ZHUAN FALUN-LECTURE SEVEN
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उपदेश सात
 

वध का विषय

वध का विषय बहुत संवेदनशील है। अभ्यासियों के लिए हमने कड़ी आवश्यकता रखी है कि वे जीवों का वध नहीं कर सकते। भले ही यह बुध्द विचारधारा, ताओ विचारधारा, या चीमन विचारधारा का अभ्यास हो, जब तक यह एक उचित साधना अभ्यास है, इसमें वध करने की सख्त मनाही होगी- यह निश्चित है। क्योंकि किसी जीव का वध करने का परिणाम बहुत गंभीर होता है, हमें इसके बारे में विस्तार से बताने की आवश्यकता है। मूल बुध्दमत में, वध करने का संदर्भ मुख्यत: किसी मानव का जीवन लेने से था, जो सबसे गंभीर कृत्य था। बाद में बड़े जीवों, बड़े पालतू जानवरों, या अपेक्षाकृत बड़े जानवरों, सभी का वध बहुत गंभीर माना जाने लगा। साधकों के समुदाय में वध के विषय को इतनी गंभीरता से क्यों लिया जाता है? अतीत में, बुध्दमत में यह माना जाता था कि वे जीव जिनकी मृत्यु अभी नहीं होनी है, यदि उनका वध कर दिया जाता है, वे भटकती हुई आत्माएँ और बेघर प्रेत बन जाएँगे। पहले, इन लोगों की आत्माओं को भटकने से बचाने के लिए संस्कार किए जाते थे। इन संस्कारों के बिना, ये आत्माएँ भूखी और प्यासी तड़पतीं, और बहुत बुरी अवस्था में रहतीं। अतीत में बुध्दमत में इस प्रकार कहा गया था।

हम विश्वास करते हैं कि जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे के साथ कोई बुरा कार्य करता है, उसे उसकी भरपाई के लिए बहुत सा सद्गुण देना पड़ता है। यहाँ, हमारा संदर्भ किसी के द्वारा दूसरे लोगों से संबंधित वस्तुएँ हथिया लेने इत्यादि से है। किन्तु यदि किसी का जीवन अचानक ही समाप्त कर दिया जाता है, भले ही यह कोई पशु है या कोई दूसरा जीव, इससे बहुत अधिक कर्म उत्पन्न होगा। अतीत में, वध का संदर्भ मुख्यत: किसी मानव का जीवन लेने से था, जिससे बहुत अधिक कर्म उत्पन्न होता है। किन्तु दूसरे साधारण जीवों का वध करना भी कोई कम अपराध नहीं है, क्योंकि इससे भी सीधे बहुत सा कर्म उत्पन्न होता है। विशेष रूप से एक अभ्यासी के लिए, साधना अभ्यास के क्रम के दौरान विभिन्न स्तरों पर आपको कुछ कठिनाइयाँ दी जाती है। वे सब आपके अपने कर्म से आती हैं और आपकी अपनी कठिनाइयाँ हैं, जो आपके सुधार के लिए विभिन्न स्तरों पर रखी जाती हैं। जब तक आप अपने नैतिकगुण में सुधार करते हैं, आप उन्हें पार कर सकेंगे। किन्तु यदि आप अचानक ही इतना अधिक कर्म प्राप्त कर लेते हैं, तो आप इसे कैसे पार कर सकेंगे? आपके नैतिकगुण स्तर के साथ, आप इसमें बिल्कुल भी सफल नहीं हो सकेंगे। यह आपको साधना अभ्यास करने में पूरी तरह असमर्थ कर सकता है।

हमने पाया है कि जब किसी व्यक्ति का जन्म होता है, इस ब्रह्माण्ड के एक विशिष्ट क्षेत्र में उसके ही जैसे अनेक एक साथ जन्म लेते हैं। वे सब एक जैसे दिखाई देते हैं और उनके एक नाम हैं, और वे एक जैसे कार्य करते हैं। इसलिए, उन्हें उसके संपूर्ण स्वरूप का भाग भी कहा जा सकता है। इसमें यह विषय आता है, कि यदि उनमें से एक की भी अचानक मृत्यु हो जाती है (जैसे दूसरे बड़े पशुओं के जीवन में होता है) जबकि अन्य विभिन्न आयामों में उसके दूसरे जीवनों की पूर्व निर्धारित जीवन यात्रा अभी पूर्ण होनी बाकी है और उनके जीवन के अभी कई वर्ष शेष हैं, यह मृत व्यक्ति एक बेघर अवस्था में रहेगा और ब्रह्माण्ड के अन्तरिक्ष में इधर-उघर भटकेगा। अतीत में यह कहा जाता था कि भटकती हुई आत्माएँ और बेघर प्रेत, भूख, प्यास और दूसरी कठिनाइयों से पीड़ित होते हैं। यह सत्य हो सकता है। किन्तु हमने वास्तव में इस व्यक्ति को बहुत बुरी अवस्था में पीड़ित होते हुए देखा है क्योंकि जब तक प्रत्येक आयाम में उनमें से हर कोई अपनी जीवन यात्रा पूर्ण नहीं कर लेता उसे अपनी अन्तिम अवस्था के लिए प्रतीक्षा करनी होती है। इसमें जितनी देर होती है, उतना ही अधिक वह पीड़ित होता है। जितना अधिक वह पीड़ित होता है, उसके पीड़ित होने से उतना ही अधिक कर्म वध करने वाले के शरीर में डाल दिया जाएगा। इसके बारे में सोचें : इससे आप कितना और कर्म एकत्रित कर लेंगे? दिव्य सिध्दियों से हमने यह देखा है।

हमने यह स्थिति भी देखी है : जब किसी व्यक्ति का जन्म होता है, एक विशिष्ट आयाम में उसके संपूर्ण जीवन की रूपरेखा का अस्तित्व होता है। दूसरे शब्दों में, वह अपने जीवन में कहाँ रहता है और क्या करता है यह सब इसमें सम्मिलित रहता है। उसके जीवन को किसने व्यवस्थित किया है? यह स्पष्ट रूप से एक उच्च प्राणी द्वारा किया गया है। उदाहरण के लिए, हमारे साधारण मानव समाज में, जन्म के बाद व्यक्ति एक विशिष्ट परिवार से संबंधित होता है, एक विशिष्ट विद्यालय में जाता है, और बड़ा होने पर किसी विशिष्ट स्थान पर कार्य करता है; समाज में बहुत से संबंध व्यक्ति के पेशे द्वारा बनते हैं। अर्थात, पूरे समाज की रूपरेखा इस प्रकार व्यवस्थित कर दी गई है। किन्तु यदि इस जीवन की अचानक ही मृत्यु हो जाती है जो मूल, विशिष्ट व्यवस्था के अनुसार नहीं है, या यदि परिस्थितियों को बदल दिया जाता है, तो उच्च प्राणी विघ्न डालने वाले को क्षमा नहीं करेगा। आप सब यह सोचें : अभ्यासियों की भाँति, हम उच्च स्तरों की ओर साधना अभ्यास करना चाहते हैं। वह उच्च स्तर का प्राणी वध करने वाले को क्षमा तक नहीं करेगा। क्या आप सोचते हैं कि यह व्यक्ति अब भी साधना अभ्यास कर सकता है? कई गुरुओं का स्तर भी इतना ऊँचा नहीं होता जितना इस उच्च प्राणी का है जिसने यह व्यवस्था बनाई है। इसलिए, व्यक्ति के गुरु को भी दण्डित किया जायेगा और निम्न स्तर पर भेज दिया जाएगा। इसके बारे में सोचें : क्या यह एक साधारण विषय है? इसलिए एक बार व्यक्ति ऐसा कार्य करता है, उसके लिए साधना अभ्यास करना बहुत कठिन होगा।

फालुन दाफा अभ्यासियों के बीच, ऐसे कुछ लोग हो सकते हैं जो युध्द के समय में लड़े होंगे। वे युध्द व्यापक रूप से बड़े विश्वक बदलावों के कारण उत्पन्न परिस्थितियाँ थीं, और आप उस परिस्थिति में एक तत्व मात्र थे। विश्वक बदलावों के बीच मानवीय कार्यकलापों के बिना, साधारण मानव समाज में इस प्रकार की परिस्थितियाँ नहीं हो सकतीं, और न ही उन्हें विश्वक बदलाव कहा जाएगा। वे घटनाएँ बड़े बदलावों के अनुसार उत्पन्न हुईं और पूरी तरह आपकी गलती नहीं थी। जिसकी हम यहाँ चर्चा कर रहे हैं वह कर्म है जो व्यक्ति के निजी लाभ खोजने, स्वार्थ की पूर्ति करने जैसे बुरे कार्य करने पर अडिग रहने से उत्पन्न होता है या जब वह किसी प्रकार प्रभावित होता है। जब तक इसका संबंध संपूर्ण व्यापक क्षेत्र में बदलावों और समाज में बड़े बदलावों से है, यह आपकी गलती नहीं है।

वध द्वारा बहुत अधिक कर्म उत्पन्न हो सकता है। कोई सोच सकता है : "हम किसी को मार नहीं सकते, किन्तु मुझे घर में खाना बनाना होता है। यदि मैं वध न करूँ तो मेरा परिवार क्या खाएगा?" मुझे इस विशिष्ट विषय की चिन्ता नहीं है, क्योंकि मैं अभ्यासियों को फा सिखा रहा हूँ न कि साधारण लोगों को बता रहा हूँ कि वे जीवन कैसे जिएँ। जहाँ तक यह बात है कि व्यक्ति को विशिष्ट विषयों के बारे में क्या करना चाहिए, आपको दाफा के अनुसार निर्णय लेना चाहिए। आपको वैसा करना चाहिए जैसा आपको उचित लगे। साधारण व्यक्ति वैसा करेंगे जैसा वे चाहते हैं, और यह उनका निर्णय है; सभी के लिए सच्चे रूप से साधना अभ्यास करना संभव नहीं है। एक अभ्यासी की भाँति, हालांकि, व्यक्ति को एक ऊँचे आदर्श का पालन करना चाहिए, इसलिए मैं यहाँ अभ्यासियों के लिए आवश्यकताएँ रख रहा हूँ।

मनुष्यों और पशुओं के अलावा, पौधे भी जीव हैं। किसी भी पदार्थ का जीवन दूसरे आयामों में अभिव्यक्त हो सकता है। जब आपका दिव्य नेत्र फा दृष्टि के स्तर तक पहुँचता है, आप पाएंगे कि चट्टानें, दीवारें, या और वस्तुएँ भी आपसे बात कर सकते हैं और आपका स्वागत कर सकते हैं। हो सकता है कोई आश्चर्य करे : "जो अनाज और सब्जियाँ हम खाते हैं वे भी जीव हैं। घर में मच्छर और मक्खियाँ भी होते हैं। हमें क्या करना चाहिए?" गर्मियों में मच्छर द्वारा काटे जाने पर बहुत तकलीफ होती है, और व्यक्ति को बिना प्रतिक्रिया किए हुए इसे काटते हुए देखना होगा। यदि कोई अपने भोजन में एक मक्खी देखे जो उसे गंदा कर देती है, वह उसे मार न सके। मैं आपको बताना चाहूँगा कि हमें अकारण ही किसी का जीवन नहीं लेना चाहिए। किन्तु न ही हमें अत्यन्त सावधान सज्जन बन जाना चाहिए, जो हमेशा छोटी-छोटी बातों पर ध्यान करता है, यहाँ तक कि चलते हुए इधर-उधर उछलता है क्योंकि उसे चिन्ता है कि वह चीटियों पर पैर न रख दे। मैं कहूँगा कि आपका जीवन बहुत तनावपूर्ण हो जाएगा। क्या यह भी एक मोहभाव नहीं है? आपके इधर-उधर उछलने से हो सकता है कि चीटियाँ न मरी हों, किन्तु आपने बहुत से जीवाणुओं को मार दिया होगा। सूक्ष्म स्तर पर और भी छोटे जीव होते हैं, जैसे कीटाणु और बैक्टीरिया; हो सकता है आपने उन पर पैर रख दिया और उनमें से कइयों को मार दिया। इस अवस्था में, हमें जीना भी बंद कर देना चाहिए। हम ऐसा व्यक्ति नहीं बनना चाहते, क्योंकि इससे साधना अभ्यास करना असंभव हो जाएगा। व्यक्ति को उदार दृष्टिकोण रखना चाहिए और उचित और सम्मानजनक तरीके से साधना का अभ्यास करना चाहिए।

मनुष्य होते हुए, हमें मनुष्य जीवन को बनाए रखने का अधिकार है। इसलिए, हमारे रहन-सहन का वातावरण मनुष्य जीवन की आवश्यकतानुसार होना चाहिए। हम अनजाने में किसी को हानि नहीं पहुँचा सकते या किसी का जीवन नहीं ले सकते, किन्तु हमें इन छोटी-मोटी बातों से चिन्तित नहीं होना चाहिए। उदाहरण के लिए, जो सब्जियाँ और अनाज हम उगाते हैं वे सब जीव हैं। हम किसी वस्तु को खाना या पीना केवल इसलिए नहीं बंद कर सकते कि इसमें जीवन है, अन्यथा हम साधना अभ्यास कैसे करेंगे? व्यक्ति को इसके आगे देखना चाहिए। उदाहरण के लिए, जब आप चलते हैं, कुछ चीटियाँ या कीट आपके पैरों के नीचे आ सकते हैं और मर सकते हैं। हो सकता है उन्हें मरना था क्योंकि आपने जान-बूझ कर उन्हें नहीं मारा। कीटों और जीवाणुओं के संसार में, वातावरण सन्तुलन का विषय भी है- कोई भी प्रजाति यदि बहुत अधिक हो जाए तो यह समस्या है। इस प्रकार हमें सम्मानजनक और उचित तरीके से साधना का अभ्यास करना चाहिए। जब घर में मक्खियाँ और मच्छर होते हैं, हम उन्हें बाहर भगा सकते हैं या खिड़की में जाली लगा कर उन्हें बाहर रख सकते हैं। कई बार, उन्हें बाहर नहीं भगाया जा सकता, और तब यदि उन्हें मारा जाता है, तो यह उचित है। यदि उस स्थान पर जहाँ मनुष्य रहते हैं वे लोगों को काटते हैं और नुकसान पहुँचाते हैं, उन्हें अवश्य ही बाहर निकाल देना चाहिए। यदि उन्हें बाहर नहीं निकाला जा सकता, उन्हें वहाँ लोगों को काटते हुए नहीं देखा जा सकता। एक अभ्यासी होने के कारण, आपको उनसे चिन्ता नहीं है क्योंकि आप उनसे प्रभावमुक्त हैं, किन्तु आपके परिवार के सदस्य साधना अभ्यास नहीं करते और साधारण लोग संक्रामक रोगों की समस्या से चिन्तित रहते हैं।

