अमेरिका की राजधानी के फा सम्मेलन में फा की सीख
 

होंगज़ी ली
22 जुलाई, 2006 ~ वॉशिंगटन, डी.सी.

(उत्साहपूर्ण तालियाँ)

सभी का अभिनंदन! (शिष्य कहते हैं, “प्रणाम, गुरु जी!”)

इस फा सम्मेलन में काफी लोग आए हैं। अनेक क्षेत्रों से शिष्य आए हैं। एक सम्मेलन कक्ष में सभी नहीं समा सकते, इसलिए कई सम्मेलन कक्षों की व्यवस्था की गई है। आज तक दाफा शिष्यों के रूप में साधना करते हुए, आप यह और अधिक स्पष्ट रूप से समझने लगे हैं कि यह दाफा क्या है जिसकी आप साधना करते हैं, दाफा शिष्यों के उत्तरदायित्वों को अधिक स्पष्ट रूप से समझने लगे हैं, और आज दाफा शिष्य जो कुछ कर रहे हैं उसके महत्व को भी अधिक स्पष्ट रूप से समझने लगे हैं। इसी कारण आप अधिक परिपक्व हो गए हैं और जीवों को बचाने, व्यक्तिगत साधना करने, और फा-सुधार काल के दाफा शिष्यों के रूप में दाफा का मान्यकरण करने में और अधिक अच्छे होते गए हैं। समग्र स्थिति में हो रहे परिवर्तनों से यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

तो वर्तमान की समग्र स्थिति के विषय में, अब यह उस समय से पूर्ण रूप से भिन्न है जब दुष्ट दमन आरंभ हुआ था। दुष्टता द्वारा फालुन गोंग का दमन फालुन गोंग को रोकने में सफल नहीं हुआ, बल्कि वे स्वयं ही ध्वस्त हो गए। (तालियाँ) यह साधारण मानव समाज में लोगों के केवल एक समूह के विरुद्ध दमन नहीं है, और न ही यह साधकों के केवल एक समूह के विरुद्ध दमन है। यह ब्रह्मांड में अच्छाई और दुष्टता के बीच सामना है, और यह उन जीवों, जो फा-सुधार प्रक्रिया के दौरान प्रभावित हुए हैं, और जो स्वार्थी हैं, जो अपने लिए कार्य करते हैं, और जो भटक गए हैं, तथा स्वयं फा-सुधार के बीच सामना है। मैंने बहुत पहले कहा था कि फा-सुधार निश्चित रूप से सफल होगा और कोई भी इसे रोक नहीं सकता। (तालियाँ) यह कोई साधना का साधारण विषय नहीं है, और न ही यह उस करुणामयी नागरिकों के समूह से संबंधित कोई साधारण विषय है जिसे यहाँ मानव समाज में फालुन गोंग कहा जाता है। बल्कि यह मानव समाज में प्रतिबिंबित ब्रह्मांड के फा-सुधार का एक सूक्ष्म रूप है, और मानव समाज ब्रह्मांड में हो रही सभी घटनाओं का केंद्र-बिंदु है। साधारण मानव समाज में जो घटित हो रहा है उससे हम पूरे ब्रह्मांड के फा-सुधार की समग्र स्थिति देख सकते हैं। यद्यपि यह कोई महान और भव्य प्रदर्शन नहीं है, कोई दीर्घकालीन और आत्मा को झकझोर देने वाली घटना नहीं है—जैसी कि यह ब्रह्मांड में हो रही है—फिर भी यह अच्छाई और दुष्टता के बीच की लड़ाई की अभिव्यक्ति है जो मानव समाज में संकुचित हो गई है, और यह देखा जा सकता है कि विकृत जीवों ने फा-सुधार प्रक्रिया के दौरान किस प्रकार हस्तक्षेप किया है।

एक बात है जो मैंने पहले कही थी, वह यह थी, “यदि दिव्यता कुछ परिवर्तित करना चाहती है, तो कोई भी उसे नहीं रोक सकता।” (तालियाँ) तो उस तुच्छ दुष्ट दल का क्या? उसका क्या मूल्य है? यदि दाफा शिष्यों की साधना आज समाप्त होनी होती, यदि केवल इतने ही लोगों को बचाया जाना होता—यदि संसार के बचाए जाने वाले लोगों की संख्या केवल इतनी ही होती—और सब कुछ इसी बिंदु पर समाप्त होना होता, तो दुष्ट दल को विघटित होने में एक दिन से भी कम समय लगता। (तालियाँ) ऐसा इसलिए है क्योंकि उसके अस्तित्व का उद्देश्य, इतिहास द्वारा पहले उसे रचने का कारण, और उसे बनाए रखने की पूरी प्रक्रिया, सब आज दाफा शिष्यों द्वारा फा का मान्यकरण करने के लिए ही है। यही प्राचीन शक्तियों ने व्यवस्थित किया था। जब उसका अब कोई उपयोग नहीं रहेगा, तो उसे क्यों रखा जाएगा? ब्रह्मांड में उसका कुछ भी महत्व नहीं है। केवल दाफा शिष्यों की साधना और चेतन प्राणियों को बचाना ठोस और वास्तविक है। केवल दाफा शिष्यों के स्तरों की उन्नति और केवल वह महान सद्गुण, जिसे दाफा शिष्य इस प्रक्रिया में स्थापित करते रहे हैं, शाश्वत हैं। वे भविष्य के लिए हैं। तब अन्य बातों का क्या महत्व है? कुछ भी नहीं। जिसने भी या जिस किसी चीज ने भी इस काल में हस्तक्षेप करने वाला प्रभाव डाला है, वे अपने ऋण चुकाते हुए विघटित होकर पूर्ण रूप से नष्ट कर दिए जाएंगे।

