ZHUAN FALUN-LECTURE FOUR
Falundafaindia.org

उपदेश चार
 

त्याग और प्राप्ति

साधकों के समुदाय में, त्याग और प्राप्ति के बीच संबंध पर अक्सर चर्चा की जाती है। साधारण लोगों के बीच भी इसकी चर्चा होती है। हमारे अभ्यासियों को त्याग और प्राप्ति को किस प्रकार लेना चाहिए? यह साधारण लोगों से भिन्न है। जो साधारण लोग चाहते हैं वह है निजी-लाभ और अच्छा और आरामदेह जीवन। हमारे अभ्यासी इस प्रकार नहीं हैं, बल्कि इसके बिल्कुल विपरीत हैं। हम वह नहीं चाहते जो साधारण लोग पाना चाहते हैं। बल्कि, जो हम प्राप्त करते हैं वह साधारण लोग नहीं पा सकते- यदि वे चाहें तो भी- सिवाय साधना अभ्यास के।

जिस त्याग की साधारणत: हम बात करते हैं वह एक संकरे अर्थ का त्याग नहीं है। जब कोई त्याग की बात करता है, तो वह कुछ धन दान में देने, जरूरतमंद लोगों की मदद करने, या राह पर किसी भिखारी को खाना खिलाने के बारे में सोचता है। वे भी कुछ देने के और त्याग करने के प्रकार हैं। किन्तु यह केवल धन और संपत्ति के विषय पर कम ध्यान देने के बारे में ही दर्शाता है। नि:संदेह, संपत्ति पर कम ध्यान देना एक प्रकार का त्याग है, और बल्कि यह एक बड़ा पहलू है। किन्तु जिस त्याग की हम बात करते हैं वह इस संकरे अर्थ में सीमित नहीं है। एक अभ्यासी होते हुए, साधना के दौरान इतने मोहभाव हैं जो त्यागने हैं, जैसे दिखावे की भावना, ईर्ष्या, प्रतियोगिता की भावना, और उत्साह की भावना। विभिन्न मोहभावों को छोड़ना आवश्यक है, क्योंकि जिस त्याग की हम चर्चा करते हैं उसका अर्थ विस्तृत है। संपूर्ण साधना क्रम के दौरान, हमें साधारण लोगों के सभी मोहभावों और विभिन्न इच्छाओं का त्याग करना है।

कोई यह आश्चर्य कर सकता है : "हम साधारण लोगों के बीच साधना अभ्यास कर रहे हैं। यदि हम सब कुछ त्याग दें, तो क्या हम संन्यासियों और संन्यासिनों जैसे नहीं हैं? सब कुछ त्याग देना असंभव प्रतीत होता है।" हमारे अभ्यास की विचारधारा में, जो साधारण लोगों के बीच साधना अभ्यास करते हैं उनके लिए आवश्यक है कि वे साधारण मानव समाज के बीच ही रह कर साधना अभ्यास करें, और साधारण लोगों के जैसा जितना हो सके उतना ढल जायें। आपको यह नहीं कहा जाता है कि आप कुछ भौतिक रूप से त्याग करें। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि आपका पद कितना ऊँचा है या आपके पास कितनी संपत्ति है। कुंजी यह है कि क्या आप उस मोहभाव को छोड़ सकते हैं।

हमारे अभ्यास की पध्दति सीधे व्यक्ति के मन को लक्ष्य बनाती है। अहम पहलू यह है कि क्या आप निजी लाभ और एक-दूसरे के बीच मतभेदों के विषयों को हल्केपन से ले सकते हैं और उनकी कम परवाह कर सकते हैं। मठों या सुदूर पर्वतों और जंगलों में किये जाने वाले साधना अभ्यास साधारण मानव समाज से आपकी पहुंच पूरी तरह से काट देते हैं, जिससे आप साधारण लोगों के मोहभावों को छोड़ने के लिए बाध्य हो जाते हैं और आपको भौतिक लाभ नकार दिये जाते हैं जिससे आप उन्हें त्याग सकें। साधारण लोगों के बीच रहने वाला अभ्यासी इस मार्ग पर नहीं चलता। इस व्यक्ति के लिए आवश्यक है कि वह साधारण मानव वातावरण में इन वस्तुओं को हल्केपन से ले। नि:संदेह, यह बहुत कठिन है। यह हमारे अभ्यास की विचारधारा का सबसे निर्णायक पहलू भी है। इसलिए, जिस त्याग की हम बात करते हैं यह एक विस्तृत दायरे का त्याग है न कि एक संकरे दायरे का। अब आइये, अच्छे कार्य करने और कुछ धन या वस्तुऐं दान में देने के बारे में बात करें। आजकल, कुछ भिखारी जो आप सड़कों पर देखते हैं पेशेवर हैं और उनके पास आप से भी अधिक धन हो सकता है। हमें एक विस्तृत दायरे की वस्तुओं पर घ्यान देना चाहिए न कि छोटी-मोटी बातों पर। साधना अभ्यास में खुलेपन और सम्मान के साथ एक विस्तृत दृष्टिकोण रखना चाहिए। हमारे त्याग करने के क्रम में, जिसका हम वास्तव में त्याग करते हैं वे बुरी वस्तुऐं हैं।

मानव अक्सर विश्वास करते हैं कि हर कोई वस्तु जिसके लिए वे प्रयासरत हैं, अच्छी है। वास्तव में, एक उच्च स्तर के दृष्टिकोण से, वे साधारण लोगों के बीच निजी-लाभ की उन इच्छाओं की तुष्टि के लिए हैं। धर्मों में यह कहा गया है चाहे आपके पास कितना भी अधिक धन हो या आप कितने भी ऊँचे पद पर हों, ये केवल कुछ दशकों के लिए ही रहते हैं। कोई इन्हें न तो जन्म के साथ ला सकता है या न ही मृत्यु के बाद ले जा सकता है। गोंग इतना मूल्यवान क्यों होता है? सही रूप से इसलिए क्योंकि यह सीधे आपकी मूल आत्मा के शरीर पर उत्पन्न होता है और जन्म के समय लाया जा सकता है और मृत्यु के बाद ले जाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, यह साधना में सीधे आपकी फल-पदवी को निर्धारित करता है, और इसलिए इसको साधना द्वारा विकसित करना कठिन होता है। दूसरे शब्दों में, जिनका आप त्याग करते हैं वे बुरी वस्तुऐं हैं। इस प्रकार, आप अपनी मूल, सच्ची प्रकृति की ओर लौट सकते हैं। तो आप क्या प्राप्त करते हैं? आपके स्तर का सुधार; जिससे अन्तत: आप उचित फल प्राप्त करते हैं और साधना पूर्ण करते हैं, जिससे आधारभूत विषय हल हो जाता है। निश्चित ही, आपके लिए तुरंत ही सभी प्रकार की साधारण लोगों की इच्छाओं को छोड़ना और एक सच्चे अभ्यासी के आदर्श पर पहुंचना सरल नहीं होगा, क्योंकि यह करने के लिए समय लगता है। जब आप मुझे कहते हुए सुनते हैं कि इसमें समय लगता है, आप कह सकते हैं कि गुरुजी ने हमें बताया है कि हम समय लें, और इसलिए आप ऐसा करने में समय लेंगे। इसकी अनुमति नहीं है! आपको अपने साथ सख्त होना चाहिए, हालांकि हम आपको क्रमबध्द सुधार करने देते हैं। यदि आप यह सब एक साथ आज ही कर पाये, तो आप आज एक बुध्द होंगे। इस प्रकार, यह वास्तविक नहीं है। आप इसे क्रमबध्द प्राप्त कर सकेंगे।

जिसका हम त्याग करते हैं वह वास्तव में बुरी वस्तु है। यह क्या है? यह कर्म है, और यह विभिन्न मानव मोहभावों के साथ ही साथ चलता है। उदाहरण के लिए, साधारण लोगों के पास सभी प्रकार के बुरे विचार होते हैं। निजी-लाभ के लिए वे अनेक बुरे कार्य करते हैं और इस काले पदार्थ, कर्म को प्राप्त कर लेते हैं। इसका संबंध सीधे हमारे मन से है। इस बुरी वस्तु को हटाने के लिए, आपको पहले अपने मन को बदलना पड़ेगा।

कर्म का रूपांतरण

श्वेत पदार्थ और काले पदार्थ के बीच में एक रूपांतरण की प्रक्रिया होती है। एक-दूसरे के बीच कोई मतभेद हो जाने के बाद, यह रूपांतरण की प्रक्रिया घटित होती है। जब व्यक्ति एक अच्छा कार्य करता है, तो उसे श्वेत पदार्थ, सद्गुण की प्राप्ति होती है। जब व्यक्ति कोई बुरा कार्य करता है, उसे काले पदार्थ, कर्म की प्राप्ति होती है। इसमें एक वंशानुगत हस्तांतरण की प्रक्रिया भी है। कोई पूछ सकता है, "क्या यह इसलिए है क्योंकि उसने अपने जीवन के आरंभ में बुरे कार्य किये थे?" यह आवश्यक नहीं कि यह इसी प्रकार हो क्योंकि यह कर्म केवल एक जीवनकाल में एकत्रित नहीं हुआ है। साधकों के समुदाय में माना जाता है कि मूल-आत्मा की मृत्यु नहीं होती। यदि मूल-आत्मा की मृत्यु नहीं होती, व्यक्ति ने इस जीवन से पहले सामाजिक कार्यकलाप किये होंगे। इसलिए हो सकता है उस पर किसी का कुछ उधार हो, उसने किसी को परेशान किया हो, या कुछ और बुरे कार्य किये हों जैसे किसी को मारना, जिनसे यह कर्म उत्पन्न होता है। ये वस्तुऐं दूसरे आयाम में जमा होती जाती हैं, और व्यक्ति उन्हें सदा ढोता रहता है; ऐसा ही श्वेत पदार्थ के लिए भी सत्य है। केवल यही एक स्रोत नहीं है, क्योंकि एक और परिस्थिति भी होती है। परिवार में वंशानुगत रूप से पूर्वज भी बाद के वंशों के लिए कर्म एकत्रित करके छोड़ सकते हैं। विगत में, वयोवृध्द कहा करते थे : "व्यक्ति को सद्गुण एकत्रित करना चाहिए, और व्यक्ति के पूर्वजों ने सद्गुण एकत्रित किया है। यह व्यक्ति सद्गुण को लुटा रहा है और सद्गुण बर्बाद कर रहा है।" यह बहुत उचित कहा गया था। आजकल, साधारण लोग इस कहावत पर ध्यान नहीं देते। यदि आप उन युवाओं को सद्गुण की हानि करने और सद्गुण नष्ट करने के बारे में बताएं, वे इसे जरा भी हृदय से नहीं लेंगे। देखा जाए तो, इसका अर्थ वास्तव में बहुत प्रगाढ़ है। यह केवल आधुनिक लोगों का विचारात्मक और आध्यात्मिक आदर्श मात्र नहीं है, बल्कि इसका एक वास्तविक भौतिक अस्तित्व भी है। हमारे मानव शरीर में दोनो प्रकार के पदार्थ होते हैं।

किसी ने पूछा, "क्या ऐसा है यदि किसी व्यक्ति के पास बहुत अधिक काला पदार्थ है तो वह ऊँचे स्तरों की ओर अभ्यास नहीं कर पायेगा?" ऐसा कहा जा सकता है, क्योंकि बहुत अधिक काला पदार्थ के होने से, व्यक्ति के ज्ञानोदय के गुण पर प्रभाव पड़ता है। क्योंकि यह व्यक्ति के शरीर के चारों ओर एक प्रभाव क्षेत्र बना लेता है और व्यक्ति को ठीक बीच में घेर लेता है, जिससे वह ब्रह्माण्ड की प्रकृति सत्य-करूणा-सहनशीलता से कट जाता है। इस प्रकार, इस व्यक्ति का ज्ञानोदय का गुण निम्न हो सकता है। जब लोग साधना अभ्यास और चीगोंग के बारे में बात करते हैं तो यह व्यक्ति इन सब को अंधविश्वास मानता है, और उन पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं करता। वह उन्हें उपहासपूर्ण मानता है। यह अक्सर इस प्रकार होता है, किन्तु सदैव नहीं। क्या ऐसा है कि इस व्यक्ति के लिए साधना अभ्यास करना बहुत कठिन है और वह उच्च स्तर का गोंग प्राप्त नहीं कर पायेगा? ऐसा नहीं है। हम कह चुके हैं कि दाफा असीमित है, और साधना अभ्यास करना पूरी तरह आपके हृदय पर निर्भर करता है। गुरु आपको प्रवेश द्वार में से ले जाते हैं, और यह आपके अपने ऊपर निर्भर करता है कि आप साधना अभ्यास करें। यह पूरी तरह इस पर निर्भर करता है कि आप किस प्रकार, स्वयं साधना अभ्यास करते हैं। आप साधना अभ्यास कर पाते हैं यह पूरी तरह इस पर निर्भर करता है कि आप कितना सहन कर पाते हैं, बलिदान कर पाते हैं, और पीड़ा सहन कर पाते हैं। यदि आप अपना मन समर्पित कर दें, तो कठिनाइयां आपको नहीं रोक सकतीं। मैं कहूँगा कि कोई समस्या नहीं है।

एक व्यक्ति जिसके पास बहुत सा काला पदार्थ है उसे उस व्यक्ति की तुलना में अधिक बलिदान करना पड़ेगा जिसके पास बहुत सा श्वेत पदार्थ है। क्योंकि श्वेत पदार्थ का सीधे ब्रह्माण्ड की प्रकृति सत्य-करूणा-सहनशीलता के साथ समावेश होता है, जब तक व्यक्ति मतभेदों के बीच अपना नैतिकगुण बढ़ाता रहता है, उसका गोंग बढ़ता रहता है। यह इतना सरल है। व्यक्ति जिसके पास बहुत सा सद्गुण है उसका ज्ञानोदय का गुण अच्छा होता है। वह शारीरिक और मानसिक कठिनाइयों को सहन कर सकता है। यदि यह व्यक्ति शारीरिक कठिनाइयों को अधिक झेलता है और मानसिक को कम, उसका गोंग तब भी बढ़ता है। यह उस व्यक्ति के साथ नहीं होता जिसका काला पदार्थ बहुत अधिक है, क्योंकि उसे पहले इस प्रक्रिया से गुजरना आवश्यक होता है : उसे काले पदार्थ को श्वेत पदार्थ में परिवर्तित करना होता है। यह प्रक्रिया भी बहुत दु:खदायी है। इसलिए, व्यक्ति जिसका ज्ञानोदय का गुण निम्न होता है उसे अक्सर अधिक कठिनाइयां झेलनी पड़ती हैं। बहुत अधिक कर्म और निम्न ज्ञानोदय के गुण के कारण, उस व्यक्ति के लिए साधना का अभ्यास करना अधिक कठिन होता है।