मैं आपको एक उदाहरण देना चाहूँगा। यह शाक्यमुनि के आरम्भिक वर्षों की एक कहानी है। एक दिन शाक्यमुनि वन में स्नान के लिए जा रहे थे, और उन्होंने एक शिष्य को हौज साफ करने के लिए कहा। उनका शिष्य हौज के पास गया और उसमें सब ओर कीड़े रेंग रहे थे। यदि वह हौज की सफाई करता तो कीड़े मर जाते। शिष्य शाक्यमुनि के पास वापस आया और कहा : "हौज कीड़ों से भरा हुआ है।" शाक्यमुनि ने उसकी ओर नहीं देखा और कहा : "तुम जाओ और हौज साफ करो।" शिष्य हौज के पास वापस गया और यह नहीं समझ सका कि वह इसे कैसे साफ करे, क्योंकि ऐसा करने से कीड़े मर जाते। वह दोबारा शाक्यमुनि के पास आया और कहा : "गुरुजी, हौज कीड़ों से भरा हुआ है। यदि मैं इसे साफ करता हूँ, कीड़े मर जाएंगे।" शाक्यमुनि ने उसकी ओर देखा और कहा : "मैंने तुम्हें जो करने के लिए कहा वह है कि हौज को साफ करो।" शिष्य तुरन्त ही समझ गया, और उसने तभी जा कर हौज साफ कर दिया। यह कहानी एक नियम बताती है : हमें इसलिए स्नान करना बंद नहीं कर देना चाहिए क्योंकि वहाँ कीड़े हैं, और न ही हमें रहने के लिए कोई और स्थान खोजना चाहिए क्योंकि वहाँ मच्छर हैं। हमें न ही अपने गले को बांध लेना चाहिए और खाना या पीना बंद कर देना चाहिए क्योंकि अनाज और सब्जियाँ दोनों जीव हैं। यह इस प्रकार नहीं होना चाहिए। हमें इस संबंध के साथ उचित निर्वाह करना चाहिए और सम्मानजनक तरीके से साधना अभ्यास करना चाहिए। जब तक हम किसी जीव को जान-बूझ कर नुकसान नहीं पहुँचाते यह उचित होगा। साथ ही, यह आवश्यक है कि लोगों के पास रहन-सहन का स्थान और वातावरण होना चाहिए, और इनकी भी देख-रेख होनी चाहिए। मनुष्यों के लिए अपने जीवन की देख-रेख करना और सामान्य प्रकार रहना आवश्यक है।

विगत में, कुछ पाखण्डी चीगोंग गुरु कहते थे : "हर महीने की पहली और पन्द्रहवीं तारीख को जीवों को मारा जा सकता है।" उनमें से कुछ यह भी कहते थे कि दो पैरों वाले जीवों को मारना ठीक है जैसे उनमें जीवन ही न हो। क्या पहली और पन्द्रहवीं तारीख में वध को जीवन लेना नहीं माना जाएगा? तो क्या यह मिट्टी खोदने जैसा है? कुछ पाखण्डी चीगोंग गुरुओं को उनके कथन और आचरण से पहचाना जा सकता है, या जो वे कहते हैं और वे जिसके पीछे होते हैं। वे सब चीगोंग गुरु जो इस प्रकार के कथन कहते हैं अक्सर प्रेत या पशु द्वारा ग्रसित होते हैं। किसी भेड़िये द्वारा ग्रसित चीगोंग गुरु को मुर्गा खाते हुए देखिए। जब यह व्यक्ति इसे निगलता है, वह हड्डियाँ तक बाहर नहीं थूकना चाहता।

वध करने से न केवल बहुत सा कर्म उत्पन्न होता है, इसका करुणा के विषय से भी संबंध है। क्या एक अभ्यासी की तरह हमारे पास करुणा नहीं होनी चाहिए? जब हमारी करुणा जागृत होगी, हम कदाचित् सभी जीवित प्राणियों और हरेक व्यक्ति को दु:ख भोगते हुए पाएँगे। ऐसा होगा।

मांस खाने का विषय

मांस खाना भी बहुत संवेदनशील विषय है, किन्तु मांस खाना जीव को मारना नहीं है। हालांकि आपने इतने समय से फा को सीखा है, हमने सभी के लिए मांस खाना बंद करने की आवश्यकता नहीं रखी है। अनेक चीगोंग गुरु, जब आप उनकी कक्षाओं में जाते हैं, आपसे मांस खाना बंद करने के लिए कहते हैं। आप सोचते हैं : "मैं तुरन्त ही मांस खाना बंद करने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हूँ।" आज घर में भुना हुआ मुर्गा या तली हुई मछली बनी होगी। हालांकि उनकी गंध बहुत अच्छी लगती है, आपको उन्हें खाने की अनुमति नहीं है। ऐसा ही धार्मिक साधना अभ्यासों में है जो व्यक्ति को मांस न खाने के लिए बाध्य करते हैं। बुध्द पध्दति के पारम्परिक अभ्यास और ताओ पध्दति के कुछ अभ्यास भी ऐसा कहते हैं और व्यक्ति को मांस खाने से मना करते हैं। हम यहाँ आपको ऐसा करने के लिए नहीं कह रहे हैं, किन्तु हमारा भी इस विषय से संबंध है। तब, हमारे लिए क्या आवश्यक है? क्योंकि हमारा अभ्यास ऐसा है जिसमें फा अभ्यासी को परिष्कृत करता है, इसका अर्थ है कि गोंग और फा से कुछ परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी। अभ्यास क्रम के दौरान, विभिन्न स्तर विभिन्न परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं। किसी दिन या मेरे आज के व्याख्यान के बाद, कुछ लोग इस अवस्था में प्रवेश कर सकते हैं : वे मांस नहीं खा सकते, और मांस से उन्हें उबकाई आएगी। यदि वे इसे खाते हैं, वे उल्टी करना चाहेंंगे। आपको किसी के द्वारा बाध्य नहीं किया गया है, और न ही आप स्वयं को मांस न खाने के लिए बाध्य कर रहे हैं। बल्कि, यह आपके मन से आता है। इस स्तर पर पहुँचने के बाद, आप मांस नहीं खा सकेंगे, क्योंकि यह गोंग द्वारा प्रदर्शित हो रहा है। यदि आप मांस निगल लेंगे, आप वास्तव में उसे उलट देंगे।

हमारे सभी अनुभवी अभ्यासी जानते हैं कि फालुन दाफा साधना अभ्यास में यह स्थिति आती है, क्योंकि विभिन्न स्तर विभिन्न स्थितियों को दर्शाते हैं। कुछ अभ्यासियों की मांस खाने के लिए बहुत तीव्र इच्छा और बहुत अधिक मोहभाव होता है- वे अक्सर बहुत अधिक मांस खाते हैं। जबकि दूसरों को मांस से उबकाई आती है, उन्हें ऐसा नहीं लगता और वे अब भी इसे खा सकते हैं। इस मोहभाव को हटाने के लिए, क्या किया जाना चाहिए? इस व्यक्ति को मांस खाने के बाद पेट में दर्द होगा। मांस न खाने पर, उसे दर्द नहीं होगा। यह स्थिति होगी, और इसका अर्थ है कि उसे मांस नहीं खाना चाहिए। क्या इसका अर्थ है कि इसके बाद हमारी अभ्यास पध्दति का मांस से कोई संबंध नहीं होगा? यह ऐसा नहीं है। हमें इस विषय को किस प्रकार लेना चाहिए? मांस न खा पाना व्यक्ति के अपने हृदय से आता है। इसका क्या प्रयोजन है? मठों का साधना अभ्यास व्यक्ति को मांस न खाने के लिए बाध्य करता है। यह, और मांस न खा पाना जो हमारे अभ्यास में प्रदर्शित होता है, दोनों इस मांस खाने की मानव इच्छा या मोहभाव को हटाना चाहते हैं।

यदि कटोरी में मांस न हो, तो कुछ लोग खाना ही नहीं खाएँगे। यह साधारण लोगों की इच्छा है। एक सुबह जब मैं चांगचुन के विजय पार्क के पिछले प्रवेश द्वार से गुजर रहा था, तीन लोग जोर से बोलते हुए द्वार से बाहर आए। उनमें से एक ने कहा : "यह कैसा चीगोंग है जिसका अभ्यास किया जाता है जिसमें व्यक्ति मांस तक नहीं खा सकता? मैं मांस खाना छोड़ने के स्थान पर अपने जीवन से दस वर्ष कम करना उचित समझूँगा!" यह कितनी तीव्र इच्छा है! आप सब यह सोचें : "क्या इस इच्छा को हटाना आवश्यक नहीं है? इसे अवश्य हटाना चाहिए। साधना अभ्यास के क्रम के दौरान, व्यक्ति को विभिन्न इच्छाएँ और मोहभाव छोड़ने होते हैं। साफ शब्दों में कहा जाए तो, यदि मांस खाने की इच्छा को नहीं हटाया जाता है, क्या यह एक मोहभाव नहीं होगा जिसे हटाया नहीं गया है? तो व्यक्ति साधना पूर्ण कैसे करेगा? इसलिए, जब तक यह मोहभाव है, इसे हटाना आवश्यक है। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि व्यक्ति फिर कभी मांस नहीं खाएगा। मांस खाना छोड़ना स्वयं में प्रयोजन नहीं है। प्रयोजन यह है कि आपको यह मोहभाव नहीं होने दिया जाए। यदि आप उस समय मोहभाव छोड़ सकें जब आप मांस नहीं खा सकते, हो सकता है आप बाद में दोबारा इसे खा सकें। तब मांस दुर्गन्धपूर्ण और खाने में बुरा नहीं लगेगा। उस समय, यदि आप मांस खाते हैं, तो इससे कोई अन्तर नहीं पड़ेगा।

जब आप दोबारा मांस खाते हैं, आपके मांस के लिए मोहभाव और इच्छा दोनों पहले ही छूट गए होंगे। हालांकि एक बड़ा बदलाव होगा, कि मांस अब आपको स्वादिष्ट नहीं लगेगा। यदि यह घर में बनाया जाता है, आप इसे अपने परिवार के साथ खाएँगे। यदि यह घर में नहीं बनाया जाता है, आपको इसकी कमी नहीं खलेगी। यदि आप इसे खाते हैं, यह स्वादिष्ट नहीं लगेगा। यह परिस्थिति आएगी। किन्तु साधारण लोगों के बीच साधना अभ्यास करना बहुत जटिल होता है। यदि आपके परिवार में हमेशा मांस बनता है, कुछ समय बाद यह आपको दोबारा बहुत स्वादिष्ट लगने लगेगा। इस प्रकार की स्थिति भविष्य में होगी, और यह साधना अभ्यास के पूरे क्रम के दौरान कई बार आएगी। हो सकता है कि आप दोबारा अचानक मांस न खा सकें। जब आप इसे नहीं खा सकते आपको इसे नहीं खाना चाहिए। आप इसे वास्तव में नहीं खा सकेंगे, और इसे खाने पर आप इसे उलट देंगे। जब तक आप इसे दोबारा न खा सकें प्रतीक्षा करें और प्रकृति के क्रम का अनुसरण करें। मांस खाना या न खाना स्वयं में प्रयोजन नहीं है- इसकी कुंजी है इस मोहभाव को छोड़ना।

हमारी फालुन दाफा पध्दति में व्यक्ति शीघ्र उन्नति करता है। जब तक आप अपने नैतिकगुण में विकास करते रहेंगे, आप प्रत्येक स्तर पर शीघ्र आगे बढ़ेंगे। कुछ लोगों का पहले से ही मांस के लिए मोहभाव नहीं होता और उनके खाने में मांस है या नहीं वे परवाह नहीं करते। उन्हें इस मोहभाव को छोड़ने में लगभग दो सप्ताह लगेंगे। कुछ लोगों को ऐसा करने के लिए एक, दो, या तीन महीने, या शायद आधा वर्ष भी लग सकता है। कुछ बहुत अनोखी परिस्थितियों को छोड़ कर, व्यक्ति को दोबारा मांस खा सकने के लिए एक वर्ष से अधिक नहीं लगेगा। यह इसलिए क्योंकि मांस पहले से ही लोगों के लिए प्रमुख भोजन हो गया है। हालांकि, मठों के अभ्यासियों को मांस नहीं खाना चाहिए।