निश्चित ही, दाफा शिष्य साधना करने और फा का मान्यकरण करने की प्रक्रिया में जो कुछ प्रदर्शित करते हैं, उसे केवल साधना की अवस्था में एक अभिव्यक्ति माना जा सकता है। उस प्रक्रिया में अवश्य ही कोई ऐसे होंगे जो अच्छा करते हैं और कोई ऐसे जो थोड़ा कम अच्छा करते हैं, कोई ऐसे जो दृढ़ नहीं होते और अस्थिर हो जाते हैं, और निश्चित ही ऐसे भी होते हैं जो अधिक दृढ़ और अच्छे होते हैं। ये सब उस प्रक्रिया की अभिव्यक्तियाँ हैं, और साधना ऐसी ही होती है। ये उन शिनशिंग परीक्षाओं से भिन्न हैं जो व्यक्ति पर केंद्रित थीं और अतीत की साधना पद्धतियों में पाई जाती थीं। आप सभी उन अतीत की साधना पद्धतियों के बारे में जानते हैं। चाहे जो भी हो, साधना करते समय उन्हें जिन शिनशिंग परीक्षाओं का सामना करना पड़ा, वे सब उनके व्यक्तिगत विषयों से संबंधित थीं। अब बातें भिन्न हैं। फा असीम है, और मुख्य उद्देश्य ब्रह्मांड का फा-सुधार है। दाफा शिष्य अपनी साधना करते समय जो प्रदर्शित करते हैं, वह अतीत की साधनाओं से पूर्ण रूप से भिन्न है, जहाँ लक्ष्य अपनी स्वयं की फल पदवी था।

मैंने बहुत पहले कहा था कि दाफा शिष्य जो साधना करते हैं वह साधना का स्वरूप साधारण मानव समाज के अधिकतम अनुरूप है; व्यक्ति साधारण लोगों के जीने के तरीके के अधिकतम अनुरूप रहते हुए साधना करता है। तब जो साधना साधारण मानव समाज के जीने के तरीके के अनुरूप होती है, उसमें वैसी ही साधना की अवस्था सम्मिलित होती है। साधना की यह अवस्था इतिहास की किसी भी साधना पद्धति या अवस्था से भिन्न है। यदि आप किसी अन्य साधना पद्धति या साधना मार्ग को संदर्भ के रूप में प्रयोग करने का प्रयास करें तो आपको ऐसा कोई नहीं मिलेगा, क्योंकि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। फा-सुधार जितनी विशाल कोई वस्तु कभी नहीं रही, और न ही ऐसी कोई वस्तु कभी रही जो जीवों के इतने बड़े समूह को और इतनी ऊँची फल पदवी पर पहुँचाये। साथ ही, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई भी व्यक्ति कभी भी साधना में सफल नहीं हुआ; जो सफल हुए वे सब सह आत्माएँ थीं। इतिहास में कभी कोई मानव दिव्य प्राणी नहीं बना, इसलिए [जो हम कर रहे हैं] वह अतीत की किसी भी साधना पद्धति से मेल नहीं खाता। इस साधना के वातावरण में और दाफा शिष्यों की साधना प्रक्रिया के दौरान, ऐसे अवसर आते हैं जब आप अच्छे से सहयोग करते हैं और ऐसे भी जब नहीं करते, और कभी-कभी आपको मतभेदों और तनावों की निरंतर धारा का सामना करना पड़ता है। ऐसे भी अवसर होते हैं जिनमें दाफा शिष्य एक साथ उन्नति करते हुए समस्याओं को सुलझा पाते हैं और फिर भी मतभेदों आदि की लहरें उठती रहती हैं। कभी-कभी अभिव्यक्तियाँ तीव्र होती हैं, कभी हल्की, और कभी-कभी साधना में कुछ समय बीत जाने के पश्चात ऐसी चीजें फिर से होने लगती हैं और नए मतभेद तथा तनाव उभर आते हैं, यहाँ तक कि वे पहले से भी अधिक गंभीर हो जाते हैं। तब कुछ लोग सोचते हैं: “अरे… हम साधना करते जा रहे हैं, और फिर भी ये मतभेद और चीजें अब भी इतनी तीव्र हैं? इतनी साधना करने के पश्चात भी मतभेद क्यों हैं? हम साधना करते ही जाते हैं, तब भी ऐसा क्यों लगता है कि हम पहले जितने भी अच्छे नहीं रहे हैं? इतनी साधना के पश्चात भी हमें कोई सुधार क्यों नहीं दिखता?” अनेक लोगों के मन में ऐसे विचार आते हैं। वास्तव में, यह अनुचित निष्कर्ष है, और यह दाफा शिष्यों की साधना स्वरूप की पूर्ण अज्ञानता को दर्शाता है।

