्ध और भिक्षु यश और भौतिक लाभ का पीछा कर रहे हैं, और उन्हें दिखावा करना अच्छा लगता है। जब दूसरे उनकी प्रशंसा करते हैं तो वे स्वयं पर प्रसन्न होते हैं। एक साधक को वास्तव में अपनी साधना करनी चाहिए। वास्तविक साधना मानवीय मोहभावों से छुटकारा पाना है। साधारण लोगों के बीच यश और लाभ का पीछा करना, झगड़ालू होना या दिखावा करना, एक ईर्ष्यालु मन रखना—सभी मानवीय इच्छाओं और मोहभावों को हटाने की आवश्यकता है। अतः जब उन लोगों की बात आती है जिनमें हर किसी से आगे बढ़ने और सांसारिक जगत में स्वयं को प्रदर्शित करने की एक तीव्र इच्छा होती है, तो आप कल्पना कर सकते हैं कि वे कितने मोहभाव प्रदर्शित करेंगे। सच्चे साधकों को इन लोगों को ऐसे करते हुए देखना वास्तव में कठिन लगता है। ऐसे लोग भी हैं जो बुद्धत्व की साधना करते हैं और फिर भी धन और संपत्ति के लिए एक तीव्र इच्छा रखते हैं। वे इसे व्यक्त नहीं करते, किंतु जैसे ही उनका हृदय या मन विचलित होता है, उच्च साधना स्तरों वाले लोग या बुद्ध इसे जान जाते हैं।
यहाँ ध्यान उन पर केन्द्रित है जो सारा समय साधना करते हैं [जैसे भिक्षु या धर्मगुरु], किंतु वास्तव में यही बात कई ऐसे लोगों पर भी लागू होती है जो बौद्ध धर्म का अध्ययन कर रहे हैं। क्या ये लोग वास्तव में बौद्ध धर्म सीख रहे हैं? आखिरकार, साधक किसकी साधना करते हैं? साधना मोहभावों को हटाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। साधारण मानवीय इच्छाओं को बहुत, बहुत कम मूल्य देना चाहिए। ऐसा क्यों है कि कई लोग जिन्होंने दाओ प्राप्त किया है, वे पर्वतों में चले गये हैं और धर्म विनाश काल के युग में मठों में नहीं रहना चाहते हैं? उन्होंने पर्वतों और जंगलों में प्रवेश इसलिए किया क्योंकि उन्होंने पाया कि मठों में रहने वाले कई व्यक्ति सच्ची साधना नहीं कर रहे थे। वहाँ के कई भिक्षुओं में ऐसे मोहभाव थे जिन्हें वे छोड़ना नहीं चाहते थे, वे एक दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्र रचते थे, और वे स्थल अब पवित्रता या सच्ची साधना के स्थान नहीं रह गये थे। इसलिए, वे साधक दूर जाकर इससे बचते थे।
और फिर, पंथों और आसुरिक साधनाओं द्वारा खुले तौर पर की गई हानि भी अस्तित्व में है। इनकी पहचान करना सरल है, और एक दृष्टि में कोई भी बता सकता है कि वे दुष्ट हैं। हालाँकि, बौद्ध धर्म के नाम पर की गई हानि सबसे गंभीर है। बुद्ध शाक्यमुनि ने क्यों कहा कि उनका धर्म, धर्म विनाश काल के युग में लोगों को नहीं बचा पायेगा? अभी धर्म विनाश काल का युग चल रहा है। भिक्षु शायद ही स्वयं को बचा सकते हैं, दूसरों को बचाना तो दूर की बात है! मैंने धर्म विनाश काल के युग में होने वाली चीजों का वर्णन किया है, और कुछ लोगों ने सत्य को अचानक पहचान लिया। आजकल के समाज में होने वाले विकास भयानक हैं। बस एक दृष्टि डालिए और आप देखेंगे कि सभी प्रकार की झूठी, दुष्ट, बुरी, और अराजक चीजें उभर आयी हैं!
तो यहाँ हमने इन सत्य को प्रस्तुत किया है, किंतु किसी विशिष्ट व्यक्ति का नाम नहीं लिया गया है। कई भिक्षुओं ने पुस्तकें लिखी हैं, और सतही तौर पर ऐसा लगता है कि इनका उद्देश्य बुद्ध फा को आगे बढ़ाना है। किंतु उनके मन में यश और व्यक्तिगत लाभ बसा है। लोग मुझसे पूछते हैं, "इस या उस व्यक्ति का क्या?" जिसका मैंने उत्तर दिया है, "अपनी अत्यधिक प्रसिद्धि के होते हुए भी, उसने मनमाने ढंग से बौद्ध सूत्रों की व्याख्या की और स्वयं का प्रचार किया। वास्तव में, बहुत पहले ही उसका नाम नर्क की सूचि में लिखा जा चुका है।"
सूत्र , नियम, और शास्त्र— सूत्रों को छोड़कर, ये बुद्ध फा के मूल अर्थ को क्षीण करने का कार्य करते हैं। आजकल ऐसे लोग हैं जो "त्रिपिटक" के बारे में बात करते हैं। किंतु वास्तव में त्रिपिटक नहीं हैं : केवल सूत्र हैं, और एक सूत्र एक सूत्र होता है। अन्य चीजों को सूत्रों के साथ समान स्तर पर नहीं रखा जा सकता है।
मानव जाति का पतन और ज्ञानप्राप्त प्राणियों का उदय
मानव जाति का पतन हव्वा के समय से शुरू नहीं हुआ था, जैसा कि यीशु ने बताया था। यह पृथ्वी एक से अधिक सभ्यता और प्राचीन काल से गुजरी है; प्रागैतिहासिक सभ्यताएँ थीं जो नष्ट हो गईं। कई बार तो पृथ्वी पूरी तरह से नष्ट या प्रतिस्थापित की गयी, एक पूरी तरह से नई बनायी गयी पृथ्वी के साथ। क्या मानव जाति ने संसार को समाप्त करने वाली आपदाओं के बारे में बात नहीं की है? वास्तव में, यह धर्म ही हैं जिन्होंने इसके बारे में बात की है। एक निश्चित समय बीतने के बाद एक बड़ी आपदा आती है, और कुछ समय के बाद एक छोटी आपदा आती है। छोटी आपदा में लोग स्थानीय प्रमाण पर नष्ट हो जाते हैं; जब एक निश्चित क्षेत्र बहुत बुरा हो जाता है तो वह नष्ट हो जाता है। भूकंप आते हैं, महाद्वीपीय प्लेटें डूब जाती हैं, आंधी तूफ़ान आते हैं, या अकाल और युद्ध होते हैं। एक छोटी आपदा स्थानीय होती है, जबकि एक बड़ी आपदा लगभग पूरी मानव जाति को प्रभावित करती है। एक बड़ी आपदा कई वर्षों के बीतने के बाद ही होती है। पृथ्वी पर होने वाले परिवर्तन, जैसे वस्तुओं की गति, एक निश्चित क्रम का पालन करते हैं। इसके परिवर्तनों के साथ होने वाली बड़ी आपदा ही मानव जाति के विनाश का कारण बनती है। हालाँकि, लोगों की एक छोटी संख्या बच जाती है, और इतिहास से पहले की कुछ संस्कृति को विरासत में ले जाती है, और वे पाषाण युग के समान जीवन जीते हैं। क्योंकि उत्पादन के सभी उपकरण नष्ट हो जाते हैं, बाद की पीढ़ी की दुर्दशा और भी बुरी होती है, क्योंकि बहुत कुछ भुला दिया जाता है। इसलिए जनसंख्या एक प्राचीन अवस्था से बढ़ने लगती है, और समय के साथ-साथ फिर से सभ्यता और उन्नत तकनीक उभरती है। जब मानव जाति का फिर से पतन होता है, तो आपदाएँ फिर से आती हैं। इस प्रकार चक्रीय परिवर्तन होता है जिसमें सृजन, स्थिरता, और पतन के काल होते हैं।
दूसरे शब्दों में, मनुष्य का पतन एक अनिवार्यता है। किंतु प्रत्येक युग में जब सभ्यता उभरती है, तो निश्चित रूप से देवता महान ज्ञानप्राप्त प्राणियों को लोगों को बचाने के लिए मानव संसार में भेजते हैं। इसका उद्देश्य पृथ्वी के पदार्थों और सामग्री के प्रति मानव मन के असंतुलित पतन को रोकना है। इस ब्रह्मांड की पृथ्वी को बनाने वाले सभी पदार्थ में एक विशेष गुण होता है। केवल इस विशेष गुण के साथ ही प्राचीन, निराकार चीजों को आकार और जीवन वाले पदार्थ में बनाना संभव है। किंतु पदार्थ के पतन से पहले मानव मन का पतन वर्जित है। यही कारण है कि हर बार जब मनुष्यों के बीच एक सभ्यता या संस्कृति उभरती है, तो महान ज्ञानप्राप्त प्राणी प्रकट होते हैं। प्रागैतिहास के सभी कालों में महान ज्ञानप्राप्त प्राणी उभरे हैं। वर्तमान सभ्यता में, यीशु, शाक्यमुनि, और लाओ ज जैसे प्राणी लोगों को सिखाने के लिए आये थे। विभिन्न कालों के सभ्य क्षेत्रों में, अलग-अलग ज्ञानप्राप्त प्राणी थे जो लोगों को यह सिखाने के लिए उत्तरदायी थे कि अपने मूल, सच्चे स्वयं की ओर कैसे लौटें। उन्होंने उन लोगों को फल पदवी प्राप्त करने में सक्षम बनाया जो दाओ प्राप्त कर सकते थे; साधारण लोगों को पुण्य का आदर करना सिखाया; और यह अपेक्षा की कि मानव जाति अपनी नैतिकता को एक अपेक्षाकृत स्थिर अवस्था में बनाये रखे, इस प्रकार यह सुनिश्चित किया कि मानव मन का इतनी सरलता से पतन ना हो जाये। जब अंततः एक दिन ब्रह्मांड के सभी पदार्थ पतन होने वाले होंगे, तो वे तब हट जायेंगे। किंतु वह एक अत्यंत लंबी प्रक्रिया है।
उन कालों के दौरान, ज्ञानप्राप्त प्राणी जो करने का प्रयत्न करते हैं, वह है मनुष्य के पतन को रोकना और, ऐसा करते हुए, उन लोगों को सक्षम बनाना जो साधना में प्रगति करके वास्तव में साधना के माध्यम से दाओ प्राप्त कर सकें। मनुष्य वानर से विकसित नहीं हुआ, जैसा कि डार्विन ने दावा किया है। वह मनुष्य का स्वयं को गिराना है। सभी मनुष्य ब्रह्मांड के कई आयामों से गिरकर यहाँ पहुंचे हैं। वे ब्रह्मांड में अपने स्तरों के फा की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करते थे, और इस प्रकार उन्हें नीचे गिरना पड़ा। जैसा कि हमने पहले कहा है, किसी के मानवीय मोहभाव जितने अधिक गहरे होंगे, वह उतना ही नीचे गिरता जाएगा, जिसमें गिरना तब तक जारी रहता है जब तक कि कोई साधारण मानव जाति की अवस्था तक नहीं पहुँच जाता। उच्चतर प्राणियों की दृष्टि में, एक मनुष्य के जीवन का उद्देश्य केवल आपके लिए मनुष्य होना नहीं है, बल्कि, इस भ्रम के स्थान, पृथ्वी पर आपको शीघ्रता से जागृत करवाना और लौटाना है। वास्तव में यही उनके मन में है; वे आपके लिए एक द्वार खोल रहे हैं। जो लोग लौटने में विफल होते हैं, उनके पास पुनर्जन्म लेने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं होगा, जिसमें यह तब तक जारी रहेगा जब तक कि वे एक भारी मात्रा में कर्म जमा नहीं कर लेते और नष्ट नहीं हो जाते। यही कारण है कि पृथ्वी ने कई आपदाओं का अनुभव किया है।
हालांकि, एक अन्य दृष्टिकोण से, पृथ्वी केवल ब्रह्मांड के कचरे का ढेर है। अनगिनत विशाल ब्रह्मांडों के भीतर अनगिनत आकाशगंगाएँ और ग्रह हैं, और प्रत्येक ग्रह पर प्राणी हैं। मनुष्य अन्य आयामों के अस्तित्व को अस्वीकार करते हैं, इसलिए वे उन प्राणियों को देखने में असमर्थ हैं। वे उन्हीं ग्रहों [जिन्हें हम देखते हैं] के अन्य आयामों में विद्यमान हैं, हमारे आयाम में नहीं, और इस प्रकार साधारण लोग उन्हें नहीं देख सकते हैं। यह कुछ ऐसा ही है कि मनुष्य जैसे कहते हैं कि इस आयाम का मंगल गर्म है, किंतु यदि कोई इस आयाम को पार कर के आगे निकल जाए, तो यह दूसरी ओर कुछ ठंडा अनुभव होगा। कई अलौकिक क्षमताओं वाले लोग सूर्य को देखते हैं, और ऐसा कुछ देर तक देखने के बाद पाते हैं कि वह अब गर्म नहीं है। और फिर से देखने के बाद, वे पाते हैं कि वह काला है। एक बार फिर से देखने पर, वह एक शीतल और सजीव संसार दिखायी देता है। इस भौतिक आयाम में यह इस प्रकार प्रकट होता है, जबकि दूसरे भौतिक आयाम में यह अन्य प्रकार से प्रकट होता है। इसलिए, जीवित प्राणी हर स्थान पर पाये जाते हैं, और उसमें मनुष्य भी सम्मिलित हैं। और जब वे उस स्तर के मानक के अनुरूप नहीं होते हैं, तो थोड़ा-थोड़ा करके वे नीचे गिरते हैं। यह एक स्कूल छात्र के उच्च कक्षा में उन्नत होने में विफल होने के समान है, केवल इस मामले में वे अंततः साधारण मानव प्राणियों के बीच होने की अवस्था तक गिर गये। ब्रह्मांड में जो मनुष्य बुरे होते हैं, वे नीचे की ओर गिरते हैं, ब्रह्मांड के केंद्र—पृथ्वी—पर गिरते हैं।
एक व्यक्ति जो मानव संसार में रहता है, पुनर्जन्म से गुजरता है, और इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वह मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म लेगा। वह कई भिन्न-भिन्न भौतिक चीजों, भिन्न-भिन्न पौधों, भिन्न-भिन्न पशुओं, या यहाँ तक कि सूक्ष्मजीवों में से किसी में भी पुनर्जन्म ले सकता है। और अपने पुनर्जन्मों के दौरान, जो अनुचित वह करता है, वह हमेशा उसके साथ ले जाया जाता है, और वही कर्म है। एक प्राणी जो अपने साथ ले जा सकता है, वह मुख्यतः पुण्य और कर्म है, और वे हमेशा उसके साथ होते हैं। यदि किसी का कर्म बड़ा है और वह एक वृक्ष के रूप में पुनर्जन्म लेता है, तो उस वृक्ष में कर्म होगा। और यदि वह एक पशु के रूप में पुनर्जन्म लेता है, तो उस पशु में कर्म होगा। पृथ्वी पर ईंटों, मिट्टी, चट्टानों, पशुओं, और पौधों सभी में कर्म हो सकता है। ऐसा क्यों है कि धर्म विनाश काल के युग में रोगियों को दी जाने वाली या सुई लगाने वाली औषधि पहले की तरह प्रभावी नहीं रह गयी है? यह इसलिए है क्योंकि आजकल के मनुष्य, भारी मात्रा में कर्म उत्पन्न करने के कारण, अपने ऊपर सशक्त कर्म रखते हैं, और इस प्रकार औषधि की मूल प्रभावकारिता समाप्त हो गयी है और वह उस स्थिति का उपचार करने में थोडा भी सक्षम नहीं है। फिर भी यदि औषधि की एक बड़ी मात्रा दी जाये, तो रोगी का शरीर विष से भर जाएगा। आज कई रोगों का उपचार संभव नहीं हैं। पूरे ग्रह की यही अवस्था है; वास्तव में सब कुछ एक गंभीर सीमा तक पतित हो चुका है।
यीशु मनुष्यों के पापों को वहन करने में सक्षम थे, और बुद्ध शाक्यमुनि ने उनचास वर्ष अत्यधिक परिश्रम करते हुए लोगों को बचाने में व्यतीत किये। क्या वे सचेतन प्राणियों को विस्तृत रूप से बचाने के लिए नहीं आये थे? तो फिर उन्होंने सबको सीधे दिव्यलोक में क्यों नहीं भेज दिया? क्योंकि लोग उच्चतर लोकों के मानकों पर खरे नहीं उतरे थे; इस कारण से वे वहाँ नहीं जा सकते थे। प्रत्येक स्तर का अपना मानक होता है। यदि आप एक महाविद्यालय छात्र होने के लिए योग्य नहीं हैं, तो क्या आप महाविद्यालय जा सकते हैं? आप वहाँ इसलिए नहीं जा सकते क्योंकि ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिन्हें आप छोड़ नहीं सकते, और आपका शरीर बहुत अधिक लदा हुआ है। आपका नैतिक मानक जहाँ है, आप वहीं हैं। [ऊपर उठने का] एकमात्र मार्ग विद्यालय जाने के समान है : यदि आप अगली कक्षा या वर्ग तक पहुँच सकते हैं, तो आप वहाँ जाएंगे। बचे हुए सब और भी अधिक पतित होते जाएंगे और नष्ट हो जाएंगे। जब कचरा सड़ जाता है तो उसे ब्रह्मांड को दूषित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इसलिए उसे नष्ट करना पड़ता है।
व्यापक रूप से सचेतन प्राणियों को बचाना ही वह है जिसका बुद्ध उपदेश देते हैं और वे ऐसा ही करते हैं। या, और विशेष रूप से, यह तथागत के स्तर पर ऐसा होता है कि सचेतन प्राणियों को बचाने की चिंता की जाती है। जिन बुद्धों का स्तर तथागत से दुगुना उच्च है, वे साधारण मनुष्यों के मामलों की देखभाल नहीं करते हैं। यदि वे ऐसा करते, तो उनके केवल एक वाक्य का उच्चारण साधारण मनुष्यों के बीच परिवर्तन पैदा कर देता। इसलिए वे उनकी देखभाल नहीं कर सकते, क्योंकि उनकी शक्ति बहुत अधिक है। एक अधिक महान बुद्ध के लिए, पृथ्वी उनके पैर की अंगुली के जितनी भी पर्याप्त बड़ी नहीं है; और एक और भी अधिक महान बुद्ध के लिए, पृथ्वी उनके बालों के रोमकूप से भी बहुत छोटी है। एक बुद्ध जो वाक्य उच्चारण करते हैं, वे फा हैं और, जब बोले जाते हैं, तो तत्काल परिवर्तन उत्पन्न करते हैं। इस कारण से वे पृथ्वी पर के मामलों में कभी सम्मिलित नहीं होते हैं। जो व्यापक रूप से सचेतन प्राणियों को बचाने का कार्य करते हैं, वे तथागत और बोधिसत्व हैं।
