ZHUAN FALUN-LECTURE SIX
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उपदेश छ:
 

साधना पागलपन

साधक समाज में एक शब्द है जिसे साधना पागलपन कहा जाता है। इसका जनता पर बहुत बड़ा प्रभाव रहा है। विशेषरूप से, कुछ लोगों ने इसे इतना चर्चित कर दिया है कि कुछ लोग चीगोंग का अभ्यास करने से घबराते हैं। जब लोग सुनते हैं कि चीगोंग अभ्यास करने से साधना पागलपन हो सकता है, वे इतना घबरा जाते हैं कि इसे नहीं करते। वास्तव में, मैं आपको बताना चाहूँगा कि साधना पागलपन नाम की कोई परिस्थिति नहीं होती।

बहुत से लोग प्रेत या पशुओं द्वारा ग्रसित हुए हैं क्योंकि उनके मन उचित नहीं थे। उनकी मुख्य चेतना स्वयं को नियंत्रित नहीं रख सकी और उन्हें गोंग मानती है। उनके शरीर ग्रसित करने वाले प्रेत या पशुओं द्वारा निर्देशित होते हैं, जिससे वे पागलों जैसी हरकतें करते हैं और चीखते चिल्लाते हैं। जब लोग देखते हैं कि चीगोंग अभ्यास इस प्रकार होता है, वे इतना घबरा जाते हैं कि अभ्यास नहीं करते। आप में से कई सोचते हैं कि यह चीगोंग है, किन्तु यह चीगोंग अभ्यास कैसे हो सकता है? यह केवल निम्नतम स्तर का रोग निवारण और स्वस्थ होना है, किन्तु यह बहुत खतरनाक है। यदि आप इस मार्ग से अभ्यस्त हैं, आपकी मुख्य चेतना आपको सदैव नियंत्रण में नहीं रख पायेगी। तब आपका शरीर सह चेतना, बाहरी संदेशों, ग्रसित करने वाले प्रेतों या पशुओं से हावी हो जायेगा। आप कुछ खतरनाक कार्यों में सम्मिलित हो सकते हैं और साधक समाज को भारी नुकसान पहुँचा सकते हैं। यह व्यक्ति के अपवित्र मन और दिखावे के मोहभाव से होता है- यह साधना पागलपन नहीं है। कोई नहीं जानता कि कुछ लोग तथाकथित चीगोंग गुरु कैसे बन गये, क्योंकि वे भी साधना पागलपन में विश्वास करते हैं। वास्तव में चीगोंग अभ्यास व्यक्ति को पागलपन की राह पर नहीं ले जा सकता। अधिकतर लोग यह शब्दावली साहित्य, युध्दकला के उपन्यासों आदि से सीखते हैं। यदि आप इसमें विश्वास नहीं करते, आप प्राचीन पुस्तकें या साधना की पुस्तकें देख सकते हैं, जहाँ ऐसी कोई वस्तु नहीं है। साधना पागलपन जैसी परिस्थिति कैसे हो सकती है? इस प्रकार की परिस्थिति का होना असंभव है।

अक्सर यह माना जाता है कि साधना पागलपन के कई प्रकार हैं। जिसका मैंने अभी उल्लेख किया वह भी उनमें से एक प्रकार है। क्योंकि व्यक्ति का मन उचित नहीं होता, वह प्रेत या पशु द्वारा ग्रसित हो जाता है और अनेक मानसिकताएँ, जैसे दिखावे के लिए किसी चीगोंग अवस्था की इच्छा, दर्शाता है। कुछ लोग दिव्य सिध्दियों के पीछे पड़े होते हैं या पाखण्डी चीगोंग अभ्यास करते हैं। जब वे चीगोंग का अभ्यास करते हैं, वे अपनी मुख्य चेतना को छोड़ देने के आदी हो जाते हैं। वे अपने आसपास की सभी वस्तुओं की चेतना भूल जाते हैं और अपने शरीर औरों को दे देते हैं। वे मानसिक रूप से भटक जाते हैं और अपने शरीरों को सह चेतना या बाहरी संदेशों द्वारा निर्देशित होने देते हैं। वे कुछ विचित्र हाव-भाव भी दिखाते हैं। यदि उसे कहा जाये तो इस प्रकार का व्यक्ति इमारत से बाहर कूद जायेगा या पानी में छलांग लगा देगा। वह स्वयं जीना भी नहीं चाहता और अपना शरीर औरों को दे देता है। यह साधना पागलपन नहीं है, बल्कि यह चीगोंग अभ्यास में भटक जाना है, और यह व्यक्ति द्वारा आरंभ में इस प्रकार जान-बूझ कर करने से होता है। कई लोग सोचते हैं कि अपने शरीर को इधर-उधर अचेतन होकर झुमाना चीगोंग अभ्यास है। वास्तव में, यदि कोई इस अवस्था में चीगोंग अभ्यास करता है, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। यह चीगोंग अभ्यास नहीं है, बल्कि यह साधारण लोगों के मोहभावों और इच्छा-प्रयासों के परिणामस्वरूप होता है।

दूसरी अवस्था है कि चीगोंग अभ्यास में, जब ची शरीर में अवरूध्द हो जाती है या ची सिर के ऊपर से नीचे नहीं उतर पाती तो व्यक्ति घबरा जाता है। मानव शरीर एक लघु ब्रह्माण्ड है। विशेष रूप से ताओ अभ्यास में, जब ची किसी मार्ग से गुजर रही होती है, तो व्यक्ति को इस प्रकार की समस्याएँ आ सकती है। यदि ची मार्ग में से नहीं निकल पाती, यह वहीं अटक जाती है। यह न केवल सिर में हो सकता है, बल्कि शरीर के दूसरे भागों में भी हो सकता है; हालांकि, व्यक्ति का सबसे संवेदनशील स्थान सिर है। ची सिर के ऊपर तक चढ़ती है और तब नीचे आ जाती है। यदि यह किसी मार्ग से नहीं निकल पाती, व्यक्ति इस प्रकार की संवेदना महसूस करेगा जैसे सिर भारी और सूजा हुआ हो गया हो जैसे ची की कोई भारी टोपी ओढ़ ली हो। किन्तु ची कुछ भी नियंत्रित नहीं कर सकती, और न ही यह कोई समस्या उत्पन्न कर सकती है या किसी प्रकार की बीमारी ला सकती है। कुछ लोग चीगोंग के बारे में सत्य नहीं जानते और रहस्यपूर्ण चर्चा करते हैं, और इससे परिस्थिति उलझ गई है। इस प्रकार, लोग सोचते हैं यदि ची सिर के ऊपर चढ़ जाये और नीचे न उतरे, तो व्यक्ति को साधना पागलपन हो सकता है, वह भटक सकता है, इत्यादि। परिणामस्वरूप, कई लोग स्वयं घबराते हैं।

यदि ची सिर के ऊपर तक चढ़ जाये और नीचे न आ सके, तो यह केवल एक अस्थायी अवस्था है। कुछ लोगों के लिए, यह आधे साल या बहुत लम्बे समय तक रह सकती है, और तब भी यह नीचे नहीं आती। यदि यह परिस्थिति है, तो व्यक्ति एक सच्चा चीगोंग गुरु ढूंढ़ सकता है जो ची को निर्देशित करके नीचे ले आये, और तब यह नीचे आ सकती है। चीगोंग अभ्यास में, आपमें से जिनकी ची किसी मार्ग में से नहीं गुजर पाती और या नीचे नहीं आ पाती उन्हें इसके कारण अपने नैतिकगुण के अंदर देखने चाहिए, जिससे यह पता लग सके कि आप उसी स्तर पर बहुत समय से अटके हैं और आपको अपना नैतिकगुण बढ़ाना चाहिए! जब आप वास्तव में अपना नैतिकगुण बढ़ा लेते हैं, आप पायेंगे कि ची नीचे आ रही है। नैतिकगुण के सुधार पर ध्यान दिये बिना आप भौतिक शरीर में केवल गोंग के रूपांतरण की इच्छा नहीं रख सकते। यह केवल आपके नैतिकगुण में सुधार के लिए प्रतीक्षा कर रहा है- केवल तभी आप पूर्ण रूप से बदलाव ला पायेंगे। यदि ची वास्तव मंि अवरूध्द हो जाती है, तब भी इससे कोई समस्या नहीं हो सकती। यहाँ अक्सर हमारे मानसिक पहलू कार्य कर रहे होते हैं। इसके अतिरिक्त, व्यक्ति घबरा जाता है जब वह किसी पाखण्डी चीगोंग गुरु से सीखता है कि जब ची सिर के ऊपर चढ़ जाती है, तो व्यक्ति भटक जाता है। इस भय के कारण, इस व्यक्ति को वास्तव में कुछ समस्या आ सकती है। यदि आप घबराते हैं, तो यह भय का मोहभाव है। क्या यह एक मोहभाव नहीं है? एक बार आपका मोहभाव उभरने पर, क्या इसे हटाना आवश्यक नहीं है? जितना आप इससे भयभीत होंगे, उतने ही आप बीमार लगेंगे। आपके इस मोहभाव को हटाना आवश्यक है। आपको इस शिक्षा से सिखाया जायेगा जिससे आपका भय हट सके, और आप आगे बढ़ सकें।

अभ्यासियों को अपने भविष्य की साधना में शारीरिक रूप से आरामदेह नहीं लगेगा, क्योंकि उनके शरीर कई प्रकार के गोंग विकसित करेंगे, जो सब उनके शरीरों के अंदर गतिशील बहुत शक्तिशाली वस्तुएँ हैं; उनसे आपको किसी न किसी प्रकार असुविधाजनक लगेगा। आपकी असुविधा का कारण मुख्यत: यह है कि आप सदैव किसी बीमारी के होने से घबराते हैं। वास्तव में, जो वस्तुएँ आपके शरीर में विकसित होती हैं वे बहुत शक्तिशाली हैं, और वे सब गोंग, दिव्य सिध्दियाँ, और अनेक चेतन सत्तायें हैं। यदि वे इधर-उधर गतिशील होती हैं, आपको शारीरिक रूप से दर्द, खुजलाहट, परेशानी, आदि होंगे। तंत्रिका तंत्र के सिरे विशेष रूप से बहुत संवेदनशील होते हैं, और यहाँ सभी प्रकार के लक्षण होंगे। जब तक आपका शरीर उच्च-शक्ति पदार्थ से पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं हो जाता, आपको इस प्रकार महसूस होगा। इसे हालांकि एक अच्छी ही वस्तु मानना चाहिए। एक अभ्यासी होते हुए, यदि आप स्वयं को हमेशा एक साधारण व्यक्ति की भांति मानते हैं और सोचते हैं कि आपको रोग हैं, तो आप साधना अभ्यास कैसे कर सकते हैं? जब साधना अभ्यास में कोई कठिनाई आती है, यदि आप तब भी स्वयं को एक साधारण व्यक्ति मानते हैं, मैं कहूँगा कि उस समय आपका नैतिकगुण एक साधारण व्यक्ति के स्तर पर गिर चुका है। कम से कम इस विषय पर, आप साधारण लोगों के स्तर पर गिर चुके हैं।

सच्चे अभ्यासियों की भांति, हमें विषयों को एक बहुत ऊँचे स्तर से देखना चाहिए न कि साधारण लोगों के दृष्टिकोण से। यदि आप मानते हैं कि आप रोगग्रस्त हैं, तो यह आपको वास्तव में रोगी बना सकता है। यह इसलिए क्योंकि एक बार आप मान लेते हैं कि आप रोगी हैं, आपका नैतिकगुण स्तर उतना ही ऊँचा होता है जितना साधारण लोगों का। चीगोंग अभ्यास और वास्तविक साधना अभ्यास रोग अवस्था की ओर नहीं ले जायेंगे, विशेषरूप से इस परिस्थिति में। यह ज्ञातव्य है कि व्यक्ति के रोगी होने के सत्तार प्रतिशत कारण मानसिक होते हैं और तीस प्रतिशत शारीरिक। खासतौर से, जब व्यक्ति को कोई मानसिक आघात पहुँचता है, उसका मन इसे नहीं संभाल पाता, और वह भारी मानसिक दबाव महसूस करता है जिससे रोग अवस्था बुरी तरह बिगड़ जाती है। उदाहरण के लिए, एक बार एक व्यक्ति था जिसे बिस्तर से बांध दिया गया। उन्होंने उसके एक हाथ को पकड़ा और कहा कि वे इसे थोड़ा चीर देंगे जिससे रक्त निकलने लगे। तब उन्होंने उसकी ऑंखों पर पट्टी बांध दी और उसकी कलाई को एक बार खुरच दिया। (उसे बिल्कुल भी नहीं काटा था और रक्त नहीं निकला।) एक पानी का नल चला दिया गया जिससे वह पानी गिरते हुए सुन सके, और उसने इस प्रकार सोचा कि यह उसका रक्त है जो गिर रहा है। वह व्यक्ति उसके कुछ देर बाद ही मर गया। वास्तव में उसे काटा नहीं गया था और न ही रक्त बहा था- यह नल का पानी था जो गिर रहा था। उसके मानसिक कारकों के कारण उसकी मृत्यु हुई। यदि आप हमेशा मानते हैं कि आप रोगग्रस्त हैं, आप शायद इस कारण अपने को रोगी बना लेंगे। क्योंकि आपका नैतिकगुण साधारण लोगों के स्तर पर गिर गया है, एक साधारण व्यक्ति को, निश्चित ही, रोग होंगे।

एक अभ्यासी होते हुए, यदि आप हमेशा सोचते हैं कि यह एक रोग है, तो आप वास्तव में इसे निमंत्रण दे रहे हैं। यदि आप किसी रोग को मांगते हैं, तो यह आपके शरीर के अंदर आ जायेगा। एक अभ्यासी होते हुए, आपका नैतिकगुण स्तर ऊँचा होना चाहिए। आपको हमेशा यह चिन्ता नहीं करनी चाहिए कि यह एक रोग है, क्योंकि यह रोग का भय एक मोहभाव है और यह इस प्रकार आपके लिए समस्या ला सकता है। साधना अभ्यास में व्यक्ति को कर्म हटाने की आवश्यकता होती है, और यह दु:खदायी होता है। व्यक्ति गोंग को आरामदेह तरीके से कैसे बढ़ा सकता है? अन्यथा उसके मोहभाव कैसे दूर होंगे? मैं आपको बुध्दमत से एक कहानी बताना चाहूँगा। एक व्यक्ति था जो साधना में बहुत प्रयत्न के बाद एक अरहत बन गया। जैसे ही वह साधना में उचित फल प्राप्त करने वाला था और अरहत बनने वाला था, वह कैसे प्रसन्न न होता? वह तीन लोकों के पार जाने वाला था! किन्तु यह उत्साह एक मोहभाव है, हर्ष का मोहभाव। एक अरहत को मोहभावों से मुक्त होना चाहिए, और हृदय प्रभावित नहीं होना चाहिए। किन्तु वह असफल रहा, और उसकी साधना व्यर्थ समाप्त हुई। क्योंकि वह असफल हुआ था, उसे आरम्भ से फिर शुरूआत करनी पड़ी। उसने अपनी साधना आरम्भ की, और बहुत दु:खदायी प्रयत्नों के बाद वह फिर अपनी साधना में सफल हुआ। इस बार वह भयभीत हो गया और उसने अपने मन में समझाया : "मुझे उत्साहित नहीं होना चाहिए। अन्यथा, मैं दोबारा असफल हो जाऊँगा।" इस भय से, वह दोबारा असफल हो गया। भय भी एक प्रकार का मोहभाव है।

एक ओर परिस्थिति होती है : जब कोई व्यक्ति मानसिक रूप से पागल हो जाता है, इस व्यक्ति को साधना पागलपन का लेबल लगा दिया जाता है। कुछ ऐसे भी लोग हैं जो मेरी प्रतीक्षा करते हैं कि मैं उनके पागलपन का उपचार करूँ! मैं कहूँगा कि पागलपन कोई रोग नहीं है, और न ही मेरे पास ऐसी वस्तुओं की देख-रेख के लिए समय है। क्यों? यह इसलिए क्योंकि एक पागलपन के रोगी में कोई वायरस नहीं होते, और न ही उसके शरीर में कोई शारीरिक बदलाव आते हैं और न ही संक्रमण होते हैं; मेरी दृष्टि में यह रोग नहीं है। पागलपन तब होता है जब व्यक्ति की मुख्य चेतना बहुत कमजोर हो जाती है। यह कितनी कमजोर हो सकती है? यह उस व्यक्ति की भांति है जो स्वयं को कभी नहीं संभाल पाता। एक पागल रोगी की मुख्य आत्मा इसी प्रकार होती है। यह शरीर को नहीं संभालना चाहती। यह हमेशा एक बेहोशी की हालत में रहती है और चेतन नहीं हो सकती। इस अवस्था में, व्यक्ति की सह चेतना या बाहरी संदेश उसके साथ विघ्न डालेंगे। प्रत्येक आयाम में बहुत से स्तर होते हैं। सभी प्रकार के संदेश उसे परेशान करेंगे। इसके अतिरिक्त, हो सकता है उसकी मुख्य आत्मा ने पिछले जन्मों में कुछ दुष्कर्म किए हों, और लेनदार उसे नुकसान पहुँचाएँ। कई प्रकार की वस्तुएँ घटित हो सकती हैं। हम कहेंगे कि पागलपन में यह सब होता है। मैं इसे आपके लिए कैसे ठीक करूँगा? मैं कहूँगा कि इस प्रकार वास्तव में पागलपन होता है। इसके लिए क्या किया जा सकता है? व्यक्ति को सिखायें और उसे चेतन बनने में मदद करें- किन्तु ऐसा करना बहुत कठिन है। आप पायेंगे कि जब पागलखाने का चिकित्सक बिजली का झटका देने के लिए तार अपने हाथ में उठाता है, रोगी तुरन्त ही बहुत भयभीत हो जाता है और कुछ बकवास नहीं बोलता। ऐसा क्यों है? उस पल, व्यक्ति की मुख्य आत्मा चेतन हो जाती है, और इसे बिजली के झटके से डर लगता है।

अक्सर, एक बार साधना अभ्यास के द्वार में प्रवेश करने पर, व्यक्ति इसे निरंतर करना चाहता है। हर किसी के पास बुध्द-प्रकृति और साधना के लिए हृदय होता है। इसलिए, ऐसा सीखने पर, बहुत से अभ्यासी अपने शेष जीवन भर साधना अभ्यास करते हैं। भले ही वे साधना अभ्यास में सफल हो पायें या फा प्राप्त कर पायें अथवा नहीं। हालांकि इस व्यक्ति का ताओ का पालन करने का हृदय है और वह सदैव इसका अभ्यास करना चाहता है। हर कोई जानता है कि यह व्यक्ति चीगोंग का अभ्यास करता है। उसके कार्यस्थल में लोग यह जानते हैं, और यह उसके सभी पड़ोसियों और आसपास रहने वालों को भी मालूम है। किन्तु इसके बारे में आप सब सोचें : जहाँ तक सच्चे साधना अभ्यास का प्रश्न है, कुछ वर्ष पहले ऐसा अभ्यास कौन सिखा रहा था? कोई नहीं। केवल यदि व्यक्ति सच्चा साधना अभ्यास करता है तभी उसके जीवन के पथ को बदला जा सकता है। किन्तु एक साधारण व्यक्ति की भांति, यह व्यक्ति केवल रोग निवारण और स्वास्थ्य के लिए चीगोंग का अभ्यास कर रहा है। उसके जीवन का पथ कौन बदलेगा? एक साधारण व्यक्ति की भांति, उसे किसी दिन कोई रोग हो जायेगा या दूसरे दिन कोई और समस्या हो जायेगी। हो सकता है किसी दिन वह मनोरोगी हो जाये या मृत्यु को प्राप्त हो जाये। एक साधारण व्यक्ति का पूरा जीवन इसी प्रकार होता है। हालांकि आप एक व्यक्ति को उद्यान में चीगोंग का अभ्यास करते हुए पाते हैं, वास्तव में, वह सच्चे रूप से साधना अभ्यास नहीं कर रहा है। हालांकि उसकी इच्छा है कि वह एक ऊँचे स्तर की ओर साधना अभ्यास करे, वह उचित मार्ग को प्राप्त किये बिना इसे नहीं कर सकता। उसे केवल एक इच्छा है कि वह ऊँचे स्तर की ओर साधना अभ्यास करे। यह व्यक्ति अभी भी रोग निवारण और स्वास्थ्य के निम्न स्तर पर एक चीगोंग अभ्यासी है। कोई भी उसके जीवन का पथ नहीं बदलेगा, इसलिए उसे रोग होंगे। यदि व्यक्ति नैतिकता को मान नहीं देता, तो उसके रोग भी ठीक नहीं होंगे। यह सत्य नहीं है कि एक बार कोई व्यक्ति चीगोंग का अभ्यास करता है, उसे कोई रोग नहीं होगा।