उदाहरण के लिए, इस स्थिति को देखें। आइये देखें कि यह व्यक्ति किस प्रकार साधना का अभ्यास करता है। बैठ कर ध्यान मुद्रा करने के लिए यह आवश्यक है कि दोनों पैर एक-दूसरे के ऊपर लम्बे समय तक रखे जायें। इस मुद्रा में बैठने के बाद पैरों में दर्द होने लगता है और पैर सुन्न हो जाते हैं। जैसे समय बीतता है, व्यक्ति को बहुत असुविधाजनक लगेगा और उसके बाद वह बेचैन होने लगेगा। शारीरिक और मानसिक पीड़ा से शरीर और मन दोनों बहुत बेचैन हो सकते हैं। कुछ लोग इस प्रकार बैठे हुए, पैरों में दर्द सहन नहीं कर पाते और पैरों को नीचे करके इसे छोड़ देना चाहते हैं। कुछ लोग कुछ देर अधिक बैठते ही इसे और सहन नहीं कर पाते। जैसे ही पैरों को नीचे रख दिया जाता है, व्यक्ति का अभ्यास व्यर्थ जाता है। जैसे ही पैरों में दर्द होता है, वह पैरों को खोल कर हिला-डुला कर दोबारा मुद्रा में बैठ जाता है। हमने पाया है कि इससे कुछ भी लाभ नहीं होता। यह इसलिए क्योंकि हमने देखा है कि जब पैरों में दर्द होता है, तब काला पदार्थ पैरों की ओर चला जाता है। यह काला पदार्थ कर्म है जिसे पीड़ा झेलने द्वारा हटाया जा सकता है; इसे सद्गुण में परिवर्तित किया जा सकता है। जैसे ही दर्द अनुभव होता है, कर्म का निष्कासन आरंभ हो जाता है। जितना कर्म निकलता है, उतना ही अधिक दर्द पैरों में अनुभव होता है। इसलिए, पैरों में दर्द अकारण ही नहीं आता। अक्सर, बैठ कर ध्यान मुद्रा करने में दर्द रूक-रूक कर अनुभव होता है। एक दर्द के बहुत दु:खदायी पल के बाद, यह समाप्त हो जाता है और कुछ राहत मिलती है। जल्द ही दर्द फिर से आरंभ हो जाता है। यह अक्सर इस प्रकार होता है।

जैसे कर्म टुकड़ों-टुकड़ों में निष्कासित होता है, एक भाग के निकल जाने के बाद कुछ अच्छा लगता है। जल्द ही दूसरा भाग आ जाता है, और पैरों में दोबारा दर्द अनुभव होने लगता है। काले पदार्थ के निकल जाने पर, यह विलुप्त नहीं होता, क्योंकि यह पदार्थ नष्ट नहीं होता। निष्कासित हो जाने पर, यह सीधे श्वेत पदार्थ में परिवर्तित हो जाता है, जो सद्गुण है। इसे इस प्रकार परिवर्तित क्यों किया जा सकता है? यह इसलिए, क्योंकि इस व्यक्ति ने दु:ख भोगा है, बलिदान किया है, और कठिनाइयों को सहन किया है। हम कह चुके हैं कि सद्गुण की प्राप्ति कठिनाइयों को सहन करने और झेलने से होती है, या अच्छे कार्यों को करने से होती है। इसलिए, बैठने वाली ध्यान मुद्रा में यह स्थिति आएगी। कुछ लोगों के पैरों में जैसे ही दर्द आरंभ होता है वे तुरंत ही उन्हें नीचे रख लेते हैं, और वे पैरों को हिला-डुला कर दोबारा ध्यान मुद्रा में बैठते हैं। इससे कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। जब खड़े होकर व्यायाम किया जाता है, चक्र-धारण करने के व्यायाम में हाथों में थकान हो सकती है। जब व्यक्ति इसे और सहन नहीं कर पाता और हाथों को नीचे कर लेता है, तब वह कुछ प्राप्त नहीं करता। वह थोड़ा दर्द क्या मायने रखता है? मैं कहूँगा यदि कोई व्यक्ति हाथों को इसी प्रकार ऊपर रखकर साधना में सफल हो सके तो यह बहुत ही सरल होगा। यही है जो होगा जब लोग बैठने वाली ध्यान मुद्रा का अभ्यास करते हैं।

हमारी अभ्यास पध्दति मूल रूप से इसी प्रकार आगे नहीं बढ़ती, हालांकि इसका एक भाग अवश्य ही इस बारे में भूमिका अदा करता है। अधिकांश स्थितियों में, व्यक्ति कर्म का रूपांतरण एक-दूसरे के बीच नैतिकगुण मतभेदों द्वारा करता है, और यहीं पर इसकी अभिव्यक्ति होती है। जब कोई किसी मतभेद में होता है, तो एक-दूसरे के बीच संघर्ष शारीरिक दु:खों को भी पार कर जाते हैं। मैं कहूँगा कि शारीरिक दु:ख सहन करने में सबसे सरल होते हैं, क्योंकि उन पर दांतों को जोर से भींच कर भी पार पाया जा सकता है। जब एक-दूसरे के बीच मतभेद होता है, तो मन को नियंत्रण में रखना सबसे कठिन होता है।

उदाहरण के लिए, कार्यस्थल पहुंचने पर, जब कोई व्यक्ति दो लोगों को अपनी बुरी तरह निंदा करते हुए सुनता है तो वह बहुत क्रोधित हो जाता है। हालांकि, हमने कहा है कि एक अभ्यासी होते हुए व्यक्ति को प्रहार और अपमान मिलने पर भी वापस नहीं लड़ना चाहिए, बल्कि अपना व्यवहार एक ऊँचे आदर्श के साथ रखना चाहिए। इस प्रकार, वह सोचता है कि गुरु ने कहा है कि अभ्यासी होते हुए हमें औरों के समान नहीं होना चाहिए और अपना व्यवहार और अच्छा रखना चाहिए। वह उन लोगों के साथ झगड़ा नहीं करेगा। किन्तु साधारणत: जब कोई समस्या आती है, यदि यह किसी व्यक्ति को मानसिक तौर पर परेशान नहीं करती, तो इसके कोई मायने नहीं है या यह व्यर्थ है और उसमें कोई सुधार नहीं ला सकती। इस प्रकार, उसका मन उसको भुला नहीं पाता और उससे परेशान होता रहता है। ऐसा हो सकता है कि उसका मन उस पर अटक गया है। वह हमेशा मुड़ कर उन दो लोगों के चेहरों को देखना चाहता है। उन्हें देखने पर, उसे दो दुष्ट दिखने वाले चेहरे एक आवेगपूर्ण वार्तालाप में दिखाई पड़ते हैं। वह उसे सहन नहीं कर पाता और बहुत बेचैन हो जाता है। वह उसी समय उनसे झगड़ा भी कर सकता है। जब एक-दूसरे के बीच मतभेद होता है, तो अपने मन को नियंत्रण में रखना बहुत कठिन होता है। मैं कहूँगा कि यदि सभी समस्याओं का हल बैठने वाली ध्यान मुद्रा में ही निकल जाये तो यह सरल होगा, यह हमेशा इस प्रकार नहीं होगा।

इसी प्रकार, अपने भविष्य के साधना अभ्यास में आप सभी प्रकार की कठिनाइयों से गुजरेंगे। इन कठिनाइयों के बिना आप साधना अभ्यास कैसे कर सकते हैं? यदि सभी एक-दूसरे से अच्छे बने रहें और कोई भी स्वार्थ के मतभेद या मानव मन की रूकावटें न हो, तो केवल आपके वहां बैठे रहने से आपके नैतिकगुण में बढ़त कैसे हो सकती है? ऐसा असंभव है। व्यक्ति को वास्तविक अभ्यास द्वारा स्वयं को सच्चे रूप से दृढ़ करना और उन्नत करना आवश्यक है। कोई पूछता है, "हमें साधना अभ्यास में हमेशा कठिनाइयां क्यों आती हैं? ये समस्यायें साधारण लोगों की समस्याओं से बहुत भिन्न नहीं होतीं।" यह इसलिए क्योंकि आप साधना का अभ्यास साधारण लोगों के बीच कर रहे हैं। आपको अचानक ही आपका सिर जमीन की ओर करके उल्टा नहीं लटका दिया जायेगा, जिससे आप हवा में लटक कर दु:ख भोगें- यह इस प्रकार नहीं होगा। सभी कुछ रोजमर्रा की परिस्थिति के समान ही होगा, जैसे आज आपको कोई परेशान कर सकता है, कोई आपको क्रुध्द कर सकता है, कोई आपके साथ बुरा बर्ताव कर सकता है, या कोई अचानक आपसे बिना सम्माu के बोल सकता है। यह सब यह देखने के लिए है कि आप इन परिस्थितियों में कैसे बर्ताव करते हैं।

ये समस्याएं आपके सामने क्यों आती हैं? वे सभी आपके अपने कर्म द्वारा उत्पन्न होती हैं। हमने पहले ही आपके लिए इनके बहुत से भागों को हटा दिया है, और आपके लिए यह छोटा सा अंश छोड़ा है जिसे विभिन्न स्तरों पर कठिनाइयों में बांट दिया है, जिससे आपके नैतिकगुण में उन्नती हो सके, आपका मन दृढ़ हो सके, और आपके विभिन्न मोहभाव दूर हो सकें। ये सभी आपकी अपनी कठिनाइयां हैं जिनका हम आपके नैतिकगुण में सुधार के लिए उपयोग करते हैं, और आप इन पर पार पा सकेंगे। जब तक आप अपने नैतिकगुण को उठाते रहेंगे, आप इन पर पार पा सकते हैं। जब तक आप स्वयं ही ऐसा न करना चाहें तो यह नहीं होगा, अन्यथा, यदि आप उन पर पार पाना चाहें तो आप सफल हो सकते हैं। इसलिए अब से आगे जब आप किसी से मतभेद का सामना करते हैं तो आपको इसे एक अकारण हुई घटना नहीं मान लेना चाहिए। यह इसलिए क्योंकि जब कोई मतभेद होता है, तो यह अचानक होगा। किन्तु यह अकारण नहीं है- यह आपके नैतिकगुण में सुधार करने के लिए है। जब तक आप स्वयं को एक अभ्यासी मानते हैं, आप इसे उचित प्रकार से संभाल सकते हैं।

नि:संदेह, आपको किसी कठिनाई या मतभेद की समय से पहले ही जानकारी नहीं दी जायेगी। यदि आपको सब कुछ बता दिया जाये तो आप साधना अभ्यास कैसे कर सकते हैं? इसकी कोई उपयोगिता नहीं रहेगी। वे अक्सर अचानक ही होते हैं जिससे वे व्यक्ति के नैतिकगुण को जांच सकें और उसके नैतिकगुण में वास्तव में सुधार कर सकें। केवल तभी यह देखा जा सकता है कि व्यक्ति अपने नैतिकगुण को बनाये रख पाता है या नहीं। इसलिए, जब कोई मतभेद होता है, यह अकारण ही नहीं होता। यह विषय साधना अभ्यास के पूरे क्रम के दौरान और कर्म के रूपांतरण में आता रहेगा। भले ही साधारण व्यक्ति कुछ भी सोचे, यह शारीरिक दु:ख की तुलना में कहीं अधिक कठिन है। आप केवल व्यायामों को कुछ देर अधिक करके गोंग कैसे बढ़ा सकते हैं जब आपके हाथ उठाये रखने से दर्द कर रहे हों और आपके पैर खड़े रहने से थके जा रहे हों? आप गोंग को केवल कुछ घंटे अधिक व्यायाम करके कैसे बढ़ा सकते हैं? उसका उपयोग केवल व्यक्ति के मूल-शरीर को रूपांतरित करने के लिए होता है, किन्तु तब भी इसे शक्ति द्वारा दृढ़ किया जाना आवश्यक है। यह व्यक्ति के स्तर के सुधार में मदद नहीं करता। मानसिक रूप से कठिनाइयों पर पार पाना ही व्यक्ति के स्तर में वास्तविक सुधार की कुंजी है। यदि कोई केवल शारीरिक परेशानी द्वारा सुधार ला पाता, तो मैं कहूँगा कि चीनी किसान सबसे अधिक परेशानी सहन करते हैं। तब, क्या उन सब को चीगोंग गुरु नहीं बन जाना चाहिए? भले ही आप शारीरिक रूप से कितनी ही परेशानी उठाते हों, किन्तु आप उतनी परेशानी नहीं उठा सकते जितनी वे उठाते हैं, जो हर रोज खेतों में तपते सूर्य के नीचे कड़ा और मेहनतभरा काम करते हैं। यह उतना सरल विषय नहीं है। इसलिए हम कह चुके हैं कि स्वयं में वास्तविक सुधार लाने के लिए, व्यक्ति को सच्चे रूप से अपने मन को उठाना चाहिये। केवल तभी व्यक्ति सच्चे रूप से अपना उत्थान कर सकता है।

कर्म परिवर्तन की प्रक्रिया के दौरान, स्वयं को नियंत्रण में रखने के लिए आपको सदैव एक परोपकारी हृदय और दयापूर्ण मन बनाये रखना होगा- न कि साधारण लोगों की तरह जो परिस्थिति को उलझा देते हैं। यदि आप अचानक ही किसी समस्या के सम्मुख हो जायें, तो आप इसे ठीक से संभाल सकेंगे। जब आप सदैव परोपकार और करूणा का हृदय बनाये रखते हैं, यदि कोई समस्या अचानक ही उठ खड़ी हो, तब आपके पास मतभेद को कम करने और सोचने के लिए समय या स्थान रहेगा। यदि आप हमेशा दूसरों के साथ प्रतिद्वन्द करने और लड़ाई-झगड़े के बारे में सोचते हैं, तो मैं कहूँगा कि जब कभी कोई समस्या होगी आप दूसरों के साथ झगड़ा कर बैठेंगे- यह निश्चित है। इस प्रकार, जब आप किसी मतभेद का सामना करते हैं, मैं कहूँगा कि यह आपके काले पदार्थ को श्वेत पदार्थ में परिवर्तित करने के लिए है।