तथागत बुद्ध मनुष्यों को साधारण प्राणी कहते हैं, किंतु बहुत उच्च स्तरों पर इससे भी उच्चतर दिव्य प्राणी तथागतों को, उस लोक तक पहुँचने पर और पीछे देखने पर, साधारण प्राणी मानते हैं। उस उच्च स्तर के एक दिव्य प्राणी की दृष्टि में, मनुष्य सूक्ष्मजीवों के समान भी नहीं हैं। एक दृष्टि डालने पर, [वे कहेंगे], "कितना सड़ा हुआ स्थान है, इसे गिरा दो! इसे नष्ट कर दो!" पृथ्वी ऐसा ही एक स्थान है। जो लोग मनुष्यों के प्रति दया दिखाते हैं, वे मनुष्यों के निकटतम बुद्ध हैं। यीशु तथागत के स्तर पर थे, और लाओ ज भी। उच्चतर स्तरों पर उपस्थित लोग मानव मामलों की परवाह नहीं करते हैं। यदि मनुष्य उन्हें पुकारते हैं, तो वे इसे नहीं सुन सकते। एक मनुष्य का उनका नाम पुकारना भी उनका अपमान करने के समान है। यह मल के एक ढेर से आने वाली आवाज के समान है, जो आपका नाम पुकार रहा है।
ज्ञान और साधना दो भिन्न चीजें हैं
यीशु, दूसरों की तरह, तथागत के स्तर पर थे। अतीत में, बुद्धों के लिए तथागत सबसे निम्न पदवी थी। पहले ऐसा होता था कि तथागत पदवी से नीचे वालों को बुद्ध नहीं कहा जाता था; उन्हें "बोधिसत्व" या "अर्हत" कहा जाता था। प्रत्येक तथागत का अपना दिव्यलोक ( तिआन-गुओ ) होता है। हमारी आकाशगंगा में सौ से अधिक तथागत हैं। इसका अर्थ है कि बुद्धों के दिव्य लोकों के सौ से अधिक लोक हैं। ऐसा प्रत्येक लोक एक तथागत द्वारा शासित होता है। प्रत्येक दिव्यलोक के लोक में तथागत के पास अपनी साधना पद्धतियां, लोगों को बचाने के लिए पद्धतियां होती हैं। उनके लोक का गठन सीधे उनकी अपनी साधना से संबंधित होता है। उनके लोक का निर्माण साधना का उत्पाद है। किंतु ये लोक ऐसी चीजें नहीं हैं जिन्हें आधुनिक मनुष्य साधना के माध्यम द्वारा निर्माण कर सके। वे अनगिनत कल्पों पहले अस्तित्व में आये थे।
यहाँ एक समस्या है। साधारण लोगों के रूप में, हम सोच सकते हैं कि साधना करते हुए, अधिक साधना पद्धतियों को सीखकर और विभिन्न धर्मों में जो सिखाया जाता है, उसे अधिक जानकर अपने मन को समृद्ध करना अच्छा है। और लोग ऐसी चीजों को अपनी साधारण लोगों की बुद्धिमत्ता और ज्ञान मानते हैं। वास्तव में, वे साधारण अर्थ में ज्ञान नहीं हैं, और आप इन चीजों को साधारण अवधारणाओं से नहीं आँक सकते। ऐसा क्यों है कि एक मनुष्य को साधना में अपने शिनशिंग पर ध्यान केंद्रित करना पड़ता है, और ताओवादी पद्धतियां सद्गुण पर क्यों जोर देती हैं? क्योंकि इस ब्रह्मांड का एक फा, एक विशेष गुण है। ब्रह्मांड के इस विशेष गुण की विभिन्न स्तरों पर विभिन्न प्राणियों के लिए भिन्न-भिन्न आवश्यकताएँ होती हैं। मनुष्य साधारण प्राणियों के इस स्तर पर हैं, इसलिए उन्हें साधारण मनुष्यों के लिए निर्धारित नैतिक मानक को पूरा करने की आवश्यकता है। ऐसा क्यों है कि वे [साधना में] प्रगति नहीं कर सकते हैं जब तक कि वे सद्गुण को महत्वपूर्ण न मानें? ऐसा इसलिए है क्योंकि साधारण मनुष्यों से उच्च स्तरों के लिए दिव्य प्राणियों के मानक हैं, और यदि आप उन पर खरे नहीं उतरते, तो आप वहाँ नहीं जा पाएंगे। दिव्यलोक के दिव्य प्राणी क्यों गिर सकते हैं? एक अर्हत क्यों गिर सकता है जब वह अच्छी तरह से साधना नहीं करता है? कारण यह है कि वे अब अपने संबंधित स्तरों के मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं।
तो, इस आकाशगंगा में सौ से अधिक दिव्यलोक हैं, और प्रत्येक दिव्यलोक पर एक तथागत का स्वामित्व होता है। उनके दिव्यलोक के गुण और संरचना उनकी साधना पद्धति से बनते हैं। हमने पाया है कि, चाहे वह धार्मिक पद्धतियों में हो या अन्य साधना मार्गों में, उपरी तौर पर गतिविधियाँ काफी सरल होती हैं—हाथों को जोड़कर ( जे-यिन ) ध्यान करना पर्याप्त होता है। यहाँ तक कि ताओवादी पंथ के मामले में भी, जिसमें अधिक गतिविधियों की आवश्यकता होती है, उनमें भी कुछ ही हैं और वे सरल हैं। तो फिर ऐसा कैसे है कि ऐसी पद्धतियां बुद्धों, बोधिसत्वों, और अर्हतों के उच्च स्तरों तक पहुँचने में सफल हो सकती हैं? यह इसलिए है क्योंकि गोंग का सच्चा विकास और रूपांतरण अत्यंत जटिल होता है। व्यक्ति की कोशिकाओं तक को विकसित और रूपांतरित होना होता है, दिव्य शक्तियों की एक पूरी श्रृंखला को विकसित होना होता है, और ऐसी बहुत सी चीजें हैं जो अभी भी मनुष्य को ज्ञात नहीं हैं—जो केवल कुछ निश्चित स्तरों के लिए उपयुक्त हैं—और इन्हें भी विकसित होना होता है। उपमा के लिए, वे मानव संसार को ज्ञात सबसे जटिल सटीक उपकरणों से भी अधिक जटिल हैं, और मनुष्य की पहुँच से बस बाहर हैं। इस प्रकार साधना जगत में एक कहावत है, जो कहती है, "साधना आप पर निर्भर है, जबकि गोंग गुरु पर निर्भर है।" दूसरे शब्दों में, एक सच्ची साधना पद्धति... भले ही ताओवादी पंथ के लोगों ने साधना पद्धतियों पर चर्चा की है, वे केवल सतही स्तर के सिद्धांतों और एक आकांक्षा का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे केवल वैचारिक हैं। यदि कोई वास्तव में उच्च-शक्ति पदार्थ से बने वास्तविक गोंग की साधना करने की आकांक्षा रखता है, तो उसे अपनी स्वयं की इच्छा से वह आकांक्षा, उसे करने की इच्छा, रखने की आवश्यकता है। किंतु वास्तविक विकास जो अन्य आयामों में होता है, वह असाधारण रूप से जटिल है, और मनुष्यों के साधनों से परे है। यह सब व्यक्ति के गुरु द्वारा किया जाता है।
तो, यहाँ एक समस्या है। यदि आप अपनी साधना में अन्य पद्धतियों से चीजों को मिलाते हैं, तो समस्याएँ आएँगी। अतीत में, भिक्षुओं को अन्य पद्धतियों के साथ संपर्क रखने की अनुमति नहीं थी, और पीढ़ियों से मठों ने भिक्षुओं को अन्य पद्धतियों के ग्रंथों को पढ़ने से कड़ाई से मना किया था। आजकल के भिक्षु गड़बड़ाए हुए हैं। पहले ऐसा होता था कि भिक्षुओं के पास कोई सांसारिक संपत्ति नहीं हो सकती थी, और उन्हें अन्य पद्धतियों के ग्रंथों को पढ़ने से पूरी तरह से वर्जित किया गया था। कारण यह है, उसे केवल एक ही साधना पद्धति के साथ रहने के लिए बाध्य करना आवश्यक है, एक ही साधना पद्धति पर दृढ़ता से बने रहना। केवल तभी जब उसका मन और विचार एक साधना की सामग्री से भरा होगा, वह स्थिरता से और ऊंचाई पर साधना कर पायेगा, एक ही मार्ग पर आगे बढ़ पायेगा। अन्यथा, यदि आप अपनी साधना में अन्य पद्धतियों की चीजों को मिलाते हैं, तो यह एक टेलीविजन सेट में एक कैमरे का भाग डालने के समान है—वह तुरंत बिगड़ जाएगा। मैं बस एक बात को समझा रहा हूँ। यदि एक व्यक्ति अपनी साधना में चीजों को मिलाता है, तो उसकी पूर्ण साधना व्यर्थ हो जाएगी, और वह अब प्रगति नहीं कर पायेगा। इसके अतिरिक्त, सच्ची चीजों और झूठी चीजों में अंतर करना कठिन है, और यदि आप दुष्ट, झूठी चीजों को मिलाते हैं, तो आप शायद पूरी तरह से व्यर्थ में साधना कर रहे होंगे। यहाँ तक कि आपके गुरु के पास भी कोई उपाय नहीं रहेगा, क्योंकि यह आपके शिनशिंग की समस्या होगी।
गोंग के विकसित और निर्मित होने की [प्रक्रिया] अत्यंत जटिल है, किंतु लोगों ने इसे ऐसे समझा है जैसे कि यह कोई साधारण मानव सिद्धांत हो। "मैं ईसाई धर्म से थोड़ा सीखूंगा, बौद्ध धर्म से थोड़ा, ताओ धर्म से थोड़ा, और कन्फ्यूशीवाद से थोड़ा।" वे इसे "एक ही छत के नीचे कई शिक्षाएँ" कह सकते हैं, किंतु वह वास्तव में निरर्थक है। धर्म विनाश काल के युग में उत्पन्न हुई यह सबसे बड़ी समस्या है। हर मनुष्य में बुद्ध स्वभाव है, साधना करने की एक इच्छा है, और अच्छा होना चाहता है। लेकिन, लोगों ने इन चीजों को साधारण मानव सिद्धांत समझा है। साधारण मानव कौशल के मामले में ऐसा हो सकता है कि आप जितना अधिक जानते हैं, उतना ही बेहतर है। किंतु एक व्यक्ति [जो अन्य पद्धतियों को मिलाता है] केवल उपस्थित गड़बड़ी को और अधिक जटिल बना रहा है। उसके पास साधना करने का कोई मार्ग नहीं होगा, और गोंग का लेश मात्र भी नहीं बचेगा।
एक धारणा, एक बार बनने पर, जीवन भर आपको नियंत्रित करेगी, आपकी सोच और यहाँ तक कि आपकी प्रसन्नता, क्रोध, दुःख, और आनंद जैसी सभी भावनाओं को भी प्रभावित करेगी। यह जन्म के बाद बनती है। यदि यह चीज कुछ समय के लिए बनी रहती है, तो यह किसी व्यक्ति की सोच का भाग बन जाएगी, उस व्यक्ति के सच्चे स्वयं के मस्तिष्क में मिल जाएगी, उस समय यह उसके स्वभाव को आकार देगी।
जो धारणाएँ विकसित होती हैं, वे एक व्यक्ति को उसके शेष जीवन के लिए बाधित और नियंत्रित करेंगी। एक मानवीय धारणा साधारणतः स्वार्थी—या इससे भी बदतर—होती है, और इस प्रकार विचार कर्म उत्पन्न करती है, जो परिणामस्वरूप, व्यक्ति को नियंत्रित करता है। एक मनुष्य को उसकी मुख्य आत्मा ( झू युआन-शेन ) द्वारा शासित होना चाहिए। जब आपकी मुख्य आत्मा शिथिल हो जाती है और धारणाओं द्वारा प्रतिस्थापित हो जाती है, तो आप पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण कर चुके होते हैं, और आपका जीवन अब उनके नियंत्रण में हो जाता है।
जो स्वयं आप हैं, वह जन्मजात स्वयं है, और वह नहीं बदलता। किंतु एक मनुष्य चीजों को समझते समय सरलता से धारणाएँ बनाने की प्रवृत्ति रखता है, और वे धारणाएँ आप नहीं हैं। यदि आप कोई धारणाएँ न बनाने का प्रबंधन कर सकते हैं, तो जब आप किसी चीज को देखते हैं तो आपके पास आपकी अपनी करुणामयी, जन्मजात प्रकृति की समझ होगी—सच्चे स्वयं का दृष्टिकोण—और मामले को उदारतापूर्वक देखेंगे। सच्चा स्वयं जितना अधिक सामने आता है, आपकी सोच का स्तर उतना ही ऊंचा होता है और आपके विचार सत्य के उतने ही निकट होते हैं, और इस प्रकार वह सीमा उतनी ही अधिक होती है जिस तक आपके विचार आपकी जन्मजात, करुणामयी प्रकृति के क्षेत्र को समाहित करते हैं। अत्यधिक, अत्यधिक सूक्ष्म कण जो मानव शरीर का गठन करते हैं, एक मनुष्य की प्रकृति का निर्माण करते हैं, एक ऐसी चीज जो कभी नहीं बदलती। जब वे सीमाएँ जो एक व्यक्ति की सोच को सीमित करती हैं, हटा दी जाती हैं, तो मनुष्य की करुणामयी प्रकृति, स्वभाव, चरित्र, और विशेषताएँ तुरंत स्पष्ट हो जाती हैं, और वही सच्चा आप है।
मुख्य आत्मा व्यक्ति की धारणाएँ विकसित करने के कारण नहीं बदलेगी; विकसित धारणाएँ मुख्य आत्मा के आंतरिक गुणों को नहीं बदलेंगी। हालांकि, यह हो सकता है कि, विभिन्न मानवीय धारणाओं और कर्म के स्वरूपों के कारण, एक व्यक्ति का जन्मजात प्रकृति दब जाए, ढक जाए, पूर्ण रूप से घिर जाए, और सामने आने में असमर्थ हो। किंतु वह बदलेगा नहीं। यह इसलिए है क्योंकि कर्म में उतना सूक्ष्म या उतना छोटा पदार्थ नहीं होता है। कर्म साधारण मनुष्यों के बीच उत्पन्न होता है, इसलिए यह साधारण मनुष्य का एक पदार्थ है। उस सामग्री के लिए इतना सूक्ष्म होना संभव नहीं है, जबकि जब एक मनुष्य के जीवन का निर्माण किया जाता है, तो अत्यधिक सूक्ष्म पदार्थों का उपयोग किया जाता है। यही कारण है कि कर्म उसे भेद नहीं सकता। यह केवल इतना है कि व्यक्ति की मूल प्रकृति दब गयी है। किसी की मूल प्रकृति का चीजों को देखने का अपना तरीका होता है। यदि आप जन्म के बाद बनी धारणाओं को वास्तव में हटा सकते हैं और अपनी मूल प्रकृति की समझ को वापस पा सकते हैं, तो यह वहीँ से होगी जहाँ से आप आये थे, सबसे शुरुआती अवधारणाएँ जो आपने बनायी थीं—अर्थात्, उस स्थान की अवधारणाएँ जहाँ आपका सबसे पहले निर्माण किया गया था। किंतु जन्म के बाद प्राप्त सोच और धारणाओं को पराजित करना बहुत कठिन है, क्योंकि साधना इसी को कहते हैं।
फा की विभिन्न स्तरों पर भिन्न-भिन्न अभिव्यक्तियाँ होती हैं। एक निश्चित स्तर पर, उस स्तर की उसकी अभिव्यक्तियाँ होती हैं। यदि आप उस स्तर पर जन्में हुए एक प्राणी हैं, तो आपकी सोच उस स्तर के फा की अवधारणाओं को प्रतिबिंबित करेगी। जब आपकी सच्ची मूल प्रकृति लौट आती है, तो वही वह स्तर होगा जिस पर आप चीजों को समझेंगे, और वह मानक आप, स्वयं हैं।
कर्म में सत्य, करुणा, सहनशीलता (जन शान रेन) का मानक नहीं है; यह उस मानक के अनुसार चीजों का मूल्यांकन करता है जो उस समय बन गया था जब धारणाएँ बनीं। यह एक व्यक्ति को वह बना सकता है जिसे साधारण लोग एक "चालाक व्यक्ति" या "सांसारिक" व्यक्ति कहते हैं। जब ऐसा होता है, तो यह एक ऐसा मामला है जिसमें विचार-कर्म के विभिन्न स्वरूप जो एक व्यक्ति साधना करते समय उत्पन्न करता है, कार्य करने लगते हैं, और वे साधना में बाधा डालते हैं। यदि लोग कर्म से बाधित नहीं होते, तो साधना सरल होती। इस प्रकार का कर्म विशिष्ट परिस्थितियों में और पिछले कुछ वर्षों के नैतिक मानकों के संदर्भ में बना था, इसलिए यह उन मानकों के प्रकाश में चीजों का मूल्यांकन करता है। यदि इस सामग्री की बड़ी मात्रा बनती है, तो व्यक्ति अपने शेष जीवन के लिए इसके प्रभाव में रहेगा। जब विकसित धारणाओं को लगता हैं कि कुछ अच्छा या बुरा है, तो वह व्यक्ति भी ऐसा ही सोचेगा और सोचेगा कि चीजें तदनुसार की जानी चाहिए। किंतु उसका वास्तविक स्वयं अब अस्तित्व में नहीं होता है। उसका वास्तविक स्वयं पूरी तरह से उसकी निर्दयी, अर्जित धारणाओं से घिरा और दबा हुआ होता है। उसके पास अब अच्छाई और बुराई में अंतर बताने के लिए अपना, सच्चा मानक नहीं होता है।
धारणाएँ मस्तिष्क के विचारों के भीतर बनती हैं, और धारणाओं द्वारा उत्पन्न विचार-कर्म कर्म का एक समूह है जो एक व्यक्ति के सिर के ऊपर आकार लेता है। तो फिर, करुणामयी विचारों का क्या? शाक्यमुनि के पद्धति ने सिखाया है कि केवल विचार के आरंभ होने का अर्थ है कर्म का उत्पन्न होना। और वास्तव में, जिसे "करुणामयी विचार" कहा जाता है, यदि एक उच्चतर मानक, या सत्य, करुणा, सहनशीलता (जन शान रेन) के उच्चतर मानक की आवश्यकताओं के साथ मापा जाए, तो उसे अन्यथा देखा जाता है।
इसका अर्थ यह है कि एक साधारण व्यक्ति जो इस संसार में रहता है, स्वयं को नहीं खोज सकता। और धारणाएँ एक व्यक्ति को केवल एक जीवनकाल के लिए नहीं, बल्कि निरंतर आगे भी नियंत्रित करती रहती हैं। केवल तभी जब एक परिवर्तन होता है, वे समाप्त होंगी। ऐसा न होने पर, वे नियंत्रण जारी रखेंगी। जैसे-जैसे धारणाएँ निरंतर शक्तिशाली होती जाती हैं, व्यक्ति का वास्तविक स्वयं वास्तव में अस्तित्व में नहीं रहता है। अब यह कहा जाता है कि कर्म परत दर परत जमा हो गया है। और यह वास्तव में उस बिंदु तक पहुँच गया है। साधारण लोगों को देखिए। वे नहीं जानते कि वे अपने दिन किस प्रकार व्यतीत करते हैं, और न ही कि वे किसके लिए जीते हैं!