आइये यह बात करें कि बुध्दमत में मांस खाने के बारे में क्या माना जाता है। आरंभिक मूल बुध्दमत में मांस खाने की मनाही नहीं थी। जब शाक्यमुनि अपने शिष्यों को कठिनाइयों के बीच साधना अभ्यास करने के लिए वन में ले गए, वहाँं मांस न खाने जैसा कोई नियम नहीं था। ऐसा क्यों नहीं था? यह इसलिए क्योंकि जब शाक्यमुनि ने दो हजार पाँच सौ वर्ष पूर्व अपना धर्म सिखाया, मानव समुदाय बहुत अविकसित था। कुछ स्थानों पर खेती होती थी जबकि कुछ पर नहीं। खेती के लिए भूमि बहुत कम थी, और वन सभी ओर थे। अनाज की कमी थी और वे दुर्लभ थे। मानव अभी प्राचीन समुदाय से बाहर आए थे और मुख्यत: शिकार द्वारा जीवन-यापन करते थे; कई स्थानों पर मुख्यत: मांस ही खाया जाता था। मानव मोहभाव का अधिकतम त्याग करने के लिए, शाक्यमुनि ने अपने शिष्यों को धन, संपत्ति, आदि के संपर्क से दूर रखा था। भोजन के लिए वे अपने शिष्यों को भिक्षा मांगने ले जाते थे। उन्हें जो कुछ मिलता था वे उसे खाते थे, क्योंकि अभ्यासी होने के कारण वे मिलने वाले भोजन को चुन नहीं सकते थे, जिसमें मांस भी हो सकता था।

मूल बुध्दमत में हन 1 निषेध था। हन के लिए यह मनाही मूल बुध्दमत से है, किन्तु अब मांस खाना भी हन माना जाता है। वास्तव में, उस समय हन का सन्दर्भ मांस से नहीं था, बल्कि प्याज, अदरक, और लहसुन जैसी वस्तुओं से था। उन्हें हन क्यों माना जाता था? आजकल, कई भिक्षु भी इसे ठीक से नहीं समझा पाते। क्योंकि उनमें से अनेक सच्चे रूप से साधना अभ्यास नहीं करते, वे बहुत सी वस्तुओं के बारे में स्पष्ट नहीं हैं। जो शाक्यमुनि ने सिखाया उसे "शील, समाधि, प्रज्ञा" कहा जाता था। शील का अर्थ है साधारण लोगों के सभी मोहभाव का त्याग करना। समाधि का अर्थ है कि अभ्यासी ध्यान में बैठकर और निर्विचार हो कर साधना अभ्यास करे- उसे पूरी तरह निर्विचार होना चाहिए। जो कुछ भी व्यक्ति के ध्यान और साधना को प्रभावित करता था उसे गंभीर बाधा माना जाता था। जो कोई प्याज, अदरक, या लहसुन खाता था उससे तीव्र गंध आती थी। उस समय, भिक्षु अक्सर किसी वन या गुफा में रहते थे। सात या आठ लोग एक घेरे में बैठते थे, और वे ध्यान के लिए कई घेरों में बैठते थे। यदि कोई इन वस्तुओं को खाता था, इससे बहुत दुर्गंध पैदा होती थी जो ध्यान में बैठे दूसरे लोगों को प्रभावित करती थी, और उनके अभ्यास में गंभीर बाधा डालती थी। इस प्रकार यह नियम बनाया गया; इस प्रकार के भोजन को हन माना गया, और इसे खाने की मनाही थी। व्यक्ति के शरीर से उत्पन्न कई सत्ताएँ ऐसी तीव्र गंध से विकर्षित हो जाती हैं। प्याज, अदरक, और लहसुन से व्यक्ति की इच्छाएँ भी जागृत हो सकती हैं। यदि व्यक्ति उन्हें बहुत अधिक खाए, उसे उनकी लत भी पड़ सकती है, इसलिए उन्हें हन माना गया था।

विगत में, साधना में बहुत ऊँचे स्तर पर पहुँचने पर और गोंग खुलने या अर्ध गोंग खुलने के अवस्था पर पहुँचने पर, कई भिक्षुओं ने जाना कि साधना अभ्यास के दौरान उन नियमों का वास्तव में अधिक महत्व नहीं है। यदि उस मोहभाव को त्याग दिया जाता है, उस पदार्थ का स्वयं कोई प्रभाव नहीं है। जो वास्तव में व्यक्ति के साथ बाधा उत्पन्न करता है वह मोहभाव है। इसलिए, संपूर्ण इतिहासकाल में ज्ञानी भिक्षुओं ने यह पाया है कि व्यक्ति मांस खाता है अथवा नहीं कोई निर्णायक विषय नहीं है। मुख्य प्रश्न यह है कि मोहभाव को छोड़ा जा सकता है या नहीं। यदि व्यक्ति को कोई मोहभाव नहीं है, तो पेट भरने के लिए कुछ भी खाना उचित है। क्योंकि मठों में साधना अभ्यास एक विशेष रूप से होता रहा है, कई लोग पहले से ही उससे अभ्यस्त हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त, यह केवल एक नियम का सरल विषय नहीं है, बल्कि मठों की लिखित नियमावली बन चुकी है कि व्यक्ति मांस बिल्कुल नहीं खा सकता। इसलिए, लोग इस प्रकार की साधना से अभ्यस्त हो चुके हैं। आइये भिक्षु जीगोंग2 के बारे में बात करें जिसे साहित्य ने बहुत प्रसिध्द बना दिया था। भिक्षुओं को मांस नहीं खाना चाहिए, किन्तु उसने मांस खाया और इस प्रकार बहुत चर्चित हो गया। वास्तव में, क्योंकि उसे लिंगयिन मठ से निकाल दिया गया था, भोजन उसके लिए सहज ही एक मुख्य समस्या बन गया क्योंकि उसका जीवन-यापन दाव पर था। अपना पेट भरने के लिए, उसे जो कुछ मिला उसने खा लिया; इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता, जब तक वह केवल अपना पेट भरना चाहता था और उसे किसी विशेष भोजन का मोह नहीं था। साधना की उस अवस्था पर, वह इस सिध्दान्त को समझ गया था। वास्तव में, जीगोंग ने मांस केवल एक या दो बार ही खाया था। यह सुन कर कि एक भिक्षु ने मांस खाया, लेखक जोश में आ जाते हैं। जितना सनसनीखेज विषय होता है, उतनी ही रुचि पढ़ने वाले लेते हैं। साहित्य जीवन पर आधारित होते हैं और फिर इसके आगे चले जाते हैं; उसे इस प्रकार प्रचारित कर दिया गया। वास्तव में, यदि इस मोहभाव को वास्तव में त्याग दिया जाता है, तो व्यक्ति अपना पेट भरने के लिए क्या खाता है इससे कोई अंतर नहीं पड़ता।

दक्षिण-पूर्वी एशिया या चीन के दक्षिणी भागों जैसे ग्वांगडोंग और ग्वांगशी3 में, कुछ बुध्दमत को मानने वाले लोग स्वयं को बातचीत में बौध्द नहीं कहते, जैसे यह बहुत पुराने फैशन का लगता हो। वे कहते हैं कि वे बौध्द भोजन करते हैं और शाकाहारी हैं, इसका भावार्थ है कि वे शाकाहारी बौध्द हैं। वे बौध्द साधना को इतना सरल मानते हैं। केवल शाकाहारी होना व्यक्ति को बुध्द स्तर की साधना के लिए कैसे समर्थ बना सकता है? हर कोई जानता है कि मांस खाना केवल एक मोहभाव और एक इच्छा है- यह केवल एक मोहभाव है। शाकाहारी होना केवल इस एक मोहभाव को हटाता है। व्यक्ति को अभी ईर्ष्या, प्रतिद्वन्द की मानसिकता, उत्साह का मोहभाव, दिखावे की मानसिकता, और दूसरे अनेक मोहभावों को छोड़ने की आवश्यकता है; अभी अनेक मानव मोहभाव हैं। केवल सभी मोहभावों और इच्छाओं को हटा कर व्यक्ति अपना साधना अभ्यास पूर्ण कर सकता है। केवल मांस खाने के मोह को छोड़ कर व्यक्ति कैसे बुध्द स्तर की साधना कर सकता है? इस प्रकार का कथन अनुचित है।

भोजन के विषय में, मांस खाने के अलावा व्यक्ति को किसी और भोजन के लिए भी मोह नहीं होना चाहिए। ऐसा ही दूसरी वस्तुओं के लिए भी सत्य है। कुछ लोग कहते हैं कि वे केवल एक विशेष भोजन खाना ही पसंद करते हैं- यह भी एक इच्छा है। साधना में एक विशेष स्तर पर पहुँचने पर, अभ्यासी में यह मोहभाव नहीं होगा। निश्चित ही, हमारा फा एक बहुत ऊँचे स्तर पर सिखाया जाता है और विभिन्न स्तरों का समावेश करके सिखाया जाता है। व्यक्ति के लिए इस स्तर पर सीधे पहुँचना असंभव है। आप कहते हैं कि आप केवल वह विशेष भोजन ही खाना चाहते हैं, किन्तु जब आपकी साधना वास्तव में वहाँ पहुँच गई है जब उस मोहभाव को छोड़ देना चांहिए, आप इसे नहीं खा सकेंगे। यदि आप इसे खाते हैं, इसका स्वाद उचित नहीं लगेगा, और इसका स्वाद कैसा भी लग सकता है। जब मैं काम पर जाता था, कार्यस्थल पर भोजनालय हमेशा घाटे में रहता था और बाद में बंद कर दिया गया। इसके बंद होने के बाद, हर कोई लंच कार्यस्थल पर लाता था। सुबह भोजन बनाना असुविधाजनक और कठिनाई भरा था। कई बार, मैं दो भाप में पके बंद और एक सोया चटनी लगा टोफू का टुकड़ा ले लेता था। वास्तव में, यह एक हल्का भोजन होना चाहिए, किन्तु इसे हर बार खाना भी उचित नहीं था, क्योंकि मोहभाव को हटाना आवश्यक था। जैसे ही मैं टोफू को दोबारा देखता, मुझे उबकाई आने लगती। जब मैंने इसे दोबारा खाने का प्रयत्न किया मैं नहीं खा सका, जिससे मुझे मोहभाव विकसित न हो। निश्चित ही, यह तभी होगा जब कोई साधना अभ्यास में किसी विशिष्ट स्तर पर पहुँच गया हो। आरम्भ में यह इस प्रकार नहीं होगा।

बुध्द विचारधारा शराब पीने की अनुमति नहीं देता। क्या आपने कभी किसी बुध्द को शराब के प्याले के साथ देखा है? नहीं। मैं कह चुका हूँ कि हो सकता है व्यक्ति मांस न खा सके, किन्तु साधारण लोगों के बीच साधना अभ्यास के दौरान जब वह मोहभाव को त्याग देता है, और बाद में इसे दोबारा खाता है तो समस्या नहीं है। शराब पीना छोड़ने के बाद, हालांकि, व्यक्ति को इसे दोबारा नहीं पीना चाहिए। क्या अभ्यासी के शरीर में गोंग नहीं होता? विभिन्न प्रकार के गोंग और कुछ दिव्य सिध्दियाँ आपके शरीर की सतह पर दिखाई देते हैं, और वे सभी पवित्र हैं। जैसे ही आप शराब पीते हैं, वे सभी तुरन्त आपके शरीर को छोड़ देंगे। पल भर में, आपके शरीर पर कुछ शेष नहीं रहेगा, क्योंकि वे सब उस गंध से डरते हैं। यदि आपको इसकी लत पड़ जाती है तो यह बहुत घिनौना होगा, शराब पीने से व्यक्ति अपनी सूझबूझ खो सकता है। कुछ महान ताओ साधना अभ्यासों में शराब पीने की आवश्यकता क्यों होती है? यह इसलिए क्योंकि वे व्यक्ति की मुख्य आत्मा की साधना नहीं करते, और पीने से व्यक्ति की मुख्य आत्मा अचेत हो सकती है।

कुछ लोग शराब को अपने जीवन जितना ही चाहते हैं। कुछ लोग शराब पीना पसंद करते हैं। कुछ लोगों के लिए शराब विषकारक हो चुकी है, और वे पिये बिना अपनी चावल की कटोरी तक नहीं उठा सकते- पिये बिना उनका गुजारा नहीं चलता। अभ्यासी होने के कारण, हमें इस प्रकार नहीं होना चाहिए। शराब पीने से निश्चित ही इसकी लत पड़ जाती है। यह एक इच्छा है और व्यक्ति की लत को बढ़ाती है। आइये इसके बारे में सोचें : अभ्यासी होने के कारण, क्या हमें इस मोहभाव को छोड़ नहीं देना चाहिए? इस मोहभाव को भी हटाना आवश्यक है। कोई सोच सकता है : "यह असंभव है क्योंकि मैं ग्राहकों के मनोरंजन के लिए उत्तारदायी हूँ," या "मैं व्यापारिक संबंध बनाने के लिए उत्तारदायी हूँ। शराब पिये बिना व्यापारिक समझौता करना सरल नहीं है।" मैं कहूँगा कि यह अवश्य ही इस प्रकार नहीं है। अक्सर, व्यापारिक समझौता करते समय, विशेष रूप से विदेशियों के साथ व्यापार या समझौता करते समय, आप एक सोडा ले सकते हैं, वह खनिज जल ले सकता या सकती है, और दूसरा व्यक्ति एक बीयर ले सकता है। कोई भी आपको शराब पीने के लिए बाध्य नहीं करेगा। आप अपनी पसंद चुन सकते हैं और जितना आप चाहें पी सकते हैं। विशेष रूप से बुध्दिजीवियों के बीच, ऐसी परिस्थिति अक्सर आती है। यह अक्सर इसी प्रकार होता है।