जब हमारी मनुष्यजाति आज इस सीमा तक विकसित हो गई है, लगभग हर कोई कर्म के ऊपर कर्म लेकर पैदा हुआ है, और हर किसी के शरीर पर बहुत अधिक कर्म है। इसलिए, कर्म के रूपांतरण में यह परिस्थिति अक्सर होती है : जब आपका गोंग बढ़ता है और आपके नैतिकगुण में सुधार होता है, तब आपका कर्म निकलता जाता है और रूपांतरित होता जाता है। जब व्यक्ति के सामने कोई मतभेद आता है, यह एक-दूसरे के बीच नैतिकगुण समस्या के रूप में व्यक्त हो सकता है। यदि आप इसे सहन कर सकते हैं, आपका कर्म निकल जायेगा, आपके नैतिकगुण में सुधार होगा, और साथ ही आपका गोंग भी बढ़ जायेगा। ये सभी एक साथ ही आयेंगे। विगत में लोगों के पास आरंभ से ही बहुत सा सद्गुण और अच्छा नैतिकगुण होता था। जब तक वे कुछ कठिनाइयां सहन करते थे, वे अपने गोंग को बढ़ा सकते थे। आज लोग उस तरह नहीं हैं। जैसे ही वे पीड़ित होते हैं, वे साधना अभ्यास नहीं करना चाहते। इसके अतिरिक्त, उनका ज्ञानोदय कम हो गया है, जिससे उनके लिए साधना अभ्यास करना कठिन हो गया है।

साधना अभ्यास में, दो परिस्थितियां हो सकती हैं जब आप किसी मतभेद का सामना करते हैं या जब दूसरे आपके साथ दुर्व्यवहार करते हैं। एक यह कि हो सकता है आपने अपने पिछले जन्म में इस व्यक्ति के साथ दुर्व्यवहार किया हो। आप अपने हृदय में सोचते हैं यह अनुचित है, "यह व्यक्ति मेरे साथ इस प्रकार व्यवहार कैसे कर सकता है?" तब आपने इस व्यक्ति के साथ अतीत में इस प्रकार व्यवहार क्यों किया था? आप कह सकते हैं कि आप उस समय वास्तव में यह जानते नहीं थे, और इस जीवन का दूसरे जीवन से कोई संबंध नहीं है। इससे बात नहीं बनेगी। एक और विषय है। मतभेदों में, कर्म के रूपांतरण का विषय जुड़ा रहता है। इसलिए मतभेदों का सामना करते समय हमें क्षमावान होना चाहिए न कि साधारण लोगों की तरह पेश आना चाहिए। यह कार्यस्थलों या दूसरे काम के वातावरणों पर भी लागू होना चाहिए। यह निजी व्यवसाय वाले लोगों के लिए भी सत्य है, क्योंकि उनके भी सामाजिक क्रियाकलाप होते हैं। यह असंभव है कि समाज के साथ मेलजोल न हो, कम से कम पड़ोसियों से तो संपर्क होता ही है।

सामाजिक क्रियाकलापों में व्यक्ति के सामने सभी प्रकार के मतभेद आयेंगे। उनके लिए जो साधारण लोगों के बीच साधना अभ्यास करते हैं, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि आप किस प्रकार के व्यवसाय में हैं। भले ही आपके पास कितना भी धन हो, आपका पद कितना भी ऊँचा हो, या आप किसी भी प्रकार की निजी संस्था या कंपनी चलाते हों, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता, क्योंकि आपको उचित प्रकार से व्यवसाय करना चाहिए और एक पवित्र मन बनाये रखना चाहिए। मानव समाज में सभी व्यवसायों का अस्तित्व होना चाहिए। यह मानव हृदय है जो भ्रष्ट होता है, न कि उसका व्यवसाय। पुराने समय में एक कहावत थी : "दस में से नौ व्यापारी धोखेबाज होते हैं।" इस कहावत को साधारण लोगों ने बनाया था। मैं कहूँगा कि यह मानव हृदय पर निर्भर करता है। जब तक आपका हृदय पवित्र है और आप उचित प्रकार से व्यवसाय करते हैं, यदि आप अधिक प्रयत्न करते हैं तो आप और धन कमाने के पात्र हो जाते हैं। यह इसलिए क्योंकि जो प्रयत्न आपने साधारण लोगों के बीच लगाये हैं उसका आपको पारितोषिक मिलता है। कोई त्याग नहीं, तो कोई प्राप्ति नहीं। आपने इसके लिए मेहनत की है। कोई चाहे किसी भी सामाजिक स्तर पर हो एक अच्छा व्यक्ति बना रह सकता है। विभिन्न सामाजिक वर्गों के लोगों के लिए विभिन्न मतभेद होते हैं। उच्च वर्ग के समाज में उच्च वर्ग के मतभेद होते हैं, जो सभी उचित प्रकार से निपटाये जा सकते हैं। किसी भी समाजिक वर्ग में, कोई एक अच्छा व्यक्ति बना रह सकता है और विभिन्न इच्छाओं और मोहभावों की कम परवाह कर सकता है। व्यक्ति विभिन्न स्तरों पर अच्छा बना रह सकता है, और वह अपने सामाजिक स्तर पर साधना अभ्यास कर सकता है।

आज कल, इस देश में सार्वजनिक कंपनी हो या दूसरे संस्थान, एक-दूसरे के बीच मतभेद बहुत विचित्र हो गये हैं। दूसरे देशों में और पूरे इतिहासकाल में, यह परिस्थिति पहले कभी नहीं हुई। परिणामस्वरूप, निजी-लाभ के लिए मतभेद विशेषरूप से तीव्र दिखाई पड़ते हैं। लोग मानसिक खेल खेलते हैं और थोड़े से निजी-लाभ के लिए संघर्ष करते हैं; उनके जो विचार होते हैं और जो चालें वे चलते हैं बहुत द्वेषपूर्ण होती हैं। अच्छा व्यक्ति बनना भी कठिन है। उदाहरण के लिए, आप अपने कार्यस्थल पर आते हैं और पाते हैं कि वातावरण ठीक नहीं है। बाद में, कोई आपको बताता है कि अमुक व्यक्ति ने आपकी निन्दा की है और आपकी शिकायत अफसर को कर दी है, जिससे आपकी स्थिति खराब हो गई है। दूसरे सभी आपको विचित्र नज़रों से घूर कर देखते हैं। एक साधारण व्यक्ति इसे कैसे सहन कर सकता है? कोई इसे कैसे झेल सकता है? "यदि कोई मेरे लिए परेशानी खड़ी करता है, मैं भी वैसा ही करूंगा। यदि उसके साथ सहयोगी हैं, तो मेरे साथ भी हैं। चलो झगड़ा करें।" यदि आप साधारण लोगों के बीच यह करते हैं, वे कहेंगे कि आप एक मजबूत व्यक्ति हैं। हालांकि, एक अभ्यासी के लिए यह बिल्कुल अशोभनीय है। यदि आप एक साधारण व्यक्ति की तरह झगड़ा और संघर्ष करते हैं, तो आप एक साधारण व्यक्ति हैं। यदि आप उससे भी अधिक करते हैं, तो आप उस साधारण व्यक्ति से भी अधिक बुरे हैं।

हमें इस विषय से किस प्रकार निपटना चाहिए? इस मतभेद में सामने पड़ जाने पर, हमें सबसे पहले मन को शांत रखना चाहिए, और हमें उस व्यक्ति की तरह बर्ताव नहीं करना चाहिए। नि:संदेह, हम विषय को दयाभाव से समझा सकते हैं, और इसमें कोई समस्या नहीं है यदि हम विषय को समझा कर स्पष्ट करें। किन्तु आपको इससे बहुत मोहभाव नहीं होना चाहिए। यदि हम इन समस्याओं का सामना करते हैं, हमें औरों की तरह संघर्ष और झगड़ा नहीं करना चाहिए। यदि आप वह करते हैं जो उस व्यक्ति ने किया, तो क्या आप एक साधारण व्यक्ति नहीं हैं? न केवल आपको उसकी तरह संघर्ष और झगड़ा नहीं करना चाहिए, बल्कि आपको अपने हृदय में उस व्यक्ति के लिए कोई द्वेषभाव भी नहीं होना चाहिए। वास्तव में, आपको उस व्यक्ति से घृणा नहीं करनी चाहिए। यदि आप उस व्यक्ति से घृणा करते हैं, तो क्या आप क्रुध्द नहीं होते? आपने सहनशीलता का पालन नहीं किया। हम सत्य-करूणा-सहनशीलता का अभ्यास करते हैं, और कहा जाए तो आपके पास और भी कम करूणा है। इसलिए आपको उसकी तरह नहीं होना चाहिए या उससे क्रुध्द नहीं होना चाहिए, भले ही उसने आपको इस बुरी परिस्थिति में डाल दिया जिसमें आप अपना सिर भी नहीं उठा सकते। उससे क्रुध्द न होकर, आपको अपने हृदय में उसे धन्यवाद देना चाहिए और सच्चाई से उसका धन्यवाद करना चाहिए। एक साधारण व्यक्ति इस प्रकार सोच सकता है : "क्या यह आह क्यू1 बनने जैसा नहीं है?" मैं आपको बता रहा हूँ कि यह ऐसा नहीं है।

आप सब यह सोचें : आप अभ्यासी हैं। क्या आपके लिए यह आवश्यक नहीं कि आपका आदर्श बहुत ऊँचा होना चाहिए? साधारण लोगों के नियम आप पर लागू नहीं होने चाहिए, क्या यह सही है? एक अभ्यासी होते हुए, जो आप प्राप्त करते हैं क्या वह ऊँचे स्तरों का नहीं है? इस प्रकार, यह आवश्यक है कि आप उच्च स्तर के नियमों का पालन करें। यदि आप वह करते हैं जो उस व्यक्ति ने किया, तो क्या आप उसी के समान नहीं हैं? तब, आपको उसका धन्यवाद क्यों करना चाहिए? इसके बारे में सोचें : आप क्या प्राप्त करेंगे? इस ब्रह्माण्ड में, एक नियम है जो कहता है : "यदि कोई त्याग नहीं, तो कोई प्राप्ति नहीं।" कुछ प्राप्त करने के लिए, त्याग करना आवश्यक है। उस व्यक्ति ने आपको साधारण लोगों के बीच एक बुरी परिस्थिति में डाल दिया, और वह उस वर्ग से है जिसने आपकी हानि द्वारा लाभ प्राप्त किया है। वह आपको जितनी बुरी परिस्थिति में डालता है उसका प्रभाव उतना ही अघिक होता है, उतना ही अधिक आप सहन करते हैं और उतना ही सद्गुण उसे खोना पड़ेगा। यह सारा सद्गुण आपको दे दिया जायेगा। जबकि आप वह सब सहन कर रहे हैं, आप इसकी कम परवाह करें और इसे मन में गंभीरता से न लें।

इस ब्रह्माण्ड में, एक और भी नियम है : यदि आपने बहुत कठिनाई सही है, आपके शरीर का कर्म रूपांतरित कर दिया जायेगा। क्योंकि आपने कठिनाई सही है, जितना भी आपने सहन किया है वह सब उसी के बराबर सद्गुण में रूपांतरित कर दिया जायेगा। क्या यह सद्गुण नहीं है जो अभ्यासी चाहते है? आपको दो तरह से लाभ होगा, क्योंकि आपका कर्म भी हटा दिया गया है। यदि उस व्यक्ति ने आपके लिए यह परिस्थिति उत्पन्न नहीं की होती, तो आप अपने नैतिकगुण में सुधार कैसे कर पाते? यदि आप और मैं दोनो एक दूसरे के लिए अच्छे बने रहते हैं और शांत रहते हैं, तो गोंग को बढ़ा पाना कैसे सभंव हो सकता है? क्योंकि उस व्यक्ति ने आपके लिए इस मतभेद को पैदा किया जिससे नैतिकगुण में सुधार करने का अवसर मिला, और आप इसका उपयोग स्वयं अपने नैतिकगुण को उठाने में कर सकते हैं। क्या इस प्रकार आपका नैतिकगुण नहीं बढ़ जाता? आपको तीन तरह से लाभ प्राप्त हुआ है। आप एक अभ्यासी हैं। नैतिकगुण में सुधार से, क्या आपका गोंग भी नहीं बढ़ेगा? आपने एक ही बार में चार तरह से लाभ प्राप्त किया है। आपको उस व्यक्ति को धन्यवाद क्यों नहीं देना चाहिए? आपको सच्चाई से तहे दिल से उसे धन्यवाद देना चाहिए- यह वास्तव में ऐसा है।

नि:संदेह, उस व्यक्ति का विचार उचित नहीं था, अन्यथा उसने आपको सद्गुण नहीं दिया होता। किन्तु उसने वास्तव में आपके नैतिकगुण को बढ़ाने के लिए परिस्थिति उत्पन्न की। दूसरे शब्दों में, हमें नैतिकगुण की साधना पर ध्यान देना चाहिए। जिस समय नैतिकगुण की साधना की जाती है, उसी समय कर्म हटता है और सद्गुण में परिवर्तित हो जाता है जिससे आप एक ऊँचे स्तर की ओर उठ सकते हैं; ये सब साथ-साथ होता है। उच्च स्तर के दृष्टिकोण से, ये सब नियम बदल जाते हैं। एक साधारण व्यक्ति इसे नहीं समझेगा। जब आप इन नियमों को ऊँचे स्तरों से देखते हैं, तो सब कुछ भिन्न होता है। साधारण लोगों के बीच आप इन नियमों को सही पा सकते हैं, किन्तु वे वास्तव में सही नहीं हैं। केवल वह जो ऊँचे स्तरों से देखा जाता है वास्तव में सही होता है। यह अक्सर इसी प्रकार होता है।

मैंने सभी को नियम विस्तार से समझा दिये हैं, और मुझे आशा है कि भविष्य के साधना अभ्यास में हर कोई एक अभ्यासी की भांति आचरण करेगा और वास्तव में साधना अभ्यास करेगा, क्योंकि यहां पर नियम समझा दिये गये हैं। शायद कुछ लोग, क्योंकि वे साधारण लोगों के बीच रहते हैं, अब भी सोचते हैं कि वास्तविक भौतिक लाभ के सामने, साधारण व्यक्ति बने रहना व्यावहारिक है। साधारण लोगों के प्रवाह के बीच वे अभी भी अपना आचरण उच्च आदर्श के साथ नहीं रख पाते। वास्तव में, साधारण लोगों के बीच अच्छा व्यक्ति बनने के लिए ऐसे नायक हैं जो पथप्रदर्शक की भूमिका निभाते हैं, किन्तु वे साधारण लोगों के बीच नायक हैं। यदि आप एक अभ्यासी बनना चाहते हैं, तो यह पूरी तरह आपके हृदय की साधना और आपके अपने ज्ञानोदय पर निर्भर करता है क्योंकि इसमें कोई पथप्रदर्शक नहीं है। सौभाग्य से, आज हमने इस दाफा को सार्वजनिक कर दिया है। विगत में, यदि आप साधना अभ्यास करना चाहते थे, आपको सिखाने वाला कोई नहीं था। इस प्रकार, आप दाफा का अनुसरण कर सकते हैं और शायद आप बेहतर करेंगे। आप साधना अभ्यास कर पाते हैं या इसमें सफल हो पाते हैं और आप किस स्तर पर पहुंचते हैं यह आपके अपने ऊपर निर्भर करता है।