लोगों में विभिन्न आध्यात्मिक क्षमताएँ और आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि की शक्तियाँ होती हैं, जो इस सिद्धांत को स्पष्ट करता है। कुछ लोग आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि के माध्यम से चीजों को समझ सकते हैं, जिसका अर्थ है कि उनका बुद्ध स्वभाव सतह पर उभर सकता है। उनके लिए आशा है। हालांकि, कुछ लोग आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि के माध्यम से चीजों को समझने में असमर्थ हैं, और वह इसलिए है क्योंकि वे जमा की हुई धारणाओं और विचारों में बहुत गहराई तक दबे हुए हैं। ऐसे में उनके लिए कोई आशा नहीं है।
बिना दाओ की साधना किये दाओ में रहना
साधना का नाम ऐसा इसलिए रखा गया है क्योंकि यह स्वयं की साधना करने की एक पद्धति, अनुसरण करने का एक मार्ग प्रदान करती है। अतीत में एक कहावत थी जिसका भाव था, "यह व्यक्ति दाओ की साधना नहीं करता, और फिर भी वह दाओ में है।" एक लघु मार्ग का पालन करते हुए, वह "कुछ नहीं होने" या "शून्यता" को महत्व देता है। वह भाग्य के अनुसार इस संसार में अपना जीवन जीता है। वह संसार में शांति से जीता है। वह सोचता है, "यदि यह मेरा होना निश्चित है तो मुझे दे दो, और यदि नहीं है, तो मुझे नहीं चाहिए।" वह साधना के विशिष्ट स्वरूपों का पालन नहीं करता है। वह यह भी नहीं जानता कि "साधना" क्या है। फिर भी उसके जैसे लोगों की देखभाल करने वाले गुरु होते हैं। और वह शायद ही कभी दूसरों के साथ विरोध करता है। इसे ही लोग "दाओ की साधना किये बिना दाओ में रहना" कहा करते थे। साधारण लोग भी, उनकी तरह, चीजों से दूर रहने का प्रबंधन कर सकते हैं, किंतु अंततः वे एक फल पदवी प्राप्त नहीं करेंगे। ऐसा व्यक्ति गोंग प्राप्त नहीं करेगा, और केवल असीमित पुण्य, एक बड़ी मात्रा, जमा कर सकता है। और कई लोग उसे हानि पहुँचाएंगे, क्योंकि एक अच्छे व्यक्ति के लिए सरल नहीं होता है। किंतु इसका परिणाम केवल पुण्य की एक बड़ी मात्रा होगी। यदि वह एक साधना शुरू करता है, तो वह स्वाभाविक रूप से बहुत अधिक गोंग में परिवर्तित हो जाएगा। यदि वह एक साधना शुरू नहीं करता है, तो उसे शायद अपने अगले जीवन में आशीर्वाद मिलेगा, एक उच्च-पदस्थ अधिकारी बनेगा या धन कमाएगा। इसके विपरीत, दाओ की साधना नहीं करने वाले अधिकांश लोगों की विशेष पृष्ठभूमि होती है, निश्चित रूप से, और उनकी देखभाल करने वाले लोग होते हैं। वह दाओ की साधना न करने की अवस्था में है, और फिर भी उसके विचार, उसका स्तर, दाओ में हैं, और इस प्रकार भविष्य में वह अपने मूल स्थान पर लौट जाएगा। दाओ की साधना किये बिना, वह उसकी साधना कर रहा है—कोई उसके लिए गोंग को रूपांतरित कर रहा है भले ही वह यह नहीं जानता। उसका जीवन दुर्भाग्य से भरा है, और वह कष्ट सहता है और अपना कर्म चुकाता है। उसका शिनशिंग उसके जीवन के दौरान बिना उसके जाने सुधार करता है, और उसकी अवस्था हमेशा ऐसी ही होती है। ये विशेष पृष्ठभूमि वाले लोग हैं। एक साधारण व्यक्ति के लिए यह करना कठिन है।
कन्फ्यूशियस ने मनुष्य के लिए आचरण करने का एक ऐसा तरीका छोड़ा जो एक मनुष्य के अनुकूल है—मध्यमार्ग का सिद्धांत। लाओ ज ने साधना के लिए एक पद्धति सिखायी। किंतु जैसे कि हुआ है, चीनी लोगों ने कन्फ्यूशियस के विचारों को ताओवादी पंथ के विचारों के साथ मिला दिया। और, सोंग वंश के प्रारंभ में, बौद्ध विचार उनमें मिश्रित होने लगे। उसके बाद बौद्ध विचारधारा इस प्रकार पहचान से परे हो गयी। और सोंग वंश के बाद, बौद्ध धर्म ने चीनी कन्फ्यूशीवाद से चीजों को सम्मिलित किया, जैसे पितृभक्ति और इस प्रकार की—उस प्रकार की बहुत अधिक चीजें। किंतु बौद्ध पंथ में वास्तव में उस प्रकार की कोई चीज सम्मिलित नहीं है। बौद्ध पंथ मानव मामलों को महत्त्व नहीं देता है, और उसके अनुसार, कौन जानता है कि एक व्यक्ति के अनेक जीवनकालों में कितने माता-पिता रहे होंगे। केवल तभी जब आप ऐसे सभी मोहभावों को छोड़ देते हैं और एक शांत और स्थिर मन से साधना करते हैं, तो आप सफलता प्राप्त कर सकते हैं। वे मोहभाव हैं। तो, कन्फ्यूशियस के विचारों को [बौद्ध धर्म में] सम्मिलित किये जाने के बाद, पारिवारिक स्नेह का मोहभाव उत्पन्न हुआ।
मिट्टी से मनुष्य के सृजन की कथा
मनुष्य सबसे निम्न स्तर पर यहाँ विद्यमान हैं, और ऊपर दिव्यलोकों की परतों पर परतें हैं। एक तथागत इस स्तर पर है। यीशु तथागत के स्तर पर थे, जैसे लाओ ज थे। उस स्तर पर वे जो देख सकते थे, वह वहाँ तक और उनसे नीचे जो कुछ भी था, उसी तक सीमित था। वे अपने से ऊपर बहुत कम देख सकते थे, बहुत अधिक ऊपर देखना तो दूर की बात है। यह उनके स्तरों के कारण था जो यह निर्धारित करते थे कि उनके पास कितनी बुद्धिमत्ता होनी चाहिए।
तो फिर मिट्टी से मनुष्य के सृजन का विचार जो यीशु को ज्ञात था, वह एक अभिव्यक्ति थी जिसका वह उपयोग कर रहे थे जो उस अस्तित्व से आयी थी जिसे वह प्रभु मानते थे—"परमेश्वर ने मनुष्य को मिट्टी से बनाया।" क्या वह उस मिट्टी की बात कर रहे थे जिसे साधारण लोग जानते हैं? नहीं। वह, वह मिट्टी नहीं थी जिसे साधारण लोग जानते हैं। बल्कि, उच्चतर आयामों में सभी पदार्थ, मिट्टी सहित, एक अधिक सूक्ष्म स्तर का उच्च-शक्ति पदार्थ है। तो फिर वह "मनुष्य" जिसका उन्होंने वर्णन किया, किस काल में बनाया गया था? क्या यह पृथ्वी पर सभ्यता के उद्गम से पहले किया गया था, या किसी अन्य समय पर? वास्तव में इसका विवरण एक दूरस्थ दंतकथा में सम्मिलित था, और उन्होंने उसे लोगों को बताया—अर्थात्, कि परमेश्वर ने मनुष्य को मिट्टी से बनाया।
किंतु वास्तव में, यह इस मानव आयाम की मिट्टी नहीं है। उन आयामों में मिट्टी जीवित है, और जो चीजें उन स्थानों को बनाती हैं, यदि यहाँ लायी जाए, तो वे गोंग की तरह होती हैं। वह मनुष्य के वहाँ बनाये जाने की बात कर रहे थे। दिव्य प्राणियों की त्वचा यहाँ हमारी त्वचा से अधिक उत्कृष्ट और कोमल होती है। यह उन कोशिकाओं के न होने के कारण है जो हमारी तरह के पदार्थों की एक परत से बनी हैं; उनकी कोशिकाएँ अधिक उत्कृष्ट और सूक्ष्म पदार्थों से बनी हैं। जब उन्हें साधारण मनुष्य के इस आयाम में भेज दिया गया, तो पता चला कि वे मनुष्य के समान थे। यह केवल इतना था कि वे एक विशेष रूप से कोमल दिखावट के साथ असाधारण रूप से सुंदर दिखते थे। इसी कारण मनुष्य के लिए कोशिकीय पदार्थ की एक बड़ी शारीरिक परत जोड़नी पड़ी। और इस प्रकार मनुष्य वैसा रूप धारण करते हैं जैसा की है।
दिव्यलोकों के लोगों के भी शरीर होते हैं, और जब वे यहाँ उड़कर आते हैं तो वे हमारे समान दिखते हैं। चीन के बड़े पर्वतों के नीचे दिव्य प्राणियों के शव दफन हैं। जब उनका देहांत हुआ तो उनके शरीरों को पर्वतों के नीचे दफना दिया गया। ये लोग लगभग मनुष्यों के समान दिखते हैं, इसके विपरीत जो धर्मग्रंथों में वर्णन किया गया था। जब यीशु संसार में थे तो वास्तव में उन्होंने लोगों के लिए कोई धर्मग्रंथ नहीं छोड़े। बल्कि, यह उनके बाद के लोग, उनके अनुयायी थे, जिन्होंने उन्हें लिखा, और उन्होंने ऐसा अपने समय के अनुसार किया। बुद्ध शाक्यमुनि ने भी कोई धर्मग्रंथ नहीं छोड़े थे; यह भी उनके अनुयायी ही थे जिन्होंने उन्हें लिखा। और उनके अनुयायियों ने वह मूल अर्थ नहीं समझा जो उन्होंने सुना, कि किस प्रकार के लोगों का संदर्भ दिया गया था, या वर्णित चीजों का ऐतिहासिक संदर्भ क्या था।
[यीशु] ने कहा कि मनुष्य को मिट्टी से बनाया गया था, जिसने साधारण लोगों को उलझा दिया, क्योंकि उनके शरीर मिट्टी के बने हुए प्रतीत नहीं होते हैं। बात यह है कि अत्यंत उच्च स्तरों पर मिट्टी हमारे मांस के शरीरों के पदार्थ से श्रेष्ठ है। स्तर जितना उच्च होता है, वह उतना ही श्रेष्ठ होता है।
निम्न-स्तर के मनुष्य के अस्तित्व से पहले के एक सुदूर काल में, ऊपर के प्राणियों ने अन्य आयामों में मनुष्य को बनाया। जिस क्षण मैं किसी आयाम से कहता कि कुछ बनाओ, वह तुरंत आकार ले लेता, और किसी भी वस्तु को उसके विचार मात्र से बनाया जा सकता था—हवा में उंगली से इशारा किया और वह बन जाती—हालांकि अन्य आयामों में। दूसरे शब्दों में, अतीत में संसार को बनाने, दिव्यलोकों के एक स्तर को बनाने के बारे में जो कहा गया था, या ब्रह्मांड को बनाने के संबंध में बौद्ध धर्मग्रंथों ने जो कहा था—वे चीजें सभी बुद्धों की शक्ति की अभिव्यक्तियाँ थीं। यह हमें क्या बताता है, सकारात्मक कर्म, अच्छा कर्म, और बुरा कर्म सभी उनके द्वारा "कर्म" या "क्रिया" के रूप में वर्गीकृत किये गए थे। ये सभी चीजें बुद्धों द्वारा बनायी गयी थीं।
महान शक्ति वाला एक बुद्ध वास्तव में दिव्यलोकों के एक स्तर का तुरंत सृजन कर सकता है, और बुद्ध का स्तर जितना ऊंचा होता है, वे जो दिव्यलोक बनाते हैं, वह उतना ही भव्य होता है। और बड़ी बात यह है कि, उन्हें अपने हाथों का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं होती है; केवल अपना मुंह खोलना और ऐसा कहना पर्याप्त होता है। और एक और भी उच्चतर बुद्ध के लिए, केवल एक विचार पर्याप्त है—केवल एक विचार से यह हो जाता है। यही कारण है कि जिन बुद्धों के स्तर तथागत से उच्चतर होते हैं, वे साधारण मानव मामलों का प्रबंधन नहीं कर सकते हैं; केवल एक विचार के उत्पन्न होने पर, पृथ्वी पर चीजें तुरंत बदल जाएंगी। किंतु एक तथागत बुद्ध भी यहाँ चीजों को प्रत्यक्ष रूप से नहीं संभालते हैं। बल्कि, वह केवल मार्गदर्शन देते हैं, और बोधिसत्व उनपर कार्य करते हैं।
आधुनिक विज्ञान की सीमाएँ और बुद्ध फा की विस्तृति और गहराई
बुद्ध शाक्यमुनि ने जो धर्म प्रदान किया, केवल उससे भी, मनुष्य बुद्ध फा की विशालता को अनुभव करने में सक्षम रहे हैं। किंतु फा बहुत ही विशाल है—वास्तव में ऐसा ही है। बुद्ध शाक्यमुनि ने जो सिखाया, वह उनके स्तर के अनुसार, तथागत फा था। और वह भी साधारण लोगों को बहुत उच्च लगता था। अतीत में, केवल एक तथागत को ही बुद्ध कहा जा सकता था। न तो बोधिसत्व और न ही अर्हत बुद्ध थे; दोनों में से कोई भी एक बुद्ध के स्तर तक नहीं पहुंचा था। इसलिए पहले ऐसा होता था कि जब भी कोई "बुद्ध" शब्द कहता था, तो वह एक तथागत की बात कर रहा होता था। किंतु तथागत ब्रह्मांड में सबसे उच्चतम पद नहीं है; बल्कि, यह बुद्ध का सबसे निम्नतम स्तर है। और बुद्धों में, केवल सबसे निम्नतम स्तर के लोग ही साधारण मानव मामलों की देखभाल करते हैं। बहुत उच्च स्तर के बुद्ध ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि जिस क्षण वे अपना मुंह खोलेंगे, पृथ्वी पर परिवर्तन हो जाएंगे। इसकी अनुमति कैसे दी जा सकती है? वे बिलकुल भी सम्मिलित नहीं हो सकते हैं। इस प्रकार केवल तथागत ही मानव चीजों की देखभाल करते हैं। हालांकि, तथागत व्यक्तिगत रूप से चीजों को नहीं संभालते हैं। यह बोधिसत्व हैं जो लोगों को बचाने का कार्य करते हैं। इसलिए केवल तथागत के स्तर को प्राप्त करना भी असाधारण है।
सूक्ष्म स्तर पर [एक तथागत] रेत के एक कण में तीन हजार लघु ब्रह्मांडों को देख सकते हैं। बुद्ध शाक्यमुनि की शिक्षाओं में तीन हजार लघु ब्रह्मांडों का सिद्धांत है। उन्होंने कहा कि आकाशगंगा में मनुष्यों के जैसे तीन हजार ग्रह थे, जिनमें मनुष्यों के समान जीवन सम्मिलित था। वास्तव में तीन हजार से अधिक हैं। उन्होंने यह भी कहा कि रेत के एक कण में तीन हजार लघु ब्रह्मांड हैं। अर्थात्, रेत के केवल एक कण में इस प्रकार के तीन हजार संसार विद्यमान हैं जिनमें मनुष्य रहता है, कुछ ऐसा जो अकल्पनीय है। जब दिव्य नेत्र खुलते हैं, तो वह चीजों को इस प्रकार देख सकता है जैसे कि वे बड़ी की गई हैं, और सूक्ष्म स्तर पर विद्यमान उन जैसी छोटी चीजों को देख सकता है। किंतु, केवल इसकी कल्पना कीजिए। रेत के एक कण में तीन हजार लघु ब्रह्मांड हैं। तो फिर, उस रेत के कण में तीन हजार लघु ब्रह्मांडों में सागर और नदियाँ हैं, हैं ना? तो फिर, क्या उन नदियों की रेत में और तीन हजार लघु ब्रह्मांड हैं? तो, यहाँ तक कि बुद्ध शाक्यमुनि ने भी पदार्थ का मूल नहीं देखा था। इस प्रकार उन्होंने कहा, "उसकी सूक्ष्मता ऐसी है कि कोई आंतरिक भाग नहीं है," जिसका अर्थ है कि वह इतना छोटा है कि पदार्थ का मूल दिखायी नहीं देता है।
आज भौतिकी केवल यह पता लगा सकती है कि एक अणु परमाणुओं से बना है, और एक परमाणु एक नाभिक और इलेक्ट्रॉनों से बना है। सूक्ष्म जगत में आगे क्वार्क और न्यूट्रिनो हैं। और यह इतने तक ही जा सकता है, बस इतना ही। तो फिर और नीचे की ओर जाते हुए, पदार्थ का मूल क्या है? यहाँ तक कि सूक्ष्मदर्शी भी क्वार्क और न्यूट्रिनो का पता नहीं लगा सकते। उनका अस्तित्व केवल अन्य उपकरणों की सहायता से ही जाना जाता है। आगे क्या है, इसका उत्तर देने में मनुष्य की प्रौद्योगिकी बहुत कम पड़ती है। जहाँ तक बड़ी चीजों का प्रश्न है, मनुष्य मानता है कि ग्रह सबसे बड़ी वस्तुएँ हैं। किंतु बुद्ध शाक्यमुनि ने इसे इस प्रकार नहीं देखा। बुद्ध शाक्यमुनि ने जो देखा, वह वास्तव में बहुत बड़ा था। उन्होंने देखा की कि ग्रह सबसे बड़े नहीं थे। हालांकि, और ऊपर देखने पर, वह शिखर नहीं देख सके। अंत में उन्होंने इस प्रकार कहा, "उसकी विशालता इतनी है कि कोई बाह्य नहीं है।" तो उनके इस कथन का अर्थ था, "उसकी विशालता इतनी है कि कोई बाह्य नहीं है; उसकी सूक्ष्मता इतनी है कि कोई आंतरिक नहीं है," कि वह इतना विशाल है कि उसकी कोई सीमा नहीं है, और इतना छोटा है कि उसका मूल नहीं देखा जा सकता है।
जीवित प्राणी जटिल हैं, और ब्रह्मांड की संरचना अत्यंत जटिल है। आज मनुष्य के पास जो ज्ञान है, वह अपने शिखर पर पहुँच गया है। शिखर पर पहुँचने के बाद, यह एक ऐसी चीज बन गया है जो मनुष्य के विज्ञान के विकास को सीमित कर देता है। उदाहरण के लिए, कई निपुण वैज्ञानिकों ने भौतिकी और रसायन विज्ञान के क्षेत्रों में मूल सिद्धांत स्थापित किये हैं। उन मूल सिद्धांतों की सीमाओं के भीतर, जो वे कहते हैं वह वास्तव में सत्य है। और उनके आधार पर आगे बढ़ना ठीक होगा। हालांकि, सत्य एक बहु-स्तरीय चीज है। जब आप उनके मूल सिद्धांतों को पार करते हैं, तो आप पाएंगे कि मूल सिद्धांतों ने वास्तव में लोगों को सीमित करने का कार्य किया है।
वर्त्तमान के विज्ञान की चीजें भी अलग नहीं हैं। कुछ लोग विज्ञान की एक परिभाषा स्थापित कर देते हैं, और इस प्रकार कोई चीज “वैज्ञानिक” तभी मानी जाता है जब वह उस परिभाषा के अनुरूप हो। और जब आप उसकी सीमाओं के भीतर रहते हैं, तो सबको लगता है कि वह वैज्ञानिक है। जब आप उसकी परिभाषा से आगे निकल जाते हैं, तो आप पाते हैं कि इसने मानव जाति की प्रगति को सीमित करने का कार्य किया है। वहाँ किसी भी अमूर्त या अदृश्य चीज की अनुमति नहीं है, इसलिए यह जो सीमाएँ लागू करता है, वे महत्वपूर्ण हैं। जिन बुद्धों, ताओवादी देवताओं, और देवों की हम बात करते हैं, वे अन्य आयामों में विद्यमान हैं जिन्हें मनुष्य छू या देख नहीं सकता। तो फिर यदि उन प्राणियों को वर्तमान के विज्ञान की पद्धतियों का उपयोग करके खोजा जाए, तो क्या वह उन्हें वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं कर देगा? हाँ कर देगा! किंतु पश्चिम ने जिसे “वैज्ञानिक” माना है, उसकी एक परिभाषा बनायी है, और ऐसी कोई भी चीज जिसे आधुनिक विज्ञान समझाने में असमर्थ है, निश्चित ही, केवल एक धर्मशास्त्रीय या धार्मिक सिद्धांत के रूप में निरस्त कर दी जाती है। यह ऐसी चीजों को मानने का साहस नहीं करता है।