व्यक्ति को सच्चे रूप से साधना का अभ्यास करना चाहिए और अपने नैतिकगुण पर ध्यान देना चाहिए। केवल सच्चे रूप से साधना अभ्यास करने से ही व्यक्ति के रोग दूर किए जा सकते हैं। क्योंकि चीगोंग अभ्यास कोई शारीरिक व्यायाम नहीं है बल्कि साधारण लोगों से आगे की वस्तु है, अभ्यासियों के लिए ऊँचा नियम और आदर्श आवश्यक हैं। व्यक्ति को उसका पालन करना चाहिए जिससे वह लक्ष्य को प्राप्त कर सके। किन्तु कई लोग ऐसा नहीं कर पाते और साधारण लोग बने रहते हैं। इसलिए समय आने पर वे भी रोगग्रस्त होंगे। इस व्यक्ति को एक दिन अचानक मस्तिष्क की नसें अवरूध्द होने का रोग हो सकता है, या अचानक कोई और रोग या मनोरोग हो सकता है। हर कोई जानता है कि वह चीगोंग का अभ्यास करता है। एक बार मनोरोगी हो जाने पर, लोग कहेंगे, "उसे साधना पागलपन हुआ है," और यह लेबल लग जायेगा। आप सब यह सोचें : क्या ऐसा करना तर्क संगत है? एक अनजान व्यक्ति सत्य नहीं जानता। पेशेवर लोगों और कई अभ्यासियों के लिए भी इसका सत्य जान पाना कठिन है। यदि यह व्यक्ति घर में मनोरोगी होता है, हो सकता है इसमें कम समस्या हो, हालांकि दूसरे लोग अब भी कहेंगे कि उसे यह चीगोंग अभ्यास से हुआ है। यदि व्यक्ति किसी व्यायाम स्थल पर मनोरोगी हो जाता है, तो यह भयंकर होगा। एक बड़ा लेबल लगा दिया जायेगा जो प्रयत्न के बाद भी हटाना असंभव होगा। समाचार पत्र यही छापेंगे कि चीगोंग अभ्यास से साधना पागलपन हुआ है। कुछ लोग तथ्य जाने बिना ही इसका विरोध करेंगे : "देखिए, कुछ समय पहले चीगोंग अभ्यास करते समय वह ठीक था, और अब वह ऐसा हो गया है।" एक साधारण व्यक्ति की तरह, जो कुछ उसके साथ होना चाहिए वह होगा। उसे कोई और रोग हो सकते थे या कोई और समस्याएँ आ सकती थीं। क्या सभी वस्तुओं के लिए चीगोंग अभ्यास पर आरोप लगाना तर्क संगत है? यह अस्पताल में एक चिकित्सक की तरह है : यदि कोई एक चिकित्सक है, उसे जीवन भर रोगी होना ही नहीं चाहिए- इसे इस प्रकार कैसे समझा जा सकता है?

इसलिए, यह कहा जा सकता है कि चीगोंग के वास्तविक तथ्य और इसके पीछे के नियमों को जाने बिना कई लोग बेमानी बातें करते हैं। एक बार कोई समस्या होने पर, चीगोंग पर सभी प्रकार के आरोप लगा दिये जायेंगे। चीगोंग समाज में बहुत कम समय से ही प्रचलित हुआ है। कई लोग हठी धारणायें रखते हैं और हमेशा इसका विरोध करते हैं, आरोप लगाते हैं, और अस्वीकृत करते हैं। कोई नहीं जानता कि इन लोगों की मनोदशा कैसी है। वे चीगोंग से इतने चिढ़े रहते हैं, जैसे इसका सारा संबंध उन्हीं से है। जैसे ही चीगोंग शब्द सामने आता है, वे इसे अकल्पनीय कहेंगे। चीगोंग एक विज्ञान है, और यह एक उच्च विज्ञान है। यह इसलिए होता है क्योंकि इन लोगों की धारणायें बहुत हठी होती हैं और उनका ज्ञान बहुत सीमित है।

एक और परिस्थिति होती है जिसे साधक समाज में "चीगोंग अवस्था" कहते हैं। इस प्रकार के व्यक्ति को मानसिक भ्रम होते हैं, किन्तु साधना पागलपन नहीं। इस अवस्था में व्यक्ति असाधारण रूप से तर्क संगत होता है। मैं आपको पहले समझाना चाहूँगा कि चीगोंग अवस्था से क्या तात्पर्य है। जैसे ज्ञातव्य है कि चीगोंग अभ्यास का संबंध व्यक्ति के जन्मजात गुण से होता है। संसार के सभी देशों में ऐसे लोग हैं जो धर्म में विश्वास करते हैं। कई हजार वर्षों से चीन में लोग बुध्दमत और ताओ मत में विश्वास करते रहे हैं। वे मानते हैं कि अच्छे कार्य करने से अच्छा फल मिलता है, और बुरा बनने से बुराई वापस मिलती है। किन्तु कुछ लोग इसे नहीं मानते। विशेष रूप से महान सांस्कृतिक आंदोलन के दौरान, इसकी आलोचना की गई और अंधविश्वास करार दे दिया गया। कुछ लोग उन सब को अंधविश्वास मान लेते हैं जिसे वे नहीं समझ पाते, जो पाठयपुस्तकों में नहीं पढ़ाया जाता, जिसका आधुनिक विज्ञान ने अभी विकास नहीं किया है, और जिसे अभी नहीं समझा जा सका है। कुछ वर्ष पहले ऐसे बहुत से लोग थे, किन्तु अब ऐसे लोग कम हुए हैं। हालांकि आप कुछ घटनाओं को स्वीकार न करें, वे हमारे आयाम में पहले ही वास्तव में प्रकट हो चुकी हैं। आप उन्हें स्वीकारने का साहस नहीं करते, किन्तु अब लोगों में उनके बारे में बात करने का साहस है। वे चीगोंग अभ्यास के बारे में भी सुन कर या देख कर कुछ तथ्य जान गये हैं।

कुछ लोग इतने हठी होते हैं कि जैसे ही आप चीगोंग का उल्लेख करते हैं, वे आप पर अपने अंदर की गहराई से हँसते हैं। वे सोचते हैं कि आप अंधविश्वासी हैं और बहुत उपहासपूर्ण हैं। जैसे ही आप चीगोंग अभ्यास कि घटनाओं के बारे में बताते हैं, वे आपको बहुत नासमझ मानते हैं। यद्यपि ऐसा व्यक्ति भ्रांति धारण किये होता है, हो सकता है उसका जन्मजात गुण बुरा न हो। यदि उसका जन्मजात गुण अच्छा है और वह चीगोंग अभ्यास करना चाहता है, हो सकता है उसका दिव्य नेत्र एक बहुत ऊँचे स्तर पर खुल जाये, और उसे दिव्य सिध्दियाँ भी प्राप्त हो जायें। वह चीगोंग में विश्वास नहीं करता, किन्तु वह यह सुनिश्चित नहीं कर सकता कि उसे रोग नहीं होगा। जब वह रोगग्रस्त होता है, वह अस्पताल जायेगा। जब पश्चिमी दवाओं का चिकित्सक उसे ठीक नहीं कर पाता, वह चीनी दवाओं के चिकित्सक से मिलता है। जब चीनी दवाओं का चिकित्सक भी उसका रोग ठीक नहीं कर पाता और जब कोई विशेष नुस्खा काम नहीं करता, वह तब चीगोंग के बारे में सोचता है और विचार करता है : "मैं यह देखने के लिए अपना भाग्य आजमाता हूँ कि चीगोंग से वास्तव में मेरा रोग ठीक हो सकता है या नहीं।" वह बहुत हिचकिचाहट के साथ आयेगा। अपने अच्छे जन्मजात गुण के कारण, जैसे ही वह चीगोंग का अभ्यास करता है, वह इसमें बहुत निपुण होगा। शायद किसी गुरु को उसमें रुचि होगी या हो सकता है दूसरे आयाम में कोई उच्च सत्ता उसकी मदद करे। अचानक ही, उसका दिव्य नेत्र खुल जाता है, या वह अर्ध-ज्ञानप्राप्ति की अवस्था में पहुँच जाता है। उसके दिव्य नेत्र के बहुत ऊँचे स्तर पर खुलने से, वह अचानक ही ब्रह्माण्ड का कुछ सत्य देख पाता है। इसके अतिरिक्त, उसके पास दिव्य सिध्दियाँ होंगी। जब ऐसा व्यक्ति इस प्रकार की स्थिति को देखता है, आप क्या कहते हैं उसका मस्तिष्क इसे स्वीकार कर पायेगा? आप क्या समझते हैं वह किस प्रकार की मनोदशा में होगा? जब और लोग बात करते समय जिसे कभी अंधविश्वास, बिल्कुल असंभव और उपहासपूर्ण मानते थे, वह वास्तव में ठीक उसकी ऑंखों के सामने प्रकट है, और वह वास्तव में उसके साथ संपर्क में है। इस व्यक्ति का मन तब इसे ग्रहण नहीं कर पायेगा, क्योंकि मानसिक दबाव बहुत अधिक होगा। वह जो कहेगा उसे और लोग नहीं समझ पायेंगे, हालांकि उसका मन तर्क संगत है। किन्तु वह दोनों ओर के संबंध में सामंजस्य नहीं रख पाता। उसे पता लगता है कि जो मानव समुदाय करता है वह गलत है, जबकि जो दूसरी ओर किया जाता है अक्सर उचित होता है। यदि वह वस्तुएँ उसी प्रकार करता है जैसे वे उस ओर की जाती हैं, लोग कहेंगे कि वह गलत है। वे उसे समझ नहीं पाते, इसलिए वे कहेंगे कि उसे साधना पागलपन है।

वास्तव में, इस व्यक्ति को साधना पागलपन नहीं है। आप में से अधिकतर लोग जो चीगोंग का अभ्यास करते हैं इस प्रकार बिल्कुल नहीं होंगे। वे लोग जिन्हें बहुत अधिक भ्रांतियाँ हैं केवल उन्हीं को चीगोंग अवस्था अनुभव होगी। यहाँ बैठे बहुत से लोगों के दिव्य नेत्र खुले हैं- जो बहुत अधिक संख्या में हैं। उन्होंने वास्तव में दूसरे आयाम की वस्तुओं को देखा है। उन्हें कोई आश्चर्य नहीं होता, उन्हें अच्छा लगता है, उनके मस्तिष्क को झटका नहीं लगता, और न ही वे इस चीगोंग अवस्था में होते हैं। व्यक्ति के चीगोंग अवस्था में पहुँचने पर, वह बहुत तर्क संगत होता है और बहुत तर्क के साथ विवेकपूर्ण तरीके से बोलता है। केवल यह है कि जो वह कहता है, साधारण लोग उसमें विश्वास नहीं करते। कभी वह आपको बताता है कि उसने किसी को देखा जिसकी मृत्यु हो चुकी है, और इस व्यक्ति ने उसे कुछ करने के लिए कहा। एक साधारण व्यक्ति इस पर कैसे विश्वास कर सकता है? बाद में, यह व्यक्ति समझ जाता है कि उसे उन वस्तुओं को अपने तक रखना चाहिए न कि उनके बारे में बात करनी चाहिए। जब वह दोनों ओर के बीच संबंध को उचित प्रकार संभालना सीख जाता है, तब सब ठीक हो जाता है। अक्सर, इन लोगों के पास दिव्य सिध्दियां भी होती हैं, किन्तु यह भी साधना पागलपन नहीं है।

एक और परिस्थिति होती है जिसे "सच्चा पागलपन" कहते हैं, और इसे दुर्लभ ही देखा जाता है। "सच्चा पागलपन" जिससे हमारा संदर्भ है उसका संबंध उन लोगों से नहीं है जो वास्तव में पागल हैं। बल्कि इसका तात्पर्य "सत्य की साधना" से है। सच्चा पागलपन क्या है? मैं कहूँगा कि अभ्यासियों के बीच ऐसा व्यक्ति दुर्लभ ही दिखाई देता है, शायद एक लाख लोगों में से एक। परिणामस्वरूप, यह साधारणत: नहीं होता और इसका समाज पर कोई प्रभाव भी नहीं है।

अक्सर, "सच्चे पागलपन" के लिए एक पूर्व आवश्यकता है। वह यह कि इस व्यक्ति का जन्मजात गुण श्रेष्ठ होना चाहिए और उसे वयोवृध्द होना चाहिए। अधिक उम्र होने के कारण, इस व्यक्ति के लिए साधना अभ्यास के लिए बहुत देर हो चुकी है। श्रेष्ठ जन्मजात गुण वाले लोग अक्सर यहां ऊँचे स्तर से किसी उद्देश्य से आते हैं; इस साधारण मानव समाज में आने से हर कोई घबराता है, क्योंकि एक बार स्मृति मिटा दिये जाने पर व्यक्ति किसी को पहचान नहीं सकेगा। व्यक्ति के इस साधारण लोगों के सामाजिक वातावरण में आने के बाद, मानवीय विघ्न उसे प्रसिध्दि और धन के पीछे जाने के लिए विवश करेंगे और अन्तत: वह साधारण लोगों के स्तर पर गिर जायेगा। ऐसा कोई दिन नहीं होगा जब वह यहां से बच कर निकल सके। इसलिए, कोई भी यहां आने का साहस नहीं करता, क्योंकि हर किसी को डर होता है। किन्तु ऐसे लोग हैं जो यहां आये हैं। यहां आने पर, वे वास्तव में साधारण लोगों के बीच स्वयं को ठीक से नहीं संभाल पाते। वे वास्तव में निम्न स्तर की ओर गिर जाते हैं और अपने जीवन में बहुत से बुरे कार्य कर बैठते हैं। जब व्यक्ति निजी लाभ की प्रतिस्पर्धा के लिए जीता है, वह बहुत से बुरे कार्य करता है और औरों का बहुतायात से ऋणी हो जाता है। उसका गुरु देखता है कि वह अब गिरने वाला है। किन्तु वह फल पदवी प्राप्त व्यक्ति है, इसलिए उसका गुरु उसे इतनी सरलता से नहीं गिरने देगा! क्या किया जा सकता है? उसका गुरु बहुत चिंतित होता है और उसके पास उसे साधना अभ्यास सिखाने का कोई और उपाय नहीं होता। वह इस समय एक गुरु कहां से खोजेगा? उसे मूल स्थान की ओर शून्य से साधना अभ्यास करके पहुंचना है। किन्तु यह सरलता से कैसे किया जा सकता है? वृध्द होने के कारण, उसे साधना अभ्यास करने के लिए बहुत देर हो चुकी है। उसे मन और शरीर की साधना पध्दति कहां से मिलेगी?

केवल तभी जब उसका जन्मजात गुण श्रेष्ठ होता है, और इस असाधारण परिस्थिति में, उस पर सच्चे पागलपन की पध्दति अपनाई जा सकती है। दूसरे शब्दों में, जब इस व्यक्ति के लिए उसके मूल स्थान की ओर स्वयं लौटने के लिए कोई आशा नहीं बचती, तब इस तरीके का उपयोग उसे पागल बनाने के लिए किया जा सकता है। उसके मस्तिष्क की कुछ प्रक्रियाओं को बंद कर दिया जायेगा। उदाहरण के लिए, मनुष्य होते हुए हमें शीत और गंदगी से डर लगता है, और इसलिए मस्तिष्क के वे भाग जो शीत और गंदगी से डरते हैं उन्हें बंद कर दिया जाता है। कुछ प्रक्रियाओं को बंधित कर दिये जाने पर, ऐसा लगेगा जैसे उसे कुछ मानसिक समस्यायें हों और वह ऐसा बर्ताव करेगा जैसे वास्तविक पागल। किन्तु वह अक्सर कोई गलत कार्य नहीं करता, और न ही वह लोगों का अपमान करता है या मारता है। इसके विपरीत, वह अक्सर अच्छे कार्य करता है, किन्तु वह अपने लिए बहुत क्रूर होता है। क्योंकि उसे ठंड का अहसास नहीं होता, शीतकाल में वह बर्फ में नंगे पैर इधर-उधर दौड़ता है और हल्के कपड़े पहनता है। उसके पैर रक्त निकलने की अवस्था तक जम जाते हैं। क्योंकि उसे गंदगी का अहसास नहीं होता, वह मानव मल और मानव मूत्र भी खाने का साहस कर लेता है। मैं एक बार ऐसे एक व्यक्ति को जानता था जो घोड़े के मल को खाता था जैसे यह स्वादिष्ट हो, जबकि यह बहुत जमा होता था। वह उन कठिनाइयों को भोग पाता था जो साधारण लोग चेतन मन से नहीं भोग सकते। यह सोचें कि इस पागलपन के कारण उसे कितनी पीड़ा भोगनी पड़ी। नि:संदेह, ऐसे लोगों के पास अक्सर दिव्य सिध्दियां होती हैं; उनमें से अधिकांश वृध्द महिलायें होती हैं। विगत में एक वृध्द महिला थी जिसके पैरों को छोटा करने के लिए बांधा गया था, किन्तु वह तब भी बिना प्रयत्न दो मीटर या उससे अधिक ऊँची दीवार को लांघ जाती थी। जब उसके परिवार ने देखा कि वह पागल है और हमेशा घर से बाहर भागती रहती है, वे उसे घर में बंद कर देते थे। परिवार के सदस्यों के घर से बाहर जाने पर, वह दरवाजे को केवल ताले की ओर अपनी अंगुली दिखा कर खोल लेती थी। तब वह भाग जाती थी। बाद में, वे उसे लोहे की जंजीरों से बांध कर रखते थे। जब हर कोई घर से चला जाता था, वह जंजीरों को सरलता से झटक कर हटा देती थी। उसे काबू में रखना असंभव था। इससे, वह बहुत अधिक कठिनाइयां सहती थी। क्योंकि उसने इतनी पीड़ा भोगी, उसने जल्द ही अपने बुरे कार्यों के ऋण को चुकता कर दिया। इसमें अधिकतम तीन वर्ष लगते हैं, और अक्सर एक या दो वर्ष, क्योंकि वह पीड़ा बहुत अधिक होती है। इसके पश्चात, वह सब समझ गई कि क्या हुआ था। क्योंकि उसने अपनी साधना पूर्ण कर ली थी, तभी उसका गोंग खोल दिया गया और विभिन्न प्रकार की दिव्य शक्तियाँ प्रकट हुईं। इन घटनाओं को बहुत दुर्लभ ही देखा जाता है, किन्तु पूरे इतिहासकाल में ऐसी कुछ हुई हैं। साधारण जन्मजात गुण के लोगों के लिए इस प्रकार करने की अनुमति नहीं होगी। यह ज्ञातव्य है कि इतिहास में वास्तव में पागल भिक्षुओं और पागल ताओ का वर्णन रहा है, जैसे वह पागल भिक्षु जिसने चिन ह्वे1 को झाड़ू से मंदिर से निकाल दिया था, और पागल ताओ के बारे में दूसरी कहानियाँ। ऐसी कई पारंपरिक कहानियाँ हैं।

जहाँ तक साधना पागलपन का प्रश्न है, हम कह सकते हैं कि इसका वास्तव में कोई अस्तित्व नहीं है। यदि कोई आग उत्पन्न कर सकता है, यदि यह वास्तव में ऐसा है, तो मैं कहूँगा कि यह व्यक्ति बहुत शक्तिवान है। यदि कोई व्यक्ति मुंह खोल कर या हाथ बढ़ा कर आग जला सके, या अंगुली से सिगरेट सुलगा सके, तो मैं इसे दिव्य सिध्दि कहूँगा!