नि:संदेह, जिस प्रकार कर्म का रूपांतरण होता है वह पूरी तरह वैसे ही नहीं होता जैसे मैंने वर्णन किया; यह दूसरे स्थानों में भी व्यक्त हो सकता है। यह समाज या घर में हो सकता है। राह पर चलते हुए या दूसरे सामाजिक वातावरण में, व्यक्ति के सामने कुछ कठिनाई आ सकती है। आपके उन सभी मोहभावों को छुड़वाया जायेगा जिन्हें साधारण लोगों के बीच नहीं छोड़ा जा सकता। जब तक वे आपके पास हैं, उन सभी मोहभावों को विभिन्न वातावरणों में छोड़ना आवश्यक है। आपको ठोकर लगने दी जायेगी, जिससे आपको ताओ का ज्ञानोदय हो सके। इस प्रकार व्यक्ति साधना अभ्यास से गुजरता है।

विशिष्ट रूप से एक और स्थिति आती है। साधना अभ्यास के दौरान आप में से कई पायेंगे कि चीगोंग का अभ्यास करते समय, आपके पति या पत्नी अक्सर बहुत अप्रसन्न हो जायेंगे। जैसे ही आप व्यायाम आरंभ करते हैं, आपके पति या पत्नी आप पर क्रुध्द होंगे। यदि आप कुछ और करते हैं, तो वे परवाह नहीं करेंगे। भले ही आप चौपड़ खेलते हुए कितना ही समय बरबाद कर दें, आपके पति या पत्नी अप्रसन्न तो होंगे किन्तु उतना नहीं जितना तब यदि आप चीगोंग का अभ्यास करें। आपका चीगोंग अभ्यास आपके पति या पत्नी के साथ कोई विघ्न नहीं डालता, और कितनी ही अच्छी बात है कि आप शरीर को व्यायाम द्वारा स्वस्थ रख रहे हैं, और आप अपने पति या पत्नी को परेशान भी नहीं कर रहे। किन्तु जैसे ही आप चीगोंग का अभ्यास आरंभ करते हैं, आपका पति या पत्नी वस्तुओं को आसपास फेंकना आरंभ कर देगा और झगड़ा शुरू कर देगा। कुछ दंपत्ति चीगोंग अभ्यास के मतभेदों को लेकर तलाक तक पहुंच जाते हैं। बहुत से लोगों ने यह नहीं सोचा कि ऐसी स्थिति क्यों आती है। यदि आप अपने पति या पत्नी से बाद में पूछें : "यदि मैं चीगोंग का अभ्यास करता हूँ तो तुम्हें इतना क्रोध क्यों आ जाता है?" वे इसे नहीं समझा पाते और वास्तव में उन्हें कोई कारण समझ नहीं आता। "सच में, मुझे उस समय इतना गुस्सा क्यों आ गया था?" वास्तव में, क्या हो रहा है? जब व्यक्ति चीगोंग का अभ्यास करता है, उसका कर्म अवश्य ही रूपांतरित होता है। आपको हानि के बिना लाभ की प्राप्ति नहीं होगी, और जिसकी आपको हानि होती हैं वे बुरी वस्तुऐं हैं। आपको त्याग करना ही चाहिए।

हो सकता है जैसे ही आप द्वार से अंदर आऐं, आपका पति या पत्नी आप पर सीधा क्रोध का प्रहार करे। यदि आप इसे सहन कर पाते हैं, आपके आज का चीगोंग अभ्यास का प्रयत्न व्यर्थ नहीं गया। कुछ लोग जानते हैं कि चीगोंग अभ्यास में व्यक्ति को सद्गुण का मान रखना चाहिए। इसलिए, इस व्यक्ति का आचरण अपनी पत्नी के साथ अक्सर बहुत अच्छा होता है। वह सोचता है, "अक्सर, यदि मैं "एक" कहता हूँ तो वह "दो" नहीं कहती। आज वह मुझ पर हुक्म चला रही है।" वह अपने व्यवहार पर नियंत्रण नहीं रख पाता और झगड़ा शुरू कर देता है। इससे आज का अभ्यास व्यर्थ जाता है। क्योंकि वहां कर्म था, वह उसे हटाने में उसकी मदद कर रही थी। किन्तु वह इसे स्वीकार नहीं कर पाया और उसके साथ झगड़ा शुरू कर दिया। इस प्रकार कर्म को नहीं हटाया जा सका। इस प्रकार की कई परिस्थितियां होती हैं और हमारे कई अभ्यासियों ने उन्हें अनुभव किया है, किन्तु उन्होंने यह नहीं सोचा कि वे इस प्रकार क्यों थीं। आपकी पत्नी कोई परवाह नहीं करती यदि आपको कुछ और करना होता। चीगोंग अभ्यास वास्तव में एक अच्छी वस्तु होनी चाहिए किन्तु वह हमेशा आप में कमियां निकालती है। वास्तव में, आपकी पत्नी आपके कर्म हटाने में मदद कर रही है, हालांकि वह स्वयं यह नहीं जानती। वह आपसे केवल बनावटी रूप से झगड़ा नहीं कर रही है और हृदय में अच्छी भावना रख रही है- ऐसा नहीं है। यह उसके हृदय की तह से वास्तविक क्रोध है, क्योंकि जो कोई कर्म को प्राप्त करता है वह बेचैन अनुभव करता है। यह निश्चित ही इस प्रकार है।

नैतिकगुण को बढ़ाना

क्योंकि विगत में कई लोग अच्छे नैतिकगुण का आचरण नहीं रख पाते थे, इससे कई समस्यायें होती थीं। जब उनका अभ्यास एक विशिष्ट स्तर पर पहुंच जाता था, वे और आगे विकास नहीं कर पाते थे। कुछ लोगों का आरंभ से ही नैतिकगुण स्तर ऊँचा होता है। अभ्यास के साथ उनका दिव्य नेत्र जल्द ही खुल जाता है और वे किसी विशिष्ट स्तर तक पहुंच पाते हैं। क्योंकि इस व्यक्ति का जन्मजात गुण अपेक्षाकृत अच्छा है और उसका नैतिकगुण स्तर ऊँचा है, उसका गोंग तेजी से बढ़ता है। जब तक उसका गोंग उसके नैतिकगुण स्तर तक पहुंचता है, तब गोंग भी उस स्तर तक बढ़ जाता है। यदि वह निरंतर गोंग को बढ़ाते रहना चाहता है, तो मतभेद भी बहुत गंभीर होते जायेंगे, क्योंकि इसके लिए यह आवश्यक है कि वह अपने नैतिकगुण को बढ़ाता रहे। यह विशेष रूप से एक अच्छे जन्मजात गुण वाले व्यक्ति के लिए सत्य है। वह सोचता है कि उसका गोंग बहुत अच्छी तरह बढ़ता जा रहा था और अभ्यास भी बहुत अच्छा चल रहा था। अचानक ही इतनी समस्याऐं क्यों आ गई हैं? कुछ ठीक नहीं हो रहा। लोग उससे ठीक बर्ताव नहीं करते, और उसका अफसर भी उसकी तरफदारी नहीं करता। यहां तक कि घर का वातावरण भी बहुत तनावपूर्ण हो गया है। अचानक ही इतनी सारी समस्याऐं क्यों आ गई हैं। हो सकता है कि इस व्यक्ति को स्वयं समझ न आये कि ऐसा क्यों हो रहा है। अपने अच्छे जन्मजात गुण के कारण, वह एक विशिष्ट स्तर तक पहुंच चुका है जिससे यह स्थिति पैदा होती है। किन्तु यह किसी अभ्यासी के लिए साधना पूर्ण करने के लिए अन्तिम मानदण्ड कैसे हो सकता है? यह साधना अभ्यास के अंत से अभी कहीं दूर है! आपको स्वयं में निरंतर सुधार करते जाना चाहिए। आपके उस थोड़े से जन्मजात गुण के कारण आप इस अवस्था पर पहुंचे हैं। और आगे उठने के लिए, आदर्श को भी साथ ही बढ़ाना आवश्यक है।

कोई कह सकता है, "मैं कुछ और धन कमाऊँगा जिससे मेरे परिवार की अच्छी देख-रेख हो सके और मुझे किसी बारे में चिंता न करनी पड़े। इसके बाद, मैं साधना का अभ्यास करूंगा।" मैं कहूँगा कि यह आपका इच्छा से भरा विचार है। आप औरों के जीवन में विघ्न डालने में असमर्थ हैं, और न ही आप औरों के भाग्य को नियंत्रित कर सकते हैं, जिसमें आपकी पत्नी, बेटे, बेटियां, माता-पिता, और भाई शामिल हैं। क्या आप उन वस्तुओं का निर्णय कर सकते हैं? आप व्यायामों को चैन के साथ और आरामपूर्वक कैसे कर सकते हैं? ऐसी स्थिति कैसे हो सकती है? यही है जो आप साधारण लोगों के दृष्टिकोण से सोचते हैं।

साधना अभ्यास को कठिनाइयों के बीच किया जाना आवश्यक है जिससे यह पता लगाया जा सके कि आप विभिन्न प्रकार की मानव भावुकताओं और इच्छाओं को छोड़ सकते हैं और उनके बारे में कम परवाह कर सकते हैं। यदि आपका इन वस्तुओं से मोहभाव बना रहता है, आप साधना में सफल नहीं हो सकेंगे। हर वस्तु का अपना कर्म संबंध होता है। मानव प्राणी मानव क्यों बने रहते हैं? यह इसलिए क्योंकि मानव प्राणियों में भावुकता होती है। वे केवल इस भावुकता के लिए जीते हैं। परिवारजनों के बीच दुलार, एक स्त्री और पुरुष के बीच प्यार, माता-पिता के लिए प्यार, भावनाएं, दोस्ती, दोस्ती के लिए कुछ करना, तथा और सब कुछ, सभी इस भावुकता से संबंधित हैं। कोई व्यक्ति कुछ करना पसंद करता है या नहीं, प्रसन्न है या अप्रसन्न, किसी वस्तु से प्यार करता है या घृणा, और संपूर्ण मानव समाज में सभी कुछ इस भावुकता से आता है। यदि इस भावुकता को नहीं हटाया जाता, तो आप साधना अभ्यास करने में असमर्थ रहेंगे। यदि आप इस भावुकता से मुक्त हैं, आप पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकता। एक साधारण व्यक्ति का मन आपको नहीं हिला पायेगा। इसके स्थान पर जो आता है वह है करूणा, जो कहीं अधिक उदार है। नि:संदेह, तुरंत ही इस भावुकता का परित्याग करना सरल नहीं है। साधना अभ्यास एक लम्बी प्रक्रिया है और अपने मोहभावों को धीरे-धीरे छोड़ते जाने की प्रक्रिया है। फिर भी, आपको अपने साथ सख्त होना चाहिए।

एक अभ्यासी होने पर, मतभेद अचानक ही आपके सामने आ जायेंगे। आपको क्या करना चाहिए? आपको सदैव करूणा और दयाभाव का हृदय बनाये रखना चाहिए। तब, जब आपके सामने कोई समस्या आती है, आप अच्छा कर सकेंगे क्योंकि यह आपको संघर्ष को कम करने के लिए स्थान देता है। आपको सदैव औरों के लिए करूणामय और दयालु रहना चाहिए, और कुछ भी करते समय औरों का ध्यान रखना चाहिए। जब कभी आपके सामने कोई समस्या आती है, आपको पहले यह ध्यान देना चाहिए कि और लोग इस विषय को सह सकते हैं या इससे किसी को दु:ख तो नहीं पहुंचेगा। ऐसा करने पर, कोई समस्याऐं उत्पन्न नहीं होंगी। इसलिए साधना अभ्यास में आपको अपने लिए ऊँचे और अधिक ऊँचे आदर्श का पालन करना चाहिए।

कुछ लोग अक्सर इन बातों को नहीं समझ पाते। जब किसी का दिव्य नेत्र खुलता है और वह एक बुध्द को देखता है, वह घर जा कर बुध्द की उपासना करता है, और मन में प्रार्थना करता है, "आप मेरी मदद क्यों नहीं करते? कृपया मेरे लिए इस समस्या को हल कर दीजिए।" वह बुध्द, निश्चित ही, इस व्यक्ति के लिए कुछ नहीं करेंगे क्योंकि यह समस्या बुध्द द्वारा उत्पन्न की गई थी, जिससे उसका नैतिकगुण बढ़ सके और उसमें कठिनाई के बीच सुधार हो सके। बुध्द आपके लिए इस समस्या की देख-रेख कैसे कर सकते हैं? वह आपके लिए समस्या को बिल्कुल भी हल नहीं करेंगे। यदि वे आपकी समस्या को हल कर देते हैं तो आप अपना गोंग कैसे बढ़ा सकते हैं और अपने नैतिकगुण को कैसे सुधार कर सकते हैं? मुख्य बात यह है कि आपका गोंग बढ़े। महान ज्ञानप्राप्त व्यक्तियों के लिए, मानव बन कर जीना उद्देश्य नहीं है, और व्यक्ति का जीवन मानव बने रहने के लिए नहीं है- इसका आपके लिए उद्देश्य है कि आप अपने मूल की ओर लौटें। मानव बहुत दु:ख भोगते हैं। ज्ञानप्राप्त व्यक्ति सोचते हैं कि व्यक्ति जितना दु:ख भोगे उतना अच्छा है, जिससे वह अपने ऋण को तेजी से चुका सके। वे इस प्रकार सोचते हैं। कुछ लोग यह नहीं समझते और यदि उनकी प्रार्थना का कोई असर नहीं होता वे बुध्द से शिकायत करना आरंभ कर देते हैं, "आप मेरी मदद क्यों नहीं करते? मैं हर रोज आपके सामने अगरबत्ती जलाता हूँ और प्रणाम करता हूँ।" इसके कारण, हो सकता है वह बुध्द की प्रतिमा को जमीन पर फेंक दे और उसके बाद बुध्द की निंदा करना आरंभ कर दे। इस निंदा के परिणामस्वरूप, उसका नैतिकगुण गिर जायेगा, और उसका गोंग लुप्त हो जायेगा। यह व्यक्ति जानता है कि सब कुछ चला गया, इसलिए वह बुध्द से और भी घृणा करने लगता है, यह सोच कर कि बुध्द उसे बर्बाद कर रहे हैं। यह व्यक्ति बुध्द के नैतिकगुण को साधारण व्यक्ति के मानदण्ड से मापता है। यह कैसे चल सकता है यदि कोई व्यक्ति उच्च स्तर की वस्तुओं को साधारण लोगों के आदर्श से देखे? इसलिए, ऐसी बहुत सी परिस्थितियां आती हैं जब लोग अपने जीवन के दु:खों को अन्यायपूर्ण मानते हैं। कई लोग इस प्रकार गिर जाते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में, कई महान चीगोंग गुरुओं जिनमें कई सुप्रसिध्द भी शामिल हैं, के स्तर गिर गये हैं और वे आज कुछ नहीं हैं। नि:संदेह, वे सच्चे चीगोंग गुरु इतिहास में अपना उद्देश्य पूर्ण करके पहले ही प्रस्थान कर चुके हैं। केवल कुछ ही पीछे छूटे हैं और वे साधारण लोगों के बीच भटक गये हैं, और वे अभी भी निम्न नैतिकगुण स्तर के साथ सक्रिय हैं। ये लोग अपना गोंग पहले ही खो चुके हैं। कुछ चीगोंग गुरु जो पहले सुप्रसिध्द थे आज भी समाज में सक्रिय हैं। जब उनके गुरुओं ने देखा कि वे साधारण लोगों के बीच भटक गये हैं और स्वयं को प्रसिध्दि और निजी-लाभ की चाह से मुक्त नहीं कर सके, और जब वे निराशाजनक हो गये, उनके गुरु उनकी सह-आत्माओं को ले गये। पूरा गोंग सह-आत्मा के शरीर पर विकसित हुआ था। ऐसे बहुत से विशिष्ट उदाहरण हैं।