धूम्रपान करना भी एक मोहभाव है। कुछ लोग कहते हैं कि धूम्रपान उन्हें तरो-ताजा कर सकता है, किन्तु मैं इसे स्वयं को धोखा देना और दूसरों को धोखा देना कहता हूँ। काम करने या कुछ लिखने से जब व्यक्ति थकान महसूस करता है, वह एक सिगरेट पी कर कुछ अवकाश पाना चाहता है। सिगरेट पीने के बाद, वह तरो-ताजा महसूस करता है। वास्तव में, यह सच नहीं है। यह इसलिए क्योंकि उसने कुछ अवकाश लिया है। मानव मन एक झूठी छवि और भ्रम उत्पन्न कर सकता है जो बाद में वास्तव में एक धारणा या झूठी छवि बन जाता है कि धूम्रपान से व्यक्ति तरो-ताजा होता है। यह ऐसा नहीं कर सकता, न ही इसका ऐसा प्रभाव हो सकता है। धूम्रपान से मानव शरीर को कोई लाभ नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति लम्बे समय तक धूम्रपान करता है, शल्य-चिकित्सा के समय चिकित्सक पायेगा कि उसकी श्वास नली और फेफड़े काले पड़ गए हैं।

क्या हम अभ्यासी अपने शरीरों को शुध्द नहीं करना चाहते? हमें अपने शरीरों को निरन्तर शुध्द करना चाहिए और निरन्तर ऊँचे स्तरों की ओर विकास करना चाहिए। किन्तु आप अब भी उसे अपने शरीर में जमा कर रहे हैं, तो क्या आप हमसे विपरीत दिशा में नहीं जा रहे हैं? इसके अतिरिक्त, यह एक प्रबल इच्छा भी है। कुछ लोग यह जानते भी हैं कि यह अच्छा नहीं है, किन्तु वे इसे नहीं छोड़ पाते। वास्तव में, मैं आपको बताना चाहूँगा कि उनके पास स्वयं को निर्देशित करने के लिए उचित विचार नहीं होते, और उस तरह उनके लिए छोड़ना सरल नहीं होगा। एक अभ्यासी के भाँति, आप इसे एक मोहभाव की तरह क्यों नहीं लेते जिसे छोड़ा जाना है, और देखिए यदि आप छोड़ सकते हैं। मैं सभी को सलाह देता हूँ कि यदि आप वास्तव में साधना अभ्यास करना चाहते हैं आपको अब से धूम्रपान छोड़ देना चाहिए, और यह निश्चित है कि आप छोड़ सकते हैं। इस कक्षा के क्षेत्र में, कोई भी सिगरेट पीने के बारे में नहीं सोचता। यदि आप छोड़ना चाहते हैं, तो यह निश्चित है कि आप यह कर सकते हैं। जब आप दोबारा सिगरेट पियेंगे, इसका स्वाद उचित नहीं होगा। यदि आप पुस्तक में इस व्याख्यान को पढ़ते हैं, इसका भी यह प्रभाव होगा। निश्चित ही, यदि आप साधना अभ्यास नहीं करना चाहते, हम इसकी देख-रेख नहीं करेंगे। मैं सोचता हूँ कि एक अभ्यासी की भाँति, आपको इसे छोड़ देना चाहिए। मैने एक बार यह उदाहरण दिया था : क्या आपने कभी किसी बुध्द या ताओ को वहाँ बैठे धूम्रपान करते देखा है? यह कैसे संभव हो सकता है? एक अभ्यासी होने के कारण, आपका क्या घ्येय है? क्या आपको इसे छोड़ना नहीं चाहिए? इसलिए, मैं कह चुका हूँ कि यदि आप साधना अभ्यास करना चाहते हैं, आपको धूम्रपान छोड़ना चाहिए। यह आपके शरीर को नुकसान पहुँचाता है और साथ ही एक इच्छा भी है। यह हमारे अभ्यासियों की आवश्यकताओं से ठीक विपरीत है।

ईर्ष्या

जब मैं फा सिखाता हूँ, मैं अक्सर ईर्ष्या के विषय के बारे में बताता हूँ। ऐसा क्यों है? यह इसलिए क्योंकि चीन में ईर्ष्या बहुत प्रबल रूप से दिखाई पड़ती है। यह इतनी प्रबल है कि यह स्वाभाविक हो गई है और व्यक्ति इसे अनुभव भी नहीं कर पाता। चीनी लोगों में इतनी प्रबल ईर्ष्या क्यों होती है? इसकी अपनी जड़ें हैं। अतीत में चीनी लोग कनफ्यूशियस से बहुत प्रभावित थे, और उनका स्वभाव अन्तर्मुखी हो गया। जब वे क्रोधित होते हैं या प्रसन्न होते हैं, वे इसे उजागर नहीं करते। वे आत्म-संयम और सहनशीलता में विश्वास करते हैं। क्योंकि वे इस प्रकार अभ्यस्त हो गए हैं, हमारे पूरे देश ने ही एक अन्तर्मुखी स्वभाव विकसित कर लिया है। निश्चित ही, इसके अपने लाभ हैं, जैसे अपनी आन्तरिक शक्तियों को न दिखाना। किन्तु इसकी हानियाँ भी हैं, और इससे हानिकारक प्रभाव उत्पन्न हो सकते हैं। विशेष रूप से इस धर्म-अन्त के काल में, इसके हानिकारक रूप अधिक व्यक्त हो गए हैं और वे व्यक्ति की ईर्ष्या को गहरा करने में बढ़ावा दे सकते हैं। यदि किसी का अच्छा समाचार सार्वजनिक किया जाता है, दूसरे लोगों को तुरन्त ही बहुत ईर्ष्या हो जाएगी। कुछ लोग अपने कार्यस्थल या कहीं और से मिले पुरस्कारों या दूसरे लाभों के बारे में बताने से घबराते हैं, जिससे यह समाचार मिलने पर और लोग जलन न महसूस करें। पश्चिमी लोग इसे "औरिएन्टल ईर्ष्या" या "एशियन ईर्ष्या" कहते हैं। संपूर्ण एशिया क्षेत्र, चीनी कनफ्यूशियस के प्रभाव के कारण लगभग इसी प्रकार है। विशेष रूप से चीन में, यह प्रबल रूप से प्रकट होती है।

यह ईर्ष्या बहुत कुछ अटल समानवाद के कारण है जो एक बार चलन में था : आखिरकार, यदि आसमान गिर पड़े, हर किसी को साथ मरना चाहिए; यदि कुछ अच्छी वस्तु है तो सभी को समान भाग मिलना चाहिए; सभी का वेतन समान रूप से बढ़ना चाहिए, भले ही बढ़त का प्रतिशत कितना भी हो। यह मानसिकता उचित जान पड़ती है, जिसमें सभी के साथ समान व्यवहार किया जाता है। वास्तव में, लोग समान कैसे हो सकते हैं? जो कार्य वे करते हैं वे भिन्न हैं, और इसी प्रकार किस सीमा तक वे अपना उत्तारदायित्व निभाते हैं भिन्न हैं। इस ब्रह्माण्ड में एक नियम है, "हानि नहीं, तो लाभ नहीं।" लाभ प्राप्त करने के लिए, व्यक्ति को हानि उठानी आवश्यक है। साधारण लोगों के बीच यह माना जाता है कि यदि व्यक्ति इसके लिए कार्य नहीं करता तो वह इसे प्राप्त नहीं करेगा। अधिक कार्य का अर्थ है अधिक लाभ, कम कार्य का अर्थ है कम लाभ। जितने अधिक प्रयत्न व्यक्ति करता है, उतने ही अधिक लाभ का वह पात्र हो जाता है। अटल समानवाद जिसका विगत में चलन था उसके अनुसार हर कोई समान पैदा हुआ है, और यह व्यक्ति के जन्म के बाद का जीवन है जो उसे बदलता है। मैं इस वक्तव्य को बहुत अटल मानता हूँ। यदि किसी को अटल बना दिया जाए, तो यह अनुचित बन जाता है। कुछ लोग नर और कुछ मादा क्यों पैदा होते हैं? वे एक जैसे क्यों नहीं दिखाई पड़ते? लोग एक समान नहीं पैदा होते, क्योंकि कुछ बीमार पैदा होते हैं और कुछ अपंग। उच्च स्तरों से, हम देख सकते हैं कि व्यक्ति के संपूर्ण जीवन का अस्तित्व दूसरे आयाम में होता है। वे समान कैसे हो सकते हैं? सब लोग समान होना चाहते हैं। यदि कोई वस्तु किसी के जीवन का भाग नहीं है, उन्हें कैसे समान बनाया जा सकता है? लोग समान नहीं होते।

पश्चिमी लोगों का स्वभाव अपेक्षाकृत बाह्यमुखी होता है। कोई भी बता सकता है कि वे प्रसन्न हैं या क्रोधित। इसके अपने लाभ हैं, किन्तु इसकी अपनी हानियाँ भी है और यह बंधन-हीनता के रूप में व्यक्त हो सकता है। क्योंकि दो स्वभाव मानसिकता में भिन्न हैं, कार्यों को करते समय उनसे भिन्न परिणाम प्राप्त होते हैं। यदि किसी चीनी व्यक्ति की उसके अफसर द्वारा प्रशंसा की जाती है या कुछ अच्छी वस्तुएँ दी जाती हैं, तो औरों के मन विचलित हो जाएंगे। यदि उसे बड़ा बोनस मिलता है, वह इसे चुपचाप दूसरों के बताए बिना अपनी जेब में रख लेगा। आजकल, एक मॉडल कर्मचारी बनना कठिन है। "तुम एक मॉडल कर्मचारी हो। तुम इसे कर सकते हो। तुम्हें काम के लिए सुबह जल्दी आना चाहिए और रात में घर देर से जाना चाहिए। तुम यह सारा काम कर सकते हो क्योंकि तुम इसमें अच्छे हो। हम उतने अच्छे नहीं हैं।" लोग कुटिलता और द्वेषभाव दर्शाते हैं, और इसलिए एक अच्छा व्यक्ति बनना भी सरल नहीं है।

यदि यह दूसरे देशों में होता है, यह पूरी तरह भिन्न होगा। यदि कोई अफसर पाता है कि उसके कर्मचारी ने आज अच्छा काम किया है, अफसर उसे और अधिक बोनस दे सकता है। वह हर्ष के साथ औरों के आगे नोट गिनेगा : "अफसर ने आज मुझे इतना धन दिया।" वह प्रसन्नता से बिना किसी परिणाम के औरों को बता सकता है। यदि यह चीन में होता है कि किसी को अतिरिक्त बोनस मिलता है, तो अफसर भी उस व्यक्ति को इसे छिपाने और दूसरों को नहीं दिखाने के लिए कहेगा। दूसरे देशों में, यदि किसी बच्चे के परीक्षा में सौ अंक आएं, वह हर्ष के साथ घर दौड़ेगा और चिल्लायेगा : "मुझे आज सौ अंक मिले! मुझे सौ अंक मिले!" बच्चा पाठशाला से घर दौड़ता हुआ जाएगा। एक पड़ोसन अपना द्वार खोलेगी और कहेगी : "हे, टॉम, अच्छा बच्चा।" दूसरा पड़ोसी अपनी खिड़की खोलेगा : "हे, जैक, अच्छा काम किया। अच्छा बच्चा।" यदि यह चीन में होता है, तो विपत्ति आ जायेगी। "मुझे सौ अंक मिले, मुझे सौ अंक मिले।" बच्चा पाठशाला से घर दौड़ कर आता है। अपना द्वार खोलने से पहले ही, एक पड़ोसी पहले से ही अपने घर में कोसना आरम्भ कर देता है : "सौ अंक प्राप्त करने में क्या बड़ी बात है? दिखावा करने वाला! किसने सौ अंक प्राप्त नहीं किए हैं?" दो मानसिकताएँ भिन्न परिणाम उत्पन्न करती हैं। इससे व्यक्ति की ईर्ष्या उभर सकती है, क्यों यदि कोई अच्छा कर रहा है, उसके बारे में प्रसन्न न महसूस करते हुए, लोगों के मन विचलित महसूस करते हैं। इससे यह समस्या उत्पन्न हो सकती है।

कुछ वर्ष पहले, अटल समानता प्रचलन में था, और इसने लोगों के विचारों और मूल्यों को उलझा दिया है। मैं आपको एक विशिष्ट उदाहरण देना चाहूँगा। कार्यस्थल पर, कोई व्यक्ति सोचता है कि दूसरे उतने समर्थ नहीं हैं जितना वह। जो कुछ वह करता है, वह अच्छे प्रकार से करता है। वह स्वयं को वास्तव में श्रेष्ठ मानता है। वह अपने बारे में सोचता है : "मैं कारखाना निर्देशक या प्रबंधक, या उससे भी ऊँचे पद के लिए उपयुक्त हूँ। मैं सोचता हूँ कि मैं प्रधानमन्त्री भी बन सकता हूँ।" उसका अफसर भी कहता है यह व्यक्ति वास्तव में योग्य है और कुछ भी कार्य कर सकता है। सह-कर्मचारी भी यह कहते हैं कि वह वास्तव में योग्य और गुणी है। तब भी, उसी कर्मचारी वर्ग में या उसी दफ्तर में एक दूसरा व्यक्ति हो सकता है जो कुछ भी करने में अयोग्य हो और कोई काम न जानता हो। किन्तु एक दिन उससे यह अपेक्षाकृत अयोग्य व्यक्ति प्रोन्नति पा लेता है और वह उसका निरीक्षक भी बन जाता है। उसे अपने हृदय में लगेगा कि यह अनुचित हुआ है और बहुत विचलित और ईर्ष्या से जलते हुए, वह अपने अफसर और सहकर्मचारियों से शिकायत करेगा।