साधना में आसुरिक विघ्न

साधना में आसुरिक विघ्न क्या होता है? यह वह विघ्न है जो चीगोंग अभ्यास में अक्सर हमारे सामने आता है। चीगोंग अभ्यास आसुरिक विघ्न को कैसे आमंत्रित कर लेता है? जब व्यक्ति साधना अभ्यास करना चाहता है तो वास्तव में बहुत कठिनाइयाँ होती हैं। व्यक्ति सच्ची साधना में मेरे फा-शरीर की सुरक्षा के बिना सफल हो ही नहीं सकता। जैसे ही आप द्वार से बाहर कदम रखते हैं, आपका जीवन खतरे में होता है। व्यक्ति की मूल आत्मा समाप्त नहीं होती। तब, आपके पिछले जन्मों के सामाजिक कार्यकलापों में, हो सकता है आप कभी औरों के ऋणी रहे हों, उन्हें धमकाया हो, या दूसरे दुष्कर्म किये हों। वे लेनदार आपको खोजेंगे। बुध्दमत में यह कहा जाता है कि व्यक्ति कर्मफल भुगतान के लिए जीता है। यदि आप पर किसी का किसी वस्तु के लिए ऋण है, वह आपको इसे चुकाने के लिए खोजेगा। यदि वह अधिक भुगतान ले लेता है, उसे अगली बार बाकी भाग आपको वापस करना होगा। यदि कोई पुत्र अपने माता-पिता का अनादर करता है, तो वे अगले जन्म में स्थान बदल लेंगे। इसी प्रकार यह क्रम चलता रहता है। किन्तु हमने वास्तव में आसुरिक विघ्न को देखा है, जो आपको चीगोंग का अभ्यास करने से रोकता है। इन सभी का कर्म संबंध होता है और अकारण नहीं होते। इनके अकारण होने की अनुमति नहीं है।

आसुरिक विघ्न का सबसे साधारण प्रकार इस तरह होता है। आपके चीगोंग अभ्यास करने से पहले, आपका वातावरण अपेक्षाकृत शांत होता है; क्योंकि आपने चीगोंग सीखा है, आप सदैव इसका अभ्यास करना चाहते हैं। जैसे ही आप ध्यान-मुद्रा में बैठते हैं, अचानक कमरे के बाहर से शोर आने लगता है। कार के हॉर्न, गलियारे में चहलकदमी, बातचीत, दरवाजे का टकराना, और रेडियो की आवाजें बाहर से आने लगती हैं। अचानक ही वातावरण शांत नहीं रह जाता। यदि आप चीगोंग का अभ्यास नहीं करते, वातावरण बहुत शांत होता है, किन्तु जैसे ही आप चीगोंग अभ्यास आरंभ करते हैं, यह इस प्रकार हो जाता है। आप में से अनेक ने इसके बारे में और नहीं सोचा होगा। वास्तव में क्या हो रहा है? आपको यह केवल विचित्र जान पड़ता है और चीगोंग अभ्यास न कर पाने के कारण बहुत निराशा महसूस होती है। यह "विचित्रता" आपके अभ्यास को रोक लेती है। यह असुर है जो आपके साथ विघ्न डाल रहा है, क्योंकि यह आपको अशांत करने के लिए लोगों को नियंत्रित करता है। यह विघ्न का सरलतम प्रकार है, और यह आपको साधना अभ्यास करने से रोकने का लक्ष्य प्राप्त कर सकता है। यदि आप साधना अभ्यास करते हैं और ताओ प्राप्त कर लेते हैं, उन बिना चुकता किये हुए ऋणों का क्या होगा जिनके आप देनदार हैं? वे इसकी अनुमति नहीं देंगे, इसलिए वे आपको चीगोंग का अभ्यास नहीं करने देंगे। किन्तु यह एक विशिष्ट स्तर को भी दर्शाता है। कुछ समय के पश्चात, यह स्थिति नहीं होने दी जायेगी। दूसरे शब्दों में, इन ऋणों के चुक जाने पर, उन्हें दोबारा आने और विघ्न डालने की अनुमति नहीं होगी। यह इसलिए क्योंकि जो हमारे फालुन दाफा में साधना अभ्यास करते हैं वे शीघ्र विकास करते हैं, और वे अपने स्तरों में भी शीघ्र भेदन करते हैं।

एक और प्रकार का आसुरिक विघ्न होता है। आप जानते हैं कि चीगोंग अभ्यास द्वारा हमारा दिव्य नेत्र खुल सकता है। दिव्य नेत्र खुल जाने पर, कुछ लोगों को घर में चीगोंग का अभ्यास करते समय हो सकता है कुछ भयावह दृश्य या डरावने चेहरे दिखाई दें। कुछ के उलझे हुए, लम्बे बाल होते हैं, और कुछ आपसे लड़ना चाहते हैं या ऐसी भाव-भंगिमायें बनाते हैं जो बहुत डरावनी होती हैं। कई बार व्यक्ति उन सब को खिड़की के बाहर रेंगता हुआ देखेगा, जो बहुत भयावह लगते हैं। यह परिस्थिति कैसे हो सकती है? यह आसुरिक विघ्न का एक प्रकार है। हमारी फालुन दाफा पध्दति में, हालांकि, यह परिस्थिति दुर्लभ ही दिखाई पड़ती है। शायद यह सौ लोगों में से एक के साथ होती है। अधिकांश लोगों के सामने यह परिस्थिति नहीं आयेगी। क्योंकि इसका आपके अभ्यास के लिए कोई लाभ नहीं है, इसे इस प्रकार आपके साथ विघ्न डालने की अनुमति नहीं है। दूसरी पारंपरिक पध्दतियों में, इस प्रकार का विघ्न सबसे साधारण परिस्थिति है, और यह बहुत लम्बे समय तक रहती है। कुछ लोग चीगोंग का अभ्यास नहीं कर सकते और केवल इसी कारण से भयभीत हो जाते हैं। व्यक्ति चीगोंग अभ्यास के लिए अक्सर रात में एक शांत वातावरण चुनता है। यदि वह अपनी आंखों के सामने ऐसा आदमी देखता है जो आधा प्रेत और आधा मनुष्य दिखाई देता है, तो वह चीगोंग का अभ्यास करने से बहुत डर जायेगा। अक्सर, हमारे फालुन दाफा में इस प्रकार की परिस्थिति नहीं होती। किन्तु कुछ बहुत दुर्लभ अपवाद होते हैं, क्योंकि कुछ लोगों की बहुत विशेष परिस्थितियां होती हैं।

दूसरे प्रकार की पध्दति दोनों आंतरिक और बाह्य साधना की होती है। इसमें युध्द कला और आंतरिक साधना के अभ्यास की आवश्यकता होती है। ताओ विचारधारा में इस प्रकार की पध्दति साधारणत: देखी जाती है। एक बार व्यक्ति इस पध्दति को सीखता है, वह अक्सर इस आसुरिक विघ्न का सामना करेगा जो साधारण पध्दतियों में नहीं आता, जो केवल दोनों आंतरिक और बाह्य साधना की पध्दतियों या युध्द कलाओं में आता है। इसमें, लोग उसे युध्द के लिए खोजेंगे। संसार में अनेक ताओ अभ्यासी हैं; जिनमें से कई युध्द कला या आंतरिक और बाह्य साधना के शिष्य हैं। एक युध्द कला का शिष्य भी गोंग विकसित कर सकता है। ऐसा क्यों है? यदि कोई व्यक्ति प्रसिध्दि और निजी लाभ जैसे और मोहभावों को छोड़ देता है, वह भी गोंग बढ़ा सकता है। किन्तु उसके प्रतिद्वन्द के लिए मोहभाव को छोड़ने में समय लगेगा, और यह बहुत धीरे-धीरे छूटेगा। इसलिए, वह सरलता से इस प्रकार करेगा, और यह कुछ विशेष स्तरों पर भी हो सकता है। ध्यान में बैठे हुए, वह जान जायेगा कि कौन युध्द कला का अभ्यास कर रहा है। उसकी मूल आत्मा उसके शरीर को छोड़ कर दूसरे व्यक्ति को युध्द के लिए ललकारेगी जिससे यह निर्धारित हो सके कि किसकी युध्द कला उत्ताम है, और तब यह युध्द आरंभ हो जायेगा। ये वस्तुएँ दूसरे आयाम में भी होती हैं जहाँ कोई दूसरा भी उसके पास युध्द के लिए आ सकता है। यदि वह मना करता है, तो दूसरा व्यक्ति वास्तव में उसका वध कर देगा। इस प्रकार दोनों के बीच युध्द छिड़ जायेगा। जब यह व्यक्ति सो जाता है, कोई उसे युध्द के लिए ललकारेगा, और इससे उसकी रात अशांत हो जाती है। वास्तव में, समय आ गया है कि वह अपना प्रतिद्वन्द का मोहभाव छोड़ दे। यदि यह प्रतिद्वन्द की मानसिकता नहीं छोड़ी गई, वह सदैव इस प्रकार रहेगा। जैसे समय गुजरेगा, वह कई वर्षों बाद भी इस स्तर से आगे नहीं जा सकेगा। वह चीगोंग का निरंतर अभ्यास करने में असमर्थ हो जायेगा। बहुत अधिक शक्ति खर्च होने के कारण, उसका भौतिक शरीर इसे नहीं सह पायेगा और सरलता से अपंग हो सकता है। इस प्रकार, आतंरिक और बाह्य दोनों की साधना पध्दतियों में, यह परिस्थिति आ सकती है, और यह भी बहुत सामान्य है। हमारी आतंरिक साधना की पध्दति में, इस प्रकार की कोई परिस्थिति नहीं होती, और न ही इसके होने की अनुमति है। ये अनेकों प्रकार जिनका मैंने अभी वर्णन किया अक्सर होते हैं।

एक और प्रकार का आसुरिक विघ्न होता है जिसे हर कोई, जिसमें हमारी पध्दति के भी सभी लोग सम्मिलित हैं, अनुभव करेगा : यह है वासना का असुर। यह बहुत गंभीर है। साधारण मानव समाज में, इस दाम्पत्य जीवन के कारण, मनुष्यजाति अपने वंशज पैदा कर सकती है। मानव समुदाय इसी प्रकार आगे बढ़ता है, और मानव समाज में भावुकताएँ होती हैं। इस प्रकार, ऐसी वस्तु साधारण लोगों के लिए पूर्णत: उपयुक्त है। क्योंकि मनुष्यों में भावुकता होती है, नाराज होना भावुकता है, और इसी प्रकार प्रसन्नता, प्यार, घृणा, किसी कार्य को पसंद करना, किसी कार्य को नापसंद करना, किसी व्यक्ति को दूसरे से अधिक पसंद करना, अभिरुचि, और नापसंदगी। सभी कुछ भावुकता से संबंधित हैं, और साधारण लोग केवल इसी के लिए जीते हैं। तब, एक अभ्यासी की भांति और जो इसके ऊपर और आगे निकल गया है, उसे वस्तुओं को इस प्रकार नहीं परखना चाहिए, और उसे इनसे छूट कर दूर हो जाना चाहिए। इसलिए, जहाँ तक अनेकों मोहभावों का प्रश्न है जो भावुकता से आते हैं, हमें उनको हल्केपन से लेना चाहिए और अंतत: उन्हें छोड़ देना चाहिए। इच्छाएँ, वासना, और इस प्रकार की वस्तुएँ सभी मानव मोहभाव हैं, और उन सभी को छोड़ देना चाहिए।

वे अभ्यासी जो साधारण लोगों के बीच साधना अभ्यास करते हैं, हमारी अभ्यास पध्दति आपको संन्यासी या संन्यासिन बनने के लिए नहीं कहती। युवा अभ्यासियों के अभी भी परिवार होने चाहिएँ। तब, इस विषय को कैसे लेना चाहिए? मैं कह चुका हूँ कि हमारी अभ्यास पध्दति सीधे व्यक्ति के मन पर प्रभाव डालती है। भौतिक लाभों की दृष्टि से, इसके कारण आपको वास्तव में कोई हानि नहीं उठानी पड़ती। बल्कि, साधारण लोगों के भौतिक लाभों के बीच आपको अपना नैतिकगुण सुदृढ़ करना होता है। जिसका वास्तव में विकास होता है वह है आपका नैतिकगुण। यदि आप मोहभाव छोड़ सकते हैं, तो आप सभी कुछ छोड़ने में समर्थ होंगे; जब आपको भौतिक लाभाें को छोड़ने के लिए कहा जाएगा, तब आप अवश्य ही यह कर सकेंगे। यदि आप मोहभाव नहीं छोड़ सकते, तो आप कुछ भी छोड़ पाने में असमर्थ होंगे। इसलिए, साधना का वास्तविक उद्देश्य आपके हृदय का संवर्धन करना है। मठों की साधना पध्दतियों में आपको इन वस्तुओं को छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया जाता है। जिससे आपके इस मोहभाव से छुटकारा पाया जा सके। आपके द्वारा इसके बारे में नहीं सोचे दिये जाने पर, वे आपको इसे पूर्णतया छोड़ने के लिए बाध्य कर देते हैं; और उन्होंने इस प्रकार की प्रणाली अपनायी है। किन्तु हम आपके लिए ऐसा करने की आवश्यकता नहीं रखते। हम आपको कहते हैं कि आप अपने सामने पड़े हुए भौतिक लाभों के बारे में कम परवाह करें। इस प्रकार, जो अपनी साधना हमारी पध्दति द्वारा करते हैं वे सर्वाधिक दृढ़ होते हैं। हम आपको संन्यासी या संन्यासिन बनने के लिए नहीं कहते। भविष्य में जैसे हमारी पध्दति का और अधिक विस्तार होगा, हमारे वे अभ्यासी जो साधारण लोगों के बीच साधना अभ्यास करते हैं उन सभी को आधा-संन्यासी नहीं बना दिया जाना चाहिए। प्रत्येक फालुन दाफा अभ्यासी के लिए इस प्रकार बनना आवश्यक नहीं है। अभ्यास के क्रम के दौरान, हमारी सभी से यह आवश्यकता है : भले ही आप अभ्यास करते हैं और आपके पति या पत्नी नहीं, अभ्यास के कारण आपको तलाक लेने की अनुमति नहीं है। दूसरे शब्दों में, हमें इस विषय को हल्केपन से लेना चाहिए, आपको इसे इतना महत्व नहीं देना चाहिए जितना साधारण लोग देते हैं। विशेषरूप से, तथाकथित आज के समाज की यौन आजादी और अश्लील साहित्य लोगों के साथ विघ्न डाल रहे हैं। कुछ लोग इन वस्तुओं में बहुत रुचि रखते हैं। अभ्यासियों की भांति, हमें उन पर जरा भी महत्व नहीं देना चाहिए।

उच्च स्तर के दृष्टिकोण से, समाज में रहते हुए साधारण लोग मिट्टी से खेल रहे हैं, बिना यह जाने कि यह गंदी है। वे पृथ्वी पर मिट्टी से खेल रहे हैं। हम बता चुके हैं कि इस विषय के कारण आपको अपने परिवार में अशांति नहीं करनी चाहिए। इसलिए, वर्तमान अवस्था में, आपको इसके बारे में कम परवाह करनी चाहिए। एक साधारण और शांत वैवाहिक जीवन बनाये रखना अच्छा है। भविष्य में, जब आप एक विशेष स्तर पर पहुँचेंगे, तब उस स्तर पर कोई और परिस्थिति होगी। वर्तमान में, यह इस प्रकार रहना चाहिए, और यदि आप इस आवश्यकता को पूर्ण करते हैं तो यह ठीक रहेगा। नि:संदेह, जो समाज में चल रहा है आपको उसका अनुसरण नहीं करना चाहिए। उसकी अनुमति कैसे हो सकती है।

इस विषय में एक और भाग सम्मिलित है। आप जानते हैं कि हमारे अभ्यासियों के शरीरों में शक्ति होती है। आपका गोंग और आपका वर्तमान नैतिकगुण स्तर अनुपात में नहीं है। आपका गोंग अस्थाई रूप से अधिक है, जिसे आकस्मिक बढ़ा दिया गया है, और अब आपके नैतिकगुण में सुधार किया जा रहा है। क्रमश:, आपका नैतिकगुण बढ़ जायेगा। यह निश्चित है कि इस समयावधि में यह बढ़ जायेगा। इसलिए हमने यह समय से पहले कर दिया है। दूसरे शब्दों में, आपके पास कुछ मात्रा में शक्ति है। क्योंकि एक उचित साधना मार्ग से प्राप्त शक्ति पवित्र और परोपकारी होती है, यहाँ बैठे हर व्यक्ति को शांति और करुणा का वातावरण अनुभव होता है। मैंने स्वयं इस प्रकार साधना की है और ये वस्तुएँ मेरे साथ रहती हैं। यहाँ बैठा हर कोई शांत है और उसके मन में बुरे विचार नहीं हैं, और कोई धूम्रपान करने के बारे में भी नहीं सोचता। भविष्य में, आपको भी हमारे दाफा की आवश्यकताओं का पालन करना चाहिए, और साधना अभ्यास द्वारा आप जो गोंग विकसित करेंगे वह भी इसी प्रकार होगा। आपके बढ़ते हुए गोंग सामर्थ्य के कारण, आपके शरीर के गोंग द्वारा निष्कासित शक्ति बहुत प्रबल होगी। यह उतनी प्रबल न भी हो, आपके प्रभाव क्षेत्र में एक साधारण व्यक्ति तब भी नियंत्रित होगा। अथवा यदि आप घर में हैं, आप औरों को भी नियंत्रित करेंगे, और आपके परिवार के सदस्य आपसे नियंत्रित हो सकते हैं। यह इस प्रकार क्यों है? आपको ऐसा करने के लिए अपने मन का प्रयोग करना भी आवश्यक नहीं है। यह प्रभाव क्षेत्र पवित्र शांति, करुणा, और सच्चे विश्वास का है। इसलिए, बहुत संभव है कि लोग बुरी वस्तुओं के बारे में न सोचें और बुरे कार्य न करें। इसका यह प्रभाव हो सकता है।