पश्चिमी विज्ञान एक चरम सीमा तक पहुँच गया है। बौद्ध पंथ मानता है कि हर चीज सृजन, स्थिरता, और विनाश के चरणों से गुजरती है। सृजन का अर्थ है आकार लेना, जबकि स्थिरता का अर्थ है एक निश्चित चरण में बने रहना। यूरोप का विज्ञान, अपने स्थापित ढाँचे से सीमित, अब स्वयं को आगे बढ़ने में असमर्थ पाता है। आगे के शोध में वह जो कुछ भी खोज सकता है, वह उसके विज्ञान की सीमाओं से परे होगा, इसलिए वह ऐसी चीजों को सीधे-सीधे धार्मिक या धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों के रूप में समाहित कर देता है। किंतु यदि कोई व्यक्ति उन चीजों को खोजता है जो वर्तमान वैज्ञानिक ज्ञान में विद्यमान नहीं हैं, और ऐसा मनुष्य के आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से करता है, या ऐसी चीजों को खोजता है जो अमूर्त और अदृश्य हैं और उन्हें हमारे समय की वैज्ञानिक पद्धति से अध्ययन करता है, तो क्या वह वैज्ञानिक नहीं है? समस्या, हालांकि, यह है कि वैज्ञानिक क्या माना जाता है, उसे बहुत पहले ही पत्थर पर लिख दिया गया है, और उसकी सीमाओं से परे किसी भी चीज को सीधे-सीधे नकारा जाता है। आगे की प्रगति के लिए कोई मार्ग नहीं छोड़ा जाता है।
और कुछ वैज्ञानिक, ऐसे विद्वान हैं जिन्हें कुछ क्षेत्रों में निपुण माना जाता है, जिन्होंने बहुत सारे मूल सिद्धांत स्थापित किये हैं। ये वैज्ञानिक, जैसे न्यूटन और आइंस्टीन, साधारण लोगों के मानदंडों से बहुत निपुण थे और औसत व्यक्ति की तुलना में बहुत कुछ समझ सकते थे। और अपनी वैज्ञानिक विरासत के साथ जो मूल सिद्धांत उन्होंने स्थापित किये, मूल्यवान ज्ञान के एक भंडार के रूप में उपलब्ध हैं। फिर भी, कोई भी शोध जो होती है या समझ जो उनके विचार की सीमाओं के भीतर कार्य करके प्राप्त की जाती है, कुछ निश्चित क्रम का पालन करने के लिए बाध्य है। यदि, वे जो उनके बाद आयेंगे, उन वैज्ञानिकों के सैद्धांतिक ढाँचों के भीतर पूरी तरह से कार्य करेंगे, तो आने वाली पीढ़ी कभी भी उनसे आगे नहीं निकल पायेगी और न ही नये अविष्कार अनुभव कर पायेगी।
जब किसी की खोज या आविष्कार पहले से स्थापित किये गए मूल सिद्धांतों की सीमाओं से परे होता है, तो यह समझ लिया जाएगा कि स्थापित किये गए मूल सिद्धांत लोगों को प्रतिबंधित कर रहे थे। ऐसा इसलिए है क्योंकि उच्चतर स्तरों पर उच्चतर ज्ञान के रूप, और उच्चतर सत्य पाये जा सकते हैं। पदार्थ के हमारे ज्ञान का एक अच्छा उदाहरण है। पहले ऐसा होता था कि मनुष्य को ज्ञात पदार्थ का सबसे छोटा कण परमाणु नाभिक था। हालांकि, अब ऐसा नहीं है, क्योंकि अब क्वार्क और फिर न्यूट्रिनो भी हैं। बात यह है कि मनुष्यों ने निरंतर ऐसी चीजों के बारे में अधिक ज्ञान प्राप्त किया है। किंतु एक नया मूल सिद्धांत स्वयं, किसी और चीज की खोज पर, एक और प्रतिबंध के रूप में कार्य करेगा। यह ऐसे ही होता है। तथ्य यह है कि ऐसे मूल सिद्धांत साधारणतः लोगों को सीमित करने का कार्य करते हैं।
आइंस्टीन कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे। उन्होंने पाया कि धर्म, और यहाँ तक कि धर्मशास्त्र ने जो सिखाया वह सत्य था। भौतिक संसार के बारे में मनुष्य की समझ मानव प्राणियों के ज्ञान तक सीमित है, ठीक उसी प्रकार जैसे स्थापित किये गए वैज्ञानिक मूल सिद्धांत। यदि लोग वास्तव में गहराई से शोध करें, और उनके प्रयास आगे बढ़ें, तो वे पाएंगे कि धर्मों ने जो सिखाया है वह सत्य है। इस प्रकार मनुष्य के स्तर से एक स्तर ऊपर के स्तर पर विद्यमान जीव एक स्तर ऊपर के विज्ञान और प्रौद्योगिकी का प्रतिनिधित्व करते हैं, और विज्ञान और प्रौद्योगिकी जो उन्हें उपलब्ध है उसके माध्यम से संसार की उनकी समझ साधारण मनुष्य की समझ से आगे है। यही कारण है कि आइंस्टीन ने, मानव विज्ञान और प्रौद्योगिकी के शिखर पर पहुँचने के बाद और फिर अपने कार्य में गहराई से जाँच करने पर, पाया कि धर्म ने जो सिखाया वह पूरी तरह से मान्य था। वर्तमान में कई वैज्ञानिकों और दार्शनिकों ने अंततः धर्म को माना है—और ये उपलब्धि प्राप्त व्यक्ति हैं। इसके विपरीत, जो लोग वर्तमान विज्ञान द्वारा स्थापित सीमाओं और उसमें अपने अंधविश्वास के कारण पंगु हैं, वे श्रेणीबद्ध रूप से [विज्ञान की पहुँच से परे] उन चीजों को "अवास्तविक विज्ञान" का नाम दे देते हैं।
“सभी साधना मार्ग एक ही ओर जाते हैं”
यह कहावत कि "सभी साधना मार्ग एक ही ओर जाते हैं" साधारण रूप से एक विशिष्ट साधना मार्ग के संदर्भ में सिखायी जाने वाली चीज है। ताओवादी पंथ मानता है कि छत्तीस सौ साधना मार्ग हैं, जो सभी दाओ तक पहुँचा सकते हैं। बौद्ध पंथ मानता है कि उसके पास चौरासी हजार साधना मार्ग हैं जिनके द्वारा कोई बुद्धत्व की साधना कर सकता है। हालांकि, यदि कोई व्यक्ति कई भिन्न-भिन्न धर्मों को मिलाने और उन्हें एक ही समय पर एक साथ साधना करने का प्रयास करता है, तो वह पूरी तरह से भिन्न चीज है [जिसका संदर्भ कहावत में है]। मनुष्य दिव्य मामलों को कैसे जान सकते हैं? वे जो करने का प्रयास कर रहे हैं, वह बस पूरी तरह से बकवास है।
प्राचीन चीन में "मार्ग की एकता" (यिगुआनदाओ) के रूप में जाना जाने वाला एक समूह था। यह समूह, जो चिंग वंश के अंतिम काल में अस्तित्व में आया, पाँच धर्मों के एकीकरण को बढ़ावा देता था। यह एक विधर्मी पंथ था, और जिस क्षण यह चिंग में प्रकट हुआ, लोगों ने इसे समाप्त करने का प्रयास किया; महान चिंग के सम्राटों ने इसे नष्ट करने का प्रयास किया। गणतंत्र काल की शुरुआत में, राष्ट्रवादी दल (केएमटी) ने भी इसी प्रकार इसे नष्ट करने का प्रयास किया, इसके सदस्यों को बड़ी संख्या में फाँसी दी। जब क्रांति के दौरान साम्यवादी दल ने सत्ता संभाली, तो उसने भी इसी प्रकार समूह के सदस्यों को दर्जनों की संख्या में मारा। ऐसा क्यों हुआ? साधारण मानव समाज में कुछ भी वास्तव में संयोग से नहीं होता है। इतिहास में जो होता वह केवल दिव्य के परिवर्तनों के साथ चलता है। इस प्रकार, मानव समाज में जो कुछ भी होता है, वह केवल किसी के क्षण भर की प्रेरणा पर कुछ करने का उत्पाद नहीं है। दूसरे शब्दों में, यह साधारण लोग नहीं थे जो इसे कुचलना चाहते थे; बल्कि, यह दिव्यलोक की इच्छा थी। उच्चतर प्राणी इसे नष्ट करना चाहते थे और इसके अस्तित्व की अनुमति नहीं देना चाहते थे। "पाँच धर्मों को एकीकृत करने" की वह बकवास, फा को क्षीण करने का एक गंभीर मामला था। यह मनुष्यों के बीच कार्य करने वाले असुरों का एक मामला था।
यहाँ तक कि आरंभ के मूल-दिव्य या बुद्ध शाक्यमुनि ने भी बौद्ध और ताओवादी को एक करने या मिश्रित करने का सुझाव देने का साहस नहीं किया। ऐसा कैसे हो सकता है! यहाँ तक कि बौद्ध धर्म के भीतर भी, यह सिखाया जाता है कि कोई भी दो संप्रदाय या पंथ आपस में नहीं मिलाये जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, जो लोग शुद्धावास की साधना करते हैं, वे जेन बुद्धामत की साधना नहीं कर सकते हैं। दोनों को नहीं मिलाया जा सकता है। और जो लोग जेन बुद्धामत की साधना करते हैं, वे तियानताई या ह्वायान की साधना नहीं कर सकते हैं। जब आप साधना करते हैं तो आप अपनी पद्धति में अन्य चीजों को नहीं मिला सकते हैं। और ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि गोंग विकसित करने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल होती है। आपका केवल एक शरीर है, और आप इसकी तुलना एक प्रकार के कच्चे माल से कर सकते हैं जिसे एक मशीन में डाला जाता है। आपका गोंग उस मशीन में विकसित होता है। आपके लिए हर चीज को सावधानीपूर्वक व्यवस्थित किया जाना होगा—चाहे वह आपको बचाने के लिए उपयोग की गई पद्धति हो, प्रत्येक कदम जो उठाया जाना है, जिस रूप में प्रत्येक प्रकार का गोंग विकसित होना है, और इत्यादि। किंतु यदि उस प्रक्रिया के बीच में आप किसी दूसरी मशीन में चले जाते हैं, तो परिणाम क्या होगा? क्या आप अभी भी साधना कर सकेंगे? आप मुझे बताइए। आप पूरी तरह से गड़बड़ा जाएंगे। आप कबाड़ का एक ढेर बन जाएंगे।
बहुत से लोग ठीक उसी प्रकार अनुत्तरदायी रूप से साधना करने के कारण अपनी साधना में प्रगति करने में विफल रहे हैं। बुद्ध शाक्यमुनि का "कोई दूसरा साधना मार्ग नहीं" ( बू अर फा-मेन ) से वास्तव में अर्थ यह था कि साधना में मिश्रण नहीं हो सकता है। कुछ समय के बाद में "कोई दूसरा साधना मार्ग" कहावत को गलत समझा गया, और कुछ और माना गया। किंतु साधनाओं को मिलाना कड़ाई से वर्जित है। "मार्ग की एकता" ने "पाँच धर्मों के विलय" का प्रचार किया—कुछ ऐसा जिसे उच्चतर नियम निंदित करते हैं। फिर भी अब यह समूह ताइवान में फिर से उभर आया है। फा विनाश काल के दौरान कोई भी दखल नहीं देगा, और यह इसलिए है क्योंकि इस अवधि में कोई भी मानव मामलों का प्रबंधन नहीं कर रहा है। मनुष्य बदतर होता गया है, इसलिए सभी [दिव्य प्राणियों] ने उनको छोड़ दिया है और अब चीजों की देखभाल नहीं करते हैं। न ही वे लोगों को बचाते हैं। कई लोग जो बुद्ध में विश्वास रखते हैं या उनकी पूजा करते हैं, वे कठोर साधना में रुचि नहीं रखते हैं। बल्कि, वे केवल धन चाहते हैं या विपत्ति को दूर करना चाहते हैं। यह इतना बुरा हो गया है।
हालांकि, लोग अभी भी सोचते हैं कि "मार्ग की एकता" जो सिखाता है, वह ठीक है। एक साधक के मन के विचार, साथ ही धार्मिक विश्वास वाले व्यक्ति के विचार, काफी महत्वपूर्ण हैं। कुछ साधना मार्ग पूरी तरह से आस्था पर निर्भर करते हैं और कोई विशिष्ट पद्धति सम्मिलित नहीं करते हैं, तो जब आपके मन में अन्य चीजें मिली हुई होती हैं, तो यह आपकी साधना को दूषित कर देगा—क्योंकि इसमें शारीरिक गतिविधियाँ सम्मिलित नहीं होती हैं। इसके अतिरिक्त, असुर अब मानव संसार में व्याप्त हैं और मानव जाति का विनाश कर रहे हैं। क्या हर किसी के पास अच्छे विचार नहीं होते हैं? ठीक वही है जिसे नष्ट करने के लिए असुर बाहर आ गये हैं; वे लोगों को साधना में विफल बनाना चाहते हैं।
दो प्रकार के लोग होते हैं, अर्थात्, जो हठधर्मी होते हैं और जो मध्य मार्ग अपनाते हैं। शुरुआत से ही जेन बौद्ध धर्म हठधर्मी की श्रेणी में रहा है, और इसे एक साधना प्रणाली नहीं समझा जा सकता है। जेन हमेशा विवाद से घिरा रहा है। हालांकि जिन लोगों ने जेन की पद्धतियों के अनुसार साधना की है, बुद्धत्व की साधना करने के उनके आशय और उनकी अच्छाई की खोज के कारण, वे वास्तव में बुद्ध शाक्यमुनि के मार्गदर्शन में रहे हैं। जेन किसी भी प्रणाली का गठन नहीं करता है। बोधिधर्म का अपना कोई दिव्यलोक नहीं है, और इसलिए लोगों को मोक्ष प्रदान नहीं कर सकता है। तथ्य यह है कि बोधिधर्म ने स्वयं, अपने समय में, बुद्ध शाक्यमुनि को संस्थापक गुरु माना। हालांकि उन्हें जेन का कुलपति कहा जाता है, वे वास्तव में बुद्ध शाक्यमुनि के शिष्य थे—अट्ठाईसवीं पीढ़ी के एक शिष्य, और जो बुद्ध शाक्यमुनि का बहुत सम्मान करते थे। बुद्ध शाक्यमुनि के सिद्धांतों पर चलते हुए, उन्होंने अपनी ज्ञानप्राप्ति को "शून्यता" पर केंद्रित किया, और यह शाक्यमुनि के सिद्धांतों से परे नहीं था। समय बीतने के साथ, जेन कमतर होता गया। बाद की पीढ़ियों ने बोधिधर्म के दृष्टिकोण को अपने आप में एक साधना मार्ग माना, और इसे सर्वोच्च माना। हालांकि, उनका सर्वोच्च नहीं था। वास्तव में जेन पीढ़ी दर पीढ़ी कमतर होता जा रहा था, और बोधिधर्म ने स्वयं कहा : उनकी शिक्षाएँ केवल छह पीढ़ियों तक ही पारित हो सकती हैं।
बोधिधर्म ने बुद्ध शाक्यमुनि द्वारा सिखायी गई "शून्यता" को अपेक्षाकृत बड़ा महत्व दिया, और बुद्ध शाक्यमुनि को बहुत सम्मान दिया; वे उनकी अट्ठाईसवीं पीढ़ी के शिष्य के रूप में जाने जाते थे। किंतु जो पीढ़ियाँ बाद में आयीं, वे पूरी तरह से चरम सीमाओं में फंस गयीं। और एक बार जब ऐसा हो गया, तो यह पतन के चरण पर पहुँच गया, जहाँ बोधिधर्म और शाक्यमुनि को लगभग समान माना जाने लगा। लोगों ने बोधिधर्म का सम्मान करना शुरू कर दिया, और बोधिधर्म के सिद्धांतों को ही केवल बौद्ध सत्य माना। यह भटकने के समान था।
ऐसा इसलिए है क्योंकि बोधिधर्म ने एक निम्न स्तर तक साधना की और केवल अर्हत की दिव्य पदवी तक पहुँचे—अर्थात, वे केवल एक अर्हत थे। वे वास्तव में कितना जान सकते थे? अंततः वे तथागत के स्तर तक भी नहीं पहुँचे थे। उनके स्तर और बुद्ध शाक्यमुनि के स्तर के बीच का अंतर अत्यधिक था! और इस कारण से, उनकी शिक्षाएँ साधारण लोगों की समझ के सबसे निकट हैं, और उनके सिद्धांत साधारण लोगों के लिए स्वीकार करना सबसे सरल हैं। विशेष रूप से, जो लोग धर्म को दर्शनशास्त्र का एक रूप, राजनीति का एक रूप, या ज्ञान का एक प्रकार मानते हैं, और जो एक शैक्षणिक दृष्टिकोण अपनाते हैं और बौद्ध धर्म को दर्शनशास्त्र या धार्मिक विचार के रूप में अध्ययन करते हैं, उनके सिद्धांतों के लिए सबसे अधिक ग्रहणशील होते हैं, क्योंकि वे साधारण दर्शनशास्त्र से मिलते जुलते होते हैं।
हालांकि, बुद्ध हर स्तर पर पाये जाते हैं, चाहे कोई कितना भी ऊंचा जाए। [किंतु जेन के अनुसार] आप साधना करते जाते हैं और साधना करते जाते हैं, और फिर, कथित रूप से, कुछ भी विद्यमान नहीं है। उनकी साधना में वे मनुष्य के अस्तित्व को भी स्वीकार नहीं करते हैं। जीवित, दृश्यमान मनुष्य हमारे सामने ठीक यहाँ हैं और फिर भी वे उनके वास्तविक रूप को स्वीकार नहीं करते हैं। यह उन साधारण व्यक्तियों से भी बुरा है जिनकी आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि क्षीण है जो कहते हैं, "मैं इस पर विश्वास करूंगा यदि मैं इसे देखूंगा, और नहीं करूंगा यदि मैं नहीं देखूंगा।" ये लोग जो देखते हैं उसे भी स्वीकार नहीं करते हैं। तो फिर क्यों जीना है? आँखें खोलने की परवाह क्यों करनी है? अपनी आँखें बंद करो, लेटो मत, खड़े मत हों... कुछ भी विद्यमान नहीं है, है ना? वे चरम सीमाओं तक चले गए हैं। बोधिधर्म ने कहा कि उनका धर्म केवल छः पीढ़ियों तक ही पारित किया जा सकता था। यह कैसी मूर्खता है कि आज के लोग अभी भी इस सिद्धांत से कसकर चिपके हुए हैं जो पहले से ही कभी वैध नहीं था। यह एक बंद गली है जिसमें वे चले गए हैं। वे स्वयं को स्वीकार नहीं करते, बुद्धों को स्वीकार नहीं करते, और पृथ्वी ग्रह का क्या? यदि वे अपने स्वयं के अस्तित्व को भी स्वीकार नहीं करते हैं, तो एक नाम होने का क्या अर्थ है? और भोजन करने का क्या अर्थ है? आप दिनभर बस भूखे रह सकते हैं, यह नहीं देख सकते कि क्या समय हुआ है, और सब कुछ सुनना बंद कर सकते हैं...