मैं आपको यह नियम बता रहा हूँ जो साधारण लोग समझने में असमर्थ हैं। आप सोचते होंगे कि आप हर काम में अच्छे हैं, किन्तु आपका जीवन संपन्न नहीं है। वह व्यक्ति कोई काम नहीं जानता, किन्तु उसका जीवन संपन्न है, और वह अफसर भी बन जाएगा। भले ही साधारण लोग कुछ भी सोचें, वह केवल साधारण लोगों की सोच है। एक उच्च जीवनसत्ता के दृष्टिकोण से, मानव समुदाय का विकास, विकास के विशिष्ट नियम के अनुसार आगे बढ़ता है। इसलिए, व्यक्ति जीवन में जो करता है वह उसकी योग्यता के अनुसार व्यवस्थित नहीं होता। बुध्दमत में कर्म के प्रतिफल के नियम में विश्वास किया जाता है। व्यक्ति का जीवन उसके कर्म के अनुसार व्यवस्थित होता है। भले ही आप कितने भी योग्य हों, यदि आपके पास सद्गुण नहीं है, शायद आपके पास इस जीवन में कुछ नहीं होगा। आप सोचते हैं कि दूसरा व्यक्ति कोई काम नहीं जानता, किन्तु उसके पास बहुत सा सद्गुण है। वह एक उच्च पदाधिकारी बन सकता है या बहुत सा धन कमा सकता है। एक साधारण व्यक्ति इस सन्दर्भ को नहीं देख पाता और सदैव विश्वास करता है कि उसे वही करना चाहिए जिसका वह योग्य है। इसलिए वह एक टूटे हुए हृदय के साथ पूरे जीवन जूझता और प्रतिद्वन्द करता रहता है। वह बहुत विचलित और थका हुआ महसूस करता है, और हमेशा वस्तुओं को अनुचित पाता है। वह ठीक प्रकार खा या सो भी नहीं पाता, वह दु:खी और निराश महसूस करता है। जब वह वृध्द होता है, उसका स्वास्थ्य खराब हो जाता है और वह अनेक प्रकार के रोगों से ग्रस्त हो जाता है।

इसलिए, हमारे अभ्यासियों को और भी कम इस प्रकार होना चाहिए, क्योंकि एक अभ्यासी को प्रकृति के क्रम का पालन करना चाहिए। यदि कोई वस्तु आपकी है, आप उसे नहीं खोएंगे। यदि कोई वस्तु आपकी नहीं है, आप उसे नहीं पाएंगे भले ही आप उसके लिए संघर्ष करें। यद्यपि, यह अटल नहीं है। यदि यह उतना ही अटल होता, तो बुरे कार्य करने का विषय ही नहीं होता। दूसरे शब्दों में, कुछ अव्यवस्थित कारक होते हैं। किन्तु एक अभ्यासी होने के कारण, आप गुरु के फा शरीर की रक्षा में होते हैं। दूसरे वह नहीं ले सकते जो आपका है, भले ही वे ऐसा चाहें। हम इसलिए प्रकृति की नियम का पालन करने में विश्वास करते हैं। कई बार, आप सोचते हैं कि अमुक वस्तु आपकी होनी चाहिए, और दूसरे भी आपको कहते हैं कि यह आपकी है। वास्तव में, यह नहीं है। आप मान सकते हैं कि यह आपकी है, किन्तु अन्त में यह आपकी नहीं होती। इसके द्वारा, यह देखा जा सकता है कि आप इसे छोड़ पाते हैं अथवा नहीं। यदि आप इसे नहीं छोड़ पाते हैं, तो यह एक मोहभाव है। इस पध्दति का प्रयोग आपके निजी लाभ के मोह को छुड़ाने के लिए किया जाना चाहिए। यह विषय है। क्योंकि साधारण लोगों को इस नियम का ज्ञान नहीं होता, वे सब लाभ के लिए संघर्ष और झगड़ा करते हैं।

साधारण लोगों के बीच, ईर्ष्या अनेक रूप में दिखाई पड़ती है। यह साधकों के समुदाय में भी बहुत देखी जाती है। वहाँ विभिन्न चीगोंग पध्दतियों के बीच में कोई आदर भाव नहीं होता, जैसे "मेरी पध्दति अच्छी है" या "उसकी पध्दति अच्छी है"- दोनों अच्छे और बुरे वक्तव्य दिये जाते हैं। मेरे विचार में, ये सभी रोग उपचार और स्वास्थ्य के स्तर से संबंधित हैं। उन आपस में विरोधाभास वाली पध्दतियों में, अधिकतर बुरे प्रभाव वाले, ग्रसित करने वाले प्रेतों या पशुओं से संबंधित हैं, और वे नैतिकगुण का अनादर करते हैं। हो सकता है किसी व्यक्ति ने बिना किसी दिव्य सिध्दियां विकसित किए हुए बीस से भी अधिक वर्षों तक चीगोंग का अभ्यास किया हो, जबकि दूसरा व्यक्ति उन्हें अभ्यास आरम्भ होने के बाद तुरन्त प्राप्त कर लेता है। इस व्यक्ति को तब यह उचित नहीं लगता : मैंने बिना किसी दिव्य सिध्दि विकसित हुए बीस वर्षों से अधिक अभ्यास किया है, और उसने उन्हें विकसित कर लिया है। उसे किस प्रकार की दिव्य सिध्दियाँ प्राप्त हुई हैं?" इस व्यक्ति को क्रोध आ जाएगा : "वह प्रेत या पशु द्वारा ग्रसित है और उसे साधना पागलपन हुआ है!" जब कोई चीगोंग गुरु किसी कक्षा को सिखाता है, वहाँ हो सकता है कोई व्यक्ति अनादर के साथ बैठा हो : "वह किस प्रकार का चीगोंग गुरु है? वह जो कह रहा है मैं उसे सुनने में भी इच्छुक नहीं हूँ।" हो सकता है वह चींगोंग गुरु वास्तव में उतना अच्छा न बोल सके जितना कि यह व्यक्ति। किन्तु, जो वह चींगोंग गुरु बताता है वह केवल उसी अभ्यास पध्दति से संबंधित है। यह व्यक्ति सभी कुछ पढ़ता है और वह सभी चीगोंग गुरुओं की कक्षाओं में गया है और ढेर सारे प्रमाणपत्र एकत्रित किए हैं। वास्तव में, यह व्यक्ति उस चींगोंग गुरु से बहुत अधिक जानता है। किन्तु उसका क्या उपयोग है? यह सब आरोग्य और स्वास्थ्य से संबंधित है। व्यक्ति जितना अधिक इससे भरा होता है, संदेश उतने ही बुरे प्रभाव वाले और जटिल हो जाएंगे, और उसके लिए साधना अभ्यास करना और अधिक कठिन हो जाएगा- यह सब उलझ जाएगा। सच्चे साधना अभ्यास एक मार्ग पर चलने की शिक्षा देते हैं, और भटकना नहीं चाहिए। यह सच्चे अभ्यासियों के बीच भी होता है, आपस में अनादर होने और संघर्ष के मोहभाव को न छोड़ने से सरलता से ईर्ष्या हो सकती है।

मैं आपको एक कहानी सुनाना चाहूँगा। देवताओं का राज्याभिषेक4 पुस्तक में शेन गोंगबाओ5 जियांग जिया6 को वृध्द और अयोग्य मानता था। किन्तु स्वर्गदेव ने जियांग जिया को देवताओं को पद प्रदान करने के लिए कहा। शेन गोंगबाओ ने अपने हृदय में इसे अनुचित माना : "उसे देवताओं को पद प्रदान करने के लिए क्यों कहा गया है? आप देखिए कि मैं कितना समर्थ हूँ। मेरा सिर कट जाने पर भी, मैं इसे अपने कंधों पर वापस लगा सकता हूँ। मुझे देवताओं को पद प्रदान करने के लिए क्यों नहीं कहा गया?" उसे इतनी ईर्ष्या थी कि वह सदैव जियांग जिया के लिए कठिनाईयाँ उत्पन्न करता रहा।

शाक्यमुनि के समय में मूल बुध्दमत में दिव्य सिध्दियों की बात की जाती थी। आजकल बुध्दमत में, कोई भी दिव्य सिध्दियों की चर्चा करने का साहस नहीं करता। यदि आप दिव्य सिध्दियों की चर्चा करते हैं, वे कहेंगे कि आपको साधना पागलपन हुआ है। "कौन सी दिव्य सिध्दियाँ?" वे उन्हें बिल्कुल नहीं पहचानते। ऐसा क्यों है? वर्तमान में, भिक्षु भी उनके बारे में नहीं जानते। शाक्यमुनि के दस मुख्य शिष्य थे, जिनमें मुजयेल्येन7 को उनके द्वारा दिव्य सिध्दियों में सर्वप्रथम माना गया था। शाक्यमुनि की महिला शिष्य भी थीं, जिनमें से ल्येनह्नाज़8 दिव्य सिध्दियों में सर्वप्रथम थी। यह तब भी सत्य था जब बुध्दमत को चीन में स्थापित किया गया। पूरे इतिहासकाल में, अनेक सामर्थ्यवान भिक्षु रहे हैं। जब बौधिधर्म चीन आए, वे एक नदी को पार करने के लिए एक सरकंडे की टहनी पर सवार हुए। जैसे इतिहास विकसित हुआ, हालाँकि, दिव्य सिध्दियों को नकारा जाता गया। मुख्य कारण यह है कि मठों के प्रमुख भिक्षु, प्रबंधक, या मठाधीश आवश्यक नहीं कि महान जन्मजात गुण से संपन्न रहे हों। यद्यपि वे मठाधीश या प्रमुख भिक्षु थे, ये केवल साधारण लोगों के पद हैं। वे भी अभ्यासी हैं, अन्तर इतना है कि वे पेशेवर हैं। आप घर में स्वयं साधना अभ्यास करते हैं। व्यक्ति साधना में सफल हो पाता है या नहीं यह हृदय की साधना पर निर्भर करता है। यह सभी के लिए सत्य है, और इसमें थोड़ी सी भी कमी स्वीकार्य नहीं है। किन्तु एक कनिष्ठ भिक्षु जो भोजन बनाता है, हो सकता है वह निम्न जन्मजात गुण का न हो। जितना अधिक कनिष्ठ भिक्षु दु:ख भोगता है उतना ही उसके लिए गोंग खोलना सरल होता है। जितना आरामदेह वरिष्ठ भिक्षुओं का जीवन होता है, उतना ही उनके लिए गोंग खुलने की अवस्था तक पहुँचना कठिन होता है क्योंकि इसमें कर्म के रूपांतरण का विषय है। कनिष्ठ भिक्षु सदैव बिना थके कठोर कार्य करता है। उसके लिए उसके कर्म का भुगतान करना और ज्ञानप्राप्त करना शीघ्र होता है। हो सकता है एक दिन अचानक ही वह गोंग खुलने की अवस्था में पहुँच जाए। इस गोंग के खुलने, ज्ञानप्राप्ति, या अर्ध-ज्ञानप्राप्ति के साथ उसकी अलौकिक सिध्दियाँ उत्पन्न हो जाएँगी। मठ के सभी भिक्षु उससे प्रश्न पूछने आएंगे, और सभी उसका आदर करेंगे। किन्तु मठाधीश यह सहन नहीं कर पाएगा : "मैं अब भी मठाधीश कैसे रह पाउँगा? कैसी ज्ञानप्राप्ति? उसे साधना पागलपन हुआ है। उसे यहाँ से बाहर निकालो।" मठ इस प्रकार कनिष्ठ भिक्षु को बाहर निकाल देता है। जैसे समय बीतता गया, चीनी बुध्दमत में कोई भी दिव्य सिध्दियों का उल्लेख करने का साहस नहीं कर पाता। आप जानते हैं कि जीगोंग कितना सामर्थ्यवान था। वह पेड़ के तनों को इमेइ पर्वत से उखाड़ कर एक कुएँ9 के बाहर फेंक सकता था। किन्तु अन्त में तब भी उसे लिंगयिन मठ से निकाल दिया गया।

र् ईष्या का विषय बहुत गम्भीर है क्योंकि इसमें यह विषय सम्मिलित है कि आप साधना पूर्ण कर सकते हैं या नहीं। यदि ईर्ष्या को समाप्त नहीं किया गया, सभी कुछ जो आपने साधना में प्राप्त किया है भंगुर हो जाएगा। यहाँ यह नियम है : यदि साधना अभ्यास के दौरान ईर्ष्या को समाप्त नहीं किया जाता है, व्यक्ति को उचित फल प्राप्त नहीं होगा- निश्चित ही नहीं होगा। हो सकता है आपने कभी सुना होगा कि बुध्द अमिताभ ने दिव्यलोक में कर्म के साथ जाने के बारे में बोला था। किन्तु यह ईर्ष्या को हटाये बिना नहीं होगा। यह संभव हो सकता है कि व्यक्ति कुछ अन्य कारणों में कम रह जाए और दिव्यलोक में आगे की साधना के लिए कर्म सहित चला जाए। किन्तु यह बिल्कुल असंभव है यदि ईर्ष्या को नहीं छोड़ा जाता। आज मैं अभ्यासियों को बता रहा हूँ कि आप इसके बारे में ज्ञानवर्धन किए बिना स्वयं को अंधकार में न रखें। जो ध्येय आप प्राप्त करना चाहते हैं वह है उच्च स्तरों की ओर साधना अभ्यास करना। ईर्ष्या के मोहभाव को छोड़ना आवश्यक है, इसलिए मैंने इस व्याख्यान में इस विषय को अलग से बताया है।

रोग उपचार का विषय

रोग उपचार के संबंध में, मैं आपको रोगों का उपचार करने के बारे में नहीं बता रहा हूँ। किसी भी सच्चे फालुन दाफा शिष्य को दूसरों का रोग उपचार नहीं करना चाहिए। एक बार आप रोग का उपचार करते हैं, आपके शरीर से फालुन दाफा की सभी वस्तुएँ मेरे फा-शरीर द्वारा वापस ले ली जाएंगी। इस विषय को गंभीरता से क्यों लिया जाता है? यह इसलिए क्योंकि यह परिस्थिति दाफा का अनादर करती है। इससे आपको अपने स्वास्थ्य के अलावा और भी हानि होगी। जैसे ही कुछ लोग रोग का उपचार करते हैं, उनमें इसे दोबारा करने का कौतुहल होता है। उन्हें जो कोई दिखता है उसे पकड़ कर रोग उपचार करेंगे और अपना दिखावा करेंगे। क्या यह एक मोहभाव नहीं है? यह व्यक्ति के साधना अभ्यास में गंभीर बाधा डालेगा।