दूसरे दिन मैंने कहा था कि बुध्द-प्रकाश सभी ओर प्रकाशित होता है और सभी अवधारणाओं को ठीक करता है। दूसरे शब्दों में, आपके शरीरों द्वारा निष्कासित शक्ति सभी अनुचित अवस्थाओं को ठीक कर सकती है। इसलिए, इस क्षेत्र के प्रभाव में, यदि आप इन वस्तुओं के बारे में नहीं सोचते हैं, तो आप अनजाने में अपने पति या पत्नी को भी नियंत्रित करेंगे। यदि आप उनके बारे में न तो सोचते हैं और न सोचेंगे, तो आपके पति या पत्नी भी उनके बारे में नहीं सोचेंगे। किन्तु यह अटल नहीं है, क्योंकि वर्तमान वातावरण में, टेलीविजन पर सभी प्रकार की वस्तुएँ होती हैं, जिसे यदि चला दिया जाये तो सरलता से व्यक्ति की इच्छाएँ जागृत हो सकती हैं। किन्तु साधारण परिस्थितियों में, आपका यह नियंत्रण का प्रभाव हो सकता है। भविष्य में जब आप ऊँचे स्तर के साधना अभ्यास में पहँचेंगे, मेरे बताए बिना ही, आप जान जायेंगे कि क्या करना है। तब शांतिपूर्ण जीवन को सुनिश्चित करने के लिए एक और अवस्था होगी। इसलिए, आपको इसकी बहुत अधिक चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि बहुत अधिक चिंता करना भी एक मोहभाव है। पति या पत्नी के बीच में कामुकता का विषय नहीं होता, किन्तु वासना का होता है। जब तक आप इसे हल्केपन से ले सकते हैं और अपने मन में उचित अनुभव कर सकते हैं, यह ठीक होगा।

तो व्यक्ति का किस प्रकार के वासना के असुरों से सामना होगा? यदि आपके दिंग 2 का सामर्थ्य समुचित नहीं हैं, यह सोते समय आपके स्वप्न में आयेगा। जब आप सो रहे होंगे या ध्यान में होंगे, यह अचानक प्रकट हो जायेगा। यदि आप पुरुष हैं, एक सुन्दरी प्रकट होगी। यदि आप स्त्री हैं, आपके सपनों का पुरुष प्रकट होगा। किन्तु वे निर्वस्त्र होंगे। एक बार आपका मन इसके बारे में सोचेगा, आप अनियंत्रित हो जायेंगे और इसे वास्तविक बना देंगे। आप सब यह सोचें : हमारे साधना अभ्यास में, व्यक्ति के जीवन का संवर्धन करने के लिए शरीर के सत्व का प्रयोग किया जाता है; आप सदैव इस प्रकार अनियंत्रित नहीं हो सकते। साथ ही, आपने वासना की परीक्षा पास नहीं की। इसकी अनुमति कैसे हो सकती है? इसलिए मैं आपको बता रहा हूँ कि हर किसी का इस विषय से सामना होगा, और यह निश्चित है। फा को सिखाते हुए, मैं आपके मन में बहुत प्रबल शक्ति की छाप छोड़ रहा हूँ। इस द्वार से बाहर निकलने के बाद हो सकता है कि आपको स्पष्ट रूप से याद न रहे कि मैंने क्या कहा था, किन्तु जब आप वास्तव में इस विषय के सम्मुख होंगे, जो मैंने कहा आपको याद आ जायेगा। जब तक आप स्वयं को एक अभ्यासी मानते हैं, यह तुरन्त आपको याद आ जायेगा और आप स्वयं को नियंत्रित कर सकेंगे, और तब आप इस परीक्षा में सफल हो सकेंगे। यदि आप इस परीक्षा में पहली बार असफल हो जाते हैं, इसमें दूसरी बार सफल होना कठिन होगा। किन्तु यह भी परिस्थिति है जब व्यक्ति पहली बार परीक्षा में असफल रहता है, नींद से जागने पर उसे बहुत खेद होगा। शायद यह धारणा और मनोस्थिति इसके बारे में आपके विचारों को दृढ़ करेगी। जब यह विषय दोबारा आयेगा, आप स्वयं को नियंत्रित कर सकेंगे और परीक्षा में सफल हो सकेंगे। यदि व्यक्ति जो परीक्षा में असफल हो जाता है और इसकी परवाह नहीं करता, इसमें बाद में सफल होना और कठिन होगा। यह निश्चित ही इस प्रकार है।

इस प्रकार का विघ्न असुरों से या गुरु से आ सकता है, जो आपकी परीक्षा के लिए एक वस्तु को किसी और में रूपांतरित करते हैं। यह दोनों प्रकार से होता है क्योंकि हर किसी को इस परीक्षा में सफल होना आवश्यक है। हम साधना अभ्यास का आरंभ साधारण व्यक्ति होते हुए करते हैं। पहली सीढ़ी यह परीक्षा है, और हर किसी का इससे सामना होगा। मैं आपको एक उदाहरण देना चाहूँगा। जब मैं वूहान3 में एक कक्षा को सिखा रहा था, वहाँ एक तीस वर्ष का युवक था। मेरे व्याख्यान देने के ठीक बाद, वह घर चला गया और साधना में बैठ गया। उसने दिंग की अवस्था तुरन्त प्राप्त कर ली। उसके बाद, उसने अचानक ही एक ओर बुध्द अमिताभ को प्रकट होते हुए देखा और दूसरी ओर लाओ ज़ को। अपने अनुभव विवरण में उसने यह बताया। प्रकट होने पर, दोनों ने बिना कुछ कहे उसे देखा और अनर््तध्यान हो गये। बाद में, बौध्दिसत्व अवलोकितेश्वर प्रकट हुई जो हाथ में पात्र लिये थीं जिसमें से श्वेत घुऑं निकल रहा था। जैसे वह वहाँ बैठा था और उसने सभी कुछ बहुत स्पष्ट देखा, वह बहुत प्रसन्न हो गया। अचानक, धुऑं कुछ अप्सराओं में रूपांतरित हो गया; अप्सराएँ दिव्यलोक की वे उड़ने वाली युवतियाँ होती हैं जो बहुत सुन्दर होती है। वे उसके लिए बहुत शोभायुक्त मुद्राओं से नृत्य कर रही थी। उसने स्वयं से सोचा : "क्योंकि मैं यहाँ अभ्यास कर रहा हूँ, बौध्दिसत्व अवलोकितेश्वर मेरे देखने के लिए कुछ अप्सराओं को प्रकट कर रही हैं और अप्सराओं को मेरे लिए नृत्य दिखाने के लिए भेज रही हैं।" जैसे वह इस विचार से प्रसन्नचित हो रहा था, ये अप्सराएँ अचानक ही निर्वस्त्र हो गयीं और उसकी ओर विभिन्न भाव दर्शाने लगीं, उसके गले और कमर को सहलाने लगीं। इस अभ्यासी के नैतिकगुण में बहुत तेजी से सुधार हुआ था। उस समय पर, वह तुरंत ही सावधान हो गया। पहला विचार जो उसके मन में आया वह था : "मैं कोई साधारण व्यक्ति नहीं हूँ। मैं एक अभ्यासी हूँ। आपको मेरे साथ इस प्रकार बर्ताव नहीं करना चाहिए, क्योंकि मैं एक फालुन दाफा अभ्यासी हूँ।" जैसे ही यह विचार आया, सभी कुछ अचानक ही अदृश्य हो गया क्योंकि उन्हें वैसे भी रूपांतरित किया गया था। तब बुध्द अमिताभ और लाओ ज़ दोबारा प्रकट हुए। लाओ ज़ ने इस अभ्यासी की ओर संकेत किया और बुध्द अमिताभ से मुस्कुराते हुए कहा : "यह बालक सिखाने योग्य है।" इसका अर्थ है कि यह व्यक्ति अच्छा है और इसे सिखाया जा सकता है।

पूरे इतिहासकाल में, ऊँचे आयामों के दृष्टिकोण से, व्यक्ति की इच्छा और वासना के विषय यह निर्धारित करने में बहुत निर्णायक रहे हैं कि वह साधना अभ्यास कर सकता है अथवा नहीं। इसलिए हमें इन वस्तुओं को वास्तव में अनिच्छा से लेना चाहिए। हालांकि, हम साधारण लोगों के बीच साधना अभ्यास करते हैं, और इसलिए हम आपको इसे पूर्णरूप से त्यागने के लिए नहीं कहते। कम से कम वर्तमान अवस्था में, आपको इसे हल्केपन से लेना चाहिए और वैसा नहीं रहना चाहिए जैसे आप पहले थे। एक अभ्यासी की भाँति, आपको इस प्रकार होना चाहिए। जब कभी चीगोंग अभ्यास में किसी प्रकार का विघ्न आता है, आपको अपने अंदर कारणों को देखना चाहिए और निर्धारित करना चाहिए कि आपने अभी तक किसका त्याग नहीं किया है।

स्वयं अपने मन द्वारा आसुरिक विघ्न

"स्वयं अपने मन द्वारा आसुरिक विघ्न" क्या होता है? मानव शरीर का प्रत्येक स्तर के आयाम में एक भौतिक क्षेत्र होता है। एक विशिष्ट क्षेत्र में, ब्रह्माण्ड की किसी भी वस्तु को आपके आयाम क्षेत्र में एक प्रतिबिम्ब की भाँति परावर्तित किया जा सकता है। यद्यपि वे प्रतिबिम्ब हैं, किन्तु उनका भौतिक अस्तित्व होता है। आपके आयाम क्षेत्र के अंदर सभी कुछ आपके मस्तिष्क के विचारों की आज्ञा द्वारा होता है। अर्थात, यदि आप अपने दिव्य नेत्र द्वारा अपने मन का प्रयोग किये बिना शांत भाव से वस्तुओं को देखते हैं, जो आप देखते हैं वह सत्य होता है। यदि आप तनिक भी सोचने लगते हैं, तो जो आप देखते हैं वह असत्य होगा। इसे व्यक्ति के अपने मन द्वारा आसुरिक विघ्न या "रूपांतरण मनोभाव का अनुसरण करता है" कहा जाता है। यह इसलिए होता है क्योंकि कुछ अभ्यासी अपना बर्ताव अभ्यासी की भाँति नहीं रख पाते और स्वयं को उचित प्रकार नहीं संभाल पाते। वे दिव्य सिध्दियों के लिए इच्छा-प्रयास रखते हैं और छोटे कौशल या दूसरे आयामों से कुछ ध्वनियों को सुनने के लिए लालायित रहते हैं। उन्हें इन वस्तुओं की चाह रहती है। इन लोगों के लिए स्वयं अपने मन द्वारा आसुरिक विघ्न उत्पन्न होना और निम्न स्तरों पर गिरना सबसे सरल हो जाता है। भले ही व्यक्ति का साधना स्तर कितना ही ऊँचा क्यों न हो, एक बार इस समस्या के उत्पन्न होने के बाद वह सीधे धरातल पर गिरेगा, और अन्त में, बर्बाद हो जायेगा- यह एक बहुत गंभीर विषय है। यह दूसरे क्षेत्रों की भाँति नहीं है जहाँ यदि व्यक्ति इस बार नैतिकगुण परीक्षा पास नहीं कर पाता, वह नीचे से ऊपर की ओर उठ सकता है और साधना अभ्यास जारी रख सकता है। किन्तु यह तब नहीं हो पाता यदि व्यक्ति के अपने मन द्वारा आसुरिक विघ्न उत्पन्न हो जाता है, क्योंकि व्यक्ति का यह जीवन बर्बाद हो जायेगा। विशेष रूप से वे अभ्यासी जिनके दिव्य नेत्र विशिष्ट स्तर पर खुले हैं, उनके साथ यह समस्या सरलता से हो सकती है। साथ ही, कुछ लोगों को अपनी चेतना में सदैव बाह्य संदेशों द्वारा विघ्न होता रहता है, और जो कुछ बाह्य संदेश उन्हें बताते हैं वे उस पर विश्वास कर लेते हैं; यह समस्या भी आ सकती है। इसलिए, आप में से कुछ जिनके दिव्य नेत्र खुले हैं उन्हें विभिन्न प्रकार के संदेशों द्वारा विघ्न होगा।

मैं आपको एक उदाहरण देना चाहूँगा। व्यक्ति के लिए साधना के निम्न स्तर पर अपने मन को शांत रखना बहुत कठिन होता है। हो सकता है आप स्पष्ट रूप से न देख पायें कि आपके गुरु कैसे दिखाई पड़ते हैं। एक दिन आप अचानक एक बहुत बड़े, विशाल देव को देखते हैं। वह आपकी प्रशंसा में कुछ शब्द कहता है और आपको कुछ सिखाता है। यदि आप इसे स्वीकार कर लेते हैं, तो आपका गोंग विकृत हो जायेगा। यदि आप हर्षोत्साहित हो जाते हैं और उसे अपना गुरु मान लेते हैं, तो आप उसका अनुसरण करेंगे। किन्तु उसे भी उचित फल की प्राप्ति नहीं हुई है। उस आयाम में, उसका शरीर रूपांतरित हो कर बड़ा या छोटा हो सकता है। इसके अपनी ऑंखों के सामने होने पर और इस विशाल देव को देख कर, आप वास्तव में हर्षोत्साहित हो जायेंगे। इस उत्साह में, क्या आप उससे सीखेंगे नहीं? यदि कोई अभ्यासी स्वयं को उचित प्रकार से नहीं संभालता तो उसे बचाना बहुत कठिन होता है। वह सरलता से स्वयं को बर्बाद कर सकता है। देवलोक के वासी सभी देव होते हैं, किन्तु उन्हें भी उचित फल की प्राप्ति नहीं हुई है और वे भी संसार के चक्र से गुजरेंगे। यदि आप ऐसे व्यक्ति को सहज ही अपना गुरु मान लेते हैं और उसका अनुसरण करते हैं, तो वह आपको कहाँ ले जा सकता है? वह उचित फल भी प्राप्त नहीं कर सकता। क्या आपकी साधना व्यर्थ नहीं जायेगी? अन्तत:, आपका गोंग विकृत हो जायेगा। अपने मन को विघ्न से बचाये रखना बहुत कठिन होता है। मैं सभी को बता रहा हूँ कि यह एक बहुत गंभीर विषय है, और आप में से अनेकों के साथ यह समस्या बाद में आयेगी। मैंने आपको फा सिखा दिया है; यह आप पर निर्भर करता है कि आप स्वयं को उचित प्रकार संभाल पाते हैं। जिसका मैंने वर्णन किया है वह एक परिस्थिति है। जब आप दूसरी अभ्यास पध्दति के किसी ज्ञानप्राप्त व्यक्ति को देखते हैं तो अपने मन को अशांत न होने दें। एक ही अभ्यास पध्दति में स्थिर रहें। भले ही वह कोई बुध्द, कोई ताओ, कोई देवता, या कोई असुर हो, उनसे आपका हृदय नहीं डोल जाना चाहिए। स्वयं को इस प्रकार संभालने से, सफलता मिलनी निश्चित है।

स्वयं अपने मन द्वारा आसुरिक विघ्न दूसरे रूपों में भी प्रकट होता है। हो सकता है आप को किसी संबंधी द्वारा विघ्न हुआ हो जिसकी मृत्यु हो चुकी है, और यह व्यक्ति कुछ कार्य करने के लिए प्रार्थना याचना करता है। सभी प्रकार की वस्तुएँ हो सकती हैं। क्या आपका मन निर्विघ्न रहेगा? मान लीजिए कि आप अपने इस बच्चे को बहुत चाहते हैं या अपने माता-पिता को चाहते हैं, और आपके माता-पिता की मृत्यु हो चुकी है। उन्होंने आपको कुछ कार्य करने के लिए कहे थे- वे वस्तुएँ जो आपको नहीं करनी चाहिए। यदि आप उन्हें करते हैं तो यह बुरा होगा। एक अभ्यासी होना इतना अधिक कठिन है। यह कहा जाता है कि बुध्दमत अव्यवस्थित हो चुका है। इसने कनफ्यूशियन मत से भी वस्तुएँ ग्रहण कर ली हैं जैसे माता-पिता का सम्मान करना और बच्चों को प्यार करना। बुध्दमत में इस प्रकार की वस्तुएँ नहीं थीं। इसका क्या अर्थ है? क्योंकि व्यक्ति का वास्तविक जीवन उसकी मूल आत्मा होती है, जो आपकी मूल आत्मा को जन्म देती है वह आपकी वास्तविक माता है। संसार के चक्र के दौरान, आपकी माताएँ मनुष्य और जो मनुष्य नहीं हैं वे भी रही हैं, और वे इतनी अधिक हैं कि गिनना भी कठिन है। आपके विभिन्न जीवनों में आपके कितने बेटे और बेटियाँ रहे हैं वे भी असंख्य हैं। आपकी माता कौन है? आपका बेटा या बेटी कौन है? व्यक्ति की मृत्यु हो जाने के पश्चात यह कोई नहीं जानता। आप पर जो औरों का कर्ज है वह आपको चुकाना आवश्यक है। मनुष्य भ्रमजाल में जीते हैं और इन वस्तुओं को नहीं छोड़ पाते। कुछ लोग अपने बेटों और बेटियों को नहीं भुला पाते और कहते हैं कि वे कितने अच्छे हैं, और तब उनकी मृत्यु हो जाती है। कोई व्यक्ति कह सकता है कि उसकी माता कितनी अच्छी है, किन्तु तब उसकी भी मृत्यु हो जाती है। यह व्यक्ति इतना विलाप करता है कि बाकी जीवन भर वह उसके पास जाना चाहता है। आप इसके बारे में क्यों नहीं सोचते? क्या वे यहाँ आपको कष्ट देने के लिये नहीं हैं? वे इस रूप को धारण करते हैं जिससे आप अच्छा जीवन व्यतीत करने में असमर्थ हो जायें।

शायद साधारण लोग इसे नहीं समझते। यदि आप इसके मोह से बंधे हैं, तो आप किसी भी प्रकार साधना का अभ्यास नहीं कर सकते। बुध्दमत में इस प्रकार की वस्तुएँ नहीं होतीं। यदि आप साधना अभ्यास करना चाहते हैं तो मानव भावुकता को त्यागना आवश्यक है। नि:संदेह, साधारण मानव समाज में साधना अभ्यास करते हुए, हमें अपने माता-पिता का सम्मान करना चाहिए और अपने बच्चों को शिक्षित करना चाहिए। सभी परिस्थितियों में, हमें दूसरों के लिए अच्छा और दयालु रहना चाहिए, जिसमें हमारे परिवार के सदस्य भी सम्मिलित हैं। हमें सभी के साथ एक जैसा बर्ताव करना चाहिए। हमें अपने माता-पिता और बच्चों के लिए अच्छा होना चाहिए और दूसरों के लिए हर प्रकार से विचारवान होना चाहिए। इस प्रकार का हृदय स्वार्थी नहीं होता, और यह एक दया और परोपकार का हृदय होता है। भावुकता एक साधारण लोगों का भाव है, और साधारण लोग केवल इसी के लिए जीते हैं।

कई लोग अपना आचरण उचित नहीं रखते, और इससे साधना अभ्यास में कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं। एक व्यक्ति यह कह सकता है कि एक बुध्द ने उसे कुछ कहा है। जब तक आपके जीवन को ही खतरा न हो और आपको बताया जाये कि इसे कैसे टाला जाये, वे सब जो आपको बताते हैं कि आपको आज एक समस्या आयेगी और जो अभी होने वाला है उसे कैसे टाला जाये, जो आपको प्रथम पुरस्कार वाली लॉटरी टिकट का नम्बर बताते हैं और आपको खेलने के लिए कहते हैं, और जो आपको साधारण मानव समाज में अच्छी वस्तुएँ प्राप्त करवाना चाहते हैं, वे असुर हैं। यदि आपके लिए सदैव साधारण लोगों के बीच मार्ग प्रशस्त हो जाता है और आप इस परीक्षा को पास नहीं कर पाते, तो आप कोई विकास नहीं करेंगे। यदि आप साधारण लोगों के बीच बहुत अच्छे प्रकार से रहते हैं, तो आप साधना अभ्यास कैसे कर सकते हैं? आपके कर्म का रूपांतरण कैसे किया जायेगा? सभी को अपने मन में यह सुनिश्चित रखना चाहिए। एक असुर भी आपकी प्रशंसा कर सकता है और कह सकता है कि आपका स्तर कितना ऊँचा है, आप कितने महान बुध्द या ताओ हैं, और उसके विचार में आप बेजोड़ हैं- वे सब पाखण्डी हैं। जो वास्तव में ऊँचे स्तरों की ओर साधना अभ्यास करता है उसकी भाँति आपको विभिन्न मोहभाव त्यागने चाहिएँ। इन विषयों का सामना करते समय, आप सभी को सावधान रहना चाहिए।