और उस सब के बाद, सब कुछ समाप्त हो जाता है। तो क्या वह बुद्ध शाक्यमुनि को अमान्य नहीं करता है? यदि बुद्ध शाक्यमुनि ने कुछ भी नहीं सिखाया, तो वे उनचास वर्षों तक क्या कर रहे थे? क्या वे बुद्ध शाक्यमुनि की शिक्षा में "शून्यता" का सच्चा अर्थ जानते थे? जब बुद्ध शाक्यमुनि [ने कहा कि उन्होंने] कोई धर्म पीछे नहीं छोड़ा, तो वे कह रहे थे कि उन्होंने वास्तव में साधना पद्धति या ब्रह्मांड का फा नहीं सिखाया। उन्होंने जिसके बारे में बात की, वह केवल उनके साधना स्तर की चीजें थीं, और उन्होंने साधारण लोगों के लिए तथागत फा छोड़ा—विशेष रूप से, साधना के अनुभव और सीखे गए पाठ। सच्चा धर्म जो शाक्यमुनि ने इस संसार में रहते हुए प्रदान किया, वह नियम और पद्धति थे, और उन्होंने विभिन्न स्तरों की अंतर्दृष्टि पर चर्चा की, जो एक निश्चित स्तर का फा है। किंतु बुद्ध शाक्यमुनि नहीं चाहते थे कि लोग उनके स्तर तक सीमित रहें, और इस प्रकार उन्होंने कहा, "मैंने अपने जीवन में कोई धर्म नहीं सिखाया।" उन्होंने वह इसलिए कहा क्योंकि वे जानते थे कि जो धर्म उन्होंने सिखाया, वह सबसे उच्चतम नहीं था। एक तथागत एक बुद्ध है, किंतु उच्चतम स्तर पर नहीं है। बुद्ध फा असीम है। एक साधक को उनके धर्म से सीमित नहीं होना चाहिए। एक महान आध्यात्मिक क्षमता वाला व्यक्ति और भी ऊंची साधना कर सकता है, जहाँ उच्चतर और गहरी अंतर्दृष्टि, फा की संबंधित अभिव्यक्तियां, प्रतीक्षा करती हैं।
सभी जो साधना करते हैं उनमें से कुछ ही साधक स्वयं की साधना का स्तर साधना के दौरान जान पाते हैं। अधिकांश साधक इसे केवल ज्ञानप्राप्ति की स्थिति तक पहुँचने के बाद या त्रिलोक-फा को पार करते हुए उच्च स्तरों तक पहुँचने के बाद ही जान पाएंगे। जो लोग जान पाते हैं वे अपने शरीरों से निकलने वाले गोंग के रंगों से अपने स्तरों को समझ सकते हैं। इसे व्यक्ति के गोंग स्तंभ या शरीर से ही समझा जा सकता है। त्रिलोक-फा साधना में, जो गोंग पहले उत्सर्जित होता है वह लाल होता है, और जब व्यक्ति का स्तर ऊंचा होता है, तो वह नारंगी, फिर पीला, फिर हरा, आदि हो जाता है, जिसमें कुल नौ रंग होते हैं—अर्थात्, लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, जामुनी, बैंगनी, रंगीन, और रंगहीन। यह देखने के लिए कि आप किस स्तर पर हैं, एक दृष्टि पर्याप्त होगी। यदि आपने एक पारदर्शी शरीर प्राप्त किया है और ऊपर की ओर साधना जारी रखते हैं, तो यह पर-त्रिलोक-फा साधना होगी जो आप करते हैं। आपने एक दिव्य पदवी प्राप्त कर ली होगी और अर्हत फा साधना के प्रारंभिक चरण की शुरुआत की होगी। पर-त्रिलोक-फा साधना करने का अर्थ है कि आपने तीन लोकों को पार कर लिया है और अब पुनर्जन्म के अधीन नहीं हैं। यदि आप इस चरण पर अपनी साधना समाप्त करते हैं, तो आप एक अर्हत हैं। यदि आप आगे साधना जारी रखते हैं, तो आप अर्हत की प्रतिष्ठित पदवी पर साधना कर रहे होंगे, और उस स्तर पर भी रंग होते हैं। हालांकि, यहाँ लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, जामुनी, और बैंगनी रंग त्रिलोक-फा साधना से भिन्न होते हैं। त्रिलोक-फा साधना में रंग सघन होते हैं, मनुष्यों के समान। किंतु उस [अर्हत] स्तर पर, वे लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, जामुनी, बैंगनी, रंगीन, और रंगहीन के पारदर्शी रंग हैं। आगे की साधना के साथ, नौ रंगों के और संग्रह हैं, जिसमें अंतर यह है कि वे अधिक पारदर्शी, अधिक उत्तम, और अधिक सुंदर होते हैं। यह इस प्रकार बार-बार दोहराया जाता है। इस प्रकार कोई व्यक्ति साधना में कहाँ है, इसे समझा जा सकता है।
किंतु लोगों को यह देखने की अनुमति नहीं है, और चीजें साधारण लोगों के लिए इतनी स्पष्ट नहीं होती हैं, क्योंकि यह अंतर्दृष्टि ( वू ) की बात है। यदि शरीर ने जो साधना की थी वह सीधी-सीधी प्रदर्शित होती, तो अंतर्दृष्टि के लिए क्या बचता? हर कोई साधना करता, हर कोई इसे करता। कौन नहीं करता? सब कुछ इतना वास्तविक होता। क्षमा न किये जा सकने वाले पाप करने वाले, न सुधरने वाले लोग भी, इसे सीखने आते। अंतर्दृष्टि का कोई प्रश्न नहीं होगा। और यदि ऐसा होता, तो साधना असंभव होती। कुछ लोग कहते हैं, "मैं अपने नेत्र खुले रखूंगा, और यदि मैं चीजों को स्पष्ट रूप से देख पाउँगा, तो मैं इसे सीखूंगा।" किंतु ऐसा नहीं हो सकता है। यदि ऐसा व्यक्ति सब कुछ देख सकता है, चीजें पूर्ण रूप से स्पष्टता से, यह उसकी साधना की संभावनाओं का अंत होगा। उसे साधना करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। कारण यह है, एक व्यक्ति को अंतर्दृष्टि के माध्यम से भ्रम से बाहर निकलने की आवश्यकता होती है, और केवल वही साधना के रूप में माना जाता है। यदि एक व्यक्ति पूर्ण अंतर्दृष्टि प्राप्त करता है और सब कुछ देख सकता है, तो उसे साधना करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। और ऐसा क्यों है? क्योंकि यदि वह साधना करता है तो वह मानी नहीं जाएगी, क्योंकि उसने देख लिया होगा कि सब कुछ [साधना के विषय में] वास्तविक है। उसने लोगों के संघर्षों के संबंधित कारणों को देख लिया होगा, और यह कि जो लोग दूसरों का लाभ उठाते हैं वे उन्हें पुण्य देते हैं। यदि वास्तविकता पूर्ण रूप से उसके सामने प्रकट कर दी जाती, तो निश्चित ही वह साधना करता। किंतु क्या उसे साधना करने के रूप में माना जाएगा? यह कुछ ऐसा उठा लेने के समान होगा जो लेने के लिए वहाँ सामने रखा है। मानवीय मोहभाव उस प्रकार से नहीं हटाये जा सकते।
एक व्यक्ति को संघर्ष के बीच मानवीय मोहभावों को हटाते हुए अपनी स्वयं की समझ तक पहुँचने की आवश्यकता है। यदि वह सबकुछ स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम होता, तो वह साधना नहीं होगी। एक बुद्ध के लिए अपना स्तर बढ़ाना कठिन क्यों है? क्योंकि उनके लिए कोई संघर्ष नहीं हैं और वे सबकुछ स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। तो वह साधना कैसे कर सकते हैं? उनके लिए साधना करनी कठिन है। और यही कारण है कि वे साधारण लोगों के बीच जाना और साधना करना चाहते हैं। केवल जब कोई भ्रम में साधना करता है तभी तेजी से उत्थान संभव है। हालांकि, यह संभव है कि कुछ लोग साधना करते समय थोड़ा सा देख पाएंगे। किंतु निश्चित ही स्पष्टता किसी भी मनुष्य को प्रकट नहीं की जाएगी।
एक व्यक्ति को अपनी पूरी साधना प्रक्रिया के दौरान चीजों का ज्ञानप्राप्त करना होगा, और उसे भ्रम के बीच साधना करनी होगी। पश्चिम आस्था को महत्व देता है, और शुरुआत से अंत तक इस पर जोर देता है। आस्था के बिना, बाकी सब कुछ व्यर्थ है; आस्था के साथ, व्यक्ति को दिव्य चीजों को समझने की अनुमति दी जाती है। जब कुछ लोगों ने यीशु की छवि के सामने पश्चात्ताप किया है, तो उनके मन ने वास्तव में अनुभव किया है कि यीशु सुन रहे थे और कोई उनके प्रश्नों का उत्तर दे रहा था। पश्चिम में साधना ऐसे ही होती है। धार्मिक आस्था एक प्रकार की साधना ही है। जब यीशु अपने अनुयायियों को अपने दिव्यलोक में प्रवेश कराने के लिए तैयार थे, यदि व्यक्ति के शरीर में गोंग या ऊर्जा की कमी होती थी, तो व्यक्ति दिव्यलोक में प्रवेश नहीं कर सकता था। और फिर, बुरी सोच जो व्यक्ति ने मनुष्यों के बीच बनायी और उसके शरीर के कर्म के कारण, उच्च स्तरों की ब्रह्मांड की प्रकृति उसे प्रतिबंधित करेगी; और एक ऐसा व्यक्ति जो वास्तव में बुरा था, [यदि वह वहाँ गया होता तो] उसका शरीर और आत्मा दोनों बिखर जाते, कुछ भी शेष नहीं बचता। वह एक भयानक दृश्य होगा। तो गोंग के बिना काम नहीं चलेगा। इस प्रकार जैसे-जैसे उसकी आस्था बढ़ती है, जैसे-जैसे वह पश्चाताप करता है, और जैसे-जैसे वह निरंतर सुधार करने और एक अच्छा व्यक्ति बनने का प्रयास करता है, व्यक्ति का गोंग एक अन्य आयाम में विकसित होता है। हालांकि वह गोंग विकसित करता है, उसे इसके बारे में नहीं बताया जाता है, क्योंकि [ पश्चिम में] उन्होंने केवल एक अच्छा व्यक्ति होने के बारे में सिखाया है और गोंग के बारे में नहीं। वही बात बौद्ध भिक्षुओं के लिए भी लागू होती है। वे भी [ चिगोंग वाले] व्यायाम नहीं करते, और इस प्रकार लोग आश्चर्य कर सकते हैं कि उन्हें फिर भी गोंग कैसे प्राप्त होता है। उनका गोंग बढ़ता है भले ही उन्हें इसके बारे में बताया नहीं जाता है।
ताओवादी पंथ एकाकी साधना का अभ्यास करता है; ताओवादी धर्म का अस्तित्व नहीं होना चाहिए। वास्तव में ताओवादी धर्म हाल के इतिहास में हुए सुधारों का उत्पाद है। इतिहास से पहले के किसी भी युग में धार्मिक ताओवाद जैसी कोई चीज कभी नहीं थी। कारण यह है, ताओवादी पंथ सभी चेतन प्राणियों को मोक्ष प्रदान करने का लक्ष्य नहीं रखता है; इसके स्थान पर, यह एकाकी साधना, और शांति से साधना करना सिखाता है। तो यह जेन की अंतर्दृष्टि की साधना करता है। जेन, शान, और रेन में से, यह सत्य की अंतर्दृष्टि पर अपनी साधना केंद्रित करता है, यह जेन की साधना करके उसकी मूल प्रकृति का पोषण करता है, और जो मूल और वास्तविक है उसकी ओर लौटने की इच्छा रखता है। दाओ यह निर्धारित करता है कि साधना शांति से की जाए, इसलिए [ताओवादी मार्ग] वास्तव में चेतन प्राणियों को व्यापक रूप से बचाने की कोई इच्छा नहीं रखता है। जब एक ताओवादी अपनी साधना पूरी कर लेता है, तो वह एक भटकता हुआ देवता या एक भटकता हुआ अमर होगा। यहाँ की तरह ही दिव्यलोकों में भी पर्वत और पानी हैं, और वह एक ऐसे ही पर्वत पर रहेगा। वास्तव में ताओवादी धर्म साधारण मनुष्यों के मोहभावों से उत्पन्न हुआ था। लोग एक साथ बंधने और किसी प्रकार का शक्ति आधार बनाने की चाह रखते हैं, क्योंकि वे मान्यता और व्यक्तिगत लाभ की लालसा रखते हैं। तो इस प्रकार की चीजें उत्पन्न होने लगती हैं।
वास्तव में ताओवादी धर्म अस्तित्व में नहीं है। एक ताओवादी अपने शिष्य को एकाकी रूप से साधना करनी सिखाता है। हालांकि ताओवादी धर्म बनाया गया था और उसके कई शिष्य हैं, उनमें से सभी सच्ची शिक्षा प्राप्त नहीं करते हैं। यदि एक गुरु को एक अच्छा शिष्य मिलता है, तो वह उसे वास्तविक चीजें सिखाएगा। और यदि कोई अच्छा शिष्य नहीं है, तो वह एक लापरवाह और सरल जीवन चुनेंगे, जो कुछ भी वे चाहेंगे वह करेंगे। [वे ऐसा कर सकते हैं] क्योंकि उन्होंने दाओ और उसके साथ मिलने वाली सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त की है।
बौद्ध बौद्ध है, और ताओवादी ताओवादी है। दोनों पंथों की शिक्षाओं को एक साथ मिलाने का प्रश्न ही नहीं उठता। हालांकि, हम जो साधना कर रहे हैं, वह वास्तव में विशाल है। हमारी साधना स्वयं ब्रह्मांड पर आधारित है, और सब कुछ सम्मिलित है। हमारा आधार बौद्ध पंथ के साथ है, और हमारे पास जो कुछ भी है, चाहे वह हमारे मुख्य सिद्धांत हों या हमारी विशेषताएँ, वह बौद्ध है। किंतु यह फा बौद्ध और ताओवादी दोनों से बहुत ऊपर जाता है। भिन्न-भिन्न स्तरों पर भिन्न-भिन्न समझ पाई जाती है, और भिन्न-भिन्न स्तरों पर भिन्न-भिन्न अभिव्यक्तियाँ दिखाई देती हैं। फालुन दिव्यलोक में रहने वालों के पास उनका ज्ञान है, जबकि फालुन दिव्यलोक के परे उच्चतर ज्ञान है, और उससे भी ऊपर, और भी उच्चतर ज्ञान के रूप हैं।
एक और विषय है, अर्थात्, प्राचीन देवताओं का। हालांकि, आजकल के साधकों के साथ इस पर चर्चा करने का कोई अर्थ नहीं है, उनकी पहुँच से परे होने के कारण, यह उनके लिए अकल्पनीय है। इस प्रकार मैं केवल बौद्ध और ताओवादी के दो पंथों की ही बात करता हूँ। बहुत उच्च स्तर पर बताने का कोई अर्थ नहीं है; लोग ऐसी चीजों को स्वीकार नहीं कर सकते हैं। उन्हें जानने की अनुमति नहीं है।
लोगों को बचाते समय और फा सिखाते समय कोई प्रदर्शन नहीं करना
साधारण लोगों को जो भिक्षुओं के रूप में साधना करते हैं—ऐसे भिक्षु जिन्हें ज्ञानप्राप्त नहीं हुआ है—को वास्तविक फा सिखाना व्यर्थ है, क्योंकि वे कुछ नहीं जानते हैं। जो भिक्षु ज्ञानप्राप्त कर चुके हैं वे सांसारिक जगत में नहीं पाये जाते हैं; वे पर्वतों और जंगलों की गहराई में चले गए हैं। वे मेरे बारे में जानते हैं। केवल साधारण लोग ही नहीं जानते हैं। कई निपुण साधक मेरे बारे में जानते हैं। वे कभी-कभी चुपचाप आकर, एक दृष्टि डालते है, और फिर चले जाते हैं। कुछ ऐसे भी थे जो आये और कुछ बातें कही। हालाँकि उन्होंने सैकड़ों या हजारों वर्षों तक पर्वतों और जंगलों में साधना की है, उनके साधना स्तर उच्च नहीं हैं। यह इसलिए है क्योंकि वे जो मार्ग अपनाते हैं, वह कठिन है और साधना का महान मार्ग नहीं है। वे लघु मार्गों के माध्यम से साधना करते हैं, और इस कारण से लंबे समय तक साधना करने पर भी उन्होंने अपनी उच्चतम पदवी प्राप्त नहीं की है। क्योंकि, वे सांसारिक जगत के साथ सम्बन्ध नहीं रखते हैं, इसलिए उनकी अलौकिक क्षमताएँ बंधित नहीं हैं और वे अपनी दिव्य शक्तियों को पूर्ण रूप से प्रदर्शित करने में सक्षम हैं। जो लोग सांसारिक जगत में साधना करते हैं उनकी अधिकांश महान क्षमताएँ साधारणतः बंधित होती हैं। यदि वे नहीं होतीं, तो केवल एक विचार एक भवन को एक अन्य स्थान पर स्थानांतरित कर सकता था—कुछ ऐसा जो अस्वीकार्य है। मानवीय मामलों को बाधित करना पूर्ण रूप से वर्जित है। लोग सोचेंगे कि ऐसे व्यक्ति का स्तर उच्च है। एक साधारण व्यक्ति सोचता है कि जो कोई भी अपनी क्षमताओं को प्रदर्शित करने में सक्षम है वह एक उच्च स्तर पर है। जो चिगोंग गुरु सार्वजनिक प्रदर्शनों में प्रदर्शित करते हैं, वे केवल निम्न क्षमताएँ और कौशल हैं, चीजें जो दयनीय बोलने के लिए भी बहुत छोटी हैं। वे चीजें वास्तव में कुछ भी नहीं हैं। फिर भी साधारण लोग सोचते हैं कि वे उच्च स्तर पर हैं।
मैं फा सिखाते समय प्रदर्शन करने से बचता हूँ क्योंकि मैंने अपने सार्वजनिक होने के उद्देश्य को पूरी तरह से स्पष्ट शब्दों में समझाया है। यदि मैं फा सिखाते समय प्रदर्शन करता, तो वह एक दुष्ट मार्ग प्रदान करना होगा। उस तरह से करने पर, लोग फा नहीं, बल्कि आपकी तकनीकों को सीखने आएंगे। बुद्ध शाक्यमुनि भी अपने समय में इसी कारण इससे दूर रहे थे। उपचार करना ठीक है, क्योंकि, इसके कार्य को होते हुए देखा नहीं जा सकता है। जो कुछ स्पष्ट होता है वह यह है कि व्यक्ति पहले से अच्छा अनुभव करता है। उपचार कैसे हुआ? यह आप पर निर्भर करता है कि आप पूरी बात पर विश्वास करते हैं या नहीं। व्यक्ति अब पहले से अच्छा अनुभव करता है, लेकिन क्या आप विश्वास करेंगे कि ऐसा है? एक दर्शक यह नहीं बता सकता कि वह अभी भी पीड़ा में है या नहीं। क्योंकि किसी के लिए अंतर्दृष्टि की शक्ति का होना अभी भी आवश्यक है, उपचार करना ठीक है। एक समय था जब यीशु और बुद्ध शाक्यमुनि ने भी यही किया था। लाओ ज ने ऐसा नहीं किया था। लाओ ज जानते थे कि मानव संसार बहुत संकटमय है। उन्होंने शीघ्रता से अपनी पाँच-हजार-शब्दों की कृति [जिसे दाओदेजिंग कहा जाता है] लिखी और पश्चिम की ओर जाते हुए मार्ग से बाहर निकल गये।
मानव संसार अत्यंत जटिल है। यहाँ पृथ्वी पर किसी व्यक्ति को देखकर, यह बताना असंभव है कि वह किस आयाम से आया है। उस आयाम का देवत्व अभी भी उसका प्रभारी होना चाहता है। जो महत्वपूर्ण है वह यह है कि क्या इस व्यक्ति को समझ है; यदि उसे समझ है, तो वह [जहाँ से आया था] लौट सकेगा। किंतु [वह देवत्व] पहचान सकता है कि यह मनुष्य अब योग्य नहीं है, इसलिए वह उसके लिए और कुछ नहीं कर सकता है। हालांकि, वह उसे छोड़ नहीं देना चाहता है। जब यीशु लोगों को बचाने के लिए आये थे, [इन देवता] को लगा कि वह उनके मामलों में हस्तक्षेप कर रहे हैं। "यह व्यक्ति मेरा है, और उसे बचाए जाने पर मेरे स्थान पर आना चाहिए। आपने हमारे क्षेत्र में अतिक्रमण क्यों किया है?" वे इसे सहन नहीं कर पाए। यह इस प्रकार की मानसिकता के कारण था [कि उन्होंने वैसा किया जो किया]। यदि आप इसके बारे में सोचेंगे, तो यह उचित नहीं था। यीशु ने परवाह नहीं की कि कौन कहाँ से आया था। उनके आने का लक्ष्य लोगों को बचाना था। उन्होंने देखा कि सभी प्राणी पीड़ित थे और उन्हें मोक्ष देना चाहते थे, उन्हें ऊँचा उठने में सक्षम करना चाहते थे। तो यह हुआ कि, यीशु ने विभिन्न आयामों के कई देवताओं को प्रभावित किया। अंततः उनके मतभेद इतनी अधिक सीमा तक तीव्र हो गए कि वे मानव संसार में अभिव्यक्त होने लगे, वैसे ही जैसे मानव संघर्ष होते हैं, और इसका पूरा बोझ यीशु पर आ गया। यीशु स्वयं को इससे मुक्त नहीं कर सके, केवल विकल्प मृत्यु था—इस प्रकार उन्हें सूली पर चढ़ाया गया, जिससे उनके बीच विद्यमान शत्रुता समाप्त हो गई। यीशु के साधारण मांस के शरीर के चले जाने के साथ, शत्रुता के लिए वहाँ कोई यीशु नहीं बचा, और इससे उनकी अनगिनत कठिनाइयाँ समाप्त हो गईं। यही कारण है कि यह कहा जाता है कि यीशु ने पूरी मानव जाति के लिए अपना बलिदान दे दिया। यही बात है।
बुद्ध शाक्यमुनि ने भी अपना धर्म सिखाने में अत्यधिक कठिनाइयों का अनुभव किया। उन्होंने निरंतर उस समय भारत के सात धर्मों के साथ संघर्ष किया। उस समय, प्रारंभिक ब्राह्मणवाद शक्तिशाली था। अंत में, बुद्ध शाक्यमुनि उस सच्चे लक्ष्य को प्राप्त किये बिना चले गए जो उन्होंने प्राप्त करना निर्धारित किया था।
लाओ ज अपनी पाँच-हजार शब्दों की पुस्तक लिखने के बाद चले गए, आगे की पीढ़ी को कार्य करने के लिए चीजें छोड़ गए। यह इस प्रकार से किया जाना चाहिए था, और यह दिव्यलोक की इच्छा थी। यह इसलिए है क्योंकि ताओवादी पंथ को एक धर्म नहीं बनाया जाना था; ताओवादी धर्म का गठन एक गलती थी। एक ताओवादी एकाकी साधना, जेन की साधना, और शांति की साधना सिखाता है, इसलिए चीजें एक चयनित शिष्य को पारित की जाती हैं। यह इस प्रकार से किया जाता है क्योंकि वह अपने शिष्य का चयन करता है, और केवल किसी ऐसे व्यक्ति को ही सिखाता है जो अच्छा है। वह व्यापक रूप से मोक्ष प्रदान नहीं कर सकता, और ऐसा करने की इच्छा भी नहीं रखता है। वह जेन की साधना करता है। हालाँकि आप एक ताओवादी मंदिर में शिष्यों के एक समूह को देख सकते हैं, केवल एक को चुना जाता है, और वह अकेला ही शिक्षा ग्रहण करेगा। शेष बस एक सहायक के रूप में कार्य करते हैं। तो ताओवादी मार्ग में एक धर्म नहीं होना चाहिए। अतीत में वे हमेशा पर्वतों में एकाकी साधना करते थे।
कन्फ्यूशियस ने जो सिखाया, वह व्यक्तिगत आचरण के लिए सिद्धांत थे, साधना नहीं। हालाँकि उनकी शिक्षाओं ने चीनी लोगों को लाभ पहुँचाया है। “ मध्यम का सिद्धांत “ किसी व्यक्ति को एक अजेय स्थिति प्राप्त करने में सक्षम कर सकता है। चीजें एक चरम सीमा तक पहुँचने के बाद विपरीत दिशा में जाती हैं, और इस प्रकार कुछ या कोई व्यक्ति शिखर पर पहुँचने के बाद गिर सकता है। यही "मध्यम" की खोज का अर्थ है, हमेशा मध्य स्थिति में दृढ़ता से बने रहना। जब एक व्यक्ति सबसे ऊपर जाने का प्रयास नहीं करता है और नीचे वालों से बड़ी मात्रा से ऊंचा होता है, तो वह व्यक्ति कभी विफल नहीं होगा। जो कुछ भी, जब एक चरम सीमा तक पहुँच जाता है, तो वह उल्टा मुड़ जाता है। यह साधारण लोगों के संदर्भ में है।
पर्वतों और जंगलों की गहराई में कई साधक हैं जिन्होंने अतीत और भविष्य की घटनाओं को होते देखा है। फिर भी उनमें से कोई भी उन मामलों में सम्मिलित नहीं हुआ है, और न ही उन्होंने इच्छा की है। उनका परे रहना इस ज्ञान से उत्पन्न होता है कि वे घटनाएँ दिव्य परिवर्तनों का परिणाम हैं। [वे जानते हैं] कि चीजें ऐसी ही होनी चाहिए।
जो कोई भी दिव्यलोक की इच्छा का विरोध करता है उसे परिणाम भुगतने पड़ेंगे, और इस कारण लोग ऐसा करने का साहस नहीं करते हैं। हर कोई युए फेई की प्रशंसा करता है, फिर भी वह दक्षिणी सोंग वंश को क्यों नहीं बचा सके? क्या युए परिवार इतना शक्तिशाली नहीं था? दिव्यलोक की ऐसी ही इच्छा थी। युए फेई सोंग को बचाने पर तुले हुए थे, किंतु वे सफल ही नहीं हो सके, क्योंकि वास्तव में वे दिव्यलोक की इच्छा के विरुद्ध जा रहे थे। सोंग वंश नष्ट होने के लिए नियत था, किंतु उन्होंने इसके विपरीत प्रयास किया, और इस प्रकार दिव्यलोक की इच्छा के विरुद्ध गए। मैं बस यहाँ एक बिंदु को स्पष्ट कर रहा हूँ। जैसा कि कहा जाता है, "चूहों और मनुष्यों की सबसे अच्छी बनायी गई योजनाएँ अक्सर विफल हो जाती हैं।" मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि युए फेई बुरे थे। मैं बस यह समझा रहा था।
जो कुछ एक व्यक्ति अपने मानवीय दृष्टिकोण से उचित मानता है, वह आवश्यक नहीं कि उचित ही हो। चाहे वह चिन का पहला सम्राट हो या हान वंश का सम्राट वू, जो भी सम्राट था या उसने जो कुछ भी किया, जो लोग ऐसे विद्वान के बाद आते हैं वे उन पर टिपण्णी करेंगे। साधारण लोग चीजों को अपने स्वयं के व्यक्तिगत दृष्टिकोणों से और उनकी अंतर्निहित धारणाओं की दृष्टि के माध्यम से देखते हैं, और जो कुछ वे अच्छा या बुरा मानते हैं वह आवश्यक नहीं कि ऐसा हो। इसके अतिरिक्त, मानदंड जिसके द्वारा एक व्यक्ति यह निर्धारित करता है कि कोई व्यक्ति या कुछ अच्छा है या बुरा, वह उसके स्वयं के विचारों पर आधारित होता है: "यदि वह मेरे साथ अच्छा है, तो मैं कहूँगा कि वह अच्छा है। यदि वह जो करता है उससे मुझे लाभ पहुंचाता है, तो मैं कहूँगा कि वह अच्छा है।" तो वह व्यक्ति जिसे वह स्वीकृति देता है, वास्तव में अच्छा हो सकता है या नहीं भी हो सकता है। अच्छा और बुरा आँकने के लिए एकमात्र मानदंड ब्रह्मांड का विशेष गुण, फा है। यह कभी नहीं बदलेगा, यह ब्रह्मांड का सत्य है, और यह एकमात्र मानदंड है जिसके द्वारा अच्छा और बुरा निर्धारित किया जाता है। चिन के पहले सम्राट ने चीन को एकीकृत करने के दौरान कई लोगों का वध किया। उन्होंने कई राज्यों के शासकों का वध किया, और हर किसी ने उसे कोसा। विभिन्न राज्यों के शासकों और लोगों को उनके शासन के अधीन लाया गया, और इस प्रकार हर किसी ने उससे घृणा की और उसे कोसा। उन सभी ने उसे अपने स्वयं के दृष्टिकोणों से आँका। चीन का एकीकरण करना उनके लिए अनिवार्य था। यह दिव्य परिवर्तनों का परिणाम था। यदि उन्होंने दिव्यलोक की इच्छा के अनुसार कार्य नहीं किया होता, तो वे सफल नहीं होते और एकीकरण विफल हो जाता। मानव मामले इनसे अधिक कुछ नहीं हो सकते हैं। साधकों के रूप में हम उन पर कभी टिप्पणी नहीं करते हैं। एक साधक राजनीति में रुचि नहीं लेगा, नहीं तो वह एक राजनीतिज्ञ होगा, एक साधक नहीं।
जब मानव जाति समय में एक निश्चित बिंदु तक पहुँचती है, तो उसका कर्म विशाल होता है, और इससे छुटकारा पाना असंभव होता है। उस प्रकार का विशाल कर्म कुछ ऐसा होता है जिसे मनुष्य कभी नहीं चुका सकता। वह कई जीवनकालों के दौरान, इतना विशाल कर्म एकत्रित करता है कि चुकाना असंभव हो जाता है, और इस प्रकार ये लोग नष्ट होने के लिए नियत हो जाते हैं। "नष्ट होने" का क्या अर्थ है? छोटी आपदाएँ होती हैं और लोगों को नष्ट करती हैं। युद्ध सबसे सुविधाजनक तरीका है, और यही कारण है कि इतिहास इस प्रकार है।
प्रत्येक युग के संस्थापक सम्राट के साथ कुछ योद्धा अवतार लेते थे, उनकी रक्षा करते थे और उनकी युद्ध में सहायता करते थे। उन योद्धाओं को विशेष रूप से वही करना था। तो उनके प्रयास उन्हें कोई पुण्य नहीं देंगे, लेकिन न ही वे कर्म उत्पन्न करेंगे—वे बस अपना कार्य कर रहे थे। इतिहास के लंबे समय के दौरान भी, कितने लोगों ने, इसे इस प्रकार समझा है?