मैंने यह निर्धारित किया कि दाफा शिष्य साधारण मानव समाज में साधना करें, और यद्यपि इसने सबसे सुविधाजनक मार्ग खोल दिया—[लोगों को सक्षम बनाते हुए] कि वे सांसारिक जगत को त्यागे बिना साधना द्वारा दिव्यता या बुद्धत्व प्राप्त कर सकें—जैसा कि आप जानते हैं, जब साधारण-समाज के मोहभाव आपस में टकराते हैं तब जो भिन्न-भिन्न बातें उत्पन्न होती हैं, और नैतिकता के पतन तथा बिखराव के बीच समाज की वास्तविकताओं में लोग जिस अवस्था में हैं, वे विशाल चुनौतियाँ प्रस्तुत करती हैं। और बात यहीं समाप्त नहीं होती। देवताओं की दृष्टि में, यह स्थान संकटपूर्ण और मलिन है, और कर्म चारों ओर है। लोग अपने शरीरों पर इतना कर्म ढोते हैं कि राह पर चलते हुए भी वह उनमें से टपकता रहता है। और फिर भावनाओं (चिंग) का दुष्ट असुर और सड़े-गले प्रेत हैं जो मानव संसार में व्याप्त हैं। ये सब वस्तुएँ निम्नतम स्तर का वह पदार्थ हैं जो विकृत हो चुका है। तब ऐसा वातावरण, साधना की दृष्टि से, केवल इस बात की परीक्षा नहीं है कि आप यहाँ सुधार कर सकते हैं या नहीं, बल्कि यह आपके उस भाग को भी, जिसकी सुधार के साथ सफलतापूर्वक साधना हो चुकी है, गंभीर रूप से दूषित कर देगा। यह निश्चित रूप से ऐसा ही होता। क्या कोई व्यक्ति उस प्रकार साधना कर सकता था? आप साधना करते रहते, और दूषित होते रहते, साधना करते रहते, दूषित होते रहते, बार-बार। क्या आप उस प्रकार साधना में सफल हो सकते थे? नहीं हो सकते थे। इसलिए जब मैं साधना का यह स्वरूप निर्धारित कर रहा था तब मैंने इस बात को ध्यान में रखा। इस प्रकार, साधना की प्रक्रिया के दौरान, जैसे ही कोई साधक किसी भाग की सफलतापूर्वक साधना कर लेता है, उसका स्तर ऊँचा होने और उसके किसी परीक्षा में उत्तीर्ण होने के साथ, वह भाग समय के बंधन से मुक्त करके तुरंत ही अलग कर दिया जाता है। (तालियाँ) [उस भाग का] फिर मानव संसार से कोई संपर्क नहीं रह जाता, और वह विशाल काल अवकाश द्वारा अलग कर दिया जाता है। उदाहरण के लिए, उसे लाखों या करोड़ों वर्ष बाद के किसी समय में रखा जा सकता है। तब क्या आप उसे दूषित कर सकते हैं? वह पहुँच से परे है। वह कुछ इंच की दूरी पर हो सकता है, किंतु विशाल काल अवकाश के अंतर के कारण यह आयाम दाफा शिष्य के उस भाग में, जिसकी सफलतापूर्वक साधना हो चुकी है, तनिक भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता। मैं केवल इस विचार को समझा रहा हूँ—वह अलग कर दिया जाता है। इस प्रकार जैसे-जैसे जिन भागों की निरंतर साधना पूर्ण होती जाती है, वे निरंतर अलग कर दिए जाते हैं। जैसे-जैसे जिन भागों की निरंतर साधना पूर्ण होती जाती है, वे निरंतर अलग कर दिए जाते हैं; और जिन भागों की साधना पूर्ण नहीं होती है, वे तब तक निरंतर साधना से गुजरते रहते हैं, उस बिंदु तक जब तक कि कुछ भी शेष नहीं रहता और सबकी साधना सफलतापूर्वक हो चुकी होती है। यही वह साधना मार्ग है जिसे आपको अपनाना है।

तब जब आप उस प्रक्रिया से गुजरते हैं, तो इस पर विचार करें: क्या आपका वह भाग जो साधारण मानव समाज में प्रकट होता है—वह भाग जिसकी सफलतापूर्वक साधना नहीं हुई है—एक साधना करते हुए मानव का भाग नहीं है? चूँकि यह एक मानव है जो साधना कर रहा है, उसके मानवीय विचार और व्यवहार होंगे। चूँकि यह एक मानव है जो साधना कर रहा है, उसके सभी प्रकार के बुरे मानवीय विचार होंगे जो या तो समय के साथ बने हैं या समाज द्वारा दूषित होने के कारण उत्पन्न हुए हैं। तब एक साधक के रूप में, वे चीजें करना जो दाफा शिष्यों को करनी चाहिए, जैसे कि वे कार्य जो फा का मान्यकरण करते हैं और जो चेतन प्राणियों को बचाते हैं, आदि, यह व्यक्ति का कर्तव्य-बद्ध उत्तरदायित्व है और महान सद्गुण स्थापित करने का एक भाग है। किंतु स्वयं में सुधार कर पाना सबसे महत्वपूर्ण है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यदि आप स्वयं में सुधार नहीं करते, तो आप उनमें से कोई भी कार्य अच्छे से नहीं कर पाएँगे। इसलिए जब आप स्वयं के प्रति अनुशासित रहते हैं, अपनी कमियों को खोजते हैं, और निरंतर उन्हें हटाते हैं, तब आप साधना कर रहे होते हैं। यदि किसी परीक्षा से गुजरते समय आप कुछ समझ जाते हैं, और उसके प्रति स्पष्टता प्राप्त करते हैं, और चीजों को अच्छे से संभालते हैं, तो आपका स्तर ऊँचा हो जाएगा। आपका वह भाग अलग कर दिया जाता है, और अधिक सुधार के साथ, अधिक भाग अलग कर दिया जाता है। और जो शेष रह जाता है वह पुनः वही भाग होता है जिसकी पूर्ण रूप से साधना नहीं हुई है; चूँकि यह वह भाग है जिसकी पूर्ण रूप से साधना नहीं हुई है, वह भाग अब भी मानव संसार में ही है। तब इस पर विचार करें: क्या ऐसा नहीं लगेगा कि यह व्यक्ति सदा साधना ही कर रहा है—और वह भी निष्फल—और कोई उल्लेखनीय उन्नति नहीं कर रहा? ऐसा क्यों है कि वह अपने दिव्य पक्ष को प्रकट नहीं कर सकता? जब किसी व्यक्ति ने अच्छी तरह से साधना की हो, तो ऊपरी सतह पर देखने से आप केवल यही देख सकते हैं कि वह व्यक्ति काफी परिश्रमी है। परिश्रमी होने का अर्थ है कि वह प्रत्येक क्षण अपने वचनों और कार्यों पर दृष्टि रख सकता है, अपने विचारों पर ध्यान दे सकता है, और स्वयं के प्रति कठोर हो सकता है, तथा साधारण तौर पर स्वयं को कठोरता से संचालित कर सकता है। यह उस व्यक्ति का वर्णन है जो साधना में परिश्रमी है। जब तक कोई व्यक्ति साधना कर रहा होता है, उसका दिव्य पक्ष प्रकट नहीं किया जा सकता, और आपको मानव समाज में किसी देवता का वास्तविक प्रदर्शन नहीं दिखेगा। इस प्रकार साधना करना यह सुनिश्चित करता है कि वह पक्ष जिसकी पूर्ण रूप से साधना हो चुकी है दूषित न हो, यह सुनिश्चित करता है कि व्यक्ति इस भ्रामक वातावरण में वास्तविकता को देखे बिना साधना करता रह सके, और यह सुनिश्चित करता है कि दाफा शिष्य और भी ऊँची फल पदवी को प्राप्त कर सकें। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करता है कि इस काल में मानव संसार दिव्य पक्ष द्वारा प्रभावित और परिवर्तित न हो। जब कोई मानव इस प्रकार दृढ़ता से आगे बढ़ता रहता है, इस दमनकारी और कठोर वातावरण में अथक साधना कर पाता है, और परिश्रमी हो पाता है, यहाँ तक कि चेतन प्राणियों को बचा पाता है तथा और भी अच्छा कर पाता है, तो क्या यह अद्भुत नहीं है?