साधना अभ्यास के दौरान, आपका दिव्य नेत्र खोला जायेगा। दिव्य नेत्र खुले होने पर, व्यक्ति के लिए साधना में उसकी कठिनाइयाँ होती हैं। दिव्य नेत्र बंद होने पर भी, व्यक्ति के लिए साधना में कठिनाइयाँ होती हैं। किसी भी प्रकार से, साधना का अभ्यास करना सरल नहीं है। आपका दिव्य नेत्र खुल जाने के पश्चात, अनेकों संदेश जब आपके साथ विघ्न करेंगे, तब आपके लिए स्वयं को उचित प्रकार से संभालना वास्तव में बहुत कठिन होगा। दूसरे आयामों में, सभी कुछ ऑंखों को चकाचौंध कर देने वाला और बहुत सुन्दर और शोभावान होता है, जिन सब से आपका हृदय डोल सकता है। एक बार आप इससे प्रभावित हो जाते हैं, तो आपके साथ विघ्न हो सकते हैं और आपका गोंग विकृत हो जायेगा- यह अक्सर इस प्रकार होता है। इस प्रकार, जब स्वयं अपने मन द्वारा आसुरिक विघ्न द्वारा प्रभावित व्यक्ति स्वयं को उचित प्रकार नहीं संभाल पाता, तब यह परिस्थिति हो सकती है। उदाहरण के लिए, एक बार व्यक्ति कोई बुरा विचार उत्पन्न कर लेता है, तो यह बहुत खतरनाक होता है। एक दिन उसका दिव्य नेत्र खुल जाता है, और वह वस्तुओं को बहुत स्पष्ट देख पाता है। वह सोचता है : "इस व्यायाम स्थल पर, केवल मेरा दिव्य नेत्र अच्छी प्रकार से खुला है। क्या मैं एक दुर्लभ व्यक्ति हूँ? मैं गुरु ली का फालुन दाफा सीख सका हूँ और इसे इतनी अच्छी तरह पढ़ा है, जो और सभी से अच्छा है। शायद मैं कोई साधारण व्यक्ति भी नहीं हूँ।" यह विचार पहले ही उचित नहीं है। वह आश्चर्य करेगा : "हो सकता है मैं कोई बुध्द हूँ। ठीक है, एक बार मैं स्वयं को देखता हूँ।" जब वह अपने को देखता है, वह स्वयं को वास्तव में एक बुध्द पाता है। ऐसा क्यों है? यह इसलिए क्योंकि उसके शरीर के सब ओर आयाम क्षेत्र के अंदर सभी कुछ उसके विचारों के अनुसार रूपांतरित होता है, जिसे "रूपांतरण द्वारा मनोभाव का अनुसरण करना" कहा जाता है।

ब्रह्माण्ड से परावर्तित सभी कुछ व्यक्ति के विचारों द्वारा रूपांतरित हो जायेगा, क्योंकि व्यक्ति के आयाम क्षेत्र के अंदर सभी कुछ उसके आदेशानुसार होता है। इसी प्रकार परावर्तित चित्र होते हैं, जिनका भी भौतिक अस्तित्व होता है। यह व्यक्ति सोचता है : "हो सकता है मैं एक बुध्द हूँ, और शायद मैं एक बुध्द के वस्त्र धारण किये हूँ।" तब वह पायेगा कि जो वह पहने हैं वे वास्तव में बुध्द के वस्त्र हैं। "आश्चर्यजनक, मैं वास्तव में एक बुध्द हूँ।" वह बहुत उत्साहित हो जायेगा। "शायद मैं एक छोटा बुध्द भी नहीं हूँ।" दोबारा देखने पर, वह स्वयं को एक बड़ा बुध्द पायेगा। "शायद मैं ली होंगज़ी से भी अधिक महान हूँ!" वह दोबारा देखेगा। "आश्चर्य, मैं वास्तव में ली होंगज़ी से अधिक महान हूँ।" कुछ लोग यह अपने कानों से भी सुनते हैं। कोई असुर उसके साथ विघ्न डालेगा और कहेगा : "आप ली होंगज़ी से भी महान हैं। आप ली होंगज़ी से इतने अधिक महान हैं।" वह उस पर विश्वास भी कर लेगा। क्या आपने सोचा है कि आप भविष्य में साधना का अभ्यास किस प्रकार करेंगे? क्या आपने कभी साधना का अभ्यास किया है? आपको साधना किसने सिखाई है? जब एक वास्तविक बुध्द भी यहाँ किसी उद्देश्य से आते हैं, उन्हें भी शून्य से साधना का अभ्यास करना होता है। उनका मूल गोंग उन्हें नहीं दिया जाता, और केवल यह है कि वे साधना अभ्यास में शीघ्र प्रगति करते हैं। इसलिए, एक बार उसके साथ यह समस्या आने पर, उसके लिए अपनी मदद कर बाहर निकलना कठिन होगा; उसे तुरन्त ही यह मोहभाव उत्पन्न हो जायेगा। यह मोहभाव उत्पन्न हो जाने के बाद, वह कुछ भी कहने का साहस करेगा : "मैं एक बुध्द हूँ। आपको औरों से सीखने की आवश्यकता नहीं है। मैं एक बुध्द हूँ, इसलिए मैं आपको बताऊँगा क्या करना है।" वह ये वस्तुएँ करना आरम्भ कर देगा।

क्या ऐसा ही एक व्यक्ति चांगचुन में नहीं है? आरम्भ में वह बहुत अच्छा था। बाद में, वह यह सब करने लगा। उसने सोचा कि वह एक बुध्द है। अन्त में, वह स्वयं को और सभी से महान मानने लगा। यह तब हुआ जब वह स्वयं को ठीक से नहीं संभाल पाया और उसे उत्पन्न हुए मोहभाव के कारण। ऐसी परिस्थिति क्यों होती है? बुध्दमत सिखाता है कि भले ही आप कुछ भी देखें, आपको उस पर ध्यान नहीं देना चाहिए, क्योंकि यह सब आसुरिक भ्रम है, और व्यक्ति को केवल ध्यान द्वारा साधना में आगे की ओर बढ़ना चाहिए। यह आपको उन्हें देखने और उनके लिए मोहभाव उत्पन्न करने की अनुमति क्यों नहीं देता? यह इस समस्या के उत्पन्न होने की चेतावनी देता है। बुध्दमत के साधना अभ्यास में, सुदृढ़ साधना प्रणाली नहीं होती, न ही इसके शास्त्रों में इन वस्तुओं से बचने के लिए कोई मार्गदर्शन है। शाक्यमुनि ने उस समय इस प्रकार का धर्म नहीं सिखाया था। स्वयं अपने मन द्वारा आसुरिक विघ्न की समस्या या रूपांतरण द्वारा मनोभाव के अनुसरण करने की समस्या से बचने के लिए, उन्होंने साधना अभ्यास के दौरान दिखाई पड़ने वाले सभी दृश्यों को आसुरिक भ्रम कहा था। इसलिए, एक बार मोहभाव उत्पन्न हो जाने पर, यह आसुरिक भ्रम पैदा करेगा। इससे बच कर रहना बहुत कठिन है। यदि इससे ठीक प्रकार नहीं निपटा जाता, तो व्यक्ति बर्बाद हो जायेगा और कोई आसुरिक मार्ग अपना लेगा। क्योंकि उसने स्वयं को एक बुध्द कहा है, उसने पहले ही स्वयं को असुर बना लिया है। अन्त में, वह आत्माओं द्वारा ग्रसित हो जायेगा, या कुछ और अनुभव करेगा और पूरी तरह बर्बाद हो जायेगा। उसका हृदय भी अनैतिक हो जायेगा, और वह पूर्णत: नीचे गिर जायेगा। ऐसे बहुत से लोग हैं। इस कक्षा में भी, ऐसे लोग हैं जो अभी अपने बारे में बहुत ऊँचा सोचते हैं और एक भिन्न मुद्रा में बात करते हैं। बुध्दमत में भी व्यक्ति के लिए यह पता लगाना निषेध है कि वह कहाँ पर है। जो मैंने अभी कहा वह आसुरिक विघ्न का एक और प्रकार है, जिसे "स्वयं अपने मन द्वारा आसुरिक विघ्न" या "रूपांतरण द्वारा मनोभाव का अनुसरण करना" कहा जाता है। बीजिंग में ऐसे कुछ अभ्यासी हैं, और ऐसे ही कुछ दूसरे प्रदेशों में हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने अभ्यासियों के लिए बहुत गंभीर विघ्न उत्पन्न कर दिया है।

किसी ने मुझ से पूछा है : "गुरुजी, आप इस समस्या का निदान क्यों नहीं करते?" आप सब यह सोचें : यदि हम आपके साधना अभ्यास के मार्ग में सभी बाधायें हटा दें, आप कैसे साधना का अभ्यास करेंगे। आसुरिक विघ्न की परिस्थितियों के बीच ही आप प्रदर्शित कर सकते हैं कि आप अपनी साधना में निरन्तर रह पाते हैं, वास्तव में ताओ की ज्ञानप्राप्ति कर पाते हैं, विघ्न के प्रभाव से दूर रह पाते हैं, और इस अभ्यास पध्दति में स्थिर रह पाते हैं। बड़ी लहरें रेत को छान कर अलग कर देती हैं, और साधना अभ्यास भी इसी प्रकार है। अन्त में जो बचता है वह खरा सोना होता है। इस प्रकार के विघ्न के बिना, मैं कहूँगा कि व्यक्ति के लिए साधना का अभ्यास करना बहुत सरल हो जायेगा। मेरे विचार में, आपकी साधना पहले ही बहुत सरल है। उच्च स्तर के वे महान ज्ञानप्राप्त व्यक्ति इसे पक्षपातपूर्ण मान सकते हैं : "आप क्या कर रहे हैं? आप लोगों को इस प्रकार बचा रहे हैं? साधना के मार्ग में कोई बाधाएँ ही नहीं हैं, और व्यक्ति अपनी साधना सीधे अन्त तक पूर्ण कर सकता है। क्या यह साधना है? जैसे-जैसे व्यक्ति साधना में आगे बढ़ता है, उसके लिए यह और अधिक सुगम और विघ्न-रहित होता जाता है। इसकी अनुमति कैसे हो सकती है?" यह विषय है, और मैं भी इसके बारे में सोच रहा हूँ। शुरूआत में, मैंने ऐसे कई असुरों का निपटान किया था। यदि मुझे यह हर समय करना है, तो मैं भी इसे उचित नहीं पाता। मुझे यह भी बताया गया : "आपने उनकी साधना को बहुत सरल बना दिया है। लोगों की अपनी केवल नाममात्र की कठिनाई होती है। उनके पास उनकी केवल वह नाममात्र की कठिनाई है। उनके बहुत से मोहभाव हैं जिन्हें वे अभी भी नहीं छोड़ पाते! यह देखा जाना शेष है कि जब वे भ्रम और कठिनाइयों के बीच हैं तब वे आपका दाफा स्वयं में समझ पाते हैं अथवा नहीं।" इस संदर्भ में यह विषय है, इसलिए विघ्न और परीक्षाएँ आयेंगी। मैंने अभी बताया कि यह आसुरिक विघ्न का एक प्रकार है। किसी व्यक्ति को वास्तव में बचाना बहुत कठिन होता है, किन्तु किसी व्यक्ति को बर्बाद करना बहुत सरल। एक बार आपका मन उचित नहीं है, आप तुरन्त ही बर्बाद हो जायेंगे।

आपकी मुख्य चेतना प्रबल होनी चाहिए

क्योंकि लोगों ने अपने विभिन्न पूर्वजन्मों में कुछ अनुचित कार्य किये होते हैं, इससे लोगों के लिए विपत्तियाँ आती हैं और अभ्यासियों के लिए कर्म संबंधी बाधाएँ आती हैं। इसलिए, जन्म, वृध्दावस्था, रोग और मृत्यु आयेंगे। ये साधारण कर्म हैं। इसके अतिक्ति एक और शक्तिशाली कर्म होता है जो अभ्यासियों पर बहुत अधिक प्रभाव डालता है- इसे विचार कर्म कहते हैं। लोगों को जीवन जीने के लिए सोचने की आवश्यकता होती है। क्योंकि व्यक्ति साधारण लोगों के बीच खोया रहता है, वह अपने मन में अक्सर प्रसिध्दि, लाभ, वासना, क्रोध, आदि के विचार विकसित कर लेता है। धीरे-धीरे, ये विचार शक्तिशाली विचार कर्म बन जाते हैं। क्योंकि दूसरे आयामों में सभी कुछ जीवित होता है, ऐसा ही कर्म के साथ भी है। जब व्यक्ति एक उचित मार्ग में साधना का अभ्यास आरम्भ करता है, उसे अपने कर्म को हटाना आवश्यक होता है। कर्म को हटाने का अर्थ है कर्म को मिटा देना और रूपांतरित करना। नि:संदेह, कर्म प्रतिरोध करेगा, और इसलिए व्यक्ति के पास कठिनाइयाँ और बाधाएँ आयेंगी। किन्तु विचार कर्म सीधे व्यक्ति के मन के साथ विघ्न डाल सकता है। इसलिए, व्यक्ति के मन में अपशब्द आते हैं जो गुरु और दाफा की भर्त्सना करते हैं, और व्यक्ति कुछ दुष्ट विचार या अपशब्द सोच सकता है। परिणामस्वरूप, कुछ अभ्यासी यह नहीं जानते कि क्या हो रहा है और यह समझते हैं कि ये विचार स्वयं उनमें से आ रहे हैं। कुछ लोग यह भी विश्वास करते हैं कि वे ग्रसित करने वाली आत्माओं या पशुओं से हैं, किन्तु वे ग्रसित करने वाली आत्माओं या पशुओं से नहीं हैं। बल्कि, वे व्यक्ति के मन में विचार कर्म के दर्शाने द्वारा उत्पन्न होते हैं। कुछ लोगों की मुख्य चेतना बहुत प्रबल नहीं होती और अनुचित कार्यों के लिए विचार कर्म की बात मान लेती है। ऐसे लोग बर्बाद हो जायेंगे और स्तरों में गिर जायेंगे। हालांकि, अधिकतर लोग अपने बहुत प्रबल विचारों द्वारा (प्रबल मुख्य चेतना द्वारा) इसे हटा और रोक सकते हैं। इससे, यह दर्शाता है कि इस व्यक्ति को बचाया जा सकता है और वह अच्छे और बुरे में भेद कर सकता है। दूसरे शब्दों में, इस व्यक्ति का ज्ञानप्राप्ति का गुण अच्छा है। मेरे फा-शरीर ऐसे अधिकांश विचार कर्म को हटाने में मदद करेंगे। यह परिस्थिति अक्सर देखने में आती है। एक बार प्रकट हो जाने पर, व्यक्ति की यह देखने के लिए परीक्षा ली जायेगी कि वह स्वयं ऐसे बुरे विचारों को हरा पाता है। यदि व्यक्ति दृढ निश्चयी है, कर्म को हटाया जा सकता है।

आपका मन उचित होना आवश्यक है

एक अनुचित मन क्या होता है? इसका अर्थ किसी व्यक्ति का स्वयं को सदैव एक अभ्यासी मानने में असमर्थ रहना है। एक अभ्यासी के सामने साधना अभ्यास में कठिनाइयाँ आयेंगी। जब कोई कठिनाई आती है, यह एक-दूसरे के बीच मतभेद के रूप में प्रकट हो सकती है। इसमें मानसिक चालें और बहुत कुछ सम्मिलित होगा, जो सीधे आपके नैतिकगुण पर प्रभाव डालते हैं। इस संदर्भ में ऐसी बहुत सी परिस्थितियाँ होंगी। आप और क्या सामना करेंगे? हमारे शरीर अचानक अस्वस्थ महसूस होंगे। यह इसलिए क्योंकि कर्म का भुगतान विभिन्न रूपों में व्यक्त होगा। एक निश्चित समायावधि पर, आप यह स्पष्ट रूप से भेद करने में असमर्थ बना दिये जायेंगे कि कुछ वास्तव में सत्य है, कि आपका गोंग वास्तव में है, कि आप साधना का अभ्यास कर सकते हैं और इसे पूर्ण कर सकते हैं, यह कि बुध्द जनों का अस्तित्व होता है और वे वास्तव में हैं। भविष्य में, ये परिस्थितियाँ दोबारा आपको भ्रमित करने के लिए प्रकट होंगी और आपको महसूस करायेंगी जैसे उनका अस्तित्व न हो और वे सब भ्रम हों- यह देखने के लिए है कि आप संकल्पित हैं। आप कहते हैं कि आपको स्थिर और दृढ़ होना चाहिए। इस संकल्प के साथ, यदि आप उस समय पूरी तरह दृढ़ निश्चयी रह पाते हैं, आप प्राकृतिक रूप से अच्छा करेंगे क्योंकि आपके नैतिकगुण में पहले ही सुधार आ चुका है। किन्तु अभी आप उतने स्थिर नहीं हैं। यदि आपको यह कठिनाई तुरन्त ही दे दी जाती है, आपको इसका जरा भी ज्ञानवर्धन नहीं हो पायेगा, और न ही आप किसी भी प्रकार साधना का अभ्यास कर पायेंगे। कठिनाइयाँ विभिन्न संदर्भों में आ सकती हैं।

साधना अभ्यास के दौरान, व्यक्ति को ऊँचे स्तरों की ओर उठने के लिए इस प्रकार साधना का अभ्यास करना चाहिए। इस प्रकार, यदि आपमें से किसी को कहीं कुछ शारीरिक असुविधा महसूस होती है, आप सोचेंगे कि आप बीमार हैं। आप स्वयं को सदैव एक अभ्यासी की भांति मानने में असफल रहते हैं, क्योंकि यदि आपके साथ यह होता है तो आप इसे एक रोग मानते हैं। इतनी अधिक कठिनाइयाँ क्यों आती हैं? मैं आपको बताना चाहूँगा कि इनमें से बहुत सी आपके लिए पहले ही हटायी जा चुकी हैं, और आपकी कठिनाइयाँ पहले ही बहुत अल्प हैं। यदि इन्हें आपके लिए नहीं हटाया जाता, इस समस्या का सामना करने पर हो सकता है आप पहले ही धराशायी हो जाते। शायद आप अपने बिस्तर से कभी उठ ही न पाते। जब आपको जरा भी समस्या आती है, आपको असुविधा महसूस होगी। किन्तु यह उतना आरामदेह कैसे हो सकता है? उदाहरण के लिए, जब मैं चांगचुन में एक कक्षा ले रहा था, वहाँ एक बहुत अच्छे जन्मजात गुण वाला व्यक्ति था, जो वास्तव में एक अच्छा प्रत्याशी था। मैंने उसे बहुत अच्छा पाया और उसकी कठिनाइयाँ थोड़ी सी बढ़ा दीं जिससे शीघ्रता से उसके कर्म का भुगतान हो सके और उसे ज्ञानप्राप्ति हो सके- मैं इसकी इस प्रकार तैयारी कर रहा था। किन्तु एक दिन अचानक ऐसा लगा कि उसके मस्तिष्क की नसों में अवरोध का रोग हुआ है और वह ज़मीन पर गिर गया। उसे लगा कि वह हिल भी नहीं सकता जैसे उसके चारों हाथ-पैर बेकार हो गये हों। उसे आकस्मिक चिकित्सा के लिए अस्पताल भेजा गया। तब वह दोबारा चलने-फिरने लगा। आप सब यह सोचें : मस्तिष्क की नसों में अवरोध के रोग के साथ, कोई फिर से इतना शीघ्र कैसे चल-फिर सकता था और अपने दोनों हाथ और पैरों को हिला सकता था? बल्कि, उसने यह सब होने के लिए फालुन दाफा को दोष दिया। उसने इसके बारे में नहीं सोचा : वह मस्तिष्क की नसों में अवरोध के रोग से इतना शीघ्र कैसे ठीक हो सकता था? यदि उसने उस समय फालुन दाफा का अभ्यास नहीं किया होता, हो सकता है जब वह गिरा था तब वह वहाँ वास्तव में मृत हो गया होता। शायद अपने शेष जीवन भर उसे पक्षाघात हो गया होता और उसे वास्तव में मस्तिष्क की नसों में अवरोध का रोग हो जाता।