हमारे अभ्यास की पध्दति में, इस प्रकार की परिस्थितियां बहुत कम हैं। यदि कुछ हैं भी, तो वे न के बराबर हैं। नैतिकगुण में सुधार के विषय में बहुत से प्रखर उदाहरण हैं। एक अभ्यासी शाडोंग प्रांत के एक नगर में एक कपड़ा बनाने के कारखाने में काम करता था। फालुन दाफा पढ़ने के बाद, उसने अपने सहकर्मियों को भी अभ्यास सिखाया। परिणामस्वरूप, कारखाने ने एक नया रूप धारण कर लिया। वह पहले कपड़े के कारखाने से तौलिये के टुकड़े घर ले जाया करता था, और उसी प्रकार दूसरे कर्मचारी भी करते थे। दाफा के अभ्यास के बाद, वस्तुएं घर ले जाने के स्थान पर वह उन सब वस्तुओं को वापस कारखाने में ले आया जिन्हें वह पहले घर ले गया था। जब औरों ने उसे ऐसा करते देखा, तो कोई भी वस्तुओं को घर नहीं ले जाने लगा। कुछ कर्मचारियों ने वे वस्तुऐं भी कारखाने में वापस कर दीं जिन्हें वे पहले घर ले गये थे। यह स्थिति पूरे कारखाने में हुई।

नगर के दाफा निदेशालय का एक स्वयंसेवी निर्देशक कारखाने में यह देखने गया कि फालुन दाफा अभ्यासियों का अभ्यास किस प्रकार चल रहा है। कारखाने का प्रबंधक स्वयं उससे मिलने आया : "फालुन दाफा सीखने के बाद से, ये कर्मचारी काम पर जल्दी आ जाते हैं और घर भी देर से जाते हैं। वे बहुत मेहनत से काम करते हैं और दी गई कोई भी जिम्मेदारी निभाते हैं। वे निजी-लाभ के लिए संघर्ष नहीं करते। ऐसा करने से, उन्होंने पूरा कारखाने को एक नया ही रूप दे दिया है, और कारखाने का मुनाफा भी बढ़ गया है। आपका अभ्यास कितना प्रभावकारी है। आपके गुरु कब आ रहे हैं? मैं भी उनके व्याख्यान सुनना चाहूँगा।" फालुन दाफा में हमारी साधना का मुख्य उद्देश्य लोगों को ऊँचे स्तरों की ओर ले जाना है। जबकि इसका ऐसा करने का कोई अभिप्राय नहीं है, तो भी यह समाज में आध्यात्मिक संस्कृति ला कर एक महान रचनात्मक भूमिका अदा कर सकता है। यदि हर कोई अपने अंदर झांके और यह सोचे कि अच्छा आचरण कैसे किया जाये, मैं कहूंगा कि समाज में स्थायित्व आयेगा और मानवीय नैतिक आदर्श फिर से बढ़ेंगे।

जब मैं ताइयुआन2 में फा और अभ्यास सिखा रहा था, वहां एक पचास वर्ष की उम्र की एक महिला अभ्यासी थी। वह और उसका पति मेरे व्याख्यानों को सुनने आये थे। जब वे चल कर सड़क के बीच तक पहुंचे, एक कार वहां से बहुत तेजी से गुजरी, और पीछे लगे आईने में उस महिला के कपड़े फंस गये। महिला के कपड़े कार के साथ फंसे होने के कारण, वह दस मीटर से भी अधिक दूरी तक घिसटती चली गई और जमीन पर आ गिरी। कार बीस मीटर आगे चलने के बाद रूकी। चालक कार से बाहर आने के बाद बहुत नाराज था : "हे, क्या तुम्हें चलते हुए दिखाई नहीं दे रहा था।" आजकल, लोग इसी तरह बर्ताव करते हैं और किसी समस्या के सामने आने पर सबसे पहले जिम्मेदारी से मुकर जाते हैं, भले ही गलती उन्हीं से हुई हो। कार के अंदर बैठे यात्री बोले : "यह तो पता करो कि महिला को कितनी चोट लगी है। हम उसे अस्पताल ले चलते हैं।" चालक अपनी सद्बुध्दि में वापस आया और कहने के लिए दौड़ा : "आप कैसी हैं? क्या आपको चोट लगी है? चलिए जांच के लिए अस्पताल चलें।" यह अभ्यासी धीरे से जमीन से उठी और बोली : "मुझे कुछ नहीं हुआ है। आप जा सकते हैं।" उसने अपने कपड़ों से गंदगी झाड़ी और अपने पति के साथ चली गई।

उसने कक्षा में आकर मुझे यह कहानी बताई, और मैं बहुत प्रसन्न हुआ। हमारे अभ्यासियों के नैतिकगुण में वास्तव में सुधार हुआ है। उसने मुझे कहा : "गुरुजी, आज मैंने फालुन दाफा पढ़ा था। यदि मैंने फालुन दाफा नहीं पढ़ा होता, तो मैं इस दुर्घटना को उस प्रकार न ले पाती जैसे आज किया।" आप सभी यह सोचें : एक सेवानिवृत्त व्यक्ति के लिए, आजकल कपड़ों के दाम भी इतने बढ़ गये हैं और लोगों के लिए कोई कल्याणकारी योजनाएं भी नहीं है। पचास वर्ष से ऊपर की एक महिला कार द्वारा इतनी दूरी तक घिसटती चली गई और जमीन पर गिर गई। उसके शरीर पर कहां चोट आ सकती थी? हर जगह। वह जमीन पर बिना उठे पड़ी रह सकती थी। वह अस्पताल जाती? ठीक है। वह अस्पताल में भर्ती हो सकती थी और फिर बाहर नहीं निकलती। एक साधारण व्यक्ति इस प्रकार हो सकता था, किन्तु वह एक अभ्यासी है और उसने वैसा नहीं किया। हमने कहा है कि अच्छाई या बुराई व्यक्ति के तत्कालिक विचार से आते हैं, और उस क्षण का विचार विभिन्न परिणाम ला सकता है। उस वृध्दावस्था में, यदि वह साधारण व्यक्ति होती, क्या वह घायल नहीं होती? किन्तु उसकी त्वचा पर खरोंच तक नहीं आई। अच्छाई या बुराई उस तत्कालिक विचार से आते हैं। यदि वह वहां पड़ी रहती और कहती, "अह, मुझे बहुत दर्द है। यहां और वहां बहुत चोट लगी है।" तब, उसकी हड्डियों में वास्तव में फ्रैक्चर हो सकता था, और वह अपंग हो सकती थी। भले ही उसे कितना भी धन दिया जाता, वह अपना बाकी जीवन अस्पताल में काट कर कैसे आरामदेह हो सकती थी? आसपास खड़े लोगों को भी यह विचित्र लगा कि वृध्द महिला ने उसका उपयोग नहीं किया और उससे धन नहीं मांगा। आजकल, मानव नैतिक आदर्श विकृत हो गये हैं। चालक वास्तव में कार बहुत तेज चला रहा था, किन्तु वह कैसे किसी को जान-बूझकर ठोकर मार सकता था? क्या उसने यह अंजाने में नहीं किया? किन्तु आज लोग इसी तरह हैं। यदि उसका उपयोग नहीं किया गया, तो आसपास खड़े लोगों को भी यह न्यायसंगत नहीं लगा। मैंने कहा है आज लोग अच्छाई और बुराई में भेद नहीं कर सकते। यदि कोई व्यक्ति दूसरे को बताता है कि वह कोई बुरा कार्य कर रहा है, तो वह इस पर विश्वास नहीं करेगा। क्योंकि मानव नैतिक आदर्श बदल गये हैं, कुछ लोगों को निजी-लाभ के अलावा कुछ दिखाई नहीं पड़ता और वे धन के लिए कुछ भी करेंगे। "यदि कोई व्यक्ति निजी-लाभ के पीछे नहीं है, तो धरती-आकाश उसे मार ही देंगे।" -आजकल यही उद्देश्य बन गया है!

बीजिंग में एक अभ्यासी अपने बच्चे को शाम को च्येनमन3 चौक पर टहलाने के लिए लाया और उसने एक लॉटरी बेचने वाले वाहन को देखा। बच्चे को उत्साह आ गया और उसने लॉटरी खेलने के लिए कहा। उसने बच्चे को खेलने के लिए एक युआन दिया, और बच्चे का दूसरा पुरस्कार निकल आया, जो एक छोटी डीलक्स साइकिल थी। बच्चा बहुत आनंदित था। तभी पिता के मन में एक विचार आया : "मैं एक अभ्यासी हूँ। मैं इस प्रकार की वस्तु कैसे ले सकता हूँ? यदि मैं कुछ ऐसा प्राप्त करता हूँ जिसका मैंने भुगतान नहीं किया है तब मुझे कितना सद्गुण त्यागना पड़ेगा? उसने बच्चे से कहा : "हम इसे नहीं लेते। यदि तुम चाहते हो तो हम स्वयं ही एक खरीद सकते हैं।" बच्चा नाराज हो गया : "मैं आपसे इसे खरीदने के लिए मिन्नतें करता रहा, और तब आपने यह नहीं खरीदी। और अब जब मुझे यह मिल गई है तो आप मुझे रखने नहीं देते।" बच्चा बुरी तरह रोने चीखने लगा। यह व्यक्ति इस बारे में कुछ नहीं कर सका और साइकिल को घर ले आया। घर में, जितना उसने इसके बारे में सोचा, उतना ही वह बेचैन हुआ। उसने उन लोगों के पास धन भेजने के बारे में भी सोचा। तब उसने अनुमान लगाया : "लॉटरी के टिकट बिक चुके हैं, और यदि मैं उन्हें धन वापस भेजता हूँ तो क्या वे उसे आपस में नहीं बांट लेंगे? मुझे धन अपने कार्यस्थल में दान में दे देना चाहिए।"

सौभाग्य से, उसके कार्यस्थल में कई फालुन दाफा अभ्यासी थे, और उसका अफसर उसे समझ सका। यदि यह एक साधारण वातावरण या साधारण कार्यस्थल में होता, जहां आप कहते कि आप एक अभ्यासी हैं जो लॉटरी में निकली साइकिल नहीं चाहता और धन को कार्यस्थल में दान में देना चाहता है, तो अफसर भी सोचता कि आपको कुछ मानसिक समस्या है। दूसरे लोग भी कुछ टिप्पणी करते : "क्या यह व्यक्ति चीगोंग अभ्यास में भटक गया है या उसे साधना पागलपन हो गया है?" मैं कह चुका हूँ कि नैतिक आदर्श विकृत हो गये हैं। 1950 या 1960 के दशकों में, यह कोई बड़ी बात नहीं होती और बहुत साधारण होती- किसी को भी यह बात अजीब या अनोखी नहीं लगती।

हम कह चुके हैं कि भले ही मानव नैतिक आदर्श कितने ही बदल जायें, ब्रह्माण्ड की यह प्रकृति सत्य- करूणा-सहनशीलता सदैव अपरिवर्तनीय रहती है। यदि कोई कहता है कि आप अच्छे हैं, हो सकता है आप वास्तव में अच्छे न हों। यदि कोई कहता है कि आप बुरे हैं, हो सकता है वास्तव में बुरे न हों। यह इसलिए क्योंकि अच्छाई और बुराई मापने के मानक विकृत हो गये हैं। केवल वही जो ब्रह्माण्ड की इस प्रकृति के अनुरूप है एक अच्छा व्यक्ति है। यही एकमात्र मानक है जो एक अच्छे और बुरे व्यक्ति में भेद करता है, और इसकी पहचान ब्रह्माण्ड द्वारा की जाती है। हालांकि मानव समाज में महान बदलाव आ चुके हैं, मानव नैतिक आदर्श बहुत अधिक गिर चुके हैं। मानव नैतिकता प्रतिदिन खराब होती जा रही है, और लाभ ही एकमात्र ध्येय बन गये हैं। किन्तु ब्रह्माण्ड में बदलाव मानव जाति में बदलावों के अनुसार नहीं होते। एक अभ्यासी होते हुए, वह साधारण लोगों के आदर्श के अनुसार आचरण नहीं कर सकता। इसकी अनुमति नहीं है कि आप जायें और कुछ भी करते रहें क्योंकि साधारण लोग उसे सही मानते हैं। जब साधारण लोग कहते हैं कि यह अच्छा है, हो सकता है कि यह अच्छा न हो। जब साधारण लोग कहते हैं यह बुरा है, हो सकता है यह बुरा न हो। इस समय में जब नैतिक आदर्श विकृत हो गये हैं, यदि आप किसी को बतायें कि वह बुरा कर रहा है, वह इस पर विश्वास नहीं करेगा! एक अभ्यासी होते हुए, व्यक्ति को ब्रह्माण्ड की प्रकृति के अनुसार ही वस्तुऐं जांचनी चाहिए। केवल तभी वह भेद कर पायेगा कि क्या सच्चे रूप से अच्छा है और क्या वास्तव में बुरा।

शक्ति-पात

साधकों के समाज में, एक परिस्थिति होती है जिसे शक्ति-पात कहते हैं। शक्ति-पात बुध्द विचारधारा के तंत्र साधना मार्ग की एक धार्मिक क्रिया है। इसका उद्देश्य है कि, शक्ति-पात की रीति के द्वारा, व्यक्ति कोई दूसरी साधना पध्दति नहीं मानेगा और इस पध्दति विशेष में सच्चे शिष्य की तरह स्वीकार किया जायेगा। अब, इसमें इतना अनोखा क्या है? यह धार्मिक औपचारिकता चीगोंग पध्दतियों में भी प्रयोग की जा रही है। न केवल इसे तंत्र में प्रयोग में किया जाता है, बल्कि ताओ पध्दति में भी। मैं कह चुका हूँ कि वे सभी जो समाज में तंत्र की पध्दति तंत्र के नाम से सिखाते हैं, पाखण्डी हैं। यह इस प्रकार क्यों है? यह इसलिए क्योंकि तांग तंत्रविद्या हमारे देश से एक हजार वर्ष से पहले ही लुप्त हो चुकी है, और इसका अस्तित्व नहीं है। भाषा की बाधा के कारण, तिब्बत की तंत्रविद्या कभी भी पूरी तरह हान 4 प्रदेशों में परिचित नहीं हो पायी। विशेषत:, क्योंकि यह एक गुप्त धर्म है, इसका अभ्यास मठों में गुप्त रूप से किया जाना आवश्यक है। गुरु द्वारा भी इसे गुप्त रूप से सिखाया जाना आवश्यक होता है, और गुरु व्यक्ति को गुप्त रूप से अभ्यास सिखाता है। यदि ऐसा नहीं किया जा सकता, तो इसे बिल्कुल सिखाया ही नहीं जा सकता।

कई लोग जो तिब्बत जाकर चीगोंग सीखते हैं उनका केवल यह लक्ष्य होता है : वे गुरु को ढूंढ कर तिब्बत की तंत्रविद्या सीखना चाहते हैं जिससे वे भविष्य में चीगोंग गुरु बन जायें और धनी और प्रसिध्द हो जायें। आप सब यह सोचें : एक सच्चे, जीवित बुध्दमत के लामा जिन्होंने सच्ची शिक्षा प्राप्त की है, उनकी दिव्य सिध्दियां बहुत प्रबल होती हैं और वे इस प्रकार के व्यक्ति के मन को पढ़ सकते हैं। यह व्यक्ति यहां क्यों आया है? वे इस व्यक्ति के मन को पढ़ कर तुरंत समझ जायेंगे : "तुम यहां धन और प्रसिध्दि के लिए पध्दति को सीखने और चीगोंग गुरु बनने आये हो, जो इस बुध्द साधना पध्दति का अपमान है।" बुध्दत्व की साधना के लिए इतनी गंभीर पध्दति को, प्रसिध्दि और धन के लिए आपके चीगोंग गुरु बनने की इच्छा के लिए सरलता से कैसे बर्बाद किया जा सकता है? आपका क्या लक्ष्य है? इसलिए, वह इस व्यक्ति को कुछ भी नहीं सिखायेगा, न ही यह व्यक्ति कोई वास्तविक शिक्षाऐं प्राप्त करेगा। नि:संदेह, आसपास इतने मठ होने के कारण, वह कुछ बनावटी वस्तुऐं सीख सकता है। यदि उसका मन उचित नहीं है, चीगोंग गुरु बनने का प्रयत्न करते समय और बुरे कार्य करते समय वह प्रेत या पशु द्वारा ग्रसित हो जायेगा। ग्रसित करने वाले पशुओं में भी शक्ति होती है, किन्तु यह तिब्बत तंत्रविद्या द्वारा नहीं आती। जो लोग तिब्बत में सच्चे भाव से धर्म की खोज में जाते हैं वे वहां पहुंचने पर वहीं रह जाते हैं- वे सच्चे अभ्यासी हैं।

यह अनोखी बात है कि अब कई ताओ पध्दतियां भी शक्ति-पात का प्रयोग करती हैं। ताओ पध्दति में शक्ति नांड़ियां प्रयोग होती हैं। इसमें तथाकथित शक्ति-पात का अभ्यास क्यों होना चाहिए? मैं व्याख्यान देने दक्षिण की ओर भी जा चुका हूँ। जहां तक मैं जानता हूँ, वहां दस से भी अधिक अलग-अलग पध्दतियां हैं जो शक्ति-पात का अभ्यास करती हैं, विशेषकर ग्वांगडोंग के प्रदेश में। वे क्या करने का प्रयास कर रहे हैं? यदि गुरु आपके लिए शक्ति-पात करता है, तो आप उसके शिष्य बन जायेंगे और किसी दूसरी पध्दति को नहीं सीख सकेंगे। यदि आप ऐसा करेंगे, वह आपको सजा देगा, क्योंकि वह ऐसा ही करता है। क्या यह किसी दुष्ट पध्दति को करने जैसा नहीं है? जो वह सिखाता है वह केवल आरोग्य और स्वस्थ रहने के लिए है। लोग इसे केवल इसीलिए सीख रहे हैं क्योंकि वे स्वस्थ शरीर पाना चाहते हैं। उसे यह सब क्यों करना चाहिये? किसी का कहना है यदि लोग उसके चीगोंग का अभ्यास करते हैं, वे किसी और चीगोंग का अभ्यास नहीं कर सकते। क्या वह लोगों को बचा सकता है और उन्हें उनकी साधना पूर्ण करने में समर्थ बना सकता है? यह शिष्यों को गुमराह करना है। कई लोग वस्तुऐं इसी प्रकार करते हैं।

ताओ पध्दति कभी शक्ति-पात नहीं सिखाती, किन्तु अब इसमें भी तथाकथित शक्ति-पात होता है। मैंने पाया है कि जो चीगोंग गुरु शक्ति-पात के प्रयोग के बारे में सबसे अधिक आवाज उठाता है, उसका गोंग स्तम्भ केवल किसी दो या तीन मंजिल की इमारत के बराबर ऊँचा रह गया है। मैं सोचता हूँ कि एक सुप्रसिध्द चीगोंग गुरु के लिए, उसका गोंग बहुत अधिक गिर गया है। सैकड़ों लोग उसके आगे शक्ति-पात करवाने के लिए पंक्ति में खड़े होते हैं। उसका गोंग उस ऊँचाई तक सीमित है और जल्द ही गिर कर समाप्त हो जायेगा। तब वह शक्ति-पात के लिए क्या प्रयोग करेगा? क्या वह लोगों को धोखा नहीं दे रहा? दूसरे आयाम से देखे जाने पर, सच्चा शक्ति-पात व्यक्ति की हड्डियों को सिर से पैर तक श्वेत रत्न जैसा दिखाता है। यह गोंग या उच्च शक्ति पदार्थ द्वारा किया जाता है जिसमें व्यक्ति के शरीर को सिर से पैर तक शुध्द किया जाता है। क्या यह चीगोंग गुरु ऐसा कर सकता है? वह नहीं कर सकता। वह क्या करता है? नि:संदेह, वह एक नया धर्म आरम्भ करना नहीं चाहेगा। उसका ध्येय यह है कि यदि आप एक बार उसकी पध्दति सीखें, तो आप उससे संबंधित हो जायें। आपके लिए उसकी कक्षाओं में उसकी वस्तुओं को सीखना आवश्यक हो जाता है। उसका ध्येय आपका धन प्राप्त करना है। उसे कोई धन अर्जित नहीं होगा यदि कोई भी उसकी पध्दति नहीं सीखता।

बुध्द विचारधारा के अन्य साधना अभ्यासों के शिष्यों की तरह, फालुन दाफा के शिष्य दूसरे आयामों में उच्च स्तर के गुरुओं द्वारा कई बार शक्ति-पात अनुभव करेंगे; किन्तु आपको इसके बारे में बताया नहीं जायेगा। वे जिनके पास दिव्य सिध्दियां हैं या जो संवेदनशील हैं उन्हें सोते समय या किसी और समय इसका अनुभव हो सकता है, जैसे एक गर्म प्रवाह अचानक ही सिर के ऊपर से उतर कर उनके पूरे शरीर में बहेगा। शक्ति-पात का लक्ष्य आपके गोंग में ऊँचे गोंग को मिलाना नहीं है, क्योंकि यह आपके अपने साधना अभ्यास द्वारा विकसित किया जाना चाहिए। शक्ति-पात एक सुदृढ़ करने का तरीका है जो आपके शरीर का शुध्दिकरण तथा और शोधन करता है। आप शक्ति-पात से कई बार गुजरेंगे- आपके शरीर का प्रत्येक स्तर पर शोधन करना आवश्यक होता है। क्योंकि साधना व्यक्ति के अपने प्रयत्न पर निर्भर करती है और गोंग का रूपांतरण गुरु द्वारा किया जाता है, हम यहां शक्ति-पात की औपचारिकता का अभ्यास नहीं करते।

कुछ ऐसे भी लोग हैं जो गुरु की उपासना करते हैं। इसके बारे में कहा जाये तो, मैं कुछ बताना चाहूँगा। कई लोग मुझे गुरु की तरह पूजना चाहते हैं। इतिहास में हमारा यह काल चीनी सामंतवादी समाज से भिन्न है। क्या झुकने और दण्डवत् प्रणाम करने का यह अर्थ है कि आप किसी को गुरु मानते हैं? हम इस औपचारिकता का अभ्यास नहीं करते। कई लोग सोचते हैं : "यदि मैं प्रणाम करूं, अगरबत्ती जलाऊं, और बुध्द की सच्चे हृदय से पूजा करूं, मेरा गोंग बढ़ जायेगा।" मुझे यह बहुत उपहासपूर्ण लगता है। सच्चा साधना अभ्यास पूरी तरह व्यक्ति के अपने ऊपर निर्भर करता है, इसलिए किसी वस्तु के लिए प्रार्थना करना व्यर्थ है। आपको बुध्द की पूजा करना या अगरबत्ती जलाना आवश्यक नहीं है। जब तक आप वास्तव में एक अभ्यासी के आदर्श के अनुसार साधना अभ्यास करते हैं, बुध्द आपको देख कर बहुत प्रसन्न होंगे। यदि आप और स्थानों पर हमेशा बुरे कार्य करते हैं, वे आपको देखना भी पसंद नहीं करेंगे, भले ही आप उनके लिए अगरबत्ती जलाते हैं और प्रणाम करते हैं। क्या यह सत्य नहीं है? सच्चा साधना अभ्यास व्यक्ति के अपने ऊपर निर्भर करता है। गुरु के लिए आपके प्रणाम करने और पूजा करने का क्या उपयोग है यदि आज इस द्वार से बाहर निकल कर आप जो चाहे वो करते हैं? हम इस औपचारिकता की परवाह बिल्कुल नहीं करते। आप मेरे मान को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं!

हमने सभी को इतनी अधिक वस्तुऐं दी हैं। आप सभी के लिए, जब तक आप वास्तव में साधना अभ्यास करते हैं और अपना आचरण सख्ती से दाफा के अनुरूप रखते हैं, मैं आपको अपना शिष्य मानूंगा। जब तक आप फालुन दाफा का अभ्यास करते हैं, मैं आपको शिष्य मानूंगा। यदि आप इसका अभ्यास नहीं करना चाहते, हम आपके लिए कुछ नहीं कर सकते। यदि आप साधना का अभ्यास नहीं करते, तो उस नाम को बनाये रखने की क्या उपयोगिता है। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि आप पहले सत्र की कक्षाओं से है या दूसरे सत्र से। आप केवल व्यायामों को करने से हमारे अभ्यासी कैसे हो सकते हैं? एक स्वस्थ शरीर पाने के लिए और उच्च स्तरों की ओर वास्तविक उन्नति करने के लिए, आपको सच्चे रूप से हमारे नैतिकगुण आदर्श का पालन करते हुए साधना का अभ्यास करना होगा। इसलिए हम उन औपचारिकताओं की परवाह नहीं करते। जब तक आप साधना का अभ्यास करते हैं, आप हमारी अभ्यास पध्दति के अभ्यासी हैं। मेरे फा-शरीर सब कुछ जानते हैं- वे आपके मन की सब बातें जानते हैं, और वे सब कुछ कर सकते हैं। यदि आप साधना अभ्यास नहीं करते तो वे आपकी देख-रेख नहीं करेंगे। यदि आप साधना अभ्यास करते हैं, वे अंत तक आपकी मदद करेंगे।

कुछ चीगोंग पध्दतियों में, जिन अभ्यासियों ने अपने गुरुओं को कभी नहीं देखा है उनका मत है कि यदि वे कुछ सौ युआन भेंट करें और किसी विशेष दिशा में प्रणाम करें, तो इतना कुछ बहुत होगा। क्या यह स्वयं को तथा औरों को धोखा देना नहीं है? इसके अतिरिक्त, ये लोग इसके बाद बहुत समर्पित हो जाते हैं और अपनी पध्दतियों और गुरुओं की प्रतिरक्षा और बचाव करने लगते हैं। वे औरों को भी कहते हैं कि वे दूसरी पध्दतियों को न पढ़ें। मुझे यह बहुत उपहासपूर्ण लगता है। साथ ही, कुछ लोग मो दिंग 5 नामक औपचारिकता भी करते हैं। कोई नहीं जानता कि इस प्रकार छूने के बाद क्या प्रभाव होता है।

न केवल वे जो तंत्र के नाम से अपने अभ्यास सिखाते हैं पाखण्डी हैं; बल्कि वे सब भी वैसे ही हैं जो बुध्दमत के नाम से चीगोंग सिखाते हैं। आप सब यह सोचें : कई हजार वर्षों से, बुध्दमत की साधना पध्दतियां उस प्रकार रही हैं। यदि कोई इसमें बदलाव कर दे तो यह तब भी बुध्दमत कैसे रह सकता है? साधना पध्दतियां गंभीर बुध्द साधना के लिए होती हैं, और वे अत्यन्त जटिल होती हैं। एक छोटा बदलाव सब कुछ बिगाड़ देगा। क्योंकि गोंग का रूपांतरण बहुत जटिल होता है, जो व्यक्ति को अनुभव होता है उसका कोई महत्व नहीं है। कोई इस आधार पर साधना का अभ्यास नहीं कर सकता कि उसे कैसा अनुभव होता है। भिक्षुओं के लिए धार्मिक रीति-रिवाज एक साधना पध्दति है; यदि इसे बदल दिया जाये, तो यह उस पध्दति का नहीं रह जायेगा। प्रत्येक पध्दति का एक महान ज्ञानप्राप्त व्यक्ति प्रभारी होता है, और प्रत्येक पध्दति ने अनेकों महान ज्ञानप्राप्त व्यक्ति पैदा किये हैं। कोई भी सहज ही उस पध्दति की साधना प्रणाली में बदलाव का साहस नहीं करता। किसी साधारण चीगोंग गुरु के लिए, उसमें क्या महान गुण है कि वह गुरु का अनादर करने का साहस करे और बुध्द साधना पध्दति में बदलाव करे? यदि इसे वास्तव में बदल दिया जाये क्या यह तब भी वही पध्दति कहलायेगी? पाखण्डी चींगोंग की पहचान की जा सकती है।

दिव्य मार्ग को उचित स्थान पर रखना

"दिव्य मार्ग को उचित स्थान पर रखने" को "एक दिव्य छिद्र" भी कहा जाता है। ऐसी शब्दावलि तान जिंग, ताओ जांग, और शिंगमिंग गुइज़ी नामक पुस्तकों में पाई जा सकती है। तो यह सब किसके बारे है? कई चीगोंग गुरु इसे स्पष्ट नहीं समझा सकते। यह इसलिए क्योंकि किसी साधारण चीगोंग गुरु के स्तर पर, न तो वह इसे देख सकता है न ही उसे यह देखने की अनुमति है। यदि कोई अभ्यासी इसे देखना चाहता है, तो उसे प्रज्ञा दृष्टि के ऊपरी स्तर या उससे ऊँचा पहुंचना होगा। एक साधारण चींगोंग गुरु इस स्तर पर नहीं पहुंच सकता; जिससे, वह इसे नहीं देख सकता। पूरे इतिहासकाल में, साधक समाज में यह चर्चा रही है कि दिव्य मार्ग क्या है, एक दिव्य छिद्र कहां होता है, और दिव्य मार्ग को उचित स्थिति में कैसे रखा जाता है। तान जिंग, ताओ जांग, और शिंगमिंग गुइज़ी की पुस्तकों में, आप पाते हैं वे सब सिध्दांतों पर चर्चा करती हैं और मूल तत्व नहीं बतातीं। एक चर्चा से दूसरी चर्चा तक, वे आपको उलझा देती हैं। वे आपको स्पष्ट रूप से विषय नहीं समझातीं क्योंकि मूल तत्व साधारण लोगों द्वारा नहीं जाना जा सकता।

इसके अतिरिक्त, मैं आपको यह बता रहा हूँ क्योंकि आप फालुन दाफा शिष्य हैं, मैं आपको ये शब्द कहूँगा: "उन विकृत चीगोंग पुस्तकों को न पढ़ें"। मैं उपरोक्त पारंपरिक पुस्तकों के लिए नहीं कह रहा हूँ, बल्कि उन पाखण्डी चीगोंग पुस्तकों के लिए कह रहा हूँ जो लोगों द्वारा आजकल लिखी जाती हैं। आपको उन्हें खोलना भी नहीं चाहिए। यदि आपके मन में यह विचार आता है कि "यह वाक्य उचित जान पड़ता है," इससे, पुस्तक में ग्रसित करने वाला प्रेत या पशु आपके शरीर से जुड़ जायेगा। कई पुस्तकें ग्रसित करने वाले प्रेत या पशुओं के प्रभाव में लिखी गई हैं जो प्रसिध्दि और धन के मानव मोहभावों को नियंत्रित करते हैं। पाखण्डी चीगोंग पुस्तकें बहुत अधिक हैं। बहुत से लोग दायित्व नहीं मानते और ग्रसित करने वाले प्रेत या पशुओं और बुरी वस्तुओं के प्रभाव में पुस्तक लिखते हैं। साधारणत:, उपरोक्त पारंपरिक पुस्तकों या दूसरे संबंधित पारंपरिक ग्रन्थों को भी पढ़ना अच्छा नहीं है, क्योंकि इसमें एक अभ्यास में एकाग्रचित होने का विषय सम्मिलित है।

चीन चीगोंग विज्ञान शोध संस्थान के एक प्रबंधक ने मुझे एक कहानी सुनाई जिससे मुझे वास्तव में हंसी आ गई। उसने बताया कि बीजिंग में एक व्यक्ति था जो अक्सर चीगोंग सभाओं में जाया करता था। कई उपदेशों को सुनने के बाद, उसे लगा कि जो वहां बताया गया था, चीगोंग उससे अधिक नहीं है। क्योंकि हर कोई समान स्तर पर था, वे सब एक जैसे विषयों के बारे में बात करते थे। दूसरे पाखण्डी चीगोंग गुरुओं की भांति ही, उसने सोचा कि चीगोंग का सार उससे अधिक नहीं है! तब वह चीगोंग पर एक पुस्तक भी लिखना चाहता था। आप सब यह सोचें : एक व्यक्ति जो अभ्यासी नहीं हैं एक चीगोंग की पुस्तक लिखेगा। आजकल, चीगोंग पुस्तकें एक-दूसरे से नकल की जाती हैं। जैसे-जैसे उसका लिखना आगे बढ़ा, वह दिव्य मार्ग के विषय पर रूक गया। कौन समझता है कि दिव्य मार्ग क्या है? यहां तक कि सच्चे चीगोंग गुरुओं में भी, कुछ ही इसे समझते हैं। उसने जाकर एक पाखण्डी चीगोंग गुरु से पूछा। वह नहीं जानता था कि वह व्यक्ति पाखण्डी है, क्योंकि वह स्वयं वैसे भी चीगोंग नहीं समझता था। किन्तु यदि यह चीगोंग गुरु प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाता, तो दूसरे यह नहीं जान जाते कि वह नकली है? इसलिए, उसने जवाब बनाने का साहस किया और कहा कि दिव्य मार्ग व्यक्ति के लिंग के अग्रभाग पर होता है। यह बहुत उपहासपूर्ण है। हंसिए मत, क्योंकि यह पुस्तक पहले से ही जनता में प्रकाशित हो चुकी है। तात्पर्य यह है कि आजकल की चीगोंग पुस्तकें कितने उपहासपूर्ण स्तर तक पहुंच चुकी हैं। उन पुस्तकों को पढ़ने से आपको क्या लाभ होगा? उनकी कोई उपयोगिता नहीं है और यह केवल हानिकारक ही हो सकता है।

"दिव्य मार्ग को उचित स्थान पर रखने" का क्या अर्थ है? त्रिलोक-फा साधना के दौरान, जब व्यक्ति की साधना त्रिलोक-फा के मध्यम स्तर से आगे या उच्च स्तर पर होती है, उस व्यक्ति के पास अमर शिशु का विकास होना आरंभ हो जाता है। अमर शिशु और साधना-जनित शिशु (यिंगहाइ) जिनकी हम बात करते हैं, दो भिन्न वस्तुऐं हैं। साधना-जनित शिशु छोटे और खेलप्रिय होते हैं, और विनोदपूर्वक क्रीड़ा करते हैं। अमर शिशु स्थिर रहता है। यदि व्यक्ति की मूल आत्मा इस पर नियंत्रण नहीं कर लेती, अमर शिशु एक कमल पुष्प पर दोनों पैरों को एक-दूसरे पर रखकर और दोनों हाथों को मिलाकर स्थिर बैठता है। अमर शिशु तानत्येन से बढ़ता है और एक सूक्ष्म स्तर पर देखा जा सकता है, जब यह सूई की नोक से भी छोटा होता है।

इसके अतिरिक्त, एक और विषय स्पष्ट करना आवश्यक है। केवल एक ही वास्तविक तानत्येन होता है और यह उदर के निचले भाग में स्थित त्येन 6 होता है। यह व्यक्ति के शरीर में हवेयिन 7 बिंदु के ऊपर और पेट के नीचे होता है। अनेक प्रकार के गोंग, अनेक दिव्य सिध्दियां, अनेक सिध्दियां, फा-शरीर, अमर शिशु, साधना-जनित शिशु, और बहुत सी सत्ताएं इसी त्येन से विकास करते हैं।

अतीत में, कुछ अभ्यासी ऊपरी तानत्येन, मध्य तानत्येन और निम्न तानत्येन के बारे में बात करते थे। मैं कहूँगा कि वे गलत थे। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि उनके गुरुओं ने वंशानुगत उन्हें इसी प्रकार सिखाया है, और पुस्तकों में भी इसी प्रकार बताया है। मैं सभी को बताना चाहूँगा कि प्राचीन काल में भी विकृतियां थीं। यद्यपि कुछ वस्तुऐं वंशानुगत चली आ रही हैं, किन्तु वे अनुचित हो सकती हैं। कुछ निम्न साधना मार्ग साधारण लोगों के बीच सदैव चले आ रहे हैं, किन्तु वे साधना के लिए नहीं हैं और व्यर्थ होते हैं। जब वे इन्हें ऊपरी तानत्येन, मध्य तानत्येन और निम्न तानत्येन कहते हैं, उनका अर्थ है कि तानत्येन वहीं होता हैं जहां तान उत्पन्न हो सके। क्या यह उपहासपूर्ण नहीं है? जब कोई व्यक्ति अपने मन को शरीर में कहीं भी लम्बे समय तक केन्द्रित करता है, एक शक्तिपुंज उत्पन्न हो जाता है और तान बन जाता है। यदि आप इस पर विश्वास नहीं करते, तो अपने मन को अपने हाथ पर केन्द्रित करें और इसी प्रकार लम्बे समय तक रखें और वहां तान बन जायेगा। इसलिए, कुछ लोगों ने इस परिस्थिति को देखा और कह दिया कि तानत्येन सब जगह होता है। यह और भी उपहासपूर्ण जान पड़ता है। वे सोचते हैं कि जहां कहीं तान बन जाये वहां तानत्येन होता है। वास्तव में, यह तान है, किन्तु एक त्येन नहीं है। आप कह सकते हैं कि तान सब जगह होता है, या यह कि ऊपरी तानत्येन, मध्य तानत्येन और निम्न तानत्येन होते हैं। किन्तु, वास्तविक त्येन केवल एक होता है जो अनेकों फा उत्पन्न कर सकता है, और यह उदर के निचले भाग में होता है। इसलिए, ऊपरी तानत्येन, मध्य तानत्येन और निम्न तानत्येन की बातें गलत हैं। जहां कहीं व्यक्ति का मन लम्बे समय तक केन्द्रित होता है, तान बन जाता है।

अमर शिशु का उदर के निचले भाग में तानत्येन में धीरे-धीरे विकास आरंभ होता है और यह बड़ा होता जाता है। जब यह एक पिंग-पोंग गेंद के बराबर बड़ा हो जाता है, इसके पूरे शरीर का आकार स्पष्ट दिखाई देता है तथा नाक और आंखें बन चुकी होती हैं। उसी समय जब अमर शिशु पिंग-पोंग गेंद के बराबर बड़ा होता है, इसके साथ ही एक छोटा गोल बुलबुला पैदा होता है। पैदा होने के बाद, बुलबुला अमर शिशु के साथ ही विकास करता है। जब अमर शिशु चार इंच का हो जाता है, एक कमल पुष्प की पत्ती बन जाती है। जब अमर शिशु पांच या छ: इंच का हो जाता है, तो कमल पुष्प की पत्तियां मूल रूप से बन चुकी होती हैं, और कमल पुष्प की एक तह प्रकट होती है। एक प्रकाशमान, सुनहरा अमर शिशु एक सुनहरे कमल पुष्प पर विराजमान होता है और बहुत सुन्दर दिखाई देता है। यह है अजर-अमर वज्र शरीर, जिसे बुध्द विचारधारा में "बुध्द शरीर" कहा जाता है, या ताओ विचारधारा में "अमर शिशु"।

हमारी अभ्यास पध्दति में दोनों प्रकार के शरीरों को साधना द्वारा विकसित करने की आवश्यकता होती है; मूल शरीर को भी रूपांतरित करना आवश्यक होता है। यह सभी को ज्ञात है कि बुध्द शरीर को साधारण लोगों के बीच प्रकट होने की अनुमति नहीं है। अत्यधिक प्रयास द्वारा, यह अपनी रूपरेखा दिखा सकता है और इसका प्रकाश एक साधारण व्यक्ति की आंखों द्वारा देखा जा सकता है। रूपांतरित होने के बाद, हालांकि, भौतिक शरीर साधारण लोगों के बीच एक औसत व्यक्ति के शरीर जैसा ही दिखाई पड़ता है। एक साधारण व्यक्ति इसमें भेद नहीं कर सकता, हालांकि यह शरीर आयामों के बीच आवागमन कर सकता है। जब अमर शिशु चार से पांच इंच बड़ा हो जाता है, गोल बुलबुला भी उतना ही बड़ा हो जाता है, और यह एक हवा के गुब्बारे की तरह पारदर्शी होता है। अमर शिशु वहां ध्यान मुद्रा में स्थिर बैठता है। इस समय तक बुलबुला तानत्येन छोड़ देता है। क्योंकि यह बड़ा और विकसित हो जाता है, इसलिए यह ऊपर की ओर उठता है। इसके उठने का क्रम बहुत धीमा होता है, किन्तु इसकी गति का निरीक्षण रोज किया जा सकता है। यह धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठता जाता है। बहुत ध्यान देने पर, हम इसके अस्तित्व का अनुभव कर सकते हैं।

जब बुलबुला व्यक्ति के तानजोंग 8 बिंदु तक पहुंचता है, यह कुछ समय वहां रूकता है। क्योंकि वहां मानव शरीर का बहुत सा सत्व होता है (हृदय भी वहीं होता है), बुलबुले में वस्तुओं की एक प्रणाली विकसित होगी। यह सत्व बुलबुले के अंदर समाया जाएगा। कुछ समय पश्चात, यह फिर से ऊपर उठने लगेगा। जब यह गले से गुजरता है, तो व्यक्ति को इस प्रकार घुटन होगी जैसे सभी रक्त की नसें अवरूध्द हो गई हों, और व्यक्ति को बहुत असुविधाजनक सूजन अनुभव होगी। यह स्थिति केवल दो दिन रहेगी। तब बुलबुला व्यक्ति के सिर के ऊपर तक पहुंच जायेगा, और हम इसे "नीवान तक पहुंचना" कहते हैं। यह कहा जाता है कि यह नीवान तक पहुंच गया, जबकि वास्तव में यह आपके पूरे सिर के बराबर बड़ा होता है। आपके सिर में सूजन अनुभव होगी। क्योंकि नीवान मनुष्य के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण स्थान होता है, इसका सत्व भी बुलबुले में विकसित होना आवश्यक है। तब बुलबुला दिव्य नेत्र की सुरंग से संकुचित होकर बाहर आने का प्रयत्न करेगा, और इसमें बहुत असुविधाजनक महसूस होगा। व्यक्ति का दिव्य नेत्र सूजन आने तक संकुचित हो जायेगा, और व्यक्ति की कनपटी का भाग भी सूज जायेगा जबकि आंखें अंदर की ओर धंसती हुई महसूस होंगी। यह अनुभव तब तक रहेगा जब तक बुलबला दिव्य नेत्र की सुरंग से बाहर निकलता है और व्यक्ति के माथे के आगे लटक जाता है। इसे दिव्य मार्ग को उचित स्थान पर रखना कहते हैं, और यह वहां लटका रहता है।

इस समय पर, जिन लोगों के दिव्य नेत्र खुले होते हैं वे कुछ भी देख पाने में असमर्थ होते हैं। यह इसलिए क्योंकि बुध्द विचारधारा या ताओ विचारधारा के साधना अभ्यास में, दिव्य मार्ग के अंदर वस्तुओं के विकास को शीघ्र करने के लिए इसके द्वार बंद कर दिये जाते हैं। वहां दो आगे के द्वार ओर दो पीछे के द्वार होते हैं, और वे सभी बंद हो जाते हैं। जैसे बीजिंग में त्येनमन के प्रवेश द्वार में, वहां दोनों ओर दो बड़े द्वार होते हैं। दिव्य मार्ग को शीघ्रता से विकसित और सुदृढ़ करने के लिए, द्वारों को किसी बहुत विशेष परिस्थिति के अलावा खोला नहीं जाता। जो लोग दिव्य नेत्र से वस्तुओं को देख सकते हैं वे अब नहीं देख सकते, क्योंकि इसकी अनुमति नहीं है। इसके वहां लटके रहने का क्या प्रयोजन है? क्योंकि हमारे शरीर की सैकड़ों शक्ति नाड़ियां वहां मिलती हैं, इस स्थिति में उन सभी को दिव्य मार्ग में से घूमकर वापस आना होता है। उनका दिव्य मार्ग से घूमकर आना आवश्यक होता है, और इसका लक्ष्य दिव्य मार्ग के अंदर कुछ अतिरिक्त आधार बनाना और वस्तुओं की प्रणाली बनाना है। क्योंकि मानव शरीर एक लघु ब्रह्माण्ड होता है, यह एक लघु जगत बना लेता है जिसमें मानव शरीर की समस्त आवश्यक वस्तुऐं बनी होती हैं। किन्तु यह केवल व्यवस्था होती है जो पूरी तरह कार्यशील नहीं हो सकती।

चीमन विचारधारा के साधना अभ्यास में, दिव्य मार्ग खुला होता है। जब दिव्य मार्ग बाहर की ओर निकलता है, यह बेलन के आकार का होता है, किन्तु धीरे-धीरे यह गोलाकार हो जाता है। इस प्रकार इसके दोनों ओर के द्वार खुले होते हैं। क्योंकि चीमन विचारधारा में बुध्दत्व या ताओ की प्राप्ति के लिए साधना नहीं होती, इसमें अपनी रक्षा स्वयं करनी आवश्यक होती है। बुध्द विचारधारा और ताओ विचारधारा में अनेक गुरु होते हैं, जो सब आपकी रक्षा कर सकते हैं। आपको वस्तुओं को देखने की आवश्यकता नहीं होती, और न ही आपको कोई समस्या आती है। किन्तु चीमन विचारधारा में इस प्रकार नहीं होता, क्योंकि अपनी रक्षा स्वयं करनी होती है। इसलिए, वस्तुओं को देखने की योग्यता बने रहना आवश्यक होता है। उस समय, दिव्य नेत्र वस्तुओं को एक दूरबीन की तरह देखता है। इस प्रणाली के बन जाने के बाद, करीब एक महीने में, यह अंदर की ओर लौटने लगता है। इसके सिर के अंदर लौटने को, दिव्य मार्ग का स्थिति से हटना कहा जाता है।

जब दिव्य मार्ग अंदर की ओर प्रवेश करता है, तो व्यक्ति का सिर सूजा हुआ और असुविधाजनक महसूस होता है। तब यह व्यक्ति के यूजन 9 बिंदु से संकुचित होकर बाहर निकलता है। इसका संकुचित होकर बाहर निकलना बहुत असुविधाजनक लगता है, जैसे व्यक्ति का सिर फटा जा रहा हो। दिव्य मार्ग एक साथ ही बाहर आ जाता है, और तब व्यक्ति तुरंत ही राहत अनुभव करता है। बाहर आने के बाद, दिव्य मार्ग एक बहुत गहरे आयाम में रहेगा और उस बहुत गहरे आयाम के शरीर के रूप में रहेगा। इसलिए, सोते समय इससे छूने का एहसास भी नहीं होगा। किन्तु एक बात है : जब दिव्य मार्ग को स्थान पर रखने की स्थिति पहली बार होती है, व्यक्ति को आंखों के सामने कुछ महसूस होता है। हालांकि यह दूसरे आयाम में होता है, व्यक्ति को हमेशा लगता है कि आंखें धुंधली हो गई हों और जैसे उन्हें कुछ ढके हुए हो, इससे उसे बहुत असुविधाजनक लगता है। क्योंकि यूजन बिंदु भी बहुत महत्वपूर्ण मार्ग होता है, इसलिए दिव्य मार्ग को वहां कुछ प्रणालियां बनानी आवश्यक होती हैं। तब यह फिर से व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाता है। एक दिव्य छिद्र वास्तव में एक दिव्य मार्ग की स्थिति को नहीं दर्शाता, क्योंकि यह कई बार अपनी स्थिति बदलता है। जब यह नीवान पर लौटता है, यह शरीर में नीचे की ओर उतरने लगता है और मिंगमेन बिंदु10 तक आ जाता है। मिंगमेन बिंदु पर, यह दोबारा बाहर निकलता है।

मानव शरीर में मिंगमेन बिंदु एक बहुत महत्वपूर्ण और अहम बिंदु होता है। इसे ताओ विचारधारा में "छिद्र" कहा जाता है और हम इसे "मार्ग" (ग्वान) कहते हैं। यह एक महत्वपूर्ण मार्ग होता है जो वास्तव में एक लौह द्वार की भांति होता है, और इसमें लौह द्वारों की अनेक परतें होती हैं। जैसे ज्ञातव्य है कि मानव शरीर की अनेक परतें होती हैं। हमारी भौतिक कोशिकाऐं एक परत हैं, और अंदर के अणु एक और। वहां परमाणुओं, प्रोटोन, इलेक्ट्रॉन, बहुत सूक्ष्म कणों, अत्यन्त सूक्ष्म कणों, और अत्यन्त सूक्ष्म कणों से लेकर अत्यन्त अनन्त सूक्ष्म कणों तक की प्रत्येक परत पर एक द्वार होता है। इसलिए, वहां अनेको दिव्य सिध्दियां और कई विशेष योग्यताऐं विभिन्न परतों के द्वारों में बंद रहती हैं। दूसरी पध्दतियां तान की साधना करती हैं। जब तान में विस्फोट होने वाला होता है, तो सबसे पहले मिंगमेन बिंदु को विस्फोट द्वारा खोलना आवश्यक होता है। यदि इसे विस्फोट द्वारा नहीं खोला जाता, तो दिव्य सिध्दियों को मुक्त नहीं कराया जा सकता। जब दिव्य मार्ग मिंगमेन बिंदु पर प्रणालियां बना लेता है, यह फिर से शरीर में लौट आता है। तब यह उदर के निचले भाग में लौट आता है। इसे "दिव्य मार्ग का उचित स्थान पर लौटना" कहा जाता है।

लौटने के पश्चात, दिव्य मार्ग अपने मूल स्थान पर वापस नहीं आता। अब तक, अमर शिशु बहुत बड़ा हो जाता है। पारदर्शी बुलबुला अमर शिशु को घेर कर ढके रहता है। जैसे-जैसे अमर शिशु बढ़ता है, वैसे दिव्य मार्ग भी बढ़ता जाता है। ताओ विचारधारा में, साधारणत: जब अमर शिशु छ: या सात वर्ष के बालक की उम्र का हो जाता है, इसे व्यक्ति के शरीर को छोड़ने की अनुमति हो जाती है; इसे "अमर शिशु का जन्म होना" कहा जाता है। व्यक्ति की मूल आत्मा के नियंत्रण में, यह उसके शरीर के बाहर विचरण कर सकता है। व्यक्ति का भौतिक शरीर स्थिर रहता है, और उसकी मूल आत्मा बाहर आ जाती है। साधारणत: बुध्द विचारधारा में, अमर शिशु को कोई खतरा नहीं होता जब यह साधना द्वारा व्यक्ति के बराबर बड़ा हो जाता है, और इसका आवरण भी बड़ा हो जाता है। यह आवरण शरीर को बाहर से घेरे रहता है- इसे दिव्य मार्ग कहते हैं। क्योंकि अमर शिशु इतना बड़ा हो चुका होता है, दिव्य मार्ग अवश्य ही शरीर को बाहर से घेरे रहता है।

शायद आपने मंदिरों में बुध्द प्रतिमाऐं देखी होंगी और देखा होगा कि बुध्द हमेशा एक वृत में होते हैं। विशेष रूप से, किसी बुध्द के चित्र में सदैव एक वृत होता है जिसमें बुध्द बैठते हैं। अनेको बुध्द चित्र इस प्रकार होते हैं, और विशेषकर प्राचीन मंदिरों में सभी इस प्रकार होते हैं। बुध्द एक वृत के अंदर क्यों बैठते हैं? कोई भी इसे स्पष्ट नहीं समझा पाता। मैं आपको बताना चाहूँगा कि यह यही दिव्य मार्ग है, किन्तु इस समय इसे दिव्य मार्ग नहीं कहा जाता। इसे एक "दिव्यलोक" कहा जाता है, यद्यपि वास्तव में यह अभी एक दिव्यलोक नहीं है, इसमें केवल इसकी प्रणाली होती है। यह एक कारखाने की तरह होता है जिसकी व्यवस्था प्रणाली होती है, किन्तु उत्पाद बनाने की क्षमता नहीं होती। कार्यशील होने से पहले शक्ति भंडार और कच्चे उत्पाद का होना आवश्यक है। कुछ वर्षों पहले, कई अभ्यासी कहते थे : "मेरे गोंग का स्तर एक बौध्दिसत्व से भी ऊँचा है," या "मेरे गोंग का स्तर एक बुध्द से भी ऊँचा है।" ऐसा सुनकर, औरों को इस पर विश्वास नहीं होता था। वास्तव में जो उन्होंने कहा वह बिल्कुल भी अविश्वसनीय नहीं था, क्योंकि मानव जगत में व्यक्ति के गोंग को वास्तव में साधना द्वारा बहुत ऊँचे स्तर तक बढ़ाना चाहिए।

यह इस प्रकार कैसे हो सकता है : वे एक बुध्द से भी ऊँचा स्तर प्राप्त कर लें? इसे इतने सतही रूप से नहीं समझा जा सकता। उस व्यक्ति का गोंग वास्तव में बहुत ऊँचे स्तर पर होता है। यह इसलिए क्योंकि जब उसकी साधना एक बहुत ऊँचे स्तर पर पहुंचती है और पूर्ण ज्ञानप्राप्ति के क्षण पर, उसका गोंग स्तर वास्तव में बहुत ऊँचा होगा। पूर्ण ज्ञानप्राप्ति से कुछ क्षण पूर्व, उसके गोंग का दस में से आठवां भाग उसके नैतिकगुण के आदर्श के साथ कम कर दिया जायेगा, और यह शक्ति उसके दिव्यलोक को सुदृढ़ करने के लिए प्रयोग की जायेगी- जो उसका अपना दिव्यलोक होगा। हर कोई जानता है कि इस नैतिकगुण आदर्श के अलावा, एक अभ्यासी का गोंग जीवनभर की अनेकों परेशानियों को सहने और कठिन वातावरणों से गुजर कर साधना द्वारा प्राप्त होता है। यह इसलिए अत्यन्त मूल्यवान होता है। इस मूल्यवान पदार्थ का दस में से आठवां भाग उसके दिव्यलोक को सुदृढ़ करने के लिए प्रयोग किया जाता है। इसलिए, जब वह भविष्य में साधना में सफल होता है, वह केवल अपना हाथ बढ़ाकर कुछ भी प्राप्त कर लेगा जो वह चाहेगा, और उसके पास वह सब कुछ होगा जिसकी उसे इच्छा है। वह जो चाहे कर सकता है, और उसके दिव्यलोक में सब कुछ होता है। यह उसका महान गुण है जो उसके दु:खों को सहने से साधना द्वारा प्राप्त हुआ है।

इस व्यक्ति की शक्ति इच्छानुसार किसी भी वस्तु में रूपांतरित की जा सकती है। इसलिए, यदि कोई बुध्द कुछ चाहता है, कुछ खाना चाहता है, या किसी के साथ खेलना चाहता है, तो वह ऐसा कर सकता है। वे उसके साधना की उपलब्धि से आते हैं, जो उसकी बुध्द पदवी (फोवी) है। इसके बिना, व्यक्ति साधना में सफल नहीं हो सकता। इस समय इसे उसका अपना दिव्यलोक कहा जा सकता है। इस व्यक्ति के पास साधना को पूर्ण करने के लिए और ताओ की प्राप्ति के लिए अपने गोंग का केवल दस में से दूसरा भाग शेष रहेगा। यद्यपि उसका केवल दस में से दूसरा भाग शेष बचा है, उसका शरीर बंधित नहीं है। वह या तो अपना शरीर त्याग सकता है या रख सकता है, किन्तु यह शरीर पहले से ही उच्च शक्ति पदार्थ से रूपांतरित हो चुका होता है। इस समय, वह अपनी महान दिव्य शक्तियों का प्रयोग कर सकता है, जो अद्वितीय रूप से महान होती हैं। किन्तु जब कोई व्यक्ति साधारण लोगों के बीच साधना करता है, वह बिना किसी महान सिध्दियों के, अक्सर बंधित रहता है। उसका गोंग स्तर कितना भी ऊँचा क्यों न हो, तब भी वह बंधित रहता है। अब यह भिन्न है।


1 आह क्यू — चीनी साहित्य में एक मूर्ख पात्र
2 ताइयुआन — शांक्सी राज्य की राजधानी।
3 च्येनमन — बीजिंग का एक प्रमुख व्यावसायिक क्षेत्र
4 हान — इसमें चीन के मध्य के क्षेत्र सम्मिलित हैं।
5 मो दिंग — कुछ चीगोंग गुरुओं द्वारा शक्ति देने के लिए व्यक्ति के सिर के ऊपर छूना।
6 त्येन — शक्ति क्षेत्र
7 हवेयिन — पेरिनियम के मध्य में स्थित एक्यूपंक्चर बिंदु।
8 तानजोंग बिंदु — छाती के मध्य में स्थित एक्यूपंक्चर बिंदु।
9 यूजन बिंदु — सिर के पीछे निचले भाग में स्थित एक्यूपंक्चर बिंदु।
10 मिंगमेन बिंदु — "जीवन का द्वार," पीठ के पिछले भाग के मध्य में स्थित एक्यूपंक्चर बिंदु।