आज दाफा शिष्य इसी का सामना कर रहे हैं, और यह साधना का वह स्वरूप है जो प्राचीन शक्तियों तथा उनके साथियों के हस्तक्षेप से उत्पन्न हुआ है। इसलिए आपकी साधना की प्रक्रिया के दौरान, जब तक आपका वह पक्ष जिसकी पूर्ण रूप से साधना हो चुकी है उसको अलग कर दिया जाता है, तब तक वह सब कुछ जिसकी आप पूर्ण रूप से साधना नहीं कर पाए हैं, अब भी प्रकट होता रहेगा। मानवीय मोहभाव अब भी प्रकट होंगे, वैसे ही जैसे बुरे तत्व। जब तनाव या मतभेद उभरते हैं तो यह नहीं कहा जा सकता कि दाफा शिष्यों ने अच्छी साधना नहीं की, और न ही साधकों के उस विशेष समूह के विषय में यह या वह कहा जा सकता है, और न ही यह कहा जा सकता है कि उसमें सम्मिलित व्यक्ति परिश्रमी नहीं हैं। आप उस पक्ष को कभी नहीं देख सकते जिसकी पूर्ण रूप से साधना हो चुकी है। वह पक्ष दिव्य बन चुका है, और केवल वही पक्ष प्रकट होता है जिसकी पूर्ण रूप से साधना नहीं हुई है। किंतु वे लोग वास्तव में साधना कर रहे होते हैं। वे केवल साधना ही नहीं कर रहे होते हैं, उन्होंने पहले ही अपनी विशाल फल पदवी और अपने संपूर्ण शरीरों में विराट परिवर्तन स्थापित कर लिए हैं, तथा उनके शरीरों के अनेक भाग साधना द्वारा देवताओं में परिवर्तित हो चुके हैं। क्या साधारण लोग इन दाफा शिष्यों की तुलना कर सकते हैं? नहीं, वे नहीं कर सकते।

यदि हम क्षण भर के लिए केवल उन परिस्थितियों को देखें जिनमें ये मतभेद और चीजें उत्पन्न होती हैं, तो वे अब भी उनसे भिन्न हैं जो साधारण मानव समाज में घटित होती हैं। दाफा शिष्यों को जिन मतभेदों और तनावों का सामना करना पड़ता है वे केवल साधना के लिए और फा का मान्यकरण करने के लिए होते हैं। यद्यपि इसमें मानवीय मोहभाव, दिखावे का मोहभाव, व्यक्तिगत मोहभाव, और मानवों के वे तत्व सम्मिलित होते हैं जो स्वयं का मान्यकरण करना चाहते हैं, दाफा शिष्य इनके विषय में जानते हैं और जैसे ही उनका पता चलता है, वे उन्हें सुधार लेंगे। यह साधारण लोगों से पूर्ण रूप से भिन्न है। तो दाफा शिष्यों के बीच समस्याएँ होंगी, और इसके अतिरिक्त, ऐसी चीजें एक और भूमिका भी निभाती हैं। अर्थात्, जैसे ही मतभेद या तनाव प्रकट होता है, वह अन्य लोगों को प्रभावित करेगा। जैसे ही अन्य लोगों का उस पर ध्यान आकर्षित होगा, मतभेद या तनाव तीव्र हो जाएगा, जिससे उससे सम्मिलित साधक उस पर ध्यान देने लगेंगे। यदि कोई साधक उस अनुभव से गुजरते समय अपने भीतर देख सके, तो वह अपनी कमियाँ देख पाएगा। यदि मतभेद या तनाव सतह पर न लाया जाता या प्रकट न होता, तो आप अपने मोहभावों को देख और पहचान नहीं पाते। जब सब कुछ शांत और सुगम हो, तो क्या आप स्वयं की साधना कर सकते हैं?

आज अनेक धार्मिक समूह हैं जो कहते हैं: “ओह, देखिए हमारे यहाँ सबकुछ कितना अच्छा है। सभी एक-दूसरे के प्रति बहुत स्नेही और प्रेमपूर्ण हैं।” किंतु वे किससे प्रेम करते हैं? (श्रोता हँसते हैं) वे मोहभावों से प्रेम करते हैं, मृत्युलोक के सुख से प्रेम करते हैं, और लोगों के बीच उस मानवीय सुखदता को बनाए रखने से प्रेम करते हैं। क्या यह साधना है? नहीं है! बिल्कुल नहीं। यह तो केवल एक ढाल है जिसका उपयोग मानवीय मोहभावों की रक्षा के लिए किया जाता है। मैं यह आशा अवश्य करता हूँ कि दाफा शिष्यों के बीच समस्याएँ कम हों—जितनी कम हों उतना अच्छा। अपने भीतर देखने और सतर्क रहने की योग्यता के कारण एक वातावरण तथा एक अवस्था निर्मित होती है जिससे जब ये तनाव उत्पन्न होते हैं तब उस प्रकार की बातें यथासंभव कम होती हैं। यही मेरी इच्छा है, और सबसे अच्छा तो यह होगा कि सभी ऐसा कर सकें। यदि लोग ऐसा न कर पाएँ तो क्या होगा? यदि वे ऐसा न भी कर पाएँ, तब भी यह साधना ही है। बात केवल इतनी है कि वे हमारे साधना के वातावरण की इस अवस्था में पर्याप्त परिश्रमी नहीं रहे हैं; फिर भी वे साधना कर ही रहे हैं। वर्तमान चरण में दाफा शिष्यों के साधना वातावरण की ठीक यही अवस्था है। मैं आप सभी को फिर से बताता हूँ: जब मतभेद या तनाव होते हैं, तो डरने की कोई बात नहीं है—बस साधना कीजिए और अच्छा कीजिए। यहाँ तक कि मुख्यभूमि चीन के वे लोग भी जिन्होंने अच्छा नहीं किया या पर्याप्त रूप से अच्छा नहीं किया, या जिन्होंने बहुत बुरे कार्य भी किए हैं, इस प्रकरण के समाप्त होने से पहले वे चीजें अब भी व्यक्तिगत साधना की अभिव्यक्तियाँ ही हैं। किंतु समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता, और अवसर कम से कम होते जा रहे हैं।