बुद्ध जो करते हैं, वह है लोगों को बचाना, न की आशीर्वाद देना और रक्षा करना
बौद्ध मार्ग लोगों को धनी बनने में सहायता करने के बारे में बिलकुल भी नहीं है। रोग, कर्म के कारण होते हैं, इसलिए इसने लोगों को स्वस्थ कैसे रहना है यह नहीं सिखाया है। जब शाक्यमुनि की शिक्षाओं ने "व्यापक रूप से चेतन प्राणियों को बचाने" के बारे में बात की, तो वे लोगों को साधारण अस्तित्व की कठिनाई से मुक्त करने और उन्हें दूसरे किनारे, निर्वाण तक पहुँचाने का संदर्भ दे रहे थे। बुद्ध शाक्यमुनि ने वही सिखाया था। यह आपके दिव्यलोक तक ऊपर पहुँचने के बारे में था। यीशु ने भी यही सिखाया था, और कोई भी एक दूसरे से उच्चतर नहीं था। बस यह है कि आधुनिक लोग इसे नहीं समझते हैं। वे मानते हैं कि बुद्ध लोगों को आशीर्वाद दे सकते हैं और रक्षा कर सकते हैं, आपके रोग को ठीक कर सकते हैं, आपको धनवान बना सकते हैं, और कैसे महान ज्ञानप्राप्त प्राणियों में असीम शक्ति होती है और वे लोगों को बचा सकते हैं। साधारण लोग गलती से बुद्ध के मोक्ष प्रदान करने को रक्षा के रूप में समझते हैं, और फिर बुद्ध से आशीर्वाद, रक्षा, और धन माँगते हैं, वे बुद्ध से उन्हें स्वस्थ बनाने की माँग करते हैं, और इत्यादि। किंतु वास्तव में बुद्ध ऐसे मामलों में बिल्कुल भी सम्मिलित नहीं होते हैं। यह एक विकृत विचार है जो आधुनिक मनुष्य की सोच के भ्रष्टाचार से उत्पन्न होता है, और यह पतित है। बौद्ध सूत्रों में मूल रूप से इस प्रकार का कुछ भी निहित नहीं था। इस प्रकार मैं अक्सर इस मामले पर चर्चा करता हूँ, और कहता हूँ कि, हालाँकि आप धन की आशा में अगरबत्ती जला सकते हैं और बुद्ध से प्रार्थना कर सकते हैं, बुद्ध परवाह नहीं करते हैं कि आप धनी बनते हैं या नहीं।
आप उस प्रकार बुद्ध से प्रार्थना करना चाहते हैं, किंतु एक बुद्ध को आपके धन प्राप्त करने में कोई रुचि नहीं है। ठीक इसके विपरीत, वे आपसे अपना लालच हटाने के लिए कहते हैं। यदि आपको दैनिक जीवन में वास्तव में परेशानी होती है, तो वे भौतिक साधन प्रदान कर सकते हैं, किंतु केवल आपके व्यक्तिगत कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए ही। यदि आपका धनी होना नहीं लिखा है, तो वे आपको धनी नहीं बनाएंगे। और रोग, एक बुद्ध की दृष्टि में, आपके पिछले जन्म या जन्मों के ऋण कर्म का परिणाम है। जब कुछ लोग धन की चाह में एक बुद्ध प्रतिमा के सामने दंडवत प्रणाम करते हैं, तो उन्हें परिणाम स्वरूप अवश्य ही धन मिलता हैं। किंतु वे वास्तव में किस प्रकार धन प्राप्त करते हैं? उस प्रतिमा पर कोई बुद्ध नहीं था। बल्कि यह एक पाखंडी बुद्ध था, जो उपासना के माध्यम से अस्तित्व में आया। या यह एक लोमड़ी हो सकती है जिसने उसको ग्रसित कर लिया, या एक साँप, एक नेवला, आदि। इसने आपको धन प्राप्त करने में सहायता की, क्योंकि, वास्तव में, आपने इसकी पूजा की और इससे धन माँगा। किंतु यदि यह आपको धन प्राप्त करने में सहायता करने जा रहा है, तो इसमें शर्तें सम्मिलित हैं। ब्रह्मांड में एक सिद्धांत है, अर्थात्: कोई हानि नहीं, तो कोई लाभ नहीं। यह इस सिद्धांत का लाभ उठाता है, क्योंकि यह एक मानव शरीर चाहता है। एक व्यक्ति धन की चाह में दंडवत प्रणाम करता है, तो [यह कहता है], "आओ और ले लो!" यदि जो चीजें व्यक्ति के पास हैं वे अच्छी नहीं हैं, तो यह उस पर ध्यान नहीं देगा, और वह कोई धन प्राप्त नहीं करेगा; उसकी मांग पूरी नहीं होगी। यदि यह निर्धारित करता है कि आपके शरीर में अच्छी चीजें हैं, तो यह आपको धन प्राप्त करने देगा, क्योंकि तब यह आपसे वे अच्छी चीजें ले सकता है। और फिर यदि आप धन चाहते हैं, तो निश्चित ही यह आपको देगा। किंतु वह व्यक्ति इस सब से अनजान है, और जो वह खोता है वह हमेशा के लिए चला जाता है। एक व्यक्ति एक से अधिक जीवन जीता है, और [ऐसी उपासना के बाद] वह अगले जन्म में और अधिक दयनीय जीवन जीने के लिए विवश हो जाता है।
मानव जाति का पतन और भयावह धारणाएँ
यदि प्राचीन चीन में कोई फा की साधना करने की बात करता था, तो लोग कहते थे कि उसका एक "पवित्र आधार" था। जो लोग बुद्धों, ताओवादी देवताओं, या देवताओं के बारे में बात करते थे, उन्हें वास्तव में अच्छा माना जाता था। लेकिन, आज, बुद्धत्व या दाओ की साधना की बात पर हंसा जाता है। मानव जाति के नैतिक मूल्यों में विशाल बदलाव आये हैं। वे एक दिन में हजारों मील नीचे खिसक रहे हैं, इतनी तीव्रता से। अपने मूल्यों के घटने के साथ, लोग वास्तव में यह विश्वास करने लगे हैं कि प्राचीन लोग अज्ञानी और अंधविश्वासी थे। मनुष्य की सोच नाटकीय रूप से बदल गई है, और यह डरावना है। इस पर विचार करें कि बुद्ध शाक्यमुनि ने एक बार कहा था : धर्म विनाश काल के साथ समाज के बदलाव वास्तव में भयावह होंगे। बात यह है कि, आजकल के समाज में लोगों के हृदय में कोई फा नहीं है जो एक संयम के रूप में कार्य कर सके, विशेष रूप से चीन में। यह अन्य देशों के लिए भी सत्य है, हालांकि यह अलग रूप धारण करता है। चीन में, सांस्कृतिक क्रांति ने लोगों के तथाकथित "प्राचीन सोच और विचारों" को नष्ट कर दिया था, और लोगों को कन्फ्यूशियस की शिक्षाओं में विश्वास करने से रोक दिया था। लोगों के लिए कोई नैतिक संयम या नैतिक संहिता नहीं बची, और उन्हें धार्मिक मान्यताओं का अनुसरण करने की अनुमति नहीं थी। लोगों ने यह मानना छोड़ दिया कि अनुचित कार्य करने से कर्म का भुगतान करना पड़ेगा।
जब लोगों के मन में आंतरिक-फा एक संयम के रूप में कार्य नहीं करता है, तो क्या वे कुछ भी करने का साहस नहीं करेंगे? यह सबसे गंभीर समस्या है जिसका सामना मानव जाति अब कर रही है। कुछ विदेशी व्यापार करने के लिए चीन जाने का साहस नहीं करते हैं, विशेष रूप से इस कारण से कि कुछ चीनी युवा चाकू मारने या किसी की हत्या करने में बहुत तेज हैं। यह भयानक है। चीन अब अन्य देशों से बदतर है। एक प्रमुख कारक यह है कि जब गिरोह युद्ध को चित्रित करने वाली विदेशी फिल्में या टीवी कार्यक्रम मुख्य भूमि में दिखाये जाते हैं, तो दर्शक गलत सोच बना लेते हैं कि हाँगकाँग और अन्य देश वास्तव में उतने ही अराजक हैं जितना उन्हें चित्रित किया जाता है। हालांकि, वे ऐसे नहीं हैं। वह केवल रोमांच चाहने वाले दर्शकों को आकर्षित करने के लिए सिनेमाई नाटकीयता है। वास्तविकता यह है, विदेश में रहने वाले लोगों का चरित्र चीन के लोगों की तुलना में कहीं बेहतर है और वे अधिक सभ्य हैं। फिर भी चीनी युवा उन चीजों की नकल करते हैं। क्योंकि चीन कुछ समय के लिए अलग-थलग था, यह लोग गलत सोच बना लेते हैं, अचानक उन चीजों को देखने के बाद, कि विदेश में चीजें ऐसी ही हैं।
टीवी श्रृंखला "द बंड" में चित्रित बदमाश व्यवसायियों की चीन में उत्सुकता से नकल की गई है। लेकिन यह केवल 1930 के पुराने शंघाई का एक चित्रण था, और उसके लिए कलात्मक लाइसेंस लिया गया था। वास्तविक जीवन वैसा नहीं था। हाँगकाँग की बदमाशों पर आधारित फिल्में और टीवी कार्यक्रमों का मुख्य भूमि चीन के लोगों की सोच पर एक भयानक प्रभाव पड़ा है। मानव जाति के मूल्य बदल गए हैं, और चीन में भी हम अब समलैंगिकता, मादक द्रव्य दुरुपयोग, मादक पदार्थों की तस्करी, संगठित अपराध, अनैतिक यौन संबंध, और वेश्यावृत्ति देखते हैं। यह हाथ से निकल गया है! एक कहावत है कि जब एक निर्धन देश का देहाती धनवान बन जाता है, तो सावधान रहें। उसके पास कोई आत्म-नियंत्रण नहीं होता है और वह कुछ भी करने का साहस करेगा। क्या मानव जाति को इस बिंदु तक पहुँचते देखना डरावना नहीं है? मानव जाति का क्या होगा जब चीजें और आगे बढ़ेंगी? अच्छे और बुरे की अवधारणाएँ अब लोगों के मन में उलट गई हैं। आजकल लोग उन लोगों की प्रशंसा करते हैं जो निर्दयी हैं, जो किसी भी सीमा तक जाएंगे, और जो हत्या करेंगे और यातना देंगे। वही है जिसे लोग सम्मानित करते हैं।
मनुष्य का तीव्रता से भारी नैतिक पतन पूरे संसार में सामने आ रहा है। लोगों की धारणाएँ नाटकीय रूप से बदल गई हैं। आजकल, जो सुंदर है वह उतना लोकप्रिय नहीं है जितना जो बदसूरत है; जो अच्छा है वह उतना स्वागत योग्य नहीं है जितना जो बुरा है; जो साफ और सुव्यवस्थित है वह उतना आकर्षक नहीं है जितना जो गन्दा और अव्यवस्थित है। एक विशिष्ट उदाहरण पर विचार करें। अतीत में, पेशेवर गायकों को मुखर तकनीक और संगीत कौशल में अच्छी तरह से प्रशिक्षित होना पड़ता था। जबकि अब, मंच पर कोई ऐसा व्यक्ति आता है जो भयानक लगता है, जिसके लंबे, बिखरे हुए अव्यवस्थित बाल हैं... "आ आ आ!" वह अपना गला फाड़ कर चिल्लाता है। और फिर थोड़े टेलीविजन प्रचार के साथ, वह एक सितारा बन जाता है। किंतु वह जिस प्रकार चीखते हैं, वे भयानक हैं। भयानक चीजों को लोगों के मूल्यों के पतन के कारण सुंदर देखा जाने लगा है, और लोग ऐसी चीजों के पीछे पागलों की तरह भागते हैं। वही बात ललित कला के लिए भी लागु होती है। एक बिल्ली की पूंछ को स्याही में डुबोएं और उसे यहाँ वहां भागने दें, और इसे कला का एक रूप कहा जाता है। और फिर वह अमूर्तवादी और प्रभाववादी—वह क्या है? पहले ऐसा होता था कि जितना अधिक सुंदर और आँख को भाने वाला एक चित्र होता था, उतना ही अधिक लोग उसका आनंद लेते थे। तो वह चीज वास्तव में क्या है?? यह "कलाकारों" के मानव प्रकृति को मुक्त करने के प्रयास का परिणाम है। मानव प्रकृति, एक नैतिक संहिता के अभाव में, आसुरिक प्रकृति के एक विशाल प्रदर्शन के समान है। जब लोग उस स्थिति में हों तो क्या सुंदर चीजें उत्पन्न हो सकती हैं? लोगों की धारणाएँ आज भी विकृत हो रही हैं।
वे कलाकार किसका पीछा कर रहे थे? वे मानव प्रकृति की मुक्ति के बारे में बात कर रहे थे—कोई बंधन या संयम नहीं, और जो कुछ भी मन चाहे वह करना। बौद्ध धर्म सिखाता है कि, एक नैतिक संहिता के बिना, मनुष्य के मन को जाँचने के नैतिक मूल्यों के बिना, जो लोग प्रदर्शित करेंगे, वह आसुरिक प्रकृति होगी। बस आजकल की कलाकृतियों को देखें! साधारण लोगों को यह नहीं पता कि उनके पीछे क्या है। वह केवल आसुरिक प्रकृति का एक विशाल प्रदर्शन है।
उदाहरण के लिए दुकानों में बेचे जाने वाले खिलौनों को लें। अतीत में, लोग सुंदर गुड़िया खरीदते थे। आजकल, जितना अधिक बदसूरत कुछ होता है, उतना ही तेजी से वह बिकता है। खोपड़ी, राक्षसों, और यहाँ तक कि मल के समान चीजें खिलौनों के रूप में बेची जा रही हैं—और जितना अधिक भयानक वह दिखता है, उतना ही तेजी से वह बिकता है! क्या यह इंगित नहीं करता है कि लोगों की धारणाएँ बदल रही हैं, और बदतर होती जा रही हैं?