अनेक पाखण्डी चीगोंग गुरु, साधारण लोगों की चीगोंग सीख कर रोगियों के उपचार की इच्छा का लाभ उठाते हैं। वे आपको ये वस्तुएँ सिखाएंगे और दावा करेंगे कि ची निष्कासित करके आप रोगों को ठीक कर सकते हैं। क्या यह एक परिहास नहीं है? आपके पास ची है, और दूसरे व्यक्ति के पास भी ची है। आप अपनी ची द्वारा उसका उपचार कैसे कर सकते हैं? हो सकता है उसकी ची आप पर प्रभावी हो जाए! इस ची या उस ची के बीच कोई बाधा नहीं होती। जब व्यक्ति उच्च स्तर की साधना में गोंग विकसित करता है, जो वह उत्पन्न करता है वह उच्च शक्ति पदार्थ है, जो वास्तव में किसी रोग को भर, रोक, या नियन्त्रित कर सकता है, किन्तु यह उसके मूल कारण को नहीं हटा सकता। इसलिए, किसी रोग को वास्तव में ठीक करने के लिए और पूरी तरह भरने के लिए दिव्य सिध्दियाँ आवश्यक होती हैं। प्रत्येक रोग को ठीक करने के लिए एक विशिष्ट दिव्य सिध्दि होती है। जहाँ तक रोगों को ठीक करने के लिए दिव्य सिध्दियों का प्रश्न है, मैं कहूँगा कि वे एक हजार प्रकार की होती हैं, और उतने प्रकार की दिव्य सिध्दियाँ होती हैं जितने कि रोग। इन दिव्य सिध्दियों के बिना, भले ही आपका उपचार कितना भी सजावटी क्यों न हो, यह व्यर्थ होगा।

गत वर्षों में, कुछ लोगों ने साधकों के समुदाय को बहुत अव्यवस्थित कर दिया है। वे सच्चे चीगोंग गुरु जो जनता में आरोग्य और स्वास्थ्य के लिए आए थे या वे जिन्होंने आरम्भ में मार्ग प्रशस्त किया था, उनमें से किसने लोगों को रोगियों का उपचार करना सिखाया था? उन्होंने सदैव आपके रोग ठीक किए और आपको दिखाया कि साधना का अभ्यास कैसे किया जाए और कैसे स्वस्थ रहा जाए। उन्होंने आपको व्यायाम सिखाए, और तब आप स्वयं अभ्यास द्वारा अपना रोग ठीक कर सकते थे। बाद में, पाखण्डी चीगोंग गुरु जनता में आए और अव्यवस्था फैला दी। जो कोई चीगोंग द्वारा रोगियों का उपचार करना चाहता है वह ग्रसित होने के लिए प्रेत या पशु को आकर्षित करेगा- यह निश्चित ही इस प्रकार है। उस समय की परिस्थितियों में, कुछ चीगोंग गुरुओं ने रोगियों का उपचार अवश्य किया था। यह उस समय के विश्वक वातावरण के साथ सहयोग करने के लिए था। किन्तु चीगोंग कोई साधारण लोगों का कौशल नहीं है, और वह परिस्थिति हमेशा के लिए नहीं रह सकती। यह उस समय के विश्वक वातावरण में बदलाव के कारण उत्पन्न हुई थी; यह केवल उस समयावधि का उत्पाद थी। बाद में, कुछ लोगों ने दूसरों को रोग उपचार सिखाने के लिए स्वयं को विशेषज्ञ बना लिया, और इस प्रकार अव्यवस्था फैला दी। एक साधारण व्यक्ति तीन या पाँच दिनों में किसी रोग का उपचार करना कैसे सीख सकता है? कोई दावा करता है: "मैं इस या उस रोग को ठीक कर सकता हूँ" मैं आपको बताना चाहूँगा कि वे सब लोग प्रेत या पशु द्वारा ग्रसित हैं। क्या वे जानते हैं कि उनकी पीठ पीछे क्या जुड़ा है? वे प्रेत या पशु द्वारा ग्रसित हैं, किन्तु वे न तो इसे महसूस करते हैं और न ही जानते हैं। तब भी, वे बहुत अच्छा महसूस करते हैं और सोचते हैं कि वे समर्थ हैं।

सच्चे चीगोंग गुरुओं को इस ध्येय को प्राप्त करने के लिए अपनी साधना में अनेक वर्षों का परिश्रम करना आवश्यक होता है। जब आप किसी रोगी का उपचार करते हैं, क्या आपने कभी सोचा है कि आपके पास उस व्यक्ति के कर्म को हटाने के लिए प्रबल दिव्य सिध्दियाँ हैं? क्या आपने कभी कोई सच्ची शिक्षा प्राप्त की है? आप तीन से पाँच दिनों में रोगों का उपचार करना कैसे सीख सकते हैं? आप एक साधारण व्यक्ति के हाथों से किसी रोग का उपचार कैसे कर सकते हैं? तब भी, इस प्रकार के पांखडी चीगोंग गुरु ने आपकी कमजोरियों और लोगों के मोहभावों का लाभ उठाया है। क्या आप लोगों का उपचार नहीं करना चाहते? यह व्यक्ति एक उपचार कक्षा आयोजित करेगा जो विशेष रूप से आपको कुछ उपचार पध्दतियाँ सिखाती है, जैसे ची सुईं, प्रकाश दीप्त पध्दति, ची निष्कासन, ची भरना, तथाकथित एक्यूप्रेशर, और तथाकथित हाथ से दबोचने की पध्दति। इनमें अनेक प्रकार की पध्दतियाँ हैं जिनका ध्येय आपका पैसा वसूलना है।

आइए हाथ से दबोचने की पध्दति के बारे में बात करें। जो हमने देखा है वह निम्नलिखित परिस्थिति है। लोग रोगी क्यों होते हैं? व्यक्ति को रोग होने और उसके सभी अभाग्यों का मूल कारण कर्म है और काले पदार्थ का कर्म क्षेत्र है। यह एक बुरा पदार्थ है। वे दुष्ट प्राणी भी बुरे हैं, और वे सभी काले हैं। इस प्रकार, वे आ सकते हैं क्योंकि यह वातावरण उनके अनुकूल है। यह इस व्यक्ति के रोगी होने का मूलभूत कारण है; यह रोगों का प्रमुख स्रोत है। नि:संदेह, इसके दो और प्रकार हैं। एक बहुत उच्च घनत्व का अति सूक्ष्म प्राणी है जो कर्म के पुंज जैसा है। दूसरा इस प्रकार है जैसे एक पाइप द्वारा प्रवाहित किया गया हो, किन्तु यह कम ही दिखाई देता है, यह सब व्यक्ति के पूर्वजों द्वारा एकत्रित किया जाता है। ये इस प्रकार भी होते हैं।

आइए सबसे साधारण रोगों के बारे में बात करें। व्यक्ति के शरीर में कहीं कोई गिल्टी, सूजन, अस्थि रोग, आदि हो सकता है। यह इसलिए क्योंकि दूसरे आयाम में वहाँ एक प्राणी वास करता है। वह प्राणी एक बहुत गहरे आयाम में है। एक साधारण चीगोंग गुरु या एक साधारण अलौकिक सिध्दि इसका पता लगाने में असमर्थ है; वे व्यक्ति के शरीर में केवल काली ची को देख सकते हैं। यह कहना उचित है कि जहाँ कहीं काली ची होती है, वहाँ रोग होता है। किन्तु काली ची रोग का मूल कारण नहीं है। यह इसलिए क्योंकि एक गहरे आयाम में एक प्राणी है जो इस क्षेत्र को उत्पन्न करता है। इसलिए कुछ लोग काली ची को निष्कासित करने और हटाने के बारे में बात करते हैं- इसे जैसे चाहें निष्कासित करें! कुछ समय बाद ही, यह दोबारा उत्पन्न हो जाएगी, क्योंकि कुछ प्राणी बहुत प्रबल होते हैं और जैसे ही ची निकाली जाती है वे इसे दोबारा भर सकते हैं; वे स्वयं इसे भर सकते हैं। उपचार कारगर नहीं हो पाते भले ही वे कैसे भी प्रयोग किए जाएँ।

जो अलौकिक सिध्दियों के द्वारा देखता है उसके अनुसार, जहाँ कहीं काली ची होती है, उस स्थान पर माना जाता है कि रोगग्रस्त ची है। एक चीनी दवाओं का चिकित्सक उस स्थान पर शक्ति नाड़ियों को अवरूध्द पाएगा, क्योंकि ची और रक्त का प्रवाह नहीं हो रहा है और शक्ति नाड़ियाँ अवरूध्द हैं। पाश्चात्य दवाओं के चिकित्सक के लिए, वह स्थान किसी फोड़े, गिल्टी, अस्थि रोग, या सूजन की दशा दिखा सकता है। जब यह इस आयाम में प्रकट होता है, यह इस रूप में होता है। जब आप उस प्राणी को हटा देते हैं, आप पाएंगे कि इस आयाम के शरीर में कुछ गलत नहीं है। भले ही यह रीढ़ की हड्डी के खिसकने का रोग है या हड्डियों के जोड़ों का, जब आप उस वस्तु को हटा देते हैं और उस क्षेत्र को साफ कर देते हैं, आप पाएंगे कि यह तुरन्त ठीक हो जाता है। आप दूसरा एक्स-रे ले सकते हैं और पाएंगे कि अस्थि रोग लुप्त हो चुका है। मूल कारण यह है कि वह प्राणी एक प्रभाव उत्पन्न कर रहा था।

कुछ लोग दावा करते हैं कि आपको हाथ से दबोचने की पध्दति सिखा कर, आप तीन या पाँच दिनों में रोगों का उपचार कर सकते हैं। अपनी दबोचने की पध्दति मुझे दिखाइए! मनुष्य सबसे निर्बल हैं जबकि वह प्राणी बहुत शक्तिशाली है। यह आपके मन को नियन्त्रित कर सकता है और सरलता से आपको इच्छानुसार भ्रमित कर सकता है। यह सरलता से आपका जीवन समाप्त कर सकता है। आप दावा करते हैं कि आप इसे पकड़ सकते हैं। आप इसे कैसे पकड़ते हैं? आप अपने साधारण व्यक्ति के हाथों द्वारा इस तक नहीं पहुँच सकते। आप वहाँ बिना निशाना लिए इसे पकड़ते हैं, और यह आपकी परवाह नहीं करेगा और आपके पीछे आप पर हँसेगा- बिना निशाने के पकड़ना इतना उपहासपूर्ण ा है। यदि आप वास्तव इसे छू सकें, यह तुरन्त आपके हाथों को हानि पहुँचाएगा। वह एक वास्तविक घाव होगा! मैंने पहले कुछ लोगों को देखा जिनके दोनों हाथ किसी भी परीक्षण द्वारा साधारण दिखाई देते थे। उनके शरीर और उनके दोनों हाथ रोगग्रस्त नहीं थे, किन्तु वे अपने हाथों को उठा नहीं सकते थे जो इस प्रकार लटके रहते थे। मैंने ऐसे एक रोगी को देखा है: उसका दूसरे आयाम में शरीर चोटग्रस्त था- उस स्थिति में वह वास्तव में लकवे से ग्रस्त था। यदि आपका वह शरीर चोटग्रस्त हो जाता है, क्या आप लकवाग्रस्त नहीं हो जाएंगे? कुछ लोग मुझसे पूछते हैं : "गुरुजी, क्या मैं चीगोंग का अभ्यास कर पाऊँगा? मेरी एक शल्य चिकित्सा हुई थी," या "मेरे शरीर से कुछ निकाला गया था।" मैंने उन्हें कहा, "इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता क्योंकि आपके दूसरे आयाम के शरीर की चिकित्सा नहीं हुई थी, और चीगोंग अभ्यास में उस शरीर पर कार्य किया जाता है।" इसलिए, मैंने अभी कहा कि जब आप इसे पकड़ना चाहते हैं, यदि आप इस तक नहीं पहुँच सकते यह आपकी परवाह नहीं करेगा। यदि आप इसे छूते हैं, यह आपके हाथ को घायल कर सकता है।

राज्य द्वारा आयोजित एक मुख्य चीगोंग कार्यक्रम को सहयोग करने के लिए, मैंने कुछ शिष्यों के साथ बीजिंग में पूर्वी स्वास्थ्य प्रदर्शनी में भाग लिया। दो प्रदर्शनियों में से दोनों में, हमारा अभ्यास सबसे उत्कृष्ट था। पहली प्रदर्शनी में, हमारे फालुन दाफा को "सितारा चीगोंग पध्दति" सम्मान दिया गया। दूसरी प्रदर्शनी में, हमारे स्थान पर इतनी भीड़ थी कि हम उसे संभाल भी नहीं पाए। दूसरे प्रदर्शनी कक्षों में अधिक लोग नहीं थे, किन्तु हमारे कक्ष में लोगों की भीड़ लगी थी। वहाँ तीन प्रतीक्षा पंक्तियाँ थीं : पहली पंक्ति उनके लिए थी जिन्होंने सुबह के उपचार के लिए सुबह के आरम्भ में रजिस्टर करा लिया था, दूसरी पंक्ति दोपहर के उपचार के लिए प्रतीक्षा कर रही थी, और तीसरी पंक्ति मेरे हस्ताक्षर लेने के लिए प्रतीक्षा कर रही थी। हम रोगों का उपचार नहीं करते। हमने यह क्यों किया? क्योंकि यह राज्य द्वारा आयोजित मुख्य कार्यक्रम को सहयोग करने के लिए था और इसकी मदद करने के लिए था, हमने इसमें भाग लिया।