कहने का तात्पर्य है कि किसी व्यक्ति को बचाना कितना अधिक कठिन है। उसके लिए इतना अधिक किया गया था, किन्तु वह तब भी यह नहीं जान पाया; बल्कि उसने वैसा कुछ कहा। कुछ अनुभवी अभ्यासी कहते हैं: "गुरुजी, मुझे अपने पूरे शरीर में असुविधाजनक क्यों लगता है? मैं हमेशा अस्पताल में सुई लगवाने जाता हूँ, किन्तु इससे मदद नहीं मिलती। दवा लेने से भी कोई मदद नहीं मिलती।" मुझे ऐसा बताने में उन्हें संकोच भी नहीं हुआ! नि:संदेह, उनसे कोई मदद नहीं मिलेगी। वे रोग नहीं हैं। उनसे मदद कैसे मिल सकती है? आप जाकर अपना शारीरिक परीक्षण करा सकते हैं। आपको कुछ नहीं हुआ है, किन्तु आपको केवल असुविधाजनक महसूस होता है। हमारे बीच एक अभ्यासी है जो अस्पताल में कुछ सुइयाँ तोड़ चुका है। अन्त में, दवा निकल कर बाहर बह गई, और सुई तब भी अन्दर नहीं जा रही थी। उसे समझ आया : "ओह, मैं एक अभ्यासी हूँ, और मुझे सुई नहीं लगवानी चाहिए।" वह समझ गया कि उसे सुई नहीं लगवानी चाहिए। इसलिए, जब कभी आप कठिनाइयों के सम्मुख होते हैं, तो इस विषय को ध्यान में अवश्य रखें। कुछ लोग सोचते हैं कि मैं उन्हें अस्पताल जाने की अनुमति नहीं देता, इसलिए वे सोचते हैं : "यदि आप मुझे अस्पताल नहीं जाने देते, तो मैं किसी चीगोंग गुरु के पास जाऊँगा।" वे अब भी इसे एक रोग मानते हैं और चीगोंग गुरु को दिखाना चाहते हैं। वे एक सच्चा चीगोंग गुरु कहाँ पायेंगे? यदि आप किसी पाखण्डी के पास जाते हैं, आप तुरन्त ही बर्बाद हो जायेंगे।

हम कह चुके हैं : "आप एक पाखण्डी चीगोंग गुरु और एक सच्चे गुरु में कैसे भेद करेंगे?" अनेक चीगोंग गुरु स्व-घोषित होते हैं। मेरा परीक्षण किया जा चुका है और मेरे पास वैज्ञानिक संस्थानों के परीक्षण दस्तावेज हैं। कई चीगोंग गुरु पाखण्डी और स्व-घोषित होते हैं। उनमें से अनेक झूठ बोलते हैं और लोगों को धोखा देते हैं। ऐसा पाखण्डी चीगोंग गुरु भी रोगों को ठीक कर सकता है। वह ऐसा क्यों कर सकता है? यह व्यक्ति किसी प्रेत या पशु द्वारा ग्रसित है जिसके बिना वह लोगों को धोखा नहीं दे सकेगा! वह ग्रसित करने वाला प्रेत या पशु भी शक्ति निष्कासित कर सकता है और रोगों को ठीक कर सकता है। क्योंकि यह एक प्रकार की शक्ति है, यह साधारण लोगों पर सरलता से प्रभाव डाल सकती है। किन्तु मैं कह चुका हूँ, "वह ग्रसित करने वाला प्रेत या पशु आपको क्या देगा जब वह आपके रोग का उपचार करता है?" बहुत सूक्ष्म स्तर पर, यह सब उस ग्रसित करने वाले प्रेत या पशु का प्रतिरूप होता है। यदि यह आपको दिया जाता है, आप क्या करेंगे? "किसी देव को आमंत्रित करना सरल है किन्तु वापस भेजना कठिन।"4 हमें साधारण लोगों की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे केवल साधारण लोग बने रहना चाहते हैं और अस्थाई समाधान पाते हैं। आप, हालांकि, एक अभ्यासी हैं। क्या आप निरन्तर अपने शरीर को शुध्द नहीं करना चाहते? यदि यह आपके शरीर पर आ जाता है, आप इससे कब छुटकारा पायेंगे? इसके अतिरिक्त, इसके पास कुछ मात्रा में शक्ति भी होती है। कुछ लोग आश्चर्य करते हैं : "फालुन इसे आने ही क्यों देता है? क्या हमारी रक्षा के लिए हमारे पास गुरु के फा-शरीर नहीं हैं?" हमारे ब्रह्माण्ड में एक नियम है: यदि आप स्वयं कुछ चाहते हैं तो इसमें कोई भी हस्तक्षेप नहीं करेगा। जब तक आप इसी को चाहते हैं, इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा। मेरा फा-शरीर आपको रोकेगा और आपको संकेत देगा। यदि उसे लगता है कि आप हमेशा इसी प्रकार हैं, यह इसके बाद आपकी देख-रेख नहीं करेगा। किसी को साधना अभ्यास करने के लिए बाध्य कैसे किया जा सकता है? आपको साधना का अभ्यास करने के लिए मनाया या बाध्य नहीं किया जा सकता। यह आप पर निर्भर करता है कि आप सच्चे रूप से विकास करें। कोई इस बारे में कुछ नहीं कर सकता यदि आप स्वयं अपने में सुधार नहीं लाना चाहते। आपको नियम और फा सिखा दिये गये हैं। आप किसे दोषी ठहरा सकते हैं यदि आप अब भी स्वयं का सुधार नहीं करना चाहते। जहाँ तक यह बात है कि आप क्या चाहते हैं, फालुन और मेरा फा-शरीर दोनों ही इसमें हस्तक्षेप नहीं करेंगे- यह निश्चित है। कुछ लोग दूसरे चीगोंग गुरुओं की कक्षाओं में भी गये और घर वापस जाने पर उन्हें बहुत असुविधाजनक लगा। यह निश्चित था। मेरे फा-शरीर ने आपकी रक्षा क्यों नहीं की? आप वहांँ किसलिए गये थे? वहाँ जाकर सुनने के लिए, क्या आप कुछ खोजना नहीं चाहते थे? यदि आपने अपने कानों से नहीं सुना, तो यह आपके शरीर में प्रवेश कैसे कर गया? कुछ लोगों ने अपने फालुन विकृत कर लिये हैं। मैं आपको बताना चाहूँगा कि यह फालुन आपके जीवन से भी अधिक मूल्यवान है। यह एक उच्च जीवन है जिसे मन चाहे बर्बाद नहीं किया जा सकता। आज-कल बहुत से पाखण्डी चीगोंग गुरु हैं, और उनमें से कुछ बहुत जाने-माने हैं। मैं चीन चीगोंग विज्ञान शोध संस्थान में प्रबंधकों को बता चुका हूँ कि प्राचीन समय में, शाही दरबार में एक बार दा जी5 का उपद्रव रहा था। उस भेड़िये ने बहुत से दुराचार किये थे, किन्तु यह तब भी उतना बुरा नहीं था जितने आज के पाखण्डी चीगोंग गुरु हैं जिन्होंने पूरे देश को नुकसान पहुँचाया है। कितने लोगों को शिकार बनाया जा चुका है?! आप देखें तो सतही रूप से यह बहुत अच्छा जान पड़ता है, किन्तु कितने लोग उस प्रकार की वस्तुओं को अपने शरीरों पर लिये हुए हैं? यदि वे इसे आपको दे देते हैं, यह आपके पास आ जायेगी- वे बहुतायत में हैं। इसलिए साधारण व्यक्ति के लिए सतही रूप से भेद करना कठिन है।

कुछ लोग सोच सकते हैं : "इस चीगोंग गोष्ठी में आने के बाद और जो ली होंगज़ी ने आज कहा वह सुनने के बाद, मैं समझ गया हूँ कि चीगोंग कितना महान और प्रगाढ़ है! यदि कुछ और चीगोंग गोष्ठियाँ आयोजित होती हैं, मुझे उनमें भी जाना चाहिए।" मैं कहूँगा कि आपको निश्चित ही वहाँ नहीं जाना चाहिए। यदि आप उन्हें सुनते हैं, बुरी वस्तुएँ आपके कानों में प्रवेश करेंगी। किसी व्यक्ति को बचाना और उसके विचार को बदलना दोनों ही बहुत ही कठिन है। किसी व्यक्ति के शरीर को शुध्द करना भी बहुत कठिन होता है। पाखण्डी चीगोंग गुरु बहुत अधिक संख्या में हैं। जहाँ तक किसी उचित पध्दति के सच्चे चीगोंग गुरु की बात है, क्या वह वास्तव में शुध्द है? कुछ पशु बहुत दुष्ट होते हैं। हालांकि वे वस्तुएँ उसके शरीर पर नहीं आ सकतीं, किन्तु न ही वह उन्हें दूर भगा सकता है। यह व्यक्ति, और विशेष रूप से उसके शिष्यों के पास, उन वस्तुओं को बड़े स्तर पर ललकारने का सामर्थ्य नहीं होता। जब वह गोंग निष्कासित करता है, इसमें सब प्रकार की गन्दली वस्तुएँ मिली होती हैं। हालांकि वह स्वयं पवित्र हो सकता है, उसके शिष्य उचित नहीं हैं और विभिन्न प्रकार के प्रेतों और पशुओं द्वारा ग्रसित हैं- जो सब प्रकार के हैं।

यदि आप वास्तव में फालुन दाफा में अभ्यास करना चाहते हैं, आपको जा कर उन्हें नहीं सुनना चाहिए। नि:संदेह, यदि आप फालुन दाफा में साधना अभ्यास नहीं करना चाहते और सभी कुछ अभ्यास करना चाहते हैं, आप ऐसा कर सकते हैं; मैं आपको नहीं रोकूँगा, क्योंकि आप तब एक फालुन दाफा शिष्य भी नहीं हैं। यदि कुछ गलत होता है, तो यह न कहें कि यह फालुन दाफा अभ्यास के कारण हुआ है। केवल जब आप नैतिकगुण आदर्श का पालन करते हैं और दाफा के अनुसार साधना अभ्यास करते हैं तभी आप एक सच्चे फालुन दाफा अभ्यासी हैं। किसी ने पूछा है : "क्या मैं दूसरी चीगोंग पध्दतियों के अभ्यासियों के साथ सम्मिलित हो सकता हूँ?" मैं आपको बताना चाहूँगा कि वे केवल चीगोंग का अभ्यास कर रहे हैं जबकि आप दाफा में साधना का अभ्यास कर रहे हैं। इस कक्षा को पूर्ण करने के पश्चात, आप स्तरों की दृष्टि से उन्हें कहीं पीछे छोड़ देंगे। यह फालुन अनेकों पीढ़ियों के साधना अभ्यास द्वारा उत्पन्न हुआ है और इसकी शक्तियाँ महान हैं। निश्चित ही, जब आप उनके संपर्क में आते हैं, यदि आप ध्यान रखते हैं कि आप उनसे कुछ वस्तु लेते या प्राप्त नहीं करते और केवल साधारण मित्र बने रहते हैं, तो कोई अन्तर नहीं पड़ेगा। यदि वे लोग वास्तव में कुछ धारण किये हैं तो यह बहुत बुरा होगा, और अच्छा यह है कि उनसे कोई संपर्क न रखा जाये। जहाँ तक पति-पत्नी की बात है, मैं सोचता हूँ कि इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता यदि आपका पति या पत्नी कोई दूसरा चीगोंग अभ्यास करते हैं। किन्तु एक बात है : क्योंकि आप एक उचित मार्ग में अभ्यास करते हैं, आपका अभ्यास औरों को लाभ पहुँचायेगा। यदि आपका पति या पत्नी कोई दुष्ट अभ्यास करते हैं, उसके शरीर पर कुछ बुरी वस्तुएँ हो सकती हैं। आपकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, उसका भी शोधन करना आवश्यक है। आपके लिए दूसरे आयामों में सभी कुछ साफ किया जायेगा। आपके घर के वातावरण को भी स्वच्छ किया जायेगा। यदि आपके वातावरण को स्वच्छ नहीं किया जाता और आपके साथ सभी प्रकार की वस्तुएँ विघ्न डालती हैं, आप साधना अभ्यास कैसे कर पायेंगे?

किन्तु एक परिस्थिति हैं जिसमें मेरा फा-शरीर वस्तुओं का शोधन नहीं करेगा। एक अभ्यासी है जिसने एक दिन मेरे फा-शरीर को अपने घर आते हुए देखा। वह बहुत उत्साहित था : "गुरु के फा-शरीर यहाँ हैं। गुरुजी, कृपया अन्दर आ जाइये।" मेरे फा-शरीर ने कहा : "तुम्हारा कमरा बहुत गंदा है, और यहाँ बहुत सी वस्तुएँ हैं।" तब, यह लौट गया। अक्सर, जब दूसरे आयामों में कई दुष्ट प्रेत होते हैं, मेरा फा-शरीर आपके लिए उन्हें साफ कर देता है। उसका कमरा, हालांकि, विभिन्न बुरी चीगोंग पुस्तकों से भरा था। वह यह समझ गया और पुस्तकों को जला या बेचकर इसे साफ कर दिया। मेरा फा-शरीर तब वापस आ गया। इस अभ्यासी ने मुझे यह बताया।

ऐसे भी लोग हैं जो भविष्य बताने वालों से मिलते हैं। किसी ने मुझसे पूछा है : "गुरुजी, मैं अब फालुन दाफा का अभ्यास कर रहा हूँ। मैं जादू-टोने या भविष्य बताने जैसे विषयों में बहुत रुचि रखता हूँ। क्या मैं उन्हें अब भी प्रयोग कर सकता हूँ?" मैं इसे इस प्रकार कहूँगा : यदि आपके पास बहुत सी शक्ति है, जो कुछ आप कहेंगे उसका एक प्रभाव होगा। यदि कुछ इस प्रकार नहीं होना है, किन्तु आप किसी को बता चुके हैं कि यह इस प्रकार होगा, तो हो सकता है आप से एक बुरा काम हो गया है। एक साधारण व्यक्ति बहुत कमजोर होता है। उसके विचार अव्यवस्थित और परिवर्तनशील होते हैं। यदि आप अपना मुंह खोलें और उसे कुछ कह दें, तो वह विपत्ति सच में हो सकती है। यदि इस व्यक्ति के पास बहुत सा कर्म है जिसका उसे भुगतान करना है, और आप उसे बताते रहते हैं कि उसका भविष्य शुभ होगा, तो क्या इसकी अनुमति होगी जबकि वह अपने कर्म का भुगतान करने में असमर्थ है? क्या आप उसे हानि नहीं पहुंँचा रहे हैं? कुछ लोग इन वस्तुओं को छोड़ ही नहीं पाते और उनसे इस प्रकार जकड़े रहते हैं जैसे उनमें कोई विशेष योग्यता हो। क्या यह एक मोहभाव नहीं है? इसके अतिरिक्त, यदि आप वास्तव में सत्य जानते भी हों, एक अभ्यासी की भाँति आपको अपना नैतिकगुण संभालना चाहिए और किसी दिव्य रहस्य को अकारण एक साधारण व्यक्ति को नहीं बताना चाहिए। यह सिध्दान्त है। भले ही कोई जादू-टोने को भविष्य बताने के लिए कैसे भी प्रयोग करे, इसमें से कुछ पहले ही सत्य नहीं है। किसी एक या दूसरे प्रकार भविष्य बताना जिसमें कुछ सही है और कुछ गलत, इस प्रकार भविष्य बताने की साधारण मानव समाज में अनुमति रही है। क्योंकि आपके पास सच्चा गोंग है, मैं कहूँगा कि एक सच्चे अभ्यासी को एक उच्च आदर्श का पालन करना चाहिए। किन्तु कुछ अभ्यासी अपना भविष्य जानने के लिए दूसरे लोगों को ढूंढते हैं और पूछते हैं : "क्या मेरा भविष्य देख कर बताएँगे कि मेरा क्या होगा? मेरा साधना अभ्यास कैसा चल रहा है? या मेरे सामने कुछ विपत्तियाँ आएँगी?" वे ये बातें जानने के लिए औरों के पास जाते हैं। यदि आपकी उस विपत्ति के बारे में पहले से पता लग जाए, तो आप अपने में कैसे सुधार ला पायेंगे? एक अभ्यासी का पूरा जीवन पुनर्व्यवस्थित किया जा चुका है। व्यक्ति के हाथ की रेखाएँ, चेहरा, जन्मकुण्डली और व्यक्ति के शरीर के सभी संदेश पहले ही भिन्न हैं और बदले जा चुके हैं। यदि आप एक भविष्य बताने वाले के पास जाते हैं, आप उस पर विश्वास कर लेंगे। अन्यथा आप ऐसा क्यों करेंगे? जो वह बता सकता है वह आपके पिछले समय की छोटी-मोटी बातें हैं किन्तु उनका सार पहले ही बदल चुका है। तब आप सभी यह सोचें : यदि आप किसी भविष्य बताने वाले के पास जाते हैं, क्या आप उसे सुनकर विश्वास नहीं कर रहे? तब, क्या यह आप पर एक मानसिक दबाव उत्पन्न नहीं करता? यदि आप इसके बारे में सोच कर अपने पर दबाव डालें क्या यह मोहभाव नहीं है? तब इस मोहभाव को कैसे हटाया जा सकता है? क्या आपने स्वयं अपने ऊपर एक अतिरिक्त कठिनाई नहीं ले ली है? क्या आपको इस मोहभाव को छोड़ने के लिए और दु:ख नहीं उठाना पड़ेगा? प्रत्येक परीक्षा या प्रत्येक कठिनाई साधना में ऊपर उठने या गिरने से संबंधित है। यह पहले ही कठिन है, किन्तु आपने तब भी स्वयं यह कठिनाई ओढ़ ली है। आप इससे कैसे बाहर आ सकते हैं? इसके परिणामस्वरूप आपके सामने कठिनाईयाँ या समस्याएँ आ सकती हैं। आपके बदले हुए जीवन के पथ को किसी दूसरे के द्वारा देखने की अनुमति नहीं है। यदि इसे कोई और देख लेता है या यदि आपको बता दिया जाता है कि आपके सामने कब कठिनाई आयेगी, तो आप साधना का अभ्यास कैसे कर सकेंगे? इसलिए, इसे देखने की अनुमति बिल्कुल नहीं है। न ही, कोई किसी दूसरी अभ्यास पध्दति से संबंधित व्यक्ति इसे देख सकता है। समान अभ्यास पध्दति से संबंधित साथ के शिष्य भी इसे नहीं देख सकते। कोई भी इसके बारे में ठीक प्रकार नहीं बता सकता, क्योंकि इस प्रकार का जीवन बदला जा चुका है और यह साधना अभ्यास के लिए है।