जब कोई मानव साधना करके देवता बनता है, मोहभावों को हटाने की इस हृदय-विदारक, पीड़ादायक प्रक्रिया के दौरान—सभी इस पर विचार करें—वह किस प्रकार की बातें प्रदर्शित करने में सक्षम हो सकता है? हो सकता है कि वह कुछ भी करने में सक्षम हो। किंतु जैसे ही वह इसे समझ लेता है, वह इसे सुधार सकता है। और वह ऐसा क्यों कर सकता है? यह एक अच्छा साधारण व्यक्ति बनने के लिए नहीं किया जाता, बल्कि फल पदवी प्राप्त करने तक साधना करने के लिए किया जाता है। (तालियाँ) वह पवित्रता है, और वही दिव्यता की ओर जाने वाले मार्ग पर चलना है। यह उससे भिन्न है जो साधारण लोगों के किसी मतभेद में होता है। उसका स्वरूप भिन्न नहीं होगा, किंतु आरंभ-बिंदु और लक्ष्य भिन्न होंगे, और यहाँ तक कि प्रक्रिया के दौरान लोग जो कार्य करते हैं तथा लोगों की जो मन की अवस्थाएँ होती हैं वे भी पूर्ण रूप से समान नहीं होंगी। इसलिए आपको इसे पहचानना चाहिए। चूँकि आज मैं साधना के स्वरूप और अवस्था के विषय में अधिक गहराई से बता रहा हूँ और चीजों को स्पष्ट कर रहा हूँ, तो अब से जब आप एक-दूसरे के साथ सहयोग करें तो आपके भीतर दूसरों के प्रति सतर्क रहने का मोहभाव नहीं रहना चाहिए। (तालियाँ) चाहे वह एक-दूसरे को दोष देना हो, मानवीय मोहभावों का उपयोग करके एक-दूसरे को दूर धकेलना हो, या सभी प्रकार की अवस्थाएँ हों—मैं आपको बता सकता हूँ, ये सब नए मोहभाव हैं जो दाफा साधना के स्वरूप को न समझने के कारण प्रकट हुए हैं। क्या ऐसा नहीं है? हाँ, ऐसा ही है! इसलिए, साधना की अवस्था को न समझने के परिणामस्वरूप कोई नया मोहभाव विकसित न करें। वह मोहभाव स्वयं ही आपकी साधना में प्रगति के लिए एक विशाल बाधा होगा, इसलिए आपको उसे भी हटाना होगा।

साधना करते समय साधकों के बीच अनेक मतभेद और तनाव उत्पन्न होते हैं। जब ऐसे कई सारे मोहभाव हों जिन्हें छोड़ा न जा सके, तो आपका [साधना का] वातावरण अच्छा नहीं होगा। यदि ऐसा ना हो तो, तो वह उत्कृष्ट होगा। यदि कुछ समस्याएँ और मतभेद प्रकट होने पर आप भीतर नहीं देखते, तो वे तीव्र हो जाएँगे, और ऐसा आपके अपने मोहभावों के कारण होता है। कुछ बहुत अधिक तीव्र हो जाते हैं, और वे वास्तव में व्यक्ति द्वारा अच्छी तरह से साधना न किए जाने के कारण होते हैं। यह तब तक चलता रहता है जब तक [मतभेद] सुलझ नहीं जाता और इस कारण वह व्यक्ति अपनी अवस्था से भ्रमित तथा व्याकुल हो जाता है। तब क्या किया जाए? [वे निर्णय लेते हैं,] “चलो गुरुजी से पूछते हैं।” जब भी चीजें हाथ से निकल जाती हैं, लोग गुरु को खोजने चल पड़ते हैं। ऐसा हमेशा इसलिए होता है कि वे उस पर नियंत्रण प्राप्त नहीं कर सकते, या उस पर नियंत्रण प्राप्त करना नहीं चाहते, वे गुरु को पूछने जाते हैं। तो क्या आप गुरु को साधना करवाने का प्रयास कर रहे हैं? (गुरुजी मुस्कुराते हैं) (श्रोता हँसते हैं) या यह आप हैं जो साधना कर रहे हैं? (तालियाँ)