मैंने अपना गोंग शिष्यों के बीच बांट दिया जो वहांँ मेरे साथ थे। प्रत्येक को एक भाग मिला जो सौ से भी अधिक दिव्य सिध्दियों का एक शक्तिपुंज था। मैंने उनके हाथों को गोंग से सील कर दिया था, किन्तु तब भी उनके हाथों पर इतने घाव हो गए थे कि रक्त निकलने लगा था, यह कई बार हुआ। वे प्राणी बहुत दुष्ट थे। क्या आप सोचते हैं कि आप एक साधारण व्यक्ति के हाथों द्वारा उन्हें छूने का साहस कर सकते हैं? इसके अतिरिक्त, आप इस तक नहीं पहुँच सकते। यह उस प्रकार की दिव्य सिध्दि के बिना कारगर नहीं होगा। यह इसलिए क्योंकि दूसरे आयाम में यह जान जाएगा कि आप क्या करना चाहते हैं- इससे पहले आप इसके बारे में सोचें। जब आप इसे पकड़ने का प्रयत्न करते हैं, यह पहले ही भाग चुका होगा। जैसे ही रोगी द्वार के बाहर पहुँचता है, यह तुरन्त वहाँ वापस पहुँच जाएगा, और रोग वापस आ जाएगा। इससे निपटने के लिए इस प्रकार की दिव्य सिध्दि की आवश्यकता है जिसमें व्यक्ति हाथ बढ़ाता है और "बैम!" इसे वहाँ दबोच लेता है। इसे दबोचने के बाद, हमारे पास दूसरी दिव्य सिध्दि है जिसे एक बार "महान आत्मा-बंध पध्दति" कहा जाता था, और वह दिव्य सिध्दि और अधिक प्रबल है। यह व्यक्ति की मूल आत्मा को बाहर निकाल सकती है, और तुरन्त व्यक्ति हिल-डुल पाने में असमर्थ होगा। इस दिव्य सिध्दि का अपना विशिष्ट प्रयोजन है, और हम केवल इस वस्तु पर निशाना बना कर दबोचते हैं। हर कोई जानता है कि भले ही आप सन वूकोंग10 को बहुत विशाल मानें, तथागत अपने हाथ के कटोरे से सन वूकोंग को ढक कर एक बहुत छोटी वस्तु में बदल सकता है। इस दिव्य सिध्दि का यह प्रभाव हो सकता है। यह प्राणी कितना ही बड़ा या छोटा क्यों न हो, यह तुरन्त ही हाथ में पकड़ लिया जाएगा और बहुत छोटा हो जाएगा।

इसके अतिरिक्त, किसी के हाथ को किसी रोगी के भौतिक शरीर में अन्दर ले जाने और कुछ बाहर निकालने की अनुमति नहीं है। इससे साधारण मानव समाज में लोगों के मन में हलचल मच जाएगी, और उसकी सख्त मनाही है। यदि यह संभव भी होता, इसे इस प्रकार नहीं किया जा सकता था। जो हाथ अन्दर ले जाया जाता है वह हाथ दूसरे आयाम में होता है। उदाहरण के लिए जब किसी को कोई हृदय रोग होता है। जब यह हाथ उस प्राणी को दबोचने के लिए हृदय की ओर जाता है, दूसरे आयाम का हाथ शरीर के अन्दर पहुँचता है, और यह तुरन्त पकड़ लिया जाता है। जैसे आपका बाहर का हाथ इसे दबोचता है, दोनों हाथ पास आते हैं और इसे दबोच लेते हैं। यह बहुत दुष्ट होता है, कई बार आपके हाथों में छटपटाता है और उन्हें छेदने का प्रयत्न करता है, और कई बार काटता है और चीखता है। हालांकि यह आपके हाथों में बहुत छोटा दिखाई पड़ता है, यदि आप इसे अपने हाथों से छोड़ दें यह बहुत बड़ा हो जाएगा। यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे हर कोई छू सके। उस दिव्य सिध्दि के बिना, कोई इसे छू भी नहीं सकता। यह उससे बिल्कुल भिन्न है जैसा साधारण लोग सोच सकते हैं।

नि:संदेह, भविष्य में इस प्रकार के चीगोंग उपचार के अस्तित्व में रहने की अनुमति हो सकती है, जैसे यह विगत में हमेशा अस्तित्व में रहा है। किन्तु इसमें यह शर्त आवश्यक है : यह व्यक्ति एक अभ्यासी होना चाहिए। साधना अभ्यास के दौरान, इस व्यक्ति के लिए करुणाभाववश यह कुछ अच्छे लोगों के लिए करने की अनुमति है। किन्तु वह उनका कर्म पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता क्योंकि उसके पास समुचित महान गुण नहीं हैं। इसलिए, कठिनाइयाँ अभी भी रहेंगी, किन्तु विशिष्ट रोग ठीक हो जाएंगे। एक साधारण चीगोंग गुरु वह व्यक्ति नहीं है जिसे साधना अभ्यास में ताओ की प्राप्ति हो गई हो। वह केवल रोगों को विलम्बित या शायद उन्हें रूपांतरित कर सकता है। हो सकता है वह उन्हें दूसरे अभाग्य में रूपांतरित कर दे, किन्तु वह स्वयं इस विलम्बन की प्रक्रिया को नहीं जानता। यदि उसके अभ्यास में सह चेतना की साधना होती है, यह उसकी सह चेतना द्वारा किया जाता है। कुछ पध्दतियों के अभ्यासी बहुत प्रसिध्द दिखाई पड़ते हैं। कई सुप्रसिध्द चीगोंग गुरुओं के पास गोंग नहीं होता क्योंकि उनका गोंग उनकी सह चेतनाओं के शरीरों में विकसित होता है। यानि, कुछ लोगों को साधना अभ्यास के दौरान इस प्रकार की वस्तुओं को करने की अनुमति होती है क्योंकि वे इसी स्तर पर निरन्तर बने रहते हैं। वे दस वर्षों से अधिक या कई दशकों से अभ्यास कर रहे हैं और तब भी इस स्तर से आगे नहीं जा सकते। इसलिए अपने जीवन भर वे हमेशा रोगियों को देखते हैं। क्योंकि वे इस स्तर पर रहते हैं, उन्हें यह करने की अनुमति है। फालुन दाफा शिष्यों को रोगियों का उपचार करने की सख्त मनाही है। आप यह पुस्तक किसी रोगी के लिए पढ़ सकते हैं। यदि रोगी इसे स्वीकार कर सकता है, यह रोग ठीक कर सकती है। किन्तु परिणाम प्रत्येक व्यक्ति के संचित कर्म के अनुसार भिन्न होंगे।

अस्पताल उपचार और चीगोंग उपचार

आइए अस्पताल उपचार और चीगोंग द्वारा रोग ठीक करने के बीच संबंध के बारे में बात करें। पाश्चात्य चिकित्सा के कुछ चिकित्सक चीगोंग को मान्यता नहीं देते, और आप कह सकते हैं कि उनमें से अधिकांश इसी प्रकार हैं। उनका विचार है यदि चीगोंग रोगों को ठीक कर सकता है, तब हमें अस्पतालों की क्या आवश्यकता है? "आपको हमारे अस्पतालों को हटा देना चाहिए! क्योंकि आपका चीगोंग केवल हाथ से रोगों को ठीक कर सकता है और इसमें सुईंयों, दवाओं और अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता नहीं होती, क्या यह अच्छा नहीं होगा कि आप हमारे अस्पताल ही हटा दें?" यह वक्तव्य न तो तर्क संगत है न विवेकपूर्ण; कुछ लोग चीगोंग के बारे में नहीं जानते। वास्तव में चीगोंग उपचार साधारण लोगों के उपचारों की भांति नहीं हो सकता, क्योंकि यह कोई साधारण लोगों का कौशल नहीं है- यह दिव्य है। इसलिए जो इतना दिव्य है उससे साधारण मानव समाज में बड़े पैमाने पर विघ्न डालने की अनुमति कैसे हो सकती है? एक बुध्द महा-सामर्थ्यवान होता है, और वह समस्त मानव जाति के रोग अपना एक हाथ हिला कर मिटा सकता है। वह ऐसा क्यों नहीं करता? इसके अतिरिक्त, वहाँ इतने अधिक बुध्द हैं। वे आपका रोग ठीक करके अपनी दया क्यों नहीं दिखाते? यह इसलिए क्योंकि साधारण मानव समाज इसी प्रकार होना चाहिए। जन्म, वृध्दावस्था, रोग, और मृत्यु इसी प्रकार की परिस्थितियाँ हैं। उन सभी के कार्मिक कारण होते हैं और कर्म प्रतिफल की वजह से होते हैं। यदि आपने ऋण लिया है आपको इसे चुकाना होगा।

यदि आप किसी का रोग ठीक करते हैं, यह उस सिध्दान्त की अवहेलना करने जैसा होगा, क्योंकि व्यक्ति बिना भुगतान किए बुरे कार्य कर सकेगा। यह कैसे संभव हो सकता है? साधना अभ्यास के व्यक्ति की भांति, जब आपके पास इस समस्या को पूर्ण रूप से सुलझाने का महान सामर्थ्य नहीं होता, आपको करुणाभाववश किसी रोगी को ठीक करने की अनुमति है। क्योंकि आपकी करुणा उभर आई है, आपको ऐसा करने की अनुमति है। किन्तु यदि आप इस प्रकार की समस्या को वास्तव में सुलझा सकें, इसके बड़े पैमाने पर करने की अनुमति नहीं होगी। उस अवस्था में, आप साधारण मानव समुदाय की स्थिति को गम्भीर रूप से हानि पहुँचा रहे होंगे- उसकी अनुमति नहीं है। इसलिए, साधारण लोगों के अस्पतालों को चीगोंग से प्रतिस्थापित करना बिल्कुल कारगर नहीं होगा, क्योंकि चीगोंग एक दिव्य फा है।

यदि चीन में चीगोंग अस्पतालों को स्थापित करने की अनुमति दे दी जाए और अनेक महान चीगोंग गुरु उपचार करने आ जाएं, आप क्या समझते हैं यह किस प्रकार होगा? उसकी अनुमति नहीं होगी, क्योंकि वे सब साधारण मानव समाज की स्थिति को बनाए रखते हैं। यदि चीगोंग अस्पताल, चीगोंग क्लीनिक, चीगोंग स्वास्थ्य केन्द्र, और उपचार विहार स्थापित कर दिए जाते हैं, चीगोंग गुरुओं के उपचार की प्रभावशीलता बहुत कुछ कम हो जाएगी, और उपचारों के परिणाम तुरन्त अच्छे नहीं होंगे। ऐसा क्यों है? क्योंंकि वे यह साधारण लोगों के बीच करते हैं, उनका फा उतना ही ऊँचा होना चाहिए जितना कि साधारण लोगों का। उन्हें उसी स्तर पर रहना होगा जो साधारण लोगों का स्तर है। उनके उपचार की प्रभावशीलता उतनी ही होनी चाहिए जितनी एक अस्पताल की। इसलिए उनके उपचार सही कारगर नहीं होते, और उन्हें किसी रोग को ठीक करने के लिए तथाकथित कई "उपचार सत्र" करने पड़ते हैं।

चीगोंग अस्पताल हों या न हों, यह कोई नकार नहीं सकता कि चीगोंग रोगों को ठीक कर सकता है। चीगोंग जनता में इतने समय से प्रसिध्द रहा है। वास्तव में कई लोग अभ्यास द्वारा आरोग्य और स्वास्थ्य के ध्येय को प्राप्त कर चुके हैं। भले ही रोग चीगोंग गुरु द्वारा हटाया गया या जिस प्रकार भी इसका उपचार किया गया, इसके बाद अब यह रोग चला गया है। दूसरे शब्दों में, यह कोई नकार नहीं सकता कि चीगोंग रोगों का उपचार कर सकता है। अधिकांश लोग जो चीगोंग गुरुओं के पास जाते हैं उन्हें कठिन और जटिल रोग होते हैं जिनका अस्पताल में उपचार नहीं हो सकता। वे चीगोंग गुरुओं के पास अपना भाग्य आजमाने जाते हैं, और रोग अन्तत: ठीक हो जाते हैं। वे जिनके रोग अस्पतालों में ठीक हो सकते हैं, चीगोंग गुरुओं के पास नहीं जाएंगे। विशेष रूप से आरम्भ में, सभी लोग इस प्रकार सोचते हैं। चीगोंग इसलिए रोगों का उपचार कर सकता है, केवल इसका इस प्रकार प्रयोग नहीं किया जा सकता जैसे साधारण मानव समाज में दूसरी वस्तुएँ की जाती हैं। क्यों बड़े पैमाने पर विघ्न की बिल्कुल अनुमति नहीं है, इसे छोटे पैमाने पर करने या इसके प्रभावहीन और एकान्त अभ्यास बने रहने की अनुमति है। किन्तु यह पूर्ण रूप से रोग ठीक नहीं करेगा- यह भी निश्चित है। अपने रोग ठीक करने का सर्वोत्ताम तरीका है स्वयं चीगोंग का अभ्यास करना।