किसी ने मुझसे पूछा कि क्या वह दूसरी धार्मिक पुस्तकें और दूसरी चीगोंग की पुस्तकें पढ़ सकता है। हम कह चुके हैं कि धार्मिक पुस्तकें, विशेष रूप से बुध्दमत संबंधित, सभी लोगों को सिखाती है कि नैतिकगुण की साधना कैसे की जाए। हम भी बुध्द विचारधारा से संबंधित हैं, इसलिए इसमें कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। किन्तु यह स्पष्ट करना आवश्यक है : भाषा अनुवाद के दौरान धर्मशास्त्रों की बहुत-सी वस्तुओं का सही अनुवाद नहीं हुआ। इसके अतिरिक्त, शास्त्रों के विभिन्न स्तरों के दृष्टिकोण से कई भावार्थ भी बनाए गए, और बिना समझे टिप्पणियाँ बनाई गईं। यह धर्म को बर्बाद करने जैसा है। वे लोग जिन्होंने बिना समझे शास्त्रों के भावार्थ बनाए वे बुध्द स्तर से कहीं दूर थे; वे शास्त्रों का वास्तविक सार नहीं जानते थे। इसलिए, उनकी विषयों के बारे में विभिन्न समझ रहती थी। आपके लिए उन्हें पूर्ण रूप से समझना बहुत सरल नहीं होगा, और आप स्वयं उन्हें नहीं समझ सकेंगे। किन्तु यदि आप कहते हैं : "मैं केवल शास्त्रों को पढ़ने में रुचि रखता हूँ," और आप सदैव शास्त्र पढ़ते हैं, तो आप उस अभ्यास पध्दति में अभ्यास कर रहे होंगे, क्योंकि शास्त्रों में भी उस अभ्यास पध्दति का गोंग और फा सम्मिलित है। एक बार आप उसे पढ़ते हैं, तो आप उस साधना पध्दति से अभ्यास कर रहे होंगे। इसमें यह विषय है। यदि आप इसे गहनता से पढ़ते हैं और उस अभ्यास पध्दति का अनुसरण करते हैं, हो सकता है आपने उस अभ्यास पध्दति को अपना लिया है न कि हमारी। पूरे इतिहासकाल में, साधना अभ्यास में यह आवश्यक रहा है कि व्यक्ति एक समय में दो अभ्यास पध्दतियों को न अपनाए। यदि आप वास्तव में इस अभ्यास पध्दति में अभ्यास करना चाहते हैं, आपको केवल इस अभ्यास पध्दति की पुस्तकें पढ़नी चाहिएँ।

जहाँ तक चीगोंग पुस्तकों का प्रश्न है, यदि आप साधना अभ्यास करना चाहते हैं तो आपको उन्हें नहीं पढ़ना चाहिए। विशेष रूप से आज-कल प्रकाशित होने वाली चीगोंग पुस्तकें, आपको उन्हें नहीं पढ़ना चाहिए। यह इस प्रकार की पुस्तकें जैसे पीले शासक की आन्तरिक रसायनशास्त्र की कृति शिंगमिंग गुइजी, या ताओ ज़ांग के लिए भी सच है। यद्यपि उनमें वे बुरे संदेश समाहित नहीं होते, किन्तु उनमें भी विभिन्न आयामों के संदेश होते हैं। वे स्वयं भी साधना अभ्यास के मार्ग हैं। एक बार उन्हें आप पढ़ते हैं, वे आपको कुछ देंगे और आपके साथ व्यावधान करेंगे। यदि आपको उनका कोई वाक्य अच्छा लगता है, तो कुछ आकर आपके गोंग में जुड़ जाएगा। हालांकि यह कुछ बुरा नहीं है, यदि आपको कुछ और अचानक दे दिया जाता है आप कैसे साधना अभ्यास करेंगे? क्या इससे समस्याएँ उत्पन्न नहीं होंगी? यदि आप एक टेलीविजन के इलेक्ट्रोनिक भाग में एक अतिरिक्त पुर्जा लगा दें, तो आप क्या समझते हैं इस टेलीविजन का क्या होगा? यह तुरन्त ही खराब हो जाएगा। यह सिध्दान्त है। इसके अतिरिक्त, आजकल अनेक चीगोंग पुस्तकें गलत हैं और उनमें विभिन्न संदेश समाहित हैं। जैसे हमारा एक अभ्यासी एक चीगोंग पुस्तक के पन्ने पलट रहा था, इसमें से एक बड़ा सर्प निकल कर बाहर आया। निश्चित ही, मैं इसके बारे में विस्तार से चर्चा नहीं करूँगा। जो मैंने अभी बताया वे कुछ समस्याएँ हैं जो अभ्यासियों द्वारा स्वयं उचित आचरण न रख पाने के कारण उत्पन्न होती हैं; अर्थात्, वे समस्याएँ एक अनुचित मन द्वारा उत्पन्न होती हैं। इससे लाभ होगा कि हम उनके बारे में बताएँ और हर किसी को जानने दें कि क्या करें और उन्हें कैसे पहचाने जिससे भविष्य में समस्याएँ उत्पन्न न हों। यद्यपि जो मैंने अभी कहा है बहुत जोर डाल कर नहीं कहा है, सभी को इस पर अवश्य ध्यान देना चाहिए। क्योंकि इस विषय पर अक्सर समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, और वे अक्सर इससे संबंधित होती हैं। साधना अभ्यास अत्यन्त कठिन और बहुत गंभीर है। यदि आप एक पल के लिए भी लापरवाह होते हैं, आप लड़खड़ा सकते हैं और तुरन्त बर्बाद हो सकते हैं। इसलिए, व्यक्ति का मन उचित होना चाहिए।

युध्द-कला चीगोंग

आन्तरिक साधना अभ्यासों के अतिरिक्त, युध्द-कला चीगोंग भी होती है। युध्द-कला चीगोंग की बात की जाए तो, मैं एक विषय पर जोर डालूँगा कि साधकों के समुदाय में अब अनेक चीगोंग स्वरूप दावा पेश कर रहे हैं।

अब यहाँ तथाकथित चित्रकला चीगोंग, संगीत चीगोंग, सुलेखन चीगोंग, और नृत्य चीगोंग- सभी प्रकार के हैं। क्या वे चीगोंग हैं? मुझे यह बहुत विचित्र लगता है। मैं कहूँगा कि यह चीगोंग को लूटने जैसा है। यह न केवल चीगोंग को लूटने जैसा है, किन्तु सरल शब्दों में चीगोंग को बर्बाद करने जैसा है। उनका सैध्दान्तिक आधार क्या है? यह कहा जाता है कि जब कोई चित्र बनाता है, गाता है, नृत्य करता है, या लिखता है, उसे अचेतन अवस्था या तथाकथित चीगोंग अवस्था में होना चाहिए। क्या इससे यह चीगोंग बन जाता है? इसे इस प्रकार नहीं समझना चाहिए। क्या यह चीगोंग को बर्बाद करना नहीं है? चीगोंग मानव शरीर की साधना की एक विस्तृत और प्रगाढ़ शिक्षा है। ओह, अचेतन अवस्था में होने को चीगोंग कैसे कहा जा सकता है? तब, इसे क्या कहा जाएगा यदि हम स्नानागार में अचेतन अवस्था में जाएँ? क्या यह चीगोंग को बर्बाद करना नहीं है? मैं इसे चीगोंग का अपमान करना कहूँगा। दो वर्ष पहले पूर्वी स्वास्थ्य प्रदर्शनी में, तथाकथित सुलेखन चीगोंग सम्मिलित था। सुलेखन चीगोंग क्या होता है? मैं वहाँ देखने के लिए गया और वहाँ एक व्यक्ति को लिखते हुए देखा। लिखने के बाद, उसने अपने हाथों से प्रत्येक शब्द को अपनी ची दी, और छोड़ी गई ची पूरी तरह काली थी। उसका मन धन और प्रसिध्दि से भरा था। उसके पास गोंग कैसे हो सकता था? उसकी ची भी अच्छी नहीं हो सकती थी। उसके लेखन महंगे दामों के साथ टंगे थे। किन्तु वे सब विदेशियों को बेचे गए। मैं कहूँगा कि जिस किसी ने उन्हें खरीदा होगा वह दयनीय होगा। काली ची कैसे अच्छी हो सकती है? उस व्यक्ति का पूरा चेहरा गहरे रंग का लग रहा था। उसे धन की लालसा थी और केवल धन के बारे में सोचता था- उसके पास गोंग कैसे हो सकता था? तब भी, उस व्यक्ति के परिचय पत्र पर ढेरों पदवियाँ लिखी थीं, जैसे अमुक अन्तर्देशीय सुलेखन चीगोंग। मैं पूछता हूँ कि इस प्रकार की वस्तु को चीगोंग कैसे कहा जा सकता है?

इसके बारे में आप सब सोचें : इस कक्षा के अस्सी से नब्बे प्रतिशत लोगों के न केवल रोग ठीक हो जाएंगे, बल्कि उनका गोंग भी उत्पन्न होगा- सच्चा गोंग। जो आपके शरीर में है वह पहले ही दिव्य है। यदि आप स्वयं साधना का अभ्यास करते हैं, एक पूरे जीवनकाल में भी आप इसे साधना द्वारा उत्पन्न नहीं करेंगे। यदि एक युवक अभ्यास को अभी आरम्भ करता है, इस जीवन काल में वह वो उत्पन्न नहीं कर सकेगा जो मैंने दिया है, और उसे तब भी एक सच्चे, पवित्र गुरु की आवश्यकता होगी। हमें इस फालुन और इन यन्त्रों को बनाने में अनेक जीवनकाल लगे हैं। इन वस्तुओं को आपके शरीर में एक साथ स्थापित किया जाता है। इसलिए, मैं आपको बता रहा हूँ कि आप इसे सरलता से न खो दें क्योंकि आपने इसे सरलता से प्राप्त किया है। वे अत्यन्त कीमती और अनमोल हैं। इस कक्षा के बाद, जो आपके पास होगा वह वास्तविक गोंग है, एक उच्च शक्ति पदार्थ। जब आप घर जाएंगे और कुछ शब्द लिखेंगे- भले ही आपका लेखन कैसा भी हो- इसमें गोंग होगा! इस प्रकार, क्या इस कक्षा में सभी को "गुरु" की पदवी दी जाए, और सब सुलेखन चीगोंग गुरु बन जाएँ? मैं कहूँगा कि इसे इस प्रकार नहीं समझना चाहिए। क्योंकि आपके पास गोंग और शक्ति है, आपको इसे जान बूझकर देने की आवश्यकता नहीं है; आप जो कुछ छूएंगे उस पर आप शक्ति छोड़ जाएंगे, और यह सब उज्जवल चमकेगा।

मैंने एक पत्रिका में एक समाचार पढ़ा जिसमें बताया गया था कि एक सुलेखन चीगोंग कक्षा होने जा रही है। मैंने इसे संक्षेप में यह देखने के लिए पढ़ा कि यह कैसे सिखाया जाएगा। यह लिखा था कि व्यक्ति को पहले अपना श्वास अन्दर लेने और बाहर निकालने को नियन्त्रित करना होगा। उसके बाद, व्यक्ति को पन्द्रह से तीस मिनट बैठना होगा, जिसमें वह तानत्येन की ची पर अपना मन केन्द्रित करे और कल्पना कर तानत्येन की ची को उठा कर बांह में लाए। तब, उसे कूची उठा लेनी चाहिए और इसे काली स्याही में डुबाना चाहिए। इसके बाद उसे ची को कूची की नोक पर ले जाना चाहिए। जब व्यक्ति का मनोभाव वहाँ पहँचता है, वह लिखना आरम्भ कर सकता है। ओह, यदि कोई ची को कहीं ले जा सकता है, क्या उसे चीगोंग मान लेना चाहिए? उस प्रकार, भोजन करने से पहले हमें कुछ देर ध्यान में बैठना चाहिए। तब हमें चोपस्टिक उठानी चाहिए और भोजन करने के लिए ची को हमारी चोपस्टिक की नोक तक ले जाना चाहिए। उसे भोजन चीगोंग कहा जाएगा, क्या नहीं? जो हम खाएँगे उसमें भी शक्ति होगी। हम केवल इस विषय पर टिप्पणी कर रहे हैं। मैं उसे चीगोंग का अपमान करना कहूँगा, क्योंकि वे चीगोंग को इतना उथला मानते हैं। इसलिए लोगों को इसे इस प्रकार नहीं समझना चाहिए।

युध्द कला चीगोंग को, यद्यपि, पहले ही एक स्वतन्त्र चीगोंग अभ्यास माना जा सकता है। ऐसा क्यों है? क्योंकि इसकी कई हजार वर्ष की धरोहर है, साधना सिध्दान्तों की एक संपूर्ण प्रणाली है, और साधना पध्दतियों की एक संपूर्ण प्रणाली है, इसे एक संपूर्ण प्रणाली माना जा सकता है। इसके बावजूद, युध्द कला चीगोंग आन्तरिक साधना अभ्यासों में सबसे निम्न स्तर पर आता है। कठोर चीगोंग एक प्रकार का समूह शक्ति पदार्थ है जो केवल प्रहार करने और मारने के लिए है। मैं आपको एक उदाहरण देना चाहूँगा। हमारी फालुन दाफा कक्षा में आने के बाद, बीजिंग में एक अभ्यासी अपने हाथ से कुछ दबा नहीं सकता था। जब वह एक बच्चा-गाड़ी खरीद रहा था, वह आश्चर्यचकित था कि जब उसने बच्चा-गाड़ी की मजबूती अपने हाथों से जांची तो वह टूट कर गिर गई। जब वह घर गया और एक कुर्सी पर बैठा, वह इसे अपने हाथों से नहीं दबा सका। यदि वह दबाता, तो कुर्सी टूट जाती। उसने मुझसे पूछा यह क्या हो रहा है। मैंने उसे नहीं बताया क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि उसे कोई मोहभाव उत्पन्न हो। मैंने केवल कहा कि यह सब प्राकृतिक है, इसे होने दे, और भूल जाए क्योंकि यह सब अच्छा है। यदि उस दिव्य सिध्दि को उचित प्रकार प्रयोग किया जाए, एक पत्थर के टुकड़े को हाथ की चुटकी से चूर-चूर किया जा सकता है। क्या यह कठोर चीगोंग नहीं है? यद्यपि, उसने कभी कठोर चीगोंग को अभ्यास नहीं किया था। आन्तरिक साधना अभ्यासों में, ये दिव्य सिध्दियाँ अक्सर उत्पन्न हो सकती हैं। किन्तु क्योंकि व्यक्ति के लिए अपने नैतिकगुण को संभालना कठिन होता है, उसे अक्सर उनके प्रयोग की अनुमति नहीं होती भले ही वे उत्पन्न हो गई हों। विशेष रूप से, साधना अभ्यास के निम्न स्तर पर, व्यक्ति के नैतिकगुण में सुधार नहीं हुआ होता है। इस प्रकार, दिव्य सिध्दियाँ जो निम्न स्तर पर उत्पन्न होती हैं वे बिल्कुल प्रदान नहीं की जातीं। जैसे समय बीतता है और आपके स्तर में सुधार होता है, इन वस्तुओं का कोई उपयोग नहीं रहता और उन्हें प्रदान करने की आवश्यकता नहीं रहती।

युध्द कला चीगोंग का विशिष्ट रूप से कैसे अभ्यास किया जाता है? युध्द कला चीगोंग के अभ्यास में, व्यक्ति को अपनी ची नियन्त्रित करनी चाहिए, किन्तु आरम्भ में ची को नियन्त्रित करना सरल नहीं होता। यद्यपि व्यक्ति ची को नियन्त्रित करना चाहता है, हो सकता है वह ऐसा न कर सके। तब उसे क्या करना चाहिए? उसे अपने हाथों, अपनी छाती के दोनों ओर, अपने पैर, टांगों, बाहों और सिर का व्यायाम करना चाहिए। वह उनका व्यायाम कैसे करे? कुछ लोग एक वृक्ष पर अपने हाथों या हथेली से प्रहार करते हैं, और कुछ लोग अपने हाथों से पत्थर पर प्रहार करते हैं। इस प्रकार का संपर्क हड्डियों के लिए कितना दु:खदायी होता होगा, क्योंकि कुछ बल लगने से ही उनमें रक्त बहने लगेगा! ची को अभी भी नियन्त्रित नहीं किया जा सकता। क्या किया जाना चाहिए? व्यक्ति अपनी बाहों को गोल घुमाना आरम्भ करता है जिससे रक्त बाहों के पीछे की ओर चला जाए, और इस प्रकार उसकी बाहें और हाथ सूज जाएंगे। वे वास्तव में सूज जाएंगे। उसके बाद, जब वह एक पत्थर पर हाथ मारता है, तो हड्डियों पर मोटी परत होगी और उनका पत्थर के साथ सीधा संपर्क नहीं होगा। इस प्रकार उन्हें उतना दर्द अनुभव नहीं होगा। जैसे व्यक्ति अभ्यास करता जाता है, गुरु इस व्यक्ति को सिखाएगा। जैसे समय बीतता है, वह ची को नियन्त्रित करना सीख जाएगा। हालांकि, केवल ची को नियन्त्रित करने की योग्यता बहुत नहीं है, क्योंकि एक वास्तविक लड़ाई में प्रतिद्वन्दि आपका इन्तजार नहीं करेगा। निश्चित ही, जब व्यक्ति ची को नियन्त्रित कर सकता है, वह प्रहार को झेल सकता है और एक मोटे डंडे के लगने से भी दर्द महसूस नहीं होगा। ची को बाहों की ओर भेजने पर, बाहें सूज जाएंगी। किन्तु आरम्भ में, ची सबसे साधारण वस्तु होती है और जैसे व्यक्ति निरन्तर अभ्यास करता है इसे एक उच्च शक्ति पदार्थ में परिवर्तित किया जा सकता है। जब इसे एक उच्च शक्ति पदार्थ में परिवर्तित किया जाता है, यह धीरे-धीरे बहुत घनत्व का एक शक्ति समूह बना लेती है, और यह शक्ति घनत्व प्रज्ञावान होता है। इसलिए, यह एक दिव्य सिध्दि का समूह होता है, या कहा जाए तो, एक प्रकार की दिव्य सिध्दि। तब भी, यह दिव्य सिध्दि केवल प्रहार करने और प्रहार को झेलने के लिए है। इसे रोगों को ठीक करने के लिए प्रयोग नहीं किया जा सकता। क्योंकि यह उच्च शक्ति पदार्थ दूसरे आयाम में होता है और हमारे आयाम में यात्रा नहीं करता, इसका समय हमारे समय से तीव्र होता है। जब आप किसी पर मुष्टी प्रहार करते हैं, आपको ची भेजने की या इसके बारे में सोचने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि गोंग पहले ही वहाँ होगा। जब आप किसी के प्रहार को झेलना चाहते हैं, तो गोंग वहाँ भी पहले ही होगा। भले ही आप कितना भी तीव्र प्रहार करें, यह आपसे पहले ही पहुंचेगा क्योंकि दोनों ओर समय की धारणाएँ भिन्न हैं। युध्द कला चीगोंग के अभ्यास द्वारा, व्यक्ति तथाकथित लौह-रेत पंजा, सिन्दूरी पंजा, वज्र पांव, और अरहत पैर को विकसित कर सकता है। ये साधारण लोगों की योग्यताएँ हैं। अभ्यास द्वारा, एक साधारण व्यक्ति इस स्तर को प्राप्त कर सकता है।