साधना का अर्थ स्वयं की साधना करने से है। चाहे किसी भी प्रकार की परिस्थिति आए, आपको स्वयं पर गंभीरता से दृष्टि डालनी चाहिए। मैं आपको बता सकता हूँ, यदि कोई साधारण व्यक्ति जब भी समस्याओं का सामना करते समय स्वयं का अवलोकन कर सके, तो वह वही बन जाएगा जिसे साधारण लोग संत कहते हैं। जब किसी दाफा शिष्य को किसी बात में कठिनाई होती है और उसे चीजों पर विचार करने की आवश्यकता होती है, तो उसे स्वयं से आरंभ करते हुए कारण खोजने चाहिए और उस वातावरण के अनुरूप कार्य करने चाहिए जिसकी दाफा शिष्यों तथा फा-सुधार के लिए आवश्यकता है। जब कोई समस्या होती है, तो ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वह व्यक्ति हठपूर्वक फा के सिद्धांतों के विरुद्ध जा रहा होता है। समझने का प्रयास करें कि समस्या कहाँ है, उस हठ को छोड़िए, और बातों को सुलझाइए। जब आप किसी बात का सामना करें, तो सर्वोत्तम उपाय यह नहीं है कि आप आगे बढ़कर दूसरों से विवाद करें, सबसे आगे आने का प्रयास करें, और समाधान करने के लिए पीछे पड़ जाएँ। अपना मोहभाव छोड़िए, एक कदम पीछे हटिए, और फिर उसे सुलझाइए। (तालियाँ) यदि जब भी कुछ होता है आप तुरंत इसमें कूद पड़ते हैं कि कौन सही है, किसकी समस्या है, और आपने कैसे संभाला, तो ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है कि आप मतभेद या तनाव को सुलझा रहे हैं, किंतु वास्तव में ऐसा बिल्कुल नहीं है। ऊपरी तौर पर यह बहुत तर्कसंगत लगता है, किंतु वास्तव में यह तर्कसंगत है ही नहीं। आपने एक कदम पीछे हटकर अपना मोहभाव पूर्ण रूप से नहीं त्यागा, और फिर उस विषय पर विचार नहीं किया। केवल तभी जब कोई व्यक्ति स्थिर रहकर शांतिपूर्वक किसी मतभेद से पीछे हटकर उसे देखता है, वह उसे वास्तव में सुलझा सकता है।

यदि आप किसी भी बात का सामना करते हुए स्वयं को उस प्रकार संचालित कर सकें, तो कम से कम आप समस्या को सुलझाने का कोई मार्ग अवश्य पा लेंगे। अन्यथा आप उसे कैसे सुलझा सकते हैं? जब कोई व्यक्ति सबसे आगे बढ़कर विवाद करता है, तो वह जितना अधिक उसे सुलझाना चाहता है, उतना ही कम सुलझा पाता है। उस परिस्थिति में आपने वास्तव में वह मोहभाव अब भी नहीं छोड़ा है और आप सबसे आगे आकर यह पता लगाने पर अड़े हैं कि कौन सही है और कौन गलत; यद्यपि आपने स्वयं गलतियाँ की हैं, आप दूसरों की गलतियाँ ढूँढ़ने पर अड़े हैं। जब यही मार्ग अपनाते हैं, तो आप समस्या को नहीं सुलझा पाएँगे। लगभग सभी विवादों का इसी प्रकार अंत होता हैं। और जब समस्या नहीं सुलझ पाती, तो आप गुरु को खोजते हैं। कई बार ऐसे कारणों कि वजह मैं साधकों से मिलना नहीं चाहता, यद्यपि वास्तव में मुझे आपके साथ रहना बहुत अच्छा लगता है। (तालियाँ) आपने देखा है कि आज के समाज के लोग कैसे बन गए हैं। मैं उनके मलिन विचारों और व्यवहार पर दृष्टि तक नहीं डालना चाहता। मैं दाफा शिष्यों के साथ समय बिताना अधिक पसंद करूँगा। किंतु जैसे ही मैं आपसे मिलता हूँ, आप अनेक प्रश्न पूछने लगते हैं (श्रोता हँसते हैं), और आप मुझ पर अनेक ऐसी बातें डाल देते हैं जिन पर आपको साधना करते समय स्वयं कार्य करना चाहिए। इसलिए मेरे पास कोई विकल्प नहीं बचता, और इस कारण मैं आपसे मिलने का साहस नहीं करता।

यदि आप सभी अपने भीतर देख सकें, तो अनेक समस्याएँ सुलझ जाएँगी, इतने तनाव नहीं होंगे, और परिणामस्वरूप इतनी उग्र बातें नहीं भड़केंगी। यद्यपि गुरु ने यह कहा है, फिर भी अंततः यह मानव ही हैं जो साधना कर रहे हैं। यद्यपि दाफा शिष्य इतनी दूर तक यात्रा कर चुके हैं और आज जहाँ हैं वहाँ तक साधना कर चुके हैं, फिर भी अंततः यह मानव ही हैं जो साधना कर रहे हैं। साधना हो चुके पक्ष दिव्य हैं और अलग कर दिए गए हैं, इसलिए मानवीय मोहभाव अब भी प्रकट होते हैं। बात यहाँ तक पहुँच जाती है कि कुछ साधक मुझसे पूछते हैं: “गुरु जी, मैंने इतने लंबे समय तक साधना की है। मेरे वे बुरे विचार अब भी इतने शक्तिशाली क्यों हैं? ऐसा क्यों है कि मैं अब भी उन्हें हटा नहीं पाता?” ऐसा ही है। जब तक आपकी साधना पूर्ण नहीं हो जाती है, आप उस दूषण के बीच हैं [जिसका मैंने वर्णन किया है]। जब तक आप साधना पूर्ण नहीं कर लेते और आपके पुराने तत्व पूर्ण रूप से नहीं हट जाते, तब तक वे तत्व प्रकट होते रहेंगे। जब वे हट जाएँगे केवल तभी कोई समस्या नहीं रहेगी। यद्यपि मैंने यह कहा है, किसी को भी सुस्त नहीं पड़ना चाहिए, यह सोचकर: “ओह, तो बात ऐसी है। तब तो मुझे चिंता करने की कोई बात ही नहीं है। (श्रोता हँसते हैं) यदि यह उभरता है, तो उभरने दो। मैं अब इससे चिंतित नहीं होऊँगा।” ऐसा नहीं चलेगा! साधना सर्वप्रथम और सर्वोपरि है। मैंने अभी कहा कि यदि आप उसे दबा नहीं पाते, यदि तनावों या मतभेदों का सामना करते समय आप भीतर नहीं देख सकते और स्वयं के भीतर नहीं खोज सकते, यदि आप स्वयं को नहीं बदल सकते और मानवीय मोहभावों को नहीं हटा सकते, तो आपके ऐसे कोई भाग नहीं होंगे जो पूर्ण रूप से साधना होकर दिव्य बन सकें, और जो आप करते हैं उसे साधना नहीं कहा जा सकता। इसलिए आपको अपने उस भाग की निरंतर साधना करनी चाहिए जिसकी पूर्ण रूप से साधना नहीं हुई है, जिससे वह दिव्यता प्राप्त कर सके और साधना पूर्ण कर सके, और आपको स्वयं के प्रति कठोर होना चाहिए—केवल तभी यह साधना है। अन्यथा, साधना करने का क्या अर्थ है?