जब मैं समाज के साथ जो हुआ है इस पर चर्चा करता हूँ, तो लोग तुरंत समझ जाते हैं, जो इंगित करता है कि मनुष्य की सहज प्रकृति नहीं बदली है। हालांकि, मानव जाति एक भयावह खतरनाक बिंदु तक पहुँच गई है। जब मैं पश्चिम में व्याख्यान देते समय समलैंगिकता के बारे में बात कर रहा था, तो मैंने कहा, "पश्चिम में ये अनैतिक यौन कार्य लगभग अनैतिक कौटुम्बिक व्याभिचार जितने बुरे हो गए हैं।" तब किसी ने बताया कि "समलैंगिकता राज्य द्वारा कानूनी रूप से मान्य कर दी गयी है।" अच्छे और बुरे को किसी व्यक्ति या सामूहिक अनुमति से नहीं मापा जाना चाहिए। अच्छे और बुरे का मानव निर्णय पूरी तरह से लोगों की अपनी धारणाओं पर आधारित है। लोग सोचते हैं, "मुझे लगता है कि वह अच्छा है..." या "वह मेरे लिए अच्छा है, इसलिए मैं कहूंगा कि वह अच्छा है।" या उसने एक निर्धारित धारणा बनायी है, और, यदि उसकी धारणा के अनुसार कोई अच्छा है, तो वह कहेगा कि वह व्यक्ति अच्छा है। वही बात समूहों पर भी लागु है। जब कोई बात समूह के हित में होती है या यह एक निश्चित लक्ष्य को बढ़ावा देती है, तो समूह कहेगा कि यह अच्छी है और उसकी सहमति दे देगा। किंतु यह आवश्यक रूप से वास्तव में अच्छी हो ऐसा नहीं है। ब्रह्मांड का सत्य, बुद्ध फा, एकमात्र, अपरिवर्तनीय मानदंड है जो मनुष्यों और विद्यमान हर चीज को मापता है—एकमात्र मानदंड जो निर्धारित करता है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा। मैंने उनसे [पश्चिम के छात्रों से] कहा, "स्पष्टता से कहें तो, आपकी सरकार इसकी अनुमति दे सकती है, लेकिन आपके प्रभु नहीं!" हर बार जब मानव जाति इस बिंदु तक पहुँची है, तो यह वास्तव में गंभीर खतरे में रही है और नियंत्रण से बाहर रही है। अब जब यह ऐसा हो गया है, यदि यह आगे बढ़ता है, तो भविष्य में यह क्या होगा?! बुद्ध शाक्यमुनि ने कहा कि फा विनाश काल के दौरान कई असुर मनुष्यों के रूप में पुनर्जन्म लेंगे और मठों में भिक्षु बनेंगे जो फा को हानि पहुंचाएंगे। विशेष रूप से ताइवान में अब कई प्रसिद्ध भिक्षु और साधारण बौद्ध हैं जो वास्तव में असुर हैं। वे स्वयं की धर्मों के संस्थापकों के रूप में सराहना करवाते हैं, किंतु यह समझने में विफल रहते हैं कि वे असुर हैं। उन्होंने पुनर्जन्म लेने और यहाँ आने से पहले अपना पूरा जीवन निर्धारित कर दिया था, और वे उस के अनुसार अपना जीवन जीते हैं जो उन्होंने हानि करने के लिए रचा था। मानव संसार भयावह है। भारत में कई विख्यात, कथित "गुरु" विशाल अजगरों से ग्रसित हैं। चीन में कई चिगोंग गुरु, काफी बड़ी संख्या में लोमड़ियों और नेवलों से ग्रसित हैं, और साँपों से भी हैं। फा विनाश काल अराजकता का समय है। जापान में “ओम शिंरिक्यो” का प्रमुख नरक के एक असुर का अवतार है जो मानव संसार में अराजकता उत्पन्न करने आया है। मनुष्य इस सब से घिरा हुआ है, और, यहाँ मानव संसार में होने के कारण, उनके पास ऐसी चीजों के बारे में सोचने का समय नहीं है। वे अनुभव कर सकते हैं कि संसार के साथ कुछ अनुचित है, किंतु उन्हें यह नहीं पता कि यह कितना बुरा है। जब इसे विस्तृत रूप से बताया जाता है, तो लोग चौंक जाते हैं।
इस प्रकार केवल किसी आवेग में आकर मैंने इस फा को प्रदान करने का निर्णय नहीं लिया। और मैंने मार्ग में विभिन्न प्रकार के हस्तक्षेप का सामना किया है। जब आप कुछ पवित्र सिखाते हैं, तो कोई और कुछ दुष्टता का प्रचार करने आ जाता है, और कुछ पवित्र होने का ढोंग करेंगे और यहाँ तक कि लोगों को अच्छाई करने के लिए समझाएंगे। किंतु उनका उद्देश्य अच्छाई को बढ़ावा देना नहीं है। बल्कि, उनके ऐसे इरादे हैं जो बहुत देर तक टिक नहीं सकते थे। चिगोंग आंदोलन अच्छाई के साथ शुरू हुआ था, किंतु अब अंधेरी राह पर चल पड़ा है। संसार में अब बहुत कम बचा है जो पवित्र है।
संसार के कई सच्चे धर्म अब लोगों को नहीं बचा सकते हैं। यह इन मूल, सच्चे धर्मों के अनेक धर्मग्रंथों के साथ बाद की पीढ़ियों द्वारा छेड़छाड़ किये जाने के कारण है; उनके सिद्धांतों को जो बाद में आये उनके द्वारा अनुचित रूप से समझा गया, और अब उन्हें अध्ययन के एक विषय के रूप में माना जाता है। उदाहरण के लिए, बौद्ध धर्म का अध्ययन इस प्रकार किया जाता है जैसे कि यह दर्शनशास्त्र हो, और इसके जिन भी पहलुओं को आधुनिक विज्ञान द्वारा समझाया नहीं जा सकता है उन्हें प्राचीन लोगों की कल्पनाओं या पिछड़ेपन के रूप में समझाया जाता है। भिक्षु और पुजारी केवल ग्रंथ पढ़ते हैं, किंतु साधना नहीं करते हैं। मंदिर और मठ समाज के सूक्ष्म रूप बन गए हैं, जिनमें आपसी संघर्ष और पद के लिए प्रतिस्पर्धा होती है। यहाँ तक कि कुछ भिक्षु बौद्ध धर्म की दयनीय स्थिति का लाभ उठाते हैं और उससे धन कमाते हैं; उनके मोहभाव इतने प्रचुर हैं कि वे साधारण लोगों से भी अधिक हैं। इस प्रकार वे दूसरों को बचाना तो दूर, स्वयं को भी शायद ही बचा सकते हैं! और फिर कुछ प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु और ताओवादी पुजारी हैं जो मनमाने ढंग से बौद्ध सूत्रों और पवित्र धर्मग्रंथों की व्याख्या करते हुए पुस्तकें लिखकर, अपने व्यक्तिगत विचारों और सूत्रों के अपने थोड़े से ज्ञान के साथ लोगों को भटकाते हैं। महान ज्ञानप्राप्त प्राणियों के शब्दों में गहरे अर्थ सम्मिलित होते हैं और वे प्रत्येक स्तर और आयाम पर बुद्ध फा का मार्गदर्शन प्रदान कर सकते हैं जिसके माध्यम से साधक निरंतर उत्थान करते हुए प्रगति करते हैं। कोई भी कार्य जो महान ज्ञानप्राप्त प्राणियों के मूल शब्दों को बदलता है, वह फा को क्षीण करने के समान है।
वे व्याख्याएँ, जो कथित रूप से लोगों को सूत्रों और पवित्र धर्मग्रंथों को समझने में सहायता करती हैं, बुद्ध के शब्दों के सच्चे अंतर्निहित अर्थ से मूल रूप से भिन्न होती हैं। वे दो पूरी तरह से भिन्न चीजें हैं। वह छोटा सा भाग जो उन लेखकों ने समझा है, वह केवल उनकी अपनी, साधारण से थोड़ी सी ही उच्च समझ है, और वे उच्चतर स्तरों के अंतर्निहित अर्थ के बारे में कुछ नहीं जानते, क्योंकि उन्होंने उन ऊंचाइयों तक साधना नहीं की है। यदि वे तथागत स्तर तक नहीं पहुँचे हैं, तो वे तथागत के शब्दों के सच्चे, उच्चतर-स्तर के अर्थ को कैसे समझ सकते हैं? उनके लेखन केवल फा को क्षीण करने का कार्य करते हैं, और लोगों को नहीं बचा सकते हैं। इस प्रकार की पुस्तकें, जो प्रसिद्धि और लाभ के लिए लिखी गई हैं, बौद्ध पद्धतियों में साधना करने वाले लोगों को लेखक के विचारों के दायरे में सीमित कर रही हैं। कुछ तो यहाँ तक इसका समर्थन करते हैं कि धर्म को आजकल के समाज की आवश्यकताओं के अनुसार ढालना चाहिए, लेकिन इससे धर्म का सार बदल जायेगा। बुद्ध फा अपरिवर्तनीय और अविनाशी, न बदलने वाला दिव्य सत्य है। आप कल्पना कर सकते हैं कि जब लोग मनुष्य को बुद्ध फा का पालन करके उत्थान करने के विपरीत, बुद्ध फा को अनैतिक मनुष्य के तरीकों के अनुकूल बनाने का प्रयास करते हैं तो वे कितने विशाल पाप और बुरे कर्म अर्जित करेंगे। जिन लोगों ने मनमाने ढंग से बौद्ध सूत्रों की व्याख्या करते हुए पुस्तकें लिखी हैं, उन्होंने सच्चे फा में गंभीर रूप से हस्तक्षेप किया है, और वास्तव में उनके लिए बहुत पहले ही नर्क की सजा निश्चित की जा चुकी है।
मनुष्यों ने जन्म दर जन्म बहुत कुछ अनुचित किया है, जिससे कर्म की अत्याधिक मात्रा जमा हो गई है। यह एक कारक है जो उनके धार्मिक आस्था की कमी में योगदान प्रदान करता है। कुछ लोग हैं जिन्होंने पिछले जन्म में साधना की लेकिन अच्छी तरह से साधना नहीं की और उसमें विफल रहे। वे विभिन्न मोहभावों को त्यागने में असमर्थ थे, किंतु कुछ पुण्य अर्जित किये। जब वे अब मनुष्यों के रूप में पुनर्जन्म लेते हैं, तो उनके पास साधारणतः "असाधारण" शक्तियाँ होती हैं, और अपने दिव्य नेत्र से वे अन्य आयामों में निम्न स्तर पर चीजों की झलक देख सकते हैं। फिर, प्रसिद्धि और लाभ की मानवीय चाह से प्रेरित होकर, वे यह या वह धार्मिक समूह शुरू कर देते हैं। उपरी तौर पर लगता है कि वे लोगों को अच्छा बनना सिखा रहे हैं, किंतु उनके मन की गहराई में प्रसिद्धि और लाभ की एक लालसा, और अकथनीय उद्देश्य छिपे हुए हैं। महान ज्ञानप्राप्त प्राणियों के अपने स्वयं के दिव्यलोक हैं जहाँ पर वे लोगों को पहुँचा सकते हैं। किंतु ये विद्वान, लोगों को कहाँ पहुँचा सकते हैं? वही बात पाखंडी चिगोंग गुरुओं के लिए भी लागु है। उनमें से कुछ बुद्ध बनना चाहते थे, और कुछ सोचते हैं कि वे पिछले जन्म में एक बुद्ध थे। और फिर ऐसे लोग हैं जो पशुओं से ग्रसित हैं जो इन चिगोंग गुरुओं पर प्रशंसा की बौछार करते हैं, उन्हें "इस या उस पीढ़ी के महागुरु" कहते हैं, और इत्यादि। ये पाखंडी चिगोंग गुरु इसके कारण स्वयं से इतने प्रसन्न हो जाते हैं, किंतु यह सब बस आत्म-छल है। ये सभी विद्वान असुरों के अवतार हैं जो संसार का सर्वनाश करने आये हैं।
दुष्टता ने मानव संसार को पूर्ण रूप से गड़बड़ा दिया है। पाखंडी धर्म, पंथ, और कई परिवर्तित धर्म कई सदियों से प्रसारित हो रहे हैं, और सच और झूठ में अंतर करना कठिन है। हालांकि उन विधर्मी या झाड़-फूँक वाली साधनाओं के सिद्धांत बुरे हैं, फिर भी ऐसे लोग हैं जो उनमें आस्था रखते हैं और उनके प्रमुखों का सम्मान करते हैं। क्या यह हमें नहीं दर्शाता है कि लोगों की नैतिकता नष्ट हो गई हैं? और लोग उन आसुरिक साधनाओं में क्यों सम्मिलित होते हैं? अधिकांश ऐसे लोग दूसरों को हानि पहुँचाने के साधन ढूँढते हैं, वे हानि पहुँचाने के लिए तत्पर रहते हैं, और वे इस बात पर ध्यान नहीं देते कि आगे चलकर उनका क्या होगा। फा के विनाश काल में प्रवेश करने के कारण, सच्चे, मूल धर्म अब लोगों को नहीं बचा सकते हैं। असुरों के समूह संसार में उतर आये हैं, जहाँ वे फा को क्षीण करते हैं और बर्बादी फैलाते हैं। मनुष्यों में अब उन्हें संयमित रखने के लिए आंतरिक-फा नहीं बचे है, न ही उनमें नैतिक मानदंड बचे हैं। असुरो के झुंडों से प्रेरित होकर, वे कोई भी दुष्टता करने से नहीं रुकते हैं। नैतिक मूल्य और मानक जितनी तेजी से हो सकते हैं उतनी तेजी से नीचे खिसक रहे हैं। मनुष्य के सोचने का तरीका और अवधारणाएँ बदल गई हैं। सुंदर बदसूरत से कम आकर्षक लगने लगे है; पुण्यवान दुष्ट से कम लोकप्रिय लगने लगा है; अच्छा बुराई से कम वांछनीय लगने लगी है; साफ-सुथरा रूप अव्यवस्थित रूप से कम मूल्यवान लगने लगा है; जो नया है वह पुराने से कम पसंदीदा लगने लगा है; सुगंधित दुर्गंध से कम पसंदीदा लगने लगा है। पुरुष लंबे बाल रखते हैं जबकि महिलाएँ अपने बालों को छोटा कटवाती हैं—बढ़ते यिन और घटते यांग का एक प्रतिबिंब, यिन और यांग उलट गए हैं । कलाकृतियाँ नैतिक मानदंडों से रहित हो गई हैं और मानव प्रकृति से दूर जाने का प्रयास करती हैं, जिससे आसुरिकता का एक विशाल प्रदर्शन होता है। और फिर वह "चिन्हों वाली" और "अमूर्तवादी" चीजें है, जिसमें आड़े टेढ़े धब्बे होते हैं, जो आधुनिक लोगों और उनकी विकृत धारणाओं द्वारा कला के रूप में स्वीकार किये जाते हैं। बस कहीं कचरे का एक ढेर डाल दें और यह एक "विशिष्ट" आधुनिकतावादी मूर्तिकार की कलाकृति बन जाती है। और संगीत की बात करें तो, आप वह "टेक्नो" और "रॉक-एंड-रोल" देखते हैं, जिसमें लोग सुंदर हॉल के मंच पर चढ़ते हैं और शोर मचाते हैं। रेडियो और टेलीविजन से बढ़ावा मिलने पर, बेसुरी आवाजों वाले अंधे या विकलांग गायक और घृणित दिखावट वाले लोग सितारे बन जाते हैं। और बच्चों के खिलौनों की बात आती है तो, जितना अधिक बदसूरत और अधिक भयानक वे दिखते हैं, उतनी ही तेजी से वे बिकते हैं।
मानव जाति, पुण्यवान विचारों से रहित इस मानसिक स्थिति में, पहले की तुलना में पूर्ण रूप से भिन्न चीजों की खोज करती है। प्रसिद्धि और लाभ के लिए, लोग हत्या, आगजनी, और ठगी का सहारा लेते हैं। उनके लिए जो कुछ महत्व रखता है, वह धन है, मित्र या परिवार नहीं। मानव संबंध अब पूरी तरह से धन पर निर्भर करते हैं। इस प्रकार आप धन के लिए किए जा रहे हर प्रकार के अविवेकपूर्ण और अपमानजनक कार्यों को देखते हैं। उत्पाद, प्रचार सामग्री, और ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग जो अनैतिक यौन संबंधों को बढ़ावा देते हैं, हर ओर हैं। धन के लिए, लोग बिना किसी झिझक के नशीले पदार्थों का उत्पादन, तस्करी, और बिक्री करते हैं और दूसरों को हानि पहुँचाते हैं। वे नशीले पदार्थों के आदी दयनीय लोग कुछ भी करने से नहीं रुकेंगे—धन के लिए चोरी, लूट, और दूसरों को धोखा देना—उन महंगे नशीले पदार्थों को खरीदने के लिए। टेलीविजन कार्यक्रम, समाचार पत्र, पत्रिकाएँ, और साहित्यिक कार्य अनैतिक कौटुम्बिक यौन संबंधों से भरे पड़े हैं। लोग पीढ़ियों के बीच अनैतिक कौटुम्बिक यौन संबंध बनाने की सीमा तक जाते हैं। घृणित समलैंगिक व्यवहार इस बीच एक गंदी, भटकी हुई मानसिक स्थिति को इंगित करता है जिसमें तर्कसंगतता की कमी है। संगठित अपराध इतना व्यापक है कि कोई स्थान नहीं है जहाँ यह नहीं पहुँचता है, फिर भी यह युवा लोगों को आकर्षित करता है जो, अपने आसुरिक पक्ष से प्रेरित होकर, हिंसा की लालसा रखते हैं। अपराध प्रमुख प्रशंसा की वस्तु बन गए हैं, और लोग उनकी ओर भागते हैं।
कई महान जागृत प्राणियों और भविष्यवक्ताओं ने पहले ही भविष्यवाणी की थी कि मानव जाति को इस समय एक भारी आपदा का सामना करना पड़ेगा। आजकल की मानव जाति भविष्यवक्ताओं ने जो भविष्यवाणी की थी उससे भी बदतर है, और अच्छे लोग बहुत कम होते जा रहे हैं। कई गलतियों के कारण जो लोगों ने अपने कई जन्मों के दौरान कीं, और विशाल कर्म जो उन्होंने इस प्रकार जमा किये, लोग जैसे ही दरवाजे से बाहर निकलते हैं कठिनाई का सामना करते हैं। किंतु वे यह नहीं समझते हैं कि वे अब उस गलती का भुगतान कर रहे हैं जो उन्होंने अपने पिछले जन्मों में की थी और उस कर्म को समाप्त कर रहे हैं। जब दूसरे उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं, तो वे सहिष्णुता या धैर्य नहीं दिखाते हैं। बल्कि, वे सोचते हैं, "तुमने मेरे साथ अनुचित किया, तो मैं तुम्हारे साथ और भी बुरा करूंगा। मैं लोगों के साथ तब तक नहीं लड़ूंगा जब तक कि मुझे उकसाया न जाए, किंतु जब ऐसा होता है, तो मैं उनसे बदला अवश्य लूँगा, और उससे भी बढ़कर।" तो वे तब पूर्व कर्म को चुकाने से पहले नया कर्म जमा कर लेते हैं, और उनके शरीरों पर कर्म एक भयानक सीमा तक बढ़ जाता है! मानव नैतिकता तेजी से नीचे खिसक रही है और भयंकर खतरे के कगार पर है। हर कोई, जन्म दर जन्म, वास्तव में मानव नैतिकता के विशाल पतन की आग में घी डाल रहा है। हर बार जब संसार का आपदा से सामना हुआ था, तो यह एक ऐसा समय रहा था जब मानव नैतिक मूल्य नष्ट हो गए थे। यह वही है जो अंतिम कल्प की अवधि में होता है।
मेरे वास्तव में साधना करने वाले शिष्यों, मैंने आपको जो सिखाया है वह एक फा है जिससे कोई भी बुद्धत्व या दाओ की साधना कर सकता है। फिर भी आप मुझसे शिकायत करते हैं जब साधारण लोग जो चीजें महत्वपूर्ण मानते हैं वे आपके तरीके से नहीं होती हैं, इसके स्थान पर कि आप मानवीय मोहभावों को छोड़ने की अपनी अक्षमता के बारे में चिंतित हों। क्या वह साधना है? मानवीय मोहभावों को छोड़ना एक सच्चा श्रेष्ठ प्राणी बनने के आपके मार्ग पर इस परिवेश के अनुकूल एक परीक्षा है। जो भी शिष्य सच्ची साधना करता है उसे इसे पार करना होगा, क्योंकि यह साधक और साधारण व्यक्ति के बीच की विभाजन रेखा है।
सत्य यह है, जब आप उन चीजों से पीड़ित अनुभव करते हैं जो आपकी प्रतिष्ठा, आपके सांसारिक हितों, या आपकी भावनाओं को ठेस पहुंचाती हैं, वह तथ्य ही इंगित करता है कि मानवीय मोहभावों को नहीं छोड़ा गया है। मेरे शब्दों को याद रखें: साधना स्वयं दुःखदायक नहीं है; बल्कि, मुख्य समस्या मानवीय मोहभावों को छोड़ने की आपकी अक्षमता है। केवल तभी जब आपको प्रतिष्ठा, स्व-हित, और भावनाओं को छोड़ने की आवश्यकता होती है तभी आप दुःख का अनुभव करते हैं।
आप उस जगत से यहाँ गिरे हैं जो पवित्र और शुद्ध है, वह भव्य स्तर जिसकी तुलना नहीं की जा सकती है, क्योंकि आपने उस स्तर पर मोहभाव विकसित किये थे। किंतु इस संसार में गिरने के बाद जो, तुलना में, पूर्ण रूप से गंदा है, वापसी की साधना करते समय अपने कदमों को तेज करने के स्थान पर, आप इस गंदे संसार में गंदी चीजों को पकड़े रहते हैं और छोड़ने से इनकार करते हैं, और यहाँ तक कि छोटी-छोटी हानियों पर भी दुखी होते हैं। क्या आप नहीं जानते कि आपके मोक्ष के लिए बुद्ध ने साधारण लोगों के बीच भिक्षा माँगी थी? आज मैंने यह महान द्वार खोला है और आपको बचाने के लिए महान सिद्धांत सिखा रहा हूँ। मैंने उन अनगिनत अग्नि-परीक्षाओं को कभी भी कठिनाई के रूप में नहीं माना है जिनसे मैं गुजरा हूँ। तो आपके पास ऐसा क्या हो सकता है जिसे छोड़ा नहीं जा सकता है? क्या आप उन चीजों को जिन्हें आप छोड़ नहीं सकते हैं, दिव्यलोक के द्वार से पार ले जा सकते हैं?
स्पष्ट मन रखें और अच्छी समझ का उपयोग करें
मैंने एक बार कुछ शिष्यों से कहा था कि अत्यधिक कठोर विचारों की उपस्थिति का अर्थ है कि विचार-कर्म कार्य कर रहा है, फिर भी अब कई शिष्य साधारण परिस्थितियों में आने वाले सभी अनुचित विचारों को भी विचार-कर्म होने का दोषी ठहराते हैं। वह उचित नहीं है। यदि आपके अपने कोई बुरे विचार नहीं होते, तो आपके साधना करने के लिए क्या शेष रह जाता? यदि आप उतने पवित्र होते, तो क्या आप एक बुद्ध नहीं होते? हमारी यह समझ अनुचित है। केवल तभी जब आपका मन उग्र रूप से गंदे विचारों को उत्पन्न करता है या गुरु, दाफा, अन्य लोगों, आदि को कोसता है और आप उन्हें हटा या दबा नहीं सकते हैं तभी वह विचार-कर्म होता है। कुछ विचार-कर्म ऐसे भी होते है जो दुर्बल होते है, किंतु यह नियमित विचारों या धारणाओं से भिन्न है। आपको यह अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए।
मानव संसार गंदा और अशांत है; मछली की आँखों को मोती समझने लगा है। चुपचाप, बिना किसी को बताये, तथागत को संसार में उतरना होगा। जैसे-जैसे वे फा प्रसारित करेंगे, दुष्ट पद्धतियों द्वारा हस्तक्षेप निश्चित रूप से होगा। दाओ और आसुरिक समानांतर रूप से प्रसारित होते हैं, एक साथ पृथ्वी पर रहते हैं। जब सत्य और असत्य मिश्रित होते है, तो परखने की क्षमता ही कुंजी है। एक श्रेष्ठ प्राणी ही उनमें अंतर कर सकता है। वास्तव में, कुछ पूर्वनिर्धारित लोग हैं जो, अपने विवेक की क्षमता के साथ, एक के बाद एक निरंतर आते रहेंगे, मार्ग को अपनायेंगे और फा प्राप्त करेंगे। दुष्टता और पवित्रता में अंतर करते हुए, वे सच्चे शास्त्र प्राप्त करेंगे, अपने शरीरों को शुद्ध करेंगे, अपने विवेक को समृद्ध करेंगे, अपने मन को भरेंगे, और फा के जहाज पर निर्विघ्न यात्रा करेंगे। कितना अद्भुत! परिश्रमी, बिना किसी प्रयत्न को छोड़े, वे सीधे फल पदवी की ओर बढ़ते हैं।
जो लोग संसार में भ्रमित हैं, परख नहीं कर पाते हैं, वे धन के लिए जीते हैं और प्रतिष्ठा के लिए मरते हैं, केवल एक छोटे से लाभ में प्रसन्नता या चिंता प्राप्त करते हैं; वे हठपूर्वक प्रतिस्पर्धा करते हैं और लड़ते हैं, जीवनभर कर्म उत्पन्न करते हैं। यदि ऐसा व्यक्ति इस फा को सुनता है तो वह निश्चित रूप से हँसेगा, "बकवास" शब्द उसकी जीभ से निकलेगा; उसका मन निश्चित रूप से इसे समझने या विश्वास करने में कठिन पायेगा। एक हीन मनुष्य ऐसा होता है; उसे बचाना कठिन है। उसका कर्म इतना विशाल है कि वह उसके शरीर को ढक लेता है, उसकी बुद्धि को बंद कर देता है, और उसकी मूल प्रकृति को उभरने नहीं देता है।
“जो देखा जाता है उसपर विश्वास किया जा सकता है; जो नहीं देखा जाता उसपर विश्वास नहीं किया जा सकता है।” ऐसा हीन मनुष्य का विचार है। मनुष्य भ्रम में खोया हुआ है और प्रचुर कर्म बनाता है। अपनी जन्मजात प्रकृति के खो जाने के साथ, वह संभवतः [जो अदृश्य है उसे] कैसे देख सकता है? परखना पहले होता है, देखना बाद में। मन की साधना करें और कर्म को समाप्त करें, और फिर, एक बार जब आपकी जन्मजात प्रकृति उभरेगी, तो आप देख पाएंगे। किंतु, देख पाने या न देख पाने पर भी, श्रेष्ठ मनुष्य केवल विवेक पर निर्भर रहकर फल पदवी प्राप्त कर सकता है। लोगों में, कुछ देख पाते हैं जबकि अन्य नहीं देख पाते, यह किसी के स्तर और आध्यात्मिक क्षमता द्वारा निर्धारित होता है। साधक अक्सर इसे प्राप्त करने की अपनी इच्छा प्रयास के कारण नहीं देख पाते, जो एक मोहभाव के समान है; इसलिए इसे हटाए बिना वे नहीं देख सकते हैं। अक्सर यह कर्म के कारण होता है, एक प्रतिकूल परिस्थिति, या साधना की पद्धति द्वारा निर्धारित होता है; इसके कई कारण हैं, क्योंकि यह सब व्यक्ति पर निर्भर करता है। यहाँ तक कि जो व्यक्ति देख पाता है, उसके लिए भी कुछ चीजें अस्पष्ट होती हैं। और केवल तभी, धुंधली दृष्टि के साथ, मार्ग का ज्ञानप्राप्त करना होता है। यदि जो देखा जाता है वह इतना स्पष्ट है जैसे कि सीधे अनुभव किया गया हो, जिसमें कुछ भी अस्पष्ट न हो, तो यह कोई ऐसा व्यक्ति है जिसका गोंग बंधित नहीं है। वह आगे साधना नहीं कर सकता, क्योंकि ज्ञानप्राप्त करने के लिए कुछ भी शेष नहीं रहा है।
जब शिक्षित लोग दाफा सीख रहे होते हैं तो उन्हें एक सबसे प्रमुख समस्या पर ध्यान देना चाहिए: साधारण लोगों के राजनीतिक विचारधारा का अध्ययन करने के तरीके से दाफा का अध्ययन करना, जैसे कि स्वयं के आचरण को मापने के लिए प्रतिष्ठित व्यक्तियों के प्रासंगिक उद्धरणों का चयन करके अध्ययन करना। यह एक साधक की प्रगति में बाधा डालेगा। कुछ ऐसे भी हैं जो, यह सुनकर कि दाफा में गहरे, अंतर्निहित अर्थ और उच्च-स्तर की सामग्री है जो विभिन्न स्तरों पर साधना का मार्गदर्शन कर सकती है, प्रत्येक और हर शब्द में गहराई से जाने का प्रयास करते हैं, किंतु कुछ प्राप्त नहीं कर पाते हैं। राजनीतिक सिद्धांत के लंबे समय तक अध्ययन के माध्यम से बनी ये आदतें, एक कारक हैं जो आपकी साधना को प्रभावित करता है, क्योंकि वे आपको फा को अनुचित प्रकार से समझने की ओर ले जाते हैं।
फा का अध्ययन करते समय, आपको किसी विशेष मामले से जुड़े प्रासंगिक भागों की खोज करने से बचना चाहिए। वह वास्तव में यह एक भिन्न रूप में मोहभाव है (इस अपवाद के साथ कि यदि तात्कालिक समस्याएँ हैं और उनके लिए समाधान की आवश्यकता है)। दाफा का अच्छी तरह से अध्ययन करने का एकमात्र तरीका इसे किसी भी विशिष्ट लक्ष्य के बिना अध्ययन करना है। झुआन फालुन के प्रत्येक पूर्ण पठन के साथ, आपने प्रगति की होती है यदि आपने अंतर्दृष्टि प्राप्त की है। चाहे आपने इसे पढ़ने के बाद केवल एक नई अंतर्दृष्टि प्राप्त की हो, आपने वास्तव में सुधार किया है।
साधना में, ऊपर की ओर प्रगति वास्तव में कुछ ऐसा है जो थोड़ा-थोड़ा करके प्राप्त किया जाता है और आप उससे अनजान होते हैं। स्मरण रहे : जो आप प्राप्त करते हैं वह स्वाभाविक रूप से आना चाहिए, इच्छाभाव से मुक्त।
विभिन्न क्षेत्रों में कई स्वयंसेवक हैं जिन्हें दाफा की अच्छी समझ है, और वे एक उदाहरण स्थापित करने और हमारे साधना स्थलों को अच्छी तरह से चलाने में सक्षम हैं। किंतु कुछ स्वयंसेवक हैं जिन्होंने इतना अच्छा नहीं किया है, और यह मुख्य रूप से उनके कार्य करने के तरीके में प्रकट होता है। यदि वे, चीजों को अधिक सरलता से पूरा करने के उद्देश्य से, साधना स्थलों पर चीजों को करने के लिए आदेश देते हैं जिससे शिष्य उनकी बात मानें, तो यह एक समस्या है। फा का अध्ययन करना एक स्वैच्छिक कार्य है। यदि अध्ययन करने वाले व्यक्ति का मन इसमें नहीं है, तो कोई समस्या या मुद्दा हल नहीं होगा, और संघर्ष निश्चित रूप से उत्पन्न होंगे। यदि दृष्टिकोण नहीं बदला जाता है, तो यह संघर्षों को बढ़ाने का कारण बनेगा, जिससे लोगों का फा अध्ययन बुरी तरह से प्रभावित होगा।
इससे भी बुरा, कुछ स्वयंसेवक अक्सर, साधकों को उनमें विश्वास करवाने और उनकी बात मनवाने के लिए, स्वयं को ऊँचा दिखाने के लिए अफवाहें या सनसनीखेज चीजें फैलाते हैं, या स्वयं की दूसरों से हटकर अपनी अलग पहचान बनाने का प्रयास करते हैं। इन सबकी की अनुमति नहीं है। हमारे स्वयंसेवक अपनी स्वयं की इच्छा से दूसरों की सेवा करते हैं, और वे गुरु नहीं हैं। उन्हें इस प्रकार का मोहभाव तो बिल्कुल भी नहीं रखना चाहिए।
तो हम स्वयंसेवक का कार्य अच्छी तरह से कैसे करें? पहला, आपको स्वयं को शिष्यों में से ही एक समझना चाहिए और स्वयं को उनसे ऊपर नहीं समझना चाहिए। यदि कुछ ऐसा है जो आप नहीं जानते कि कैसे करना है, तो विनम्रतापूर्वक सबके साथ मिलकर इसकी चर्चा करें। और यदि आपने कोई कार्य ठीक से नहीं किया है, तो सच्चाई से शिष्यों को बताएं, "मैं आपकी तरह ही एक साधक हूँ, और इस कार्य को करने में गलतियों से बचना कठिन है। मैंने इसे ठीक प्रकार से नहीं किया है। अब हम इसे ठीक से करते हैं।" यदि आप सच में सबसे मिलकर उस चीज को अच्छी तरह होते हुए देखना चाहते हैं, तो आपको क्या लगता है कि यह उचित होगा? कोई भी यह नहीं कहेगा कि आप अच्छे नहीं हैं। ठीक इसके विपरीत, लोग सोचेंगे कि आपने फा का अच्छी तरह से अध्ययन किया है और आप उदार हृदय वाले हैं। दाफा ठीक यहाँ हमारे साथ है, और आप सभी इसका अध्ययन कर रहे हैं। स्वयंसेवक का प्रत्येक और हर कार्य, अच्छा या बुरा, शिष्यों द्वारा दाफा के प्रकाश में मापा जाएगा और जैसा है वैसा समझा जाएगा। जब आप स्वयं का पद ऊँचा करने में लग जाते हैं, तो शिष्य सोचेंगे कि आपके शिनशिंग के साथ कोई समस्या है। केवल विनम्र होकर ही आप चीजों को अच्छी तरह से संभाल सकते हैं। किसी का कद फा का अच्छी तरह से अध्ययन करने से स्थापित होता है। क्या कोई साधक दोष से रहित हो सकता है?
"रिक्तता" क्या है? सच्ची रिक्तता किसी भी मोहभाव के अभाव के बारे में है, न कि भौतिक अर्थ में रिक्तता। किंतु फिर ज़ेन बौद्ध धर्म की बात करें तो, वह अब नहीं रहा है और जिसमें संचारण करने के लिए कुछ भी शेष नहीं बचा है। इस अंतिम युग में, जब फा गड़बड़ा गया है, तब भी इसके ऐसे शिष्य हैं जो इसके रिक्तता के सिद्धांत से हठपूर्वक चिपके हुए हैं, विवेक और तर्क से रहित कार्य करते हैं, जैसे कि उन्होंने दार्शनिक सत्य के मूल को समझ लिया हो। लेकिन इसके संस्थापक कुलपति, बोधिधर्म, ने स्वयं एक बार इसे केवल छह पीढ़ियों का धर्म घोषित किया था, जिसके बाद संचारण करने के लिए कुछ भी शेष नहीं बचेगा। यह क्यों नहीं समझा जाता है? यदि यह कहा जाता है कि सब कुछ रिक्त है, कोई फा विद्यमान नहीं है, कोई बुद्ध नहीं है, कोई रूप नहीं है, कोई स्व नहीं है, और कुछ भी विद्यमान नहीं है, तो बोधिधर्म क्या थे? यदि कोई फा नहीं है, तो ज़ेन का रिक्तता का सिद्धांत क्या है? यदि कोई बुद्ध नहीं है और कोई रूप नहीं है, तो शाक्यमुनि कौन थे? यदि आपका कोई नाम नहीं है, कोई रूप नहीं है, कोई स्व नहीं है, कोई अस्तित्व नहीं है, और सब कुछ "रिक्तता" है, तो आप किस कारण से खाते हैं और पीते हैं? वस्त्र क्यों पहनते हैं? क्या यह ठीक होगा यदि आपकी आँखों को निकाल दिया जाए? फिर भी देखो आप मानव भावनाओं और इच्छाओं से कितने मोहभाव रखे हुए हैं। जब एक तथागत "रिक्तता" की बात करते हैं, तो यह मानव मोहभावों के पूर्ण अभाव को संदर्भित करता है; "अपवित्रता से मुक्त" होना "रिक्तता" का सच्चा अर्थ है। ब्रह्मांड अपने अस्तित्व, इसके गठन, और इसके निरंतरता में सहज रूप से भौतिक है। यह "शून्य" कैसे हो सकता है? तथागत से निम्न किसी के भी द्वारा प्रदान किया गया फा अधिक समय के लिए नहीं चल सकता है, इसकी शिक्षाएँ निश्चित रूप से समाप्त हो जाएँगी। एक अर्हत का फा बुद्ध फा नहीं है। इसे समझें! इसे समझें!
जब गुरु सामने होते हैं तो आप आत्मविश्वास से भरे होते हैं। जब गुरु सामने नहीं होते, तो आपकी साधना में कोई रुचि नहीं होती, जैसे कि आप गुरु के लिए साधना कर रहे हैं और इसे ऐसे ही आवेग में आकर करना शुरू किया था। साधारण मनुष्य की यही एक बड़ी त्रुटि है। शाक्यमुनि, यीशु, लाओ ज, और कन्फ्यूशियस दो हजार वर्षों से अधिक समय पहले जा चुके हैं, फिर भी उनके शिष्यों ने कभी अनुभव नहीं किया कि वे अपने गुरु की अनुपस्थिति में साधना नहीं कर सकते हैं। साधना कुछ ऐसी है जो स्वयं आप पर निर्भर करती है, और कोई भी इसे आपके स्थान पर नहीं कर सकता है। एक गुरु केवल, कम से कम सतही तौर पर, आपको फा के सिद्धांत बता सकते हैं। यह आप पर निर्भर करता है कि आप अपने मन की साधना करें और इच्छा की डोर को काटें, ज्ञान का प्रकाश प्राप्त करें और सभी संदेह दूर करें। यदि आपने आवेग में आकर इस मार्ग को शुरू किया था, तो आपका मन निश्चित रूप से दृढ़ नहीं होगा और जब आप सांसारिक जगत में जाएँगे तो निश्चित रूप से अपका आधार भी नहीं रहेगा। यदि आप अपनी आस्था में दृढ़ नहीं रह सकते, तो आपके पूरे जीवनकाल के बाद भी कुछ नहीं बचेगा। कौन जानता है कि भाग्य में एक और अवसर कब आयेगा। यह आने कठिन हैं!
बौद्ध धर्म की शिक्षाएँ बुद्ध फा का सबसे छोटा और कमजोर भाग हैं
चेतन प्राणियों! सत्य, करुणा, सहनशीलता के महान फा को मापने के लिए बौद्ध धर्म का उपयोग न करें, क्योंकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं किया जा सकता है। वह केवल इसलिए किया जाता है क्योंकि लोगों को बौद्ध धर्म के सूत्रों को "फा" कहने की आदत पड़ गई है। वास्तव में ब्रह्मांडीय पिंड इतना विशाल है कि यह बुद्ध के ब्रह्मांड के ज्ञान से कहीं अधिक है। ताओवादी ताईजी सिद्धांत भी इसी प्रकार केवल एक छोटे स्तर पर ब्रह्मांड की एक समझ है और, साधारण मनुष्य के स्तर पर, अब वर्तमान में एक वास्तविक फा का गठन नहीं करता है; बल्कि, यह केवल ब्रह्मांड की बाहरी परत से कुछ, सीमित समझ को सम्मिलित करता है जिनके साथ लोग साधना कर सकते हैं। क्योंकि साधारण लोग मनुष्य का सबसे निम्न स्तर हैं, उन्हें वास्तविक बुद्ध फा को जानने की अनुमति नहीं है। किंतु लोगों ने संतों को यह कहते हुए सुना है कि: "बुद्ध का आदर करना साधना करने के अवसर के कर्म बीज बो सकता है," "साधकों द्वारा मंत्रों का जाप करने से उच्चतर प्राणियों की सुरक्षा प्राप्त हो सकती है," "मठों के नियमों का पालन आपको एक साधक के आवश्यक मानदंड तक पहुँचा सकता है।" इतिहास काल से, लोगों ने हमेशा यह देखा है और चर्चा की है कि क्या ज्ञानप्राप्त प्राणी के शब्द सहज रूप से बुद्ध फा के समान माने जा सकते हैं। जो एक तथागत कहता है, वह बुद्ध-प्रकृति का एक रूप है, और इसे फा की एक अभिव्यक्ति कहा जा सकता है। किंतु यह ब्रह्मांड का वास्तविक फा नहीं है, क्योंकि, अतीत में, लोगों को बुद्ध फा के वास्तविक रूप को जानने की कड़ाई से मनाही थी। बुद्ध फा क्या है, वह कुछ ऐसा था जिसे केवल एक उच्चतर स्तर तक साधना करने के बाद ही समझा जा सकता था; इस प्रकार, मानव प्राणियों को साधना के सार को जानने की अनुमति दी जाना तो और भी कम संभव था। फालुन दाफा ने, सभी युगों में पहली बार, ब्रह्मांड के विशेष गुण—बुद्ध फा—को मनुष्यों के सामने प्रकट किया है। यह मनुष्य को दिव्यलोक तक पहुँचने की सीढ़ी प्रदान करने के समान है। इस दृष्टि से देखने पर, आप बौद्ध धर्म के अतीत की चीजों से ब्रह्मांड के महान फा का मूल्यांकन कैसे कर सकते हैं?
लोग मानव समाज के प्रसिद्ध व्यक्तियों, विद्वानों, और विभिन्न विशेषज्ञों को इतना मानते हैं। वास्तव में, वे बहुत ही महत्वहीन हैं, क्योंकि वे साधारण लोग हैं। उनका ज्ञान केवल वह छोटी, नगण्य चीजें है जिसे मानव समाज के आधुनिक विज्ञान ने अर्जित किया है, केवल इतना ही। विशाल ब्रह्मांड में, सबसे स्थूलतम स्तर से सबसे सूक्ष्मतम स्तर तक देखने पर, मानव समाज ठीक केंद्र में, सबसे बाहरी परत पर, और ठीक सतह पर स्थित है। और वहाँ के जीव अस्तित्व के सबसे निम्न रूप हैं, इसलिए उनका भौतिक और आध्यात्मिक ज्ञान कम, उथला, और दयनीय है। भले ही कोई मानवजाति के सारे ज्ञान में महारत प्राप्त कर ले, वह अभी भी एक साधारण व्यक्ति ही रहेगा।
साधना करने के लिए सेवानिवृत्ति तक प्रतीक्षा करना
शिष्यों का कुछ प्रतिशत ऐसा है जो एक अच्छी आध्यात्मिक क्षमता से संपन्न हैं जो मेरे व्याख्यानों में सम्मिलित हुए और फिर भी, क्योंकि वे अपने व्यवसायों में व्यस्त हैं, उन्होंने साधना करनी छोड़ दी है। कितना दुःखदायक! यदि वे सामान्य, साधारण लोग होते, तो मैं और कुछ नहीं कहता और इस बात को वहीं छोड़ देता। किंतु ये होनहार लोग हैं। मानव नैतिकता हर दिन गिरती जा रही है, और साधारण लोग लहरों के साथ बह रहे हैं। जैसे-जैसे वे दाओ से परे होते जाते हैं, साधना के माध्यम से लौटना उनके लिए, उतना ही कठिन होता जाता है। वास्तव में साधना मन की साधना करने का एक विषय है, और कार्यस्थल की जटिल परिस्थिति, विशेष रूप से, आपके शिनशिंग को ऊंचा करने का वास्तव में एक अच्छा अवसर प्रदान करती है। एक बार जब आप सेवानिवृत्त हो जाते हैं, तो क्या आप साधना करने के लिए आदर्श परिस्थिति गंवा नहीं देंगे? मतभेद बिल्कुल भी नहीं होने पर, साधना करने के लिए आपके पास क्या होगा? आप कैसे सुधार करेंगे? एक मानव जीवन केवल इतना ही लंबा होता है, तो जबकि आपके पास अक्सर अच्छी योजनाएँ हो सकती हैं, क्या आपको वास्तव में पता हैं कि भविष्य में [आपके साधना करने के लिए] पर्याप्त समय बचा है या नहीं? साधना कोई साधारण विषय नहीं है, बल्कि, मानव संसार में किसी भी चीज से अधिक गंभीर है; इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता है। एक बार जब आप अवसर चूक जाते हैं, तो कौन कह सकता है कि आप पुनर्जन्म के चक्र में फिर से एक मानव शरीर कब प्राप्त करेंगे। सौभाग्य केवल एक बार आता है। एक बार जब आप जिस सपने जैसे भ्रम से चिपके रहते हैं वह समाप्त हो जाता है, तो आप अनुभव करेंगे कि आपने क्या खोया है।