युध्द कला चीगोंग और आन्तरिक साधना अभ्यास में सबसे बड़ा अन्तर यह है कि युध्द कला चीगोंग में गति के साथ अभ्यास आवश्यक होता है; ची इस प्रकार त्वचा के नीचे प्रवाहित होती है। क्योंकि इसमें गति के साथ अभ्यास की आवश्यकता होती है, व्यक्ति शान्त अवस्था प्राप्त नहीं कर सकता, और न ही उसकी ची तानत्येन में प्रवेश करती है। उसकी ची त्वचा के नीचे और पेशियों के बीच प्रवाहित होती है। इसलिए, व्यक्ति न तो शरीर की साधना कर पाता है और न ही उच्च स्तर की सिध्दियों की। हमारे आन्तरिक साधना अभ्यास में शान्त अवस्था में अभ्यास करना आवश्यक होता है। पारम्परिक अभ्यासों में आवश्यक होता है कि ची उदर के निचले भाग में तानत्येन में प्रवेश करे। उनमें शान्त अवस्था में अभ्यास और मूल शरीर का रूपान्तरण आवश्यक होता है। वे शरीर की साधना कर सकते हैं और उच्च स्तरों पर साधना का अभ्यास प्रशस्त कर सकते हैं।

आपने उपन्यासों में युध्द-कला के कौशल जैसे सुनहरी घण्टी कवच, लौह वस्त्र परिधान, और चिनार के वृक्ष को सौ गज की दूरी से भेदना, आदि के बारे में पढ़ा होगा। सूक्ष्म युध्द-कला द्वारा, व्यक्ति उच्च स्थानों पर आ-जा सकता है। कुछ दूसरे आयाम में भी प्रवेश कर सकते हैं। क्या इस प्रकार की युध्द-कला का अस्तित्व है? हाँ, निश्चित ही है। किन्तु उनका अस्तित्व साधारण लोगों के बीच नहीं है। जिन्होंने वास्तव में इतनी उत्कृष्ट युध्द-कला की साधना की है वे इसका सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं कर सकते। क्योंकि इस प्रकार का व्यक्ति केवल युध्द-कला का अभ्यास नहीं करता और वह साधारण लोगों के स्तर से पूरी तरह आगे है, उसके लिए आवश्यक है कि वह आन्तरिक साधना अभ्यास द्वारा साधना का अभ्यास करे। उसके लिए नैतिकगुण का मान रखना और उसमें सुधार करना आवश्यक है। उसे भौतिक लाभ जैसी वस्तुओं पर कम धयान देना चाहिए। हालांकि, वह इस प्रकार की युध्द-कला की साधना कर सकता है, वह इसके बाद उन्हें सहज ही साधारण लोगों के बीच प्रयोग नहीं कर सकता। इसकी अनुमति है यदि वह उनका तब प्रयोग करे जब कोई देख न रहा हो। उन उपन्यासों को पढ़ते समय, आप पायेंगे कि पात्र किसी गुप्त तलवारबाजी दस्तावेज, खजाने, या औरतों के लिए लड़ाई और हत्या करता है। सभी को महान कौशल युक्त दर्शाया जाता है, जो रहस्यमय तरीके से आते-जाते रहते हैं। आप सब यह सोचें : वे लोग जिनके पास वास्तव में ये युध्द-कला कौशल हैं क्या उन्हें इनको प्राप्त करने के लिए आन्तरिक साधना अभ्यास नहीं करना पड़ेगा? वे इन्हें केवल अपने नैतिकगुण की साधना द्वारा प्राप्त कर सकते हैं, और यह आवश्यक है कि वे प्रसिध्दि, लाभ, और विभिन्न इच्छाओं में बहुत पहले से ही रुचि न रखते हों। वे दूसरों की हत्या कैसे कर सकते हैं? उनका धन और संपत्ति की ओर इतना धयान कैसे हो सकता है? यह बिल्कुल असंभव है। वे केवल कपोल कल्पनाएँ हैं। लोग केवल मनो-विनोद के पीछे जाते हैं और उस इच्छा के लिए कुछ भी करते हैं। लेखक इस बात का लाभ उठाते हैं और वह सब लिखने का प्रयास करते हैं जो आप खोज रहे हैं या आपको अच्छा लगता है। लेखन जितना अविश्वसनीय होता है, उतना ही अधिक आप उसे पढ़ना चाहते हैं। वे केवल कपोल कल्पनाएँ हैं। वे जिनके पास वास्तव में ऐसे युध्द-कला कौशल हैं, इस प्रकार व्यवहार नहीं करेंगे। विशेष रूप से, वे उनका सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं करेंगे।

दिखावे की मानसिकता

साधारण लोगों के बीच साधना अभ्यास करने के कारण, हमारे बहुत से अभ्यासी अपने कई मोहभाव नहीं छोड़ पाते। कई मोहभाव स्वभाव में ही आ जाते हैं, और ये लोग स्वयं उन्हें नहीं पहचान पाते। दिखावे की यह मानसिकता किसी भी स्थिति में प्रकट हो सकती है; यह कोई अच्छा कार्य करते समय भी उभर सकती है। प्रसिध्दि, निजी लाभ, और कुछ प्रोत्साहन प्राप्त करने के लिए, कुछ लोग अक्सर अपने बारे में डींगें हाँकते हैं और दिखावा करते हैं : "मैं बहुत सक्षम और आगे रहने वाला हूँ।" हमारे पास ऐसे भी उदाहरण हैं जिसमें जो लोग दूसरों से कुछ अच्छा अभ्यास करते हैं, जिनकी दिव्य-नेत्र दृष्टि बेहतर है, या जिनके व्यायाम की मुद्राएँ बेहतर दिखती हैं वे भी दिखावा करना चाहते हैं।

यदि कोई कहता है : "मैंने गुरु ली से कुछ सुना है।" लोग इस व्यक्ति को घेर लेंगे और वह जो कहता है उसे सुनेंगे। वह सुनी हुई अफवाह बताएगा जिसमें उसने अपनी समझ भी डाल दी है। इसका क्या प्रयोजन है? यह उसके दिखावे के लिए है। कुछ ऐसे लोग हैं जो बहुत रुचि के साथ एक-दूसरे के बीच अफवाह फैलाते हैं, जैसे वे बहुत जानकार हों, और जैसे हमारे बहुत से अभ्यासी उतना न समझते या जानते हों जितना वे। मन ही मन, उनकी यह केवल दिखावे की मानसिकता है। अन्यथा, अफवाह फैलाने का क्या प्रयोजन हो सकता है? कुछ लोग गपशप करते हैं कि गुरुजी कब पर्वतों में वापस जाएँगे। मैं पर्वतों से नहीं आया हूँ। मैं पर्वतों में वापस क्यों लौटूँगा। जबकि दूसरे गपशप करते हैं कि मैंने किसी विशेष दिन किसी को कुछ बताया, और मैं उस व्यक्ति को बहुत विशेष मानता हूँ। ऐसी बातें फैलाने से क्या लाभ होगा? इससे कोई लाभ नहीं होगा। हालांकि हमने देखा है, कि यह उनका मोहभाव है- दिखावे की मानसिकता।

कुछ लोग मेरे पास मेरे हस्ताक्षर लेने आते हैं। इसका क्या प्रयोजन है? किसी के हस्ताक्षर याद रखने के लिए लेना साधारण लोगों का रिवाज है। यदि आप साधना का अभ्यास नहीं करते, तो मेरे हस्ताक्षर का आपको कोई उपयोग नहीं होगा। मेरी पुस्तक में प्रत्येक शब्द मेरी छवि और फालुन धारण किए है, और प्रत्येक वाक्य मेरे द्वारा बोला गया है। तब भी आप मेरा हस्ताक्षर किस लिए चाहते हैं? कुछ लोग मानते हैं : "हस्ताक्षर होने से, गुरुजी के संदेश मेरी रक्षा करेंगे।" वे संदेश जैसी वस्तुओं पर अब भी विश्वास करते हैं। यह पुस्तक पहले ही अनमोल है। इसके अलावा आप और क्या खोज रहे हैं? यह सब उन मोहभावों के कारण है। साथ ही, उन शिष्यों का आचरण देख कर जो मेरे साथ यात्रा करते हैं, कुछ लोग यह सोचे बिना ही कि यह उचित है या अनुचित उनकी नकल करते हैं। वास्तव में, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि वह कौन व्यक्ति है- यहाँ केवल एक फा है। केवल इस दाफा का पालन करने से व्यक्ति सच्चे आदर्श तक पहुँच सकता है। जो लोग मेरे साथ काम करते हैं उन्हें कोई विशेष बर्ताव नहीं मिलता और वे औरों के समान ही हैं; वे केवल शोध संस्थान के कर्मचारी सदस्य हैं। उन मोहभावों को उत्पन्न न होने दें। कई बार इन मोहभावों के उत्पन्न हो जाने से, आप अनजाने ही दाफा के अपमान की भूमिका निभा सकते हैं। जो सनसनीखेज अफवाह आपने पैदा की उससे मतभेद भी हो सकते हैं या अभ्यासियों में गुरु के नजदीक आने का मोहभाव जाग सकता है जिससे वे और बातें सुन सकें आदि। क्या यह सब समान विषय नहीं हैं?

इस दिखावे की मानसिकता से सहज ही और क्या हो सकता है? मैं दो वर्ष से अभ्यास सिखा रहा हूँ। हमारे अनुभवी फालुन दाफा अभ्यासियों में से कुछ का गोंग खुलने वाला है। कुछ निरन्तर ज्ञानप्राप्ति की अवस्था में प्रवेश करेंगे और तुरन्त ही इसे प्राप्त कर लेंगे। उनके पास ये दिव्य सिध्दियाँ पहले क्यों नहीं आईं? यह इसलिए हालांकि मैंने आपको एक बार में ही इतने ऊँचे स्तर पर उठा दिया, वैसा करने की अनुमति नहीं होती, क्योंकि आपके साधारण लोगों के मोहभाव पूरी तरह दूर नहीं हुए थे। निश्चित ही, आपके नैतिकगुण में उल्लेखनीय सुधार हुआ, किन्तु बहुत से मोहभाव नहीं छूटे थे। इसलिए, वे दिव्य सिध्दियाँ आपको नहीं दी गईं। इस अवस्था के पूर्ण होने पर और आपमें स्थिरता आने पर, आपको एक साथ ही निरन्तर ज्ञानप्राप्ति की अवस्था में प्रवेश करा दिया जाएगा। निरन्तर ज्ञानप्राप्ति की अवस्था में, आपका दिव्य नेत्र एक बहुत ऊँचे स्तर पर खोला जाएगा और आप अनेक दिव्य सिध्दियाँ उत्पन्न करेंगे। वास्तव में, मैं आपको बताना चाहूँगा कि जब आप वास्तव में साधना अभ्यास करते हैं, आपने पहले से ही अनेक दिव्य सिध्दियाँ उत्पन्न कर ली होती हैं। आप पहले ही इस ऊँचे स्तर पर पहुँच चुके हैं, इसलिए आपके पास अनेक दिव्य सिध्दियाँ हैं। यह स्थिति आप में से अनेकों के साथ हाल ही में हुई होगी। ऐसे भी कुछ लोग हैं जो साधना में किसी ऊँचे स्तर पर नहीं पहुँच सकते। उनके पास सहनशीलता सहित जो कुछ भौतिक रूप से है, पूर्व निश्चित है। परिणामस्वरूप, कुछ लोग एक बहुत निम्न स्तर पर गोंग के खुलने या ज्ञानप्राप्त- पूर्ण ज्ञानप्राप्त होने- का अनुभव करेंगे। ऐसे लोग होंगे।

मैं इस विषय पर प्रकाश डाल रहा हूँ जिससे सब जान सकें कि यदि कोई ऐसा व्यक्ति है, आपको उसे एक उल्लेखनीय, ज्ञानप्राप्त व्यक्ति नहीं मानना चाहिए। साधना अभ्यास में यह एक बहुत गंभीर विषय है। केवल इस दाफा का अनुसरण करके आप वस्तुओं को उचित प्रकार कर सकते हैं। आपको उसका अनुसरण करना या सुनना नहीं चाहिए क्योंकि उसके पास दिव्य सिध्दियाँ, अलौकिक शक्तियाँ हैं, या क्योंकि वह कुछ वस्तुएँ देख सकता है। आप उसे हानि पहुँचाएंगे, क्योंकि उसे उत्साह का मोहभाव उत्पन्न हो जाएगा और उससे सब कुछ छिन जाएगा और वे निष्क्रिय हो जाएँगी। अन्त में, वह लड़खड़ा कर गिर जाएगा। वह जो गोंग के खुलने की अवस्था में पहुँच चुका है, वह भी गिर सकता है। यदि व्यक्ति अपना आचरण उचित नहीं रख सकता, तो वह भी गिर सकता है भले ही उसे ज्ञानप्राप्त हो चुका हो। यदि वस्तुओं का उचित धयान न रखा जाए, एक बुध्द भी गिर सकता है, साधारण लोगों के बीच आप जैसे अभ्यासी के बारे में क्या कहा जाए! इसलिए, भले ही आपने कितनी भी दिव्य सिध्दियाँ विकसित कर ली हों, वे कितनी भी महान हों, या आपकी दिव्य शक्ति कितनी भी प्रबल हो, आपको अपना आचरण उचित रखना चाहिए। हाल ही में, हमारे बीच यहाँ एक व्यक्ति बैठा था जो एक पल में लुप्त और दूसरे पल में प्रकट हो सकता है। यह इसी प्रकार है। इससे भी महान अलौकिक शक्तियाँ विकसित होंगी। आप क्या करेंगे? हमारे अभ्यासियों या शिष्यों की भाँति, भविष्य में जब ये वस्तुएँ आपके साथ या किसी और के साथ होती हैं, आपको उनकी उपासना नहीं करनी चाहिए या इन वस्तुओं की इच्छा नहीं रखनी चाहिए। यदि एक बार भी आपका मन अनुचित होता है, यह सब समाप्त हो जाएगा, और आप गिर जाएँगे। हो सकता है आप उनसे भी अधिक ऊँचे स्तर पर हों, किन्तु केवल इतना ही है कि आपकी अलौकिक शक्तियाँ अभी उत्पन्न नहीं हुई हैं। कम से कम, इस विशिष्ट विषय पर आप गिर गए हैं। इस प्रकार, प्रत्येक को इस विषय पर विशेष धयान देना चाहिए। हम इसे एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय मानते हैं क्योंकि यह पहलू जल्द ही सामने आएगा। एक बार होने पर, यदि आप अपना आचरण उचित नहीं रख पाते तो इसकी अनुमति नहीं है।

एक अभ्यासी जो गोंग विकसित कर चुका है और गोंग खुलने की अवस्था में पहुँच चुका है या वास्तव में ज्ञानप्राप्त कर चुका है उसे स्वयं को कोई विशेष व्यक्ति नहीं मानना चाहिए। जो कुछ उसने देखा है वे उसके अपने स्तर तक सीमित है। उसकी साधना इस स्तर तक पहुँची है, क्योंकि उसकी ज्ञानप्राप्ति की योग्यता, नैतिकगुण आदर्श और समझ इस स्तर तक पहुँचे हैं। इसलिए, जहाँ तक उच्च स्तर की वस्तुओं की बात है, हो सकता है उसे विश्वास न हो। क्योंकि वह उन पर विश्वास नहीं करता। वह सोचता है कि जो वह देखता है वह निश्चित है और केवल यही वस्तुएँ हैं। यह कहीं दूर है, क्योंकि इस व्यक्ति का स्तर केवल यहीं है।

कुछ लोगों का गोंग इसी स्तर पर खोल दिया जाएगा क्योंकि साधना अभ्यास में वे और आगे नहीं जा सकते। परिणामस्वरूप, वे केवल इसी स्तर पर गोंग के खुलने और ज्ञानप्राप्त करने का अनुभव कर सकते हैं। आपमें से जो भविष्य में साधना पूर्ण करेंगे, कुछ लघु जगत के मार्गों पर ज्ञानप्राप्ति करेंगे, कुछ विभिन्न स्तरों पर ज्ञानप्राप्ति करेंगे, और कुछ उचित फल के साथ ज्ञानप्राप्ति करेंगे। केवल उचित फल के साथ ज्ञानप्राप्त व्यक्ति अपने उच्चतम स्तरों को प्राप्त करेंगे, विभिन्न स्तरों पर वस्तुओं को देख पाएँगे और स्वयं को प्रकट कर पायेंगे। वे भी जिन्हें जगत के मार्गों पर निम्नतम स्तरों पर ज्ञानप्राप्त होगा, कुछ आयामों और कुछ ज्ञानप्राप्त व्यक्तियों को देख पायेंगे, और वे उनके साथ संपर्क भी कर पायेंगे। उस समय, आपको शिथिल नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि निम्न स्तरों पर लघु जगत के मार्गों पर ज्ञानप्राप्ति द्वारा उचित फल प्राप्त नहीं हो सकता- यह निश्चित है। तब, इसके बारे में क्या किया जा सकता है? वह केवल इसी स्तर पर रह सकता है। किसी ऊँचे स्तर की ओर साधना का अभ्यास करना भविष्य की बात होगी। क्योंकि उसकी साधना केवल उतनी ही आगे जा सकती है, उसके गोंग को बांधे रखने का क्या औचित्य है? यद्यपि आप इस प्रकार अपनी साधना करते रहेंगे, आपकी साधना में और विकास नहीं होगा, इसलिए आपका गोंग खोल दिया जाएगा क्योंकि आप अपनी साधना के अन्त तक पहुँच गए हैं; ऐसे बहुत से लोग होंगे। भले ही कुछ भी हो, व्यक्ति को अपना नैतिकगुण उचित रखना चाहिए। केवल दाफा के साथ चलने से व्यक्ति वास्तव में उचित हो सकता है। भले ही वे आपकी दिव्य सिध्दियाँ हों या आपके गोंग का खुलना, आप उन्हें दाफा में साधना अभ्यास द्वारा प्राप्त करते हैं। यदि आप दाफा को दूसरे स्थान पर रखते हैं और अपनी अलौकिक शक्तियों को प्राथमिक स्थान पर, या आप मानते हैं कि एक ज्ञानप्राप्त व्यक्ति की भाँति जो आप एक या दूसरे प्रकार समझते हैं उचित है, या यदि आप स्वयं को महान और दाफा से आगे मानते हैं, मैं कहूँगा कि आप का गिरना आरंभ हो गया है। यह खतरनाक होगा और आप और बुरे हो जाएँगे। उस समय, आप वास्तव में समस्या में होंगे, और आपकी साधना व्यर्थ जाएगी। यदि वस्तुओं को उचित प्रकार नहीं किया गया, आप गिर जाएंगे और साधना में असफल होंगे।

मैं आपको यह भी बताना चाहूँगा कि इस पुस्तक का विषयसार उस फा को सम्मिलित किये है जो मैंने विभिन्न कक्षाओं में सिखाया है। सभी कुछ मेरे द्वारा सिखाया गया था, और प्रत्येक वाक्य मेरे द्वारा बोला गया था। प्रत्येक शब्द मेरी टेप-रिकॉर्डिंग से लिया गया था और शब्दानुसार लिखा गया था। मेरे शिष्यों और अभ्यासियों ने टेप-रिकॉर्डिंग से सभी कुछ लिखने में मेरी मदद की। तब मैंने इसे कई बार दोहरा कर उचित किया। यह सब मेरा फा है, और जो मैंने सिखाया है वह केवल यही फा है।


1 चिन ह्वे — सोंग राजवंश के राज दरबार में एक दुष्ट दरबारी।
2 दिंग — मन की रिक्त किन्तु चेतन अवस्था।
3 वूहान — हूबेइ राज्य की राजधानी।
4 "किसी देव को आमंत्रित करना सरल है किन्तु वापस भेजना कठिन।" — यह बताने के लिए एक चीनी मुहावरा कि किसी परिस्थति में गिरना सरल है किन्तु निकलना कठिन।
5 दा जी — शांग राजवंश में अतिंम शासक की एक दुष्ट रखैल।