आप जानते हैं, अनेक धर्म फा विनाश काल के युग के अंत तक पहुँच चुके हैं। ऐसा नहीं है कि लोग वास्तव में वैसा करना चाहते हैं जैसा वे करते हैं; यह इसलिए है क्योंकि लोग भ्रमित और धुँधले मस्तिष्क वाले हो गए हैं। लोग सक्रिय रूप से कार्य करने को साधना मान लेते हैं, और वे धार्मिक स्वरूपों को बनाए रखने को साधना मान लेते हैं। वास्तव में, दिव्य उन बातों को कोई महत्व नहीं देते। वे केवल लोगों के मन के सुधार को महत्वपूर्ण मानते हैं, क्योंकि वही सच्चा सुधार है। वातावरण केवल इसलिए है कि साधकों को या बुद्ध अथवा ईश्वर में विश्वास करने वालों को एक ऐसा स्थान मिले जहाँ वे साथ मिलकर सुधार कर सकें, और यह इसलिए है जिससे लोग एक-दूसरे से सीख सकें। यह ठीक वैसे ही है जैसे दाफा शिष्य फा सम्मेलन आयोजित करने के लिए एकत्रित होते हैं, फा का अध्ययन करने और अनुभव साझा करने के लिए एकत्रित होते हैं, तथा साथ मिलकर व्यायाम करते हैं। दाफा शिष्य ऐसे वातावरण में अपेक्षाकृत कम समय बिताते हैं, और फिर भी केवल वही अवसर हैं जब आप बातों पर चर्चा कर सकते हैं और एक-दूसरे से सीख सकते हैं। परस्पर संवाद के अधिक अवसर और अधिक समय साधारण समाज में व्यतीत होता है, और जिन तनावों तथा मतभेदों का आप सामना करते हैं वे मुख्यतः साधारण समाज में ही उठते हैं। ठीक यही आपकी साधना का स्वरूप है। तब यह नहीं कहा जा सकता कि आपने अच्छी साधना नहीं की, और न ही यह कि दाफा शिष्य परिश्रमी नहीं हैं। लोगों के बीच मतभेद और समस्याएँ होंगी ही। महत्वपूर्ण यह है कि आप उन्हें कैसे संभालते हैं।

मैंने अभी इस विषय पर आपके साथ और आगे चर्चा की। वास्तव में, वह सारा फा जो मैंने सिखाया है, फा के उसी एक ग्रंथ से है। ज़ुआन फालुन को ध्यान से पढ़िए, और [आप देखेंगे कि] उस पुस्तक के प्रकाशन के पश्चात मैंने जो भी फा सिखाया है वह ज़ुआन फालुन की ही व्याख्या है। यदि आपको विश्वास न हो, तो जाकर देख लीजिए। ज़ुआन फालुन के अनुसार साधना करना आपको साधना में सफलता तक ले जाएगा। (तालियाँ)

इस अवसर पर मैं एक बात का उल्लेख करना चाहूँगा। जब दाफा शिष्य साथ मिलकर कार्य करें, तो आपको वास्तव में एक-दूसरे के साथ अच्छे से सहयोग करना चाहिए। समग्र स्थिति में विशाल परिवर्तन हुए हैं। आपने देखा है कि अनेक बातों में अब भी बाधाएँ हैं, किंतु जैसे ही वे सभी बाधाएँ समाप्त हो जाएँगी, यह प्रकरण समाप्त हो जाएगा। चीजों की वर्तमान अवस्था ऐसी इसलिए है क्योंकि वे चीजें अभी हटाई नहीं गई हैं, क्योंकि अब भी अनेक लोग असत्य के कारण भटके हुए हैं, और क्योंकि अब भी अनेक लोग सत्य को अपनाने के लिए तैयार नहीं हैं। किंतु यह अवस्था निरंतर पिघल रही है, जैसे बर्फ पिघलती है। जब यह सारी पिघल जाएगी, तो यह वातावरण नहीं रहेगा। जो साधना करना और सुधार करना चाहते हैं उनके लिए ऐसा करने का कोई वातावरण नहीं रहेगा। जो चेतन प्राणियों को बचाना चाहते हैं वे पाएँगे कि सभी मनुष्य चीजें समझने लगे हैं, और इसलिए वैसा करने की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी। दूसरे शब्दों में, जब यह वास्तव में उस बिंदु पर पहुँच जाएगा, तो करने के लिए कुछ शेष नहीं रहेगा। ठीक इसीलिए कि अभी अनेक चीजें हैं जो की जानी हैं और अनेक लोग अब भी नहीं जानते हैं कि वास्तव में क्या हो रहा है, हमारे सामने आज की यह स्थिति है और आपके द्वारा कार्य करने की आवश्यकता है। और इस अवस्था में होने वाले परिवर्तन इन सब से अलग नहीं हैं जिनमें दाफा शिष्यों का योगदान है जो वे सत्य स्पष्ट करते हुए और चेतन प्राणियों को बचाने में कर रहे हैं। निश्चित ही, फा-सुधार की स्थिति का प्रभाव भी इसका ही एक भाग है, किंतु यदि दाफा शिष्य सभी लोगों को व्यक्तिगत रूप से सत्य स्पष्ट न करें, या समाज को सत्य स्पष्ट न करें, तो साधारण लोगों के मन के सतही स्तर पर रूपांतरित होने की प्रक्रिया, देवता उनके लिए व्यक्तिगत रूप से नहीं करेंगे। इसलिए जो बातें मनुष्यों के सतही स्तर से संबंधित हैं वे दाफा शिष्यों को ही करनी होंगी।

पूर्वनिर्धारित संबंध वाले लोगों को और जिन्हें बचाया जा सकता है उन्हें—गुरु के फा-शरीरों, देवताओं, या उस विशाल क्षेत्र द्वारा जो दाफा ने संसार में बनाया है—अनेक प्रकार की परिस्थितियों में से किसी को भी आपके सामने प्रस्तुत किया जा सकता है, जिससे उन्हें सत्य जानने का अवसर मिले। किंतु आपको इसे करना होगा, और यदि आप जाकर कार्य नहीं करेंगे तो ऐसा नहीं चलेगा। यद्यपि समग्र स्थिति में विशाल परिवर्तन हुए हैं, फिर भी आपके सामने जो है उसका दबाव कम नहीं हुआ है। इस समय लोगों को बचाना अति आवश्यक विषय है; अब भी अनेक लोग हैं जिन्होंने सत्य नहीं जाना है। विभिन्न सरकारों का व्यवहार जैसा होता है वैसा ही साधारण लोगों का व्यवहार भी होता है: चाहे उनकी समझ उचित हो या न हो, और चाहे उनके विचार किसी भी प्रकार के हों, जब उनके सामने तथ्य रखे जाएँगे तो वे आश्वस्त होंगे और वे चीजों को पवित्र दृष्टि से देख पाएंगे। चाहे वह साधना हो या चेतन प्राणियों को बचाना—लक्ष्य व्यक्ति का मन है, कोई सत्ता नहीं। चीजें इस प्रकार निर्धारित नहीं की गई हैं कि किसी विशेष राष्ट्रीयता को रखा जाए और किसी अन्य को हटा दिया जाए। ऐसा निश्चित रूप से नहीं है। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि कोई व्यक्ति किस देश से है या संसार के किस कोने में रहता है, हमारे प्रयास केवल व्यक्ति के मन को लक्ष्य बनाते हैं, किसी सत्ता को नहीं।

हमारे अनेक दाफा शिष्यों ने भविष्य के सच्चे दृश्य देखे हैं; वे मिथ्या नहीं हैं। क्रम दर क्रम, समय के साथ आने वाले परिवर्तनों के साथ, वे चीजें निरंतर निकट आती जा रही हैं। इसलिए, दाफा शिष्यों के रूप में आपको वह अच्छे से करना चाहिए जो आपको करना चाहिए। इसकी चिंता न करें कि भविष्य में क्या घटित होगा, यह पर्याप्त है कि आप भीतर से जानते हैं कि आपको क्या करना चाहिए, फा को अपने मन में धारण करते हुए, जो भी करने की आवश्यकता हो वह करते हुए, और जो भी आप करना चाहें वह करते हुए, जब तक दाफा को आवश्यकता है। (तालियाँ) किसी भी बात में अति न करें; बातें तर्कसंगत रूप से और ध्यान से करें। यही एक दाफा शिष्य का महान सद्गुण है। जो भी इस साधारण-समाज के साधना स्वरूप का अनुसरण करते हुए दृढ़ रह पाता है, वही व्यक्ति साधना के इस स्वरूप में वास्तव में सर्वोत्तम कर रहा है। यदि इस स्वरूप में कोई ऐसा व्यवहार प्रदर्शित करता है जो इस स्वरूप के अनुरूप नहीं है और इसके विरुद्ध है, तो संभव है कि उस व्यक्ति ने पर्याप्त रूप से अच्छा नहीं किया है। चूँकि दाफा शिष्यों की साधना ऐसे स्वरूप में रहकर की जाती है, यह स्वरूप दाफा शिष्यों को आगे बढ़ाने में समर्थ है, और यह अविश्वसनीय रूप से ऊँची भावी फल पदवियों तक पहुँचा सकता है। इस स्वरूप से हटना या इसके अनुरूप न होना आपकी साधना में बाधा डालेगा; वे चीजें वास्तव में मोहभावों की उपज हैं।

मैंने आज आपसे ये बातें कही हैं और इन विषयों पर चर्चा की है क्योंकि इस समय अनेक चीजें ऐसी हैं जो पर्याप्त रूप से अच्छे प्रकार से नहीं की गई हैं, और अनेक प्रमुख समस्याएँ हैं। जब आप साथ मिलकर कार्य करते हैं तब ऐसी स्थितियां उत्पन्न हुई हैं जो पर्याप्त संतोषजनक नहीं रही हैं, और इसलिए गुरु ने इन बातों को संबोधित किया है। आज मैं मुख्य रूप से आप सभी से मिलने आया था। फा सम्मेलन आपके लिए चर्चा करने और एक-दूसरे से सीखने का एक अच्छा अवसर है। गुरु अब कुछ और नहीं कहेंगे। मैं यहीं समाप्त करता हूँ। धन्यवाद! (उत्साहपूर्ण तालियाँ)

आपसे मिलकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। (तालियाँ) जब भी मैं आपसे मिलता हूँ, [मैं समझ पाता हूँ कि] व्यापक स्थिति और समग्र परिस्थिति में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ है। हर बार ऐसा ही होता है, इसलिए मैं कहूँगा कि दाफा शिष्यों का जो वातावरण है वह लोगों को तपस्या करवा सकता है। इस समाज में एक दाफा शिष्य के रूप में, चाहे आप किसी भी प्रकार के स्थान या समाज के किसी भी कोने में हों, आप एक सकारात्मक भूमिका निभा रहे हैं। चाहे आप सत्य स्पष्ट कर रहे हों और फा का मान्यकरण कर रहे हों या ऐसे कार्य कर रहे हों जो दाफा से सीधे-सीधे जुड़े न भी हों, फिर भी आप चेतन प्राणियों को बचा रहे हैं और विशाल भूमिकाएँ निभा रहे हैं (तालियाँ), और ऐसा इसलिए है क्योंकि आपके पवित्र विचार तथा करुणामय शक्ति-क्षेत्र सकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं। मुझे आशा है कि आने वाले समय में आप और भी अच्छा करेंगे। (तालियाँ) दाफा शिष्यों ने जो कुछ प्राप्त किया है वह शीघ्र ही प्रकट होगा। धन्यवाद! (दीर्घ काल तक तालियाँ)




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