ऐसे भी कई चीगोंग गुरु हैं जो दावा करते हैं कि अस्पताल रोगों को ठीक नहीं कर सकते, और यह कि अस्पताल उपचारों की प्रभावशीलता बस इतनी ही होती है। हम इसके बारे में क्या बोलें? नि:संदेह, इसमें कई प्रकार के कारण सम्मिलित हैं। मेरे विचार में, मुख्य कारण यह है कि मानव नैतिक आदर्श बहुत नीचे गिर गए हैं, जिससे अनेक प्रकार के विचित्र रोग पैदा हो गए हैं जो अस्पताल ठीक नहीं कर सकते। दवा लेना भी प्रभावशाली नहीं होता। बहुत सी नकली दवाइयाँ भी उपलब्ध हैं। यह सब इसलिए है क्योंकि मानव समाज का इस अवस्था तक पतन हो गया है। इसके लिए किसी को दूसरे पर दोष नहीं डालना चाहिए, क्योंकि सभी ने आग में घी डालने का काम किया है। परिणामस्वरूप, सभी को साधना अभ्यास में कठिनाइयों का सामना करना होगा।

कुछ रोगों का अस्पताल में पता नहीं लगाया जा सकता, भले ही लोग वास्तव में बीमार हों। कुछ लोगों की जांच के बाद पाया जाता है कि उन्हें वे रोग हैं जिनके नाम नहीं है, क्योंकि उन्हें पहले कभी नहीं देखा गया। अस्पताल उन सभी को "आधुनिक रोग" कहते हैं। क्या अस्पताल रोगों को ठीक कर सकते हैं? नि:संदेह वे कर सकते हैं। यदि अस्पताल रोगों को ठीक नहीं कर पाते, लोग उनमें विश्वास क्यों करते और वहाँ उपचार के लिए क्यों जाते? अस्पताल अब भी रोगों को ठीक कर सकते हैं, किन्तु उनके उपचार के तरीके साधारण लोगों के स्तर के हैं जबकि रोग अलौकिक हैं। कुछ रोग बहुत गंभीर होते हैं, इसलिए यदि व्यक्ति को ऐसा रोग है तब अस्पतालों में आरम्भ में ही उपचार की आवश्यकता होती है। यदि यह बहुत गंभीर हो जाए तो अस्पताल मदद नहीं कर सकेंगे, क्योंकि दवा के अधिक प्रयोग से व्यक्ति में जहर भर सकता है। वर्तमान चिकित्सा उपचार उसी स्तर पर हैं जितने हमारे विज्ञान और तकनीक- वे सब साधारण लोगों के स्तर पर हैं। इस प्रकार, उनकी उपचार प्रभावशीलता केवल इतनी ही होती है। एक विषय जिसे स्पष्ट करना आवश्यक है वह यह है कि साधारण चीगोंग उपचार और अस्पताल उपचार उन कठिनाइयों को जो रोगों के मूलभूत कारण हैं, बाकी आधे जीवन या उसके भी बाद के लिए टाल देते हैं। कर्म बिल्कुल भी समाप्त नहीं होता।

आइए चीनी चिकित्सा के बारे में बात करें। चीनी चिकित्सा चीगोंग उपचार के बहुत समीप है। प्राचीन चीन में, अलौकिक योग्यताएँ लगभग सभी चीनी चिकित्सकों के पास होती थीं, जैसे वे महान चिकित्सा वैज्ञानिक : सन सिमिओ, ह्ना तोआ, ली शजन, ब्येन च्यू11। उन सभी के पास अलौकिक योग्यताएँ थीं जो सब चिकित्सा शास्त्रों में लिखित हैं। हालांकि अब इन उत्कृष्ट भागों की अक्सर आलोचना की जाती है। जो चीनी चिकित्सा ने वंशानुगत प्राप्त किया है वह केवल वे नुस्खे या खोज के अनुभव हैं। प्राचीन चीनी चिकित्सा बहुत विकसित थी, और इसके विकास का स्तर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान से आगे था। कुछ लोग सोच सकते हैं कि आधुनिक चिकित्सा इतनी विकसित है कि इसके सी.टी.स्कैन द्वारा मानव शरीर के अन्दर देखा जा सकता है और इसमें अल्ट्रासाउंड, फोटोग्राफी और एक्स-रे हैं। हालांकि आधुनिक उपकरण बहुत विकसित हैं, मेरे विचार में यह तब भी प्राचीन चीनी चिकित्सा से निम्न हैं।

ह्ना तोआ ने चाओचाओ12 के मस्तिष्क में एक गिल्टी देखी और वह इसकी चिकित्सा करना चाहता था। चाओचाओ ने सोचा कि ह्ना तोआ उसे मारना चाहता है, इसलिए उसने ह्ना तोआ को बंदी बना लिया। परिणामस्वरूप, ह्ना तोआ की बंदीगृह में मृत्यु हो गई। जब चाओचाओ का रोग सामने आया, उसने ह्ना तोआ को याद किया और उसे खोजा, किन्तु ह्ना तोआ की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी। बाद में, चाओचाओ की वास्तव में इस रोग के कारण मृत्यु हुई। ह्ना तोआ इसे क्यों जान सका? उसने इसे देखा था। यह हमारी अलौकिक योग्यता है जो विगत के सभी चिकित्सकों के पास थी। दिव्य-नेत्र के खुल जाने के बाद, व्यक्ति एक ओर से, एक साथ मानव शरीर के चारों ओर देख सकता है। वह सामने से पीछे का भाग, बायां भाग और दायां भाग देख सकता है। वह परत दर परत देख सकता है। या इस आयाम के आगे रोग का मूलभूत कारण देख सकता है। क्या आधुनिक चिकित्सा साधन ऐसा कर सकते हैं? वे बहुत दूर हैं। इसमें एक हजार वर्ष और लगेंगे! सी.टी.स्कैन, अल्ट्रासाउंड, और एक्स-रे भी आन्तरिक मानव शरीर की जांच कर सकते हैं, किन्तु उपकरण बहुत भारी हैं, और इतनी बड़ी वस्तुएँ सुविधाजनक नहीं हैं; न ही वे बिजली के बिना कार्य करती हैं। यह दिव्य-नेत्र, हालांकि, हर कहीं जा सकता है जहाँ व्यक्ति जाता है, और इसके लिए बिजली की आवश्यकता नहीं होती। उनकी समानता कैसे की जा सकती है?

कुछ लोग बात करते हैं कि आधुनिक चिकित्सा कितनी उत्कृष्ट हैं। मैं कहूँगा कि यह आवश्यक नहीं है, क्योंकि प्राचीन चीनी औषघियाँ, प्रयोग करने पर, वास्तव में रोगों को ठीक करती थीं। ऐसी बहुत सी वस्तुएँ हैं जो वंशानुगत हस्तांतरित नहीं हुई हैं, किन्तु अनेक लुप्त नहीं हुई हैं और लोगों के बीच अब भी उपयोग में हैं। जब मैंने चीचीहार में एक कक्षा ली, मैंने एक व्यक्ति को देखा जो सड़क पर दुकान लगाए था और लोगों के लिए उनके दांत निकल रहा था। यह आसानी से बताया जा सकता था कि यह व्यक्ति दक्षिण से आया था, क्योंकि वह एक उत्तार-पूर्वी व्यक्ति की तरह कपड़े नहीं पहने था। जो कोई उसके पास आता था वह किसी को मना नहीं कर रहा था। जो कोई उसके पास आता वह उसका दांत निकालता, और उसके पास निकाले हुए दांतों का ढेर मौजूद था। उसका उद्देश्य दांत निकालना नहीं था, बल्कि उसकी तरल दवा को बेचना था। तरल दवा से बहुत गहन पीला धुऑं निकल रहा था। दांत निकालते समय, वह दवा की बोतल खोलता और इसे रोगी के गाल पर खराब दांत वाले भाग की ओर लगा देता। रोगी को पीली तरल दवा के धुएँ को सूँघने के लिए कहा जाता, जो बहुत कम ही खर्च होती। दवा की बोतल को बंद करके एक ओर रख दिया जाता। वह व्यक्ति अपनी जेब से एक माचिस की तीली निकालता। अपने दवा के बारे में बात करते हुए, वह खराब दांत को माचिस की तीली से धकेलता और यह बाहर निकल आता। इसमें दर्द नहीं होता था। दांत पर केवल कुछ रक्त के छींटे होते, किन्तु रक्त नहीं निकलता था। आप सब यह सोचें : एक माचिस की तीली को यदि बलपूर्वक प्रयोग किया जाए तो यह टूट सकती है, किन्तु उसने इसे दांत निकालने के लिए केवल छूने भर से प्रयोग किया।

मैंने कहा है कि चीन में अब भी कुछ वस्तुएँ हैं जो लोगों के बीच पहले से हस्तांतरित होती आ रही है, जिनका सामना पाश्चात्य चिकित्सा के सटीक उपकरण नहीं कर सकते। आइए देखते हैं किसका उपचार बेहतर है। उसकी माचिस की तीली दांत निकाल सकती है। यदि पाश्चात्य चिकित्सा का चिकित्सक दांत निकालना चाहता है, चिकित्सक पहले रोगी को सुन्न करने की सुईं इघर-उधर लगाएगा। सुईंयाँ बंहुत दु:खदायी होती हैं, और तब तक प्रतीक्षा करनी होती है जब तक सुन्न होने का असर न हो। तब चिकित्सक एक संडासी से दांत खींचेगा। बहुत से समय और प्रयत्न के बाद, यदि चिकित्सक सावधान नहीं हो, दांत के मुहाने में इसकी जड़ टूट सकती है। तब चिकित्सक इसे खोदने के लिए एक हथौड़ी और छेदक का प्रयोग करेगा, जो रोगी को डर और चिन्ता से धड़का सकते हैं। बाद में छेदने के लिए एक सटीक यंत्र का प्रयोग किया जाएगा। कुछ लोग छेदने से इतने अधिक दर्द में होते हैं कि वे उछल ही पड़ते हैं। दांत से बहुत सा रक्त निकलेगा, और रोगी कुछ देर तक रक्त थूकता रहेगा। किसका उपचार आप कहेंगे कि बेहतर है? किसका अधिक विकसित है? हमें केवल औजारों का रूप ही नहीं देखना चाहिए, बल्कि उनकी प्रभावशीलता भी देखनी चाहिए। प्राचीन चीनी चिकित्सा बहुत विकसित थी, और वर्तमान पाश्चात्य चिकित्सा आने वाले अनेक वर्षों तक इस तक नहीं पहुँच पाएगी।

प्राचीन चीनी विज्ञान हमारे वर्तमान विज्ञान से भिन्न है जो हमने पश्चिम से सीखा है, क्योंकि इसने दूसरा मार्ग अपनाया जिससे दूसरी अवस्था सामने आ सकी। इसलिए, हम प्राचीन चीनी विज्ञान और तकनीक को हमारे वस्तुओं को समझने के वर्तमान तरीके से नहीं समझ सकते। क्योंकि प्राचीन चीनी विज्ञान सीधे मानव शरीर, जीवन और ब्रह्माण्ड पर केन्द्रित होता था, यह इन विषयों का सीधे अध्ययन करता था, इसने एक भिन्न मार्ग अपनाया। उस समय, जब छात्र पाठशाला जाते, वे ध्यान में बैठने का अभ्यास करते और अच्छी बैठने की मुद्रा पर ध्यान देते। जब वे अपनी कूंची उठाते, वे अपना श्वास और ची नियन्त्रित करते। सभी पेशे मन को रिक्त करने और श्वास को नियन्त्रित करने में विश्वास करते, और पूरे समाज में यही स्थिति थी।

किसी ने कहा है : "यदि हम प्राचीन चीनी विज्ञान को अपनाते तो क्या हमारे पास कार और रेलगाड़ियाँ होतीं? क्या हमारे पास आज की आधुनिकता होती?" मैं कहूँगा कि आप दूसरी परिस्थिति को इस वातावरण के दृष्टिकोण से नहीं समझ सकते। आपके विचारों में एक क्रान्ति आनी चाहिए। बिना टेलीविजन के, वे लोगों के पास उनके माथे में होते, और वे कुछ भी देख पाते जो वे चाहते। उनके पास दिव्य सिध्दियाँ भी होतीं। बिना रेलगाड़ियों और जहाजों के, लोग बैठे हुए बिना ऊँचा उठाने वाले यन्त्र का प्रयोग किए हुए हवा में उड़ सकते। इससे एक विभिन्न प्रकार का समाजिक विकास होता, और यह आवश्यक नहीं कि यह इसी रूपरेखा में बंधा होता। परलोकवासियों की उड़न तश्तरियाँ आगे और पीछे अविश्वसनीय गति से यात्रा कर सकती हैं और बड़ी या छोटी हो सकती हैं। उन्होंने विकास का दूसरा तरीका अपनाया है, जो दूसरा वैज्ञानिक मार्ग है।


1 हन — भोजन जो बुध्दमत में निषेध है।
2 जीगोंग — दक्षिणी सोंग राजवंश में एक सुप्रसिध्द बौध्द भिक्षु (1127ए.डी. - 1279ए.डी.)।
3 ग्वांगडोंग और ग्वांगशी — दक्षिणी चीन के दो राज्य।
4 देवताओं का राज्याभिषेक — एक चीनी काल्पनिक साहित्य।
5 शेन गोंगबाओ — देवताओं का राज्याभिषेक में एक ईर्ष्या करने वाला पात्र।
6 जियांग जिया — देवताओं का राज्याभिषेक में एक पात्र।
7 मुजल्येन — बुध्द शाक्यमुनि के दस मुख्य पुरुष शिष्यों में से एक।
8 ल्येनह्नास — बुध्द शाक्यमुनि की दस मुख्य महिला शिष्यों में से एक।
9 इमेई पर्वत — यह लिंगयिन मठ से करीब एक हजार मील दूर है जहाँ कुऑं था।
10 सन वूकोंग — वानर राजा के नाम से भी जाना जाता है, चीनी काल्पनिक साहित्य पश्चिम की ओर यात्रा का एक पात्र।
11 सन सिमियो, ह्ना तोआ, ली शजन, ब्येन च्यू — इतिहास में चीनी चिकित्सा के सुप्रसिध्द चिकित्सक।
12 चाओचाओ — तीन राज्यों में एक